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Wednesday, March 26, 2014

IT IS NOW TIME TO ACT UPON..............

APPEAL TO THE ACADEMY OF LETTERS (SAHITYA AKADEMI)
NEW DELHI.
On behalf of the members of the World of Children's Literature Group I appeal to the Governing Body of the Sahitya Akademi, New Delhi to note the following points for consideration:
1. To strengthen the relationship of children with good reads, the Academy should increase its budget for publication of quality children books in all genres and enrich its library with a special section devoted to children books in all indian languages with more impetus on Hindi which is our National language.
2. The eminent children writers be encouraged to undertake the project of writing History of children's literature in all indian languages with all out support by Sahitya Akademi.
3. More and More events are supposed to be organised on national/international level to discuss and promote Indian Children Literature and if possible, a bimonthly journal may also be planned to be published by S.A. in due course which carry important articles on creative as well as critical children's literature.
4. Translation of world's modern/contemporary children literature into Indian languages and vice-versa needs to given importance with immediate effect because as of now the children's literature is getting international focus and being the apex literary body of the country S.A. should make its initiative in this direction .
5. Eminent children writers from all important indian languages be invited to form a body of consultants with other govt/non.govt.officials to work on the blue print of the future plans to link up the literature with children's education and their overall personality development. Because Children are the back bone of any civilised society .
With warm regards,
RAMESH TAILANG
09211688748/rtailang@gmail.com
Modrtr: FB GROUP : W.O.C.L.

Wednesday, March 5, 2014

होली की राम राम!





होली की राम राम!

केसर की , चन्दन की , रोली की राम राम!
सब नन्हें-मुन्नों को होली की राम राम!

भैया को, बिन्नू को,भौजी की राम राम!
गुझियों को मुंह लगी चिरोंजी की राम राम!
ढम्म-ढम्म ढोलक को ढोली की राम राम!

गईयों  को गाँव के गुपालों की राम राम!
नदियों को पोखर और तालों की राम-राम!
रसियों को बम-बम-बम टोली की राम राम! 

कान्हा को जमुना के कूलों की राम राम!
राधा को टेसू के फूलों की राम राम!
बाकी को प्यार भरी बोली की राम राम 
सब नन्हें-मुन्नों को होली की राम राम!

- रमेश तैलंग 
506 गौर गंगा-1, वैशाली, सेक्टर-4
गाज़ियाबाद-201012 
उत्तर प्रदेश.
मो. 9211688748
E-mail: rtailang@gmail.com 

Saturday, December 21, 2013

किताबें नहीं हैं तो यहाँ पढ़िए : कुछ नटखट शिशुगीत - रमेश तैलंग

बकरी


में..में..बकरी मटक-मटक.
चली तो रस्ता गई भटक .
ब..ब..बचाओ! गले से उसके..
बोली निकली अटक-अटक..

******

घोडा

टिक-टिक-घोडा टिम्मक-टिम.
चलता डिम्मक-डिम्मक-डिम.
जिसने छोड़ी ज़रा लगाम.
धरती पर आ गिरा धडाम.

********



कबूतर

उड़ा कबूतर ऊपर-ऊपर
कित्ते ऊपर? इत्ते ऊपर!
नीचे कब तक आएगा?
उड़कर जब थक जाएगा!

*********

मुट्ठी

एक अँगूठा, उँगली चार
मिल जाएँ पंजा तैयार
पंजा बंद तो बन गई   मुठ्ठी
कर देगी अब सबकी छुट्टी.


- रमेश तैलंग  
+91 9211688748 

Tuesday, December 10, 2013

सुनो कहानी - मनोहर चमोली 'मनु' से



अगली बार जरूर आना

मनोहर चमोली ‘मनु’


अनुभव चिल्लाया-‘‘मम्मी! यहाँ आओ। देखो न, ये नई चिडि़या हमारे घर में घुस आई है। इसकी पूँछ दो मुँह वाली है।’’
अमिता दौड़कर आई। खुशी से बोली-‘‘अरे! ये तो अबाबील है। प्रवासी पक्षी। दूर देश से आई है। ये हमेशा यहाँ नहीं रहेगी। कुछ महीनों बाद ये वापिस अपने वतन चली जाएगी।’’
अनुभव सोचने लगा-‘‘इसका मतलब ये विदेशी चिडि़या है। भारत में घूमने आई है। मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूँगा।’’
अबाबील का जोड़ा मेहनती था। दोनों ने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने घर की बैठक वाले कमरे का एक कोना चुन लिया था। छत के तिकोने पर दोनों ने मिलकर घोंसला बना लिया।
अमिता ने अनुभव से कहा-‘‘अबाबील ने कितना सुंदर घोंसला बनाया है। अब हम इन्हें झुनका और झुनकी कहेंगे।’’
अनुभव ने पूछा-‘‘मम्मी। ये अपनी चोंच में क्या ला रहे हैं?’’

pic.credit: google

अमिता ने बताया-‘‘झुनकी अंडे देगी। घोंसला भीतर से नरम और गरम रहेगा। इसके लिए झुनका-झुनकी घास-फूस के तिनके, पंख और मुलायम रेशे ढूँढ-खोज कर ला रहे हैं।’’ यह कहकर अमिता रसोई में चली गई।
अनुभव ने मेज सरकाया। उस पर स्टूल रखा। स्टूल पर चढ़ कर अनुभव ने छतरी की नोक से झुनका-झुनकी का घोंसला तोड़ दिया। झुनका-झुनकी चिल्लाने लगीं। कमरे के चारों ओर मँडराने लगीं।
‘‘अनुभव। ये तुमने अच्छा नहीं किया। चलो हटो यहाँ से।’’ अमिता दौड़कर रसोई से आई और टूटा हुआ घोंसला देखकर अनुभव से बोली।
विदेशी चिडि़या की वजह से मुझे डाँट पड़ी है। अनुभव यही सोच रहा था।
शाम हुई तो अमिता ने अनुभव को चाय-नाश्ता देते हुए कहा-‘‘झुनका-झुनकी फिर से अपना घोंसला उसी जगह पर बना रहे हैं। घास-फूस और गीली मिट्टी चोंच में ला-लाकर वह अपना घोंसला बनाते हैं। तिनका-तिनका जोड़ते हैं। देखो। बेचारे दोबारा मेहनत कर रहे हैं। सिर्फ तुम्हारी वजह से। शुक्र है कि वे हमारा घर छोड़कर कहीं ओर नहीं गये।’’ यह सुनकर अनुभव चुप रहा। फिर मन ही मन में सोचने लगा-‘‘मैं झुनका-झुनकी को किसी भी सूरत में यहाँ नहीं रहने दूँगा। मैं इनका घोंसला बनने ही नहीं दूँगा।’’
झुनका-झुनकी ने बिना थके-रुके दो दिन की मशक्कत के बाद घोंसला तैयार कर लिया। अनुभव अपने दोस्त से गुलेल माँग कर ले आया। उसने गुलेल स्टोररूम में छिपा दी। झुनका-झुनकी दिन भर चहचहाते। फुर्र से उड़ते हुए बाहर निकलते। बैठक के दो-तीन चक्कर लगाते। फिर एक-एक कर घोंसले के अंदर घुस जाते।
एक दिन अमिता ने अनुभव को बताया-‘‘लगता है झुनकी ने अंडे दे दिये हैं। देखो। झुनका चोंच में कीड़े-मकोड़े पकड़ कर ला रहा है। कीट-पतंगे और केंचुए इनका प्रिय भोजन है। पंद्रह-बीस दिनों के बाद घोंसले से बच्चों की चीं-चीं की आवाजें सुनाई देने लगेंगी।’’
अनुभव सोचने लगा-‘‘मेरा निशाना पक्का है। बस एक बार गुलेल चलाने का मौका मिल जाए। मैं घोंसला अंडों समेत नीचे गिरा दूँगा।’’
फिर एक दिन घोंसले से बच्चों की चींचीं की आवाजें आने लगीं। अनुभव दौड़कर आया। घोंसले से आ रही आवाजों को सुनने लगा।
‘‘अब कुछ ही दिनों में बच्चे घोंसले से बाहर निकल आएँगे।’’ अमिता ने अनुभव से कहा। अनुभव मन ही मन बुदबुदाया-‘‘कुछ भी हो। आज रात को मैं घोंसला तोड़ कर ही दम लूँगा।’’
रात हुई। अनुभव चुपचाप उठा। स्टोररूम से गुलेल निकाल कर वह घोंसले के नजदीक जा पहुँचा। वह अभी निशाना साध ही रहा था कि झुनका-झुनकी चींचीं करते हुए अनुभव पर झपट पड़े। अनुभव के हाथ से गुलेल छिटक कर सोफे के पीछे जा गिरी। अनुभव उछलकर सोफे पर जा चढ़ा।
‘‘अनुभव बच कर रहना। देखो सोफे के सामने कितना बड़ा बिच्छू है।’’ अंकिता खटका सुनकर बैठक वाले कमरे में आ चुकी थी। दूसरे ही क्षण झुनका-झुनकी ने बिच्छू को चोंच मार-मार कर जख्मी कर दिया। झुनका बिच्छू को चोंच में उठा कर घोंसले में ले गया। अनुभव डर के मारे काँप रहा था।
अमिता ने कहा-‘‘ अनुभव तुम बाल-बाल बच गए। वह बिच्छू तो खतरनाक था। अब तक झुनका-झुनकी के बच्चे बिच्छू को अपना भोजन बना चुके होंगे। यदि बिच्छू कहीं छिप जाता तो बड़ी मुश्किल हो जाती।’’ अनुभव ने राहत की साँस ली।
दिन गुजरते गए। अनुभव स्कूल आते-जाते घोंसले पर नज़र जरूर डालता। अब वह बैठक वाले कमरे में ही पढ़ाई करता। एक शाम अमिता ने कहा-‘‘अनुभव। मैं बाजार जा रही हूँ।’’
अनुभव को इसी पल का इंतजार था। वह दौड़कर गुलेल ले आया। घोंसला निशाने पर था। इस बार उसका निशाना चूका नहीं। घोंसला भर-भराकर नीचे आ गिरा। ढेर में मिट्टी, पँख, घास-फूस के अलावा कुछ नहीं था। अमिता देर शाम घर लौटी और सीधे रसोई में खाना बनाने चली गई। खाना खाकर सब सो गए।
सुबह हुई। अमिता ने उठकर बैठक की सफाई की। अनुभव उठा तो वह डरता हुआ बैठक के कमरे में जा पहुँचा। अमिता ने कहा-‘‘अनुभव बेटा। झुनका-झुनकी का घोंसला न जाने कैसे टूट गया।’’
अनुभव ने कहा-‘‘ मम्मी लगता है कि वे अपने बच्चों समेत अपने देश वापिस लौट गए।’’
अमिता उदास हो गई। अनुभव से बोली-‘‘हाँ। लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि तुम झुनका-झुनकी के बच्चों को देख नहीं पाए। तुम्हारे स्कूल जाने के बाद और तुम्हारे स्कूल आने से पहले वे सब बैठक में यहाँ-वहाँ खूब उड़ते थे। कई बार रसोई में भी आ जाते थे। लेकिन जब भी तुम घर में होते, तो वे बच्चे घोंसले में ही रहते। पता नहीं क्यों? लगता है वे तुमसे बेकार में डरते ही रहे।’’
यह सुनकर अनुभव को हैरानी हुई। कुछ ही देर में उसे महसूस होने लगा कि घर सूना-सूना सा लग रहा है। वह मुस्कराया और मन ही मन कहने लगा-‘‘साॅरी झुनका-झुनकी। अगली बार फिर आना और हमारे घर ही आना। मैं इंतजार करुँगा।’’
अनुभव चुपचाप स्टोररूम में गया। गुलेल एक कोने में पड़ी थी।
‘‘ये सब इस गुलेल की वजह से हुआ है।’’ यह सोचते हुए अनुभव ने गुलेल उठाई और उसे दोस्त को वापिस करने के लिए घर से निकल पड़ा।

Thursday, August 8, 2013

फ़िल्मी बातें - आज शुक्रवार है

इस शुक्रवार देखिये एनसीईआरटी के शिक्षा प्रौद्योगिकी केन्‍द्र द्वारा  यूनिसेफ और यूनेस्‍को की मदद से बनाई गई यह शिक्षा प्रद लघुफिल्म -'किशन का उड़नखटोला'. इसे फेसबुक के माध्यम से सुझाया है मेरे प्रिय मित्र एवं अजीमप्रेमजी फाउन्डेशन में संपादक के रूप में कार्यरत राजेश उत्साही ने. link hai: -

http://teachersofindia.org/hi/video/%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%89%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%A8%E0%A4%96%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%BE#.UgMXkmm0560.facebook



(abhaar : teachers of india.org)






Thursday, July 25, 2013

फ़िल्मी बातें -आज शुक्रवार है

एक थे जॉन चाचा



बीती शताब्दी के छठे दशक में एक ऐसी यादगार फिल्म प्रदर्शित हुई जिसने  सड़क पर भीख मांगते बच्चों को आत्म सम्मान से जीने का रास्ता दिखाया और श्रम के महत्त्व का एक शाश्वत सन्देश दिया. यह फिल्म थी  बूट पॉलिश
शंकर -जयकिशन का कर्णप्रिय सदाबहार संगीत, और अपने समय के श्रेष्ठ बाल कलाकार बेबी नाज़ और मास्टर रतन  के साथ मंजे हुए अभिनेता डेविड की बेहतरीन कलाकारी ने दर्शकों का मन मोह लिया.. इस फिल्म के गीत और संगीत  जितने लोकप्रिय हुए उनसे कहीं अधिक मशहूर हुआ डेविड का जॉन चाचा वाला अद्भुत चरित्र. जो बच्चों को इस तरह भाया कि आज भी उनकी स्मृति से उसे मिटाया नहीं जा सकता.


डेविड ने इस फिल्म में एक ऐसे लंगड़े व्यक्ति की भूमिका अदा की ,जो पियक्कड़  और जेबकतरा होते हुए भी  बच्चों के प्रति प्रगाढ़ स्नेह रखता है.  बाल कलाकार  नाज़ और मास्टर रतन ने  क्रमशः बेलू और भोला नाम से दो ऐसे अनाथ बाल चरित्रों को परदे पर जिया जिनके माता-पिता  हैजा से मरते वक्त उन्हें  कमला नाम की स्त्री  के दरवाजे पर छोड़ जाते है और जो उनसे  सड़क पर भीख मांगने का धंधा कराती है. जब इन दो बच्चों की मुलाक़ात जॉन चाचा से  होती है तो वे उन्हें भीख मांगने की बजाय  बूट पॉलिश करने और श्रम के ज़रिये  आत्म सम्मान से जीने की प्रेरणा देते है. 
याद कीजिये ये प्रेरणास्पद गीत

नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है,
मुट्ठी में है तकदीर हमारी.......
.....
जॉन चाचा तुम कितने अच्छे
तुम्हे प्यार करते सब बच्चे....

बूट पॉलिश फिल्म को  कान्स फिल्म समारोह के लिए नामांकित किया गया जिसमें   दोनों बाल कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय की विशेष सराहना की गई.
जॉन चाचा  की भूमिका के लिए डेविड को फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता पुरस्कार दिया गया. अपने लगभग चालीस साले के फ़िल्मी करिएर में  डेविड ने एक सौ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया पर उनकी सहृदय चाचा वाली छवि ही दर्शकों को सदा लुभाती रही.




नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है'  के अलावा, डेविड पर फिल्माया गया एक और गीत लपक-झपक तू आ रे बदरवा  जो मन्नाडे की आवाज में था भी बेहद लोकप्रिय हुआ (http://www.youtube.com/results?search_query=lapak+jhapak+tu+aa+re+badarwa&oq=lapak&gs_l=youtube.1.0.0l6j0i10j0l3.1495.2017.0.7753.5.2.0.0.0.0.1145.1919.6-1j1.2.0...0.0...1ac.1.11.youtube.W1_W8B6q64M)

बूट पॉलिश. फिल्म के निर्देशक के रूप में हालांकि औपचारिक रूप से प्रकाश अरोड़ा का नाम क्रेडिट लाइन में गया  पर अब यह तथ्य सर्व विदित है कि इसका असली निर्देशन स्व. राज कपूर ने ही किया और फिल्म को व्यावसायिक रूप से एक नया जीवन दिया.
डेविड का पूरा नाम डेविड अब्राहम श्युलकर था. वे यहूदी थे. उनका जन्म 1909 में हुआ और 71 वर्ष की आयु में २८ दिसंबर, 1981 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए. डेविड की चमकती हुई  खल्वाट, छोटा कद, मुस्कराता चेहरा, सुतवां नाक, और बड़ी-बड़ी आँखें आज भी उनके प्रशंसकों  को भुलाए नहीं भूलती.
कहा तो ये जाता है कि उन्होंने गंजों का एक  क्लब भी बनाया हुआ था  . सच कुछ भी हो पर उनके आकर्षक व्यक्तित्व और हाजिर जवाबी के किस्से कईयों की स्मृति में आज भी जिंदा होंगे.. डेविड बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे, वाशिंगटन में बसी उनकी पौत्री एन.रयूबेन के शब्दों में वे (डेविड) भारतीय फिल्मों के बॉब होप थे. यही नहीं डेविड  अनेक राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय समारोह, जिनमें पहला फिल्मफेयर सम्मान समारोह भी शामिल है, के सूत्रधार और अंतर-राष्ट्रीय कुश्ती के रेफरी भी रहे. पर जहाँ तक बच्चों का सवाल है, उनके लिए वे जॉन चाचा थे, जॉन चाचा हैं, और जॉन चाचा ही रहेंगे
-         रमेश तैलंग

सन्दर्भ सामग्री सौजन्य
http://www.washingtonpost.com/lifestyle/style/shalom-bollywood-reveals-indian-cinemas-surprising-stars-of-its-golden-age/2013/04/18/d043967c-a833-11e2-b029-8fb7e977ef71_story.html      


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