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Tuesday, December 6, 2011

बड़ दादा और नीम नानी

-हरिकृष्ण तैलंग

स्कूल के अहाते में बड़ और नीम के दो वृक्ष लगे हैं. बड़ का वृक्ष काफी पुराना है. बूढा चपरासी मंगलू कहता है कि जब वह इसी स्कूल की दूसरी कक्षा में पढता था तो बड़ का वृक्ष छोटा सा था. लेकिन अब तो वह काफी फ़ैल गया है. उसके तने खूब मोटे हो गए हैं और मंगलू को सफ़ेद लटकती दाढी के सामान शाखाओं में से जताएं लटक पड़ी हैं. नीम का वृक्ष है तो पुराना, परन्तु इसे मंगलू ने स्वयं उस समय लगाया था, जब उसने अपनी नौकरी शुरू की थी.

मंगलू को सभी बच्चे उसकी सफ़ेद दाढी के कारण दादा कहकर पुकारते हैं. बड वृक्ष के साठ भी इसीलिये दादा शब्द जुड गया है. जब बड दादा कहलाने लगा तो नीम का भी कुछ नाम होना चाहिए, यही सोच बच्चे उसे नीम नानी कहा करते थे.

बड़ दादा और नीम नानी बच्चों को बड़े प्यारे हैं. इनकी छाया में छुट्टी के समय सभी बच्चे खेला करते हैं. पी.टी भी इन्हीं की छाया में होती है और कभी-कभी कक्षाएं भी वहां लगे जाती हैं. बड़ दादा और नीम नानी भी बच्चों को हँसते-खेलते देखते हैं तो उनकी शाखाएं खुशी से हिलने लगती हैं. पट्टे सर-सर करते हुए झूमने लगते हैं और उनसे ऐसे अच्छी हवा के झोंके आते हैं कि बच्चों का मन उमंग से भर उठता है.

एक बार इन दोनों वृक्षों पर एक बड़ा संकट आ पड़ा. उनकी जान तक जाने की नौबत आ गई. बात यह हुई कि एक दिन शाम को जब चारों ओर सुनसान था, बड़ दादा नीम नानी से बोले-'नीम, तुझे बच्चे बेकार में नानी कहते हैं. नानी तो स्वभाव से बड़ी मीठी होती हैं, परन्तु तू तो बड़ी कड़वी हैं.'

नीम ने उत्तर दिया -'हां, दादा, हूं तो मैं कड़वी, पर तब भी बच्चों को बड़ा प्यार करती हूं. मुझे यदि बच्चे खा लें, तो उन्हें कोई नुक्सान नहीं होते. मेरा हर अंग - छल, पट्टे, फल आदी चर्म रोग और घावों को अच्छा करने के लिए काम आता है. पर तुम तो नाम के ही बड़े हो, बच्चों के किसी काम के नहीं. 'नाम बड़े और दर्शन थोड़े' यह कहावत तुम पर बिलकुल ठीक बैठती है.

नीम नानी की यह बात सुनकर बड दादा क्रोध से भड़क उठे. बोले -'अरी नीम, तू बढ़ चढ़ कर मत बोल. छोटे मुंह बड़ी बात. सारा शरीर तो तेरा कड़वा है, फिर ज़बान तेरी कैसे मीठी हो सकती है? तू मेरा महत्त्व क्या जाने? मेरे दूध और फलों के गुण वैद्य ही जानते हैं. मेरे पट्टे हाथी जैसे बड़े प्राणी का भी पे भर देते हैं, पर तू तो बकरी के भी काम की नहीं. मैं वृक्षों का राजा हूं. मनुष्य मुझे बड़ा पवित्र मानते हैं. स्त्रियां सौभाग्य की रक्षा के लिए मेरी पूजा करती हैं. मेरी जाति के वृक्ष अश्वत्थ के नीचे शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्त कर भगवान बुद्ध बने थे. इसलिए बोधि वृक्ष के रूप में संसार भर के बौद्ध उसकी पूजा करते हैं. ज्ञानदाता होने के कारण मुझे हर स्कूल में लगा होना चाहिए. परन्तु, निकम्मी नीम, तेरा स्थान तो बच्चों से दूर ही होना चाहिए, ताकि वे तेरे कड़वेपन से प्रभावित न् हो सकें.'

नीम नानी ने भी भन्नाकर वैसा हि जवाब दिया -'अरे बूढ़े बड़, तो क्यों इतना बड़बड़ा रहा है? ढोल की आवाज तेज जरूर होती है, पर उतनी ही कर्कश भी होती है. मैं छोटी और कड़वी भले ही हूं, पर यदि मैं अपने गुणों का वर्णन करने बैठूं तो उन्हें सुन तेरा दिमाग चक्र जाएगा. सुना है मोटों का दिमाग भी मोटा होता है. जिसका तू साक्षात प्रमाण मालूम होता है. यदि तू ज्ञानी होता, तो तुझे मेरी उस प्रशंसा का ज्ञान अवश्य होता, जो आयुर्वेद के ग्रंथों में भरी पड़ी है. परन्तु तो अकाल का कोल्हू है, कोल्हू. तेरी संगत में तो बच्चों की भी बुद्धि खराब होने का खतरा है. कल से उन्हें सचेत करना पड़ेगा ताकि तेरी छाया उन पर न् पड़ सके.'

इस तरह बड़ दादा और नीम नानी सारी रात आपस में तू-तू मैं-मैं करते रहे और तभी चुप हुए जब सुबह हुई.

स्कूल का समय हुआ, तो बच्चे आने लगे. घंटी बजने में कुछ देर थी इसलिए वे खेलने लगे. कुछ बच्चे बड के नीचे खेलने लगे और कुछ नीम के नीचे. बड़ के नीचे खेलने वालों ने कबड्डी जमाई और नीम के नीचे खेलने वालों ने आँख मिचौनी. आँख पर पट्टी बांधे हुए लड़के ने जब एक कबड्डी वाले लड़के को पकड़ लिया तो दोनों में तकरार हो गई. अपने-अपने साथी का साठ देने अन्य लड़के भी आ पहुंचे. बात बढ़ गई और दोनों ओर से मारपीट होने लगी.

इतने में ही घंटी बज उठी. झगडा उस समय तो बंद हो गया लेकिन दोनों ओर के लड़कों के मन में गाँठ पड़ गई. परिणाम यह हुआ कि लड़की दो दलों में बाँट गए. एक दल 'बड़दल' कहलाने लगा और दूसरा 'नीम दल'. अब यदि बड़ दल वाला कोई लड़का नीम के नीचे पाया जाता, तो नीम दल वाले उसकी मरम्मत कर देते. उसी तरह बड़ दल के लड़के करते.

पिटने वाले लड़के शिकायतें लेकर हेड मास्टर साहब के पास पहुंचते. रोज ही शिकायतें होने लगीं. झगड़े निबटाते-निबटाते हेड मास्टर साहब परेशान हो गए. एक दिन झुंझलाकर उन्होंने निश्चय किया कि दोनों वृक्षों को कटवा दिया जावे. न् रहेगा बांस न् बजेगी बांसुरी. उन्होंने मंगलू को बुलाकर बधाई लगवा कर वृक्षों को कटवा देने का आदेश दे दिया.

मंगलू ने यह आदेश सुना, तो उसे बड़ा दुःख हुआ. जिन वृक्षों से उसे अत्यधिक लगाव था, जिनकी छाया में उसके जीवन के अनेक वर्ष कटे थे. वे अब काटने वाले हैं, यह सोचकर उसका मुंह लटक गया. वह दोनों वृक्षों के पास आया. बारी-बारी से वह दोनों वृक्षों के तने चूमता और उन्हें सहलाता. उसकी आंखें दबदबा आई थीं.

लड़कों ने उस ऐसा करते देखा तो इसका कारण पूछा. मंगलू ने हेड मास्टर साहब का आदेश उन्हें बता दिया और कहा कि यह सब लड़कों को आपसी लड़ाई के कारण ही हो रहा है.

मंगलू से यह जानकर कि अब वे काटने वाले हैं. बड दादा और नीम नानी के देवता कूच कर गए. कितना बड़ा धोका खाया उन्होंने. मन ही मन वे सोचने लगे - यह मुसीवत खुद उन्होंने ही तो मोल ली है. न् वे आपस में झगड़ते, न् बच्चों के मन में झगडने की भावना पैदा होती. अब क्या करें, जिससे उनका जीवन बच सके.

रात हुई तो दोनों ने सलाह की. वे अपनी करनी पर खूब पछताए. उन्होंने निश्चय किया कि यदि अबकी बार उनका जीवन बच जाए तो वे आपस में कभी भी न् झाग्देंगे और न् बच्चों को बह्कायेंगे. बच्चे अपनी इच्छा से जिसकी छाया में चाहे खेलें उन्हें कोई शिकायत न् होगी. ऐसा तय करके दोनों वृक्ष सबेरे का इंतज़ार करने लगे.

जब लड़के स्कूल आए तो उन्होंने देखा कि बढई बड़ी-बड़ी कुल्हाडियां और आरे लिए वृक्षों के नीचे बैठे हैं. वे हेड मास्टर साहब का इंतज़ार कर रहे थे. लड़कों को यह भी पता चला कि मंगलू दादा ने आज की छुट्टी ले राखी है क्योंकि वह अपनी आँखों से अपने प्यारे वृक्षों को कटते हुए नहीं देखना चाहता.

बहुत से लड़के कल से ही वृक्षों का कटना सुनकर बुरा महसूस कर रहे थे. वे यह समझ गए थे कि उन्ही के झगडों की वजह से हेडमास्टर साहब ने वृक्षों को काटने का आदेश दिया है. अब भी मौका है वृक्षों को कटने से बचाने का. यह सोचकर दोनों दलों के समझदार लड़कों ने आपस में मेल कर लेने का फैसला कर लिया. अन्य लड़के भी इसके लिए राजी हो गए. दलों को भंग कर दिया गया और वे अपना निश्चय सुनाने के लिए हेडमास्टर साहब के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे.

इतने में ही हेडमास्टर साहब आते हुए दिखे. सब लड़के मिलकर उनके सामने पहुंचे. उन्होंने अपना निश्चय सुनाते हुए प्रार्थना की कि वृक्षों को कटवाया न् जावे, क्योंकि अब वे कभी नहीं झगड़ेंगे.

हेडमास्टर साहब बड़े अच्छे थ. उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक उनकी बात मान ली और बढ़ई लोगों को विदा कर दिया.

दूसरे दिन मंगलू जब स्कूल आया तो उसने दोनों वृक्षों को जैसे का तैसा खड़ा पाया. बच्चे उनके नीचे हँसते हुए उछल कूद रहे थे. उसका चेहरा दमक उठा. मारे खुशी के वह भी बच्चों में शामिल होकर दोनों वृक्षों के चकार लगाने लगा. बड़ दादा और नीम नानी भी प्रसन्नता से लहरा उठे. उनकी शाखाएं झूम उठीं.

Monday, December 5, 2011

फिसलन : भगवती प्रसाद द्विवेदी की किशोर कहानी

एक किशोर वय वाले विद्यार्थी के मन में अपनी अध्यापिका के प्रति जन्मे यौनाकर्षण
(infatuation) को शालीनता से उकेरती आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी की यह अनूठी कहानी हिंदी की बेहतरीन किशोर कहानियों में से एक है :

फिसलन
- भगवती प्रसाद द्विवेदी (मोबा: ०९४३०६००९५८)

दिनेश के रहन-सहन, चाल-ढाल में अचानक हो रहे परिवर्तन से विद्यालय के सभी लोग दंग हैं.
होस्टल के लड़के आजकल उसकी तरफ घूर-घूरकर देखने लगे हैं. सचमुच, तब और अब के दिनेश में कोई तुलना ही नहीं है.

निपट देहात से प्रायमरी स्कूल की शिक्षा लेकर दिनेश छठी कक्षा में प्रवेश के लिए इस शहर में आया था. उसके लटियाए धूल-धूसरित बालों, लंबी चुटिया और देहाती कपड़ों को देखकर स्कूल के नए सहपाठी उसे चिढा-चिढकर मज़ा लेने लगे थे. मगर पता नहीं, वह शख्स किस मिटटी का बना था कि लाख चिढ़ाने के बावजूद वह मंद-मंद मुस्करा रहा होता था. पहले नाम लिखाकर कुछ दिनों सहमा-सहमा सा दिखा था जरूर, मगर जल्दी ही वह सबसे घुल-मिलकर बतियाने लगा था. अब दोस्तों के उपहास का पात्र बनकर भी वह चिढता नहीं था, बल्कि अपने-आप पर ही ठहाके लगाने लगता था. उसके रहन-सहन में भी कोई खास बदलाव नहीं आया. आखिरकार संगी-साथी भी उसे अब उसी रूप में देखने के आदी हो गए.विद्यालय की छमाही परीक्षा में जब देहाती से दिखने वाले दिनेश ने तमाम विषयों में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए तो सबकी आंखें फटी-की फटी रह गई. फिर तो अध्यापक, सहपाठी सबकी आँखों का तारा बन गया वह.

छठी से नौवीं कक्षा तक दिनेश ने देहाती रहन-सहन, वेशभूषा और कक्षा में अव्वल आने का रिकार्ड कायम रखा. होस्टल से स्कूल और स्कूल से होस्टल, यही उसकी दिनचर्या होती थी.
सभी घंटियों को मनोयोग से अटेंड करना, नियमित नोट्स तैयार करना और रात में जमकर पढ़ाई करना ही उसकी ड्यूटी थी.

मगर दसवीं कक्षा में आते ही दिनेश में एकाएक बदलाव नज़र आने लगा. विद्यालय में एक नई
अध्यापकी की नियुक्ति हुई थी और वे दसवीं कक्षा में हिंदी पढाने आने लगी थीं. पूरे विद्यालय में शशि मैडम इकलौती महिला थीं. पहले दिन आकर उन्होंने सभी छात्रों से एक-एक कर परिचय पूछा. जब दिनेश की बारी आई तो उसकी अजीबोगरीब हुलिया देखकर वे अपने को रोक न सकी थीं और खिलखिलाकर हंस पड़ी थीं. दिनेश ने उस दिन पहली बार स्वय्स्म को अपमानित महसूस किया था.

छुट्टी की घंटी बजते ही दिनेश सीधे सैलून में गया था और चुटिया कटवाकर बेतरतीव बालों को उसने व्यवस्थित करवाया था. अगले माह जब घर से मनी-आर्डर आया तो दिनेश ने अपने लिए नए कपड़े बनवाए थे. दातुन की बजाय टूथब्रश से दांत साफ़ करने लगा था. साथियों की देखा-देखी उसने बाज़ार से शैम्पू और टेलकम पाउडर भी खरीद लिए हैं. सभी लोग अब अचरज से दिनेश की ओर देखते. उसे खुद भी अपने इस बदलाव पर आश्चर्य हो रहा था.

शशि मैडम को इस बात की अब बखूबी जानकारी मिल चुकी थी कि दिनेश अपनी कक्षा में सबसे होनहार और मेधावी छात्र है. उसकी भोली-भोली सूरत भी उन्हें बड़ी प्यारी लगती. जब दिनेश कक्षा में पिछली सीट पर बैठा हुआ रोता, तो मैडम उसे आगे की बेंच पर बुला लेतीं. कक्षा में पूछे गए प्रश्नों का जब वह संतोषजनक उत्तर देता, तो वे उसे शाबाशी देतीं. कभी पीठ थपथपा देतीं, तो कभी माथा सहला देतीं. दिनेश उस वक्त अजीब अनुभूति से भर उठता था.

सिर्फ वेशभूषा और रहन-सहन में ही नहीं, बल्कि और भी कई तरह के बदलाव दिनेश में आने लगे. अब वह पढ़ाई की अपेक्षा शशि मैडम में ही अधिक रूचि लेने लगा. कभी शशि मैडम उसे स्वर्ग की किसी अप्सरा-सी लगतीं, तो कभी किसी राजकुमारी-सी. उसका शर्मीलापन न जाने कहां उड़न-छू हो गया था. गाहे-बगाहे शशि मैडम की तरफ वह गौर से देखा करता. जब वे ब्लैकबोर्ड पर शब्दार्थ आदी लिख रही होतीं, अथवा कोई पाठ पढाने में मशगूल होतीं तो वह उनके चेहरा और खुले अंगों की ओर चोर निगाहों से देखा करता था. इस बात पर मैडम ने भी गौर किया था, पर शायद खुले स्वभाव की होने के कारण वे हंसकर टालती रही थीं.
दिनेश मैडम के घर का पता भी जान चुका था. एक रोज वे शाम को जब रिक्शे से घर जाने लगीं, तो उसने पीछे से एक रिक्शे से उनका पीछा किया था और घर के पास पहुंचकर ही दम लिया था. फिर तो जब भी उसके पास खाली समय होता, वह फटाफट मैडम के घर की ओर ही भागता और गली के पास वाली उनके कमरे की खिड़की से झांककर उन्हें देखा करता था. कभी मैडम अपने कमरे में लेटकर पैर हिलाते हुए किताब पढ़ रही होतीं, तो कभी नहा-धोकर बाल सुखा रही होतीं. अलग-अलग समय में वह मैडम को अलग-अलग रूपों में पाता था.

अब विद्यालय में चपरासियों, टीचरों या सहपाठियों के बीच जहां भी शशि मैडम की चर्चा हो रही होती, भनक मिलते ही दिनेश तत्काल वहां जा पहुँचता और कान खड़े कर सब-कुछ सुनने लगता था. उसे यह जानकारी भी बखूबी मिल चुकी थी कि शादी के कुछ साल बाद मैडम ने अपने पति को तलाक दे दिया था और अब मां-बाप के यहां ही रह रही थीं. दिनेश बार-बार चिंतातुर होकर सोचता कि शशि मैडम ने फिर दूसरी शादी क्यों नहीं की. आखिर क्यों दे दिया उन्होंने अपने पति को तलाक.

छमाही परीक्षा में जब दिनेश को बहुत ही कम अंक प्राप्त हुए, तो तभे लोग अवाक रह गए. दिनेश जैसे होनहार छात्र से किसी को भी ऐसे आशा नहीं थी. शशि मैडम ने भी अंदाज लगाया कि जिस बात को वे बहुत ही हल्के रूप में ले रही थीं, वह तो अब गंभीर रूप धारण कर चुकी है. मन-ही-मन उन्होंने कुछ निश्चय किया और अगला रविवार का छुट्टी का दिन दिनेश के साथ ही गुजारने के लिए उसे अपने घर बुलाया.

उस रोज रात में दिनेश को नींद नहीं आई, पूरी रात वह मैडम के बारे में ही सोचता रहा. उनकी खूबसूरती, उनकी मुस्कराहट, उनकी भाव-भंगिमाएं बार-बार उसकी आँखों के सामने आती रहीं और वह उन्हीं में खोया रहा. फिर उसने मन-ही-मन कुछ अंतिम फैसला भी कर लिया. अपनी कक्षा में पढ़ाई के मामले पिछड़ते जाने का उसे जरा भी अफ़सोस नहीं हुआ.

अगले दिन सज-धजकर वह समय से पहले ही मैडम के घर जा पहुंचा. शशि मैडम ने उसे बड़े प्यार से अपने कमरे में बिठाया.मैडम अभी कुछ कहने ही वाली थीं कि दिनेश अधीरता से बोला. 'मैडम! मैंने अंतिम फैसला कर लिया है. घर-परिवार की मुझे जरा भी चिंता नहीं है. मुझे तो बस आपकी इज़ाज़त चाहिए.'
'मेरी इज़ाज़त? कैसे फैसला?' मैडम ने अचरज से पूछा.
"मैं आपसे शादी करना चाहता हूं, मैडम!' दिनेश ने हकलाते हकलाते हुए कहा.
'शादी और मुझसे?' शशि मैडम ने ठहाका लगाते हुए कहा, 'जानते हो, मेरा बेटा तुमसे कहीं ढाई-तीन साल बड़ा ही होगा. मेरी उम्र तुम्हारी उम्र से दुगुनी से भी अधिक होगी. तुम्हें देखकर मैं यही सोचा करती थी कि मेरा बेटा भी अब इतना बड़ा हो गया होगा. मैं तो तुम्हें अपने पुत्र की तरह ही प्यार करती गई. और कोई बेटा, क्या अपनी मां से ही शादी करने की बात कभी सोचता है?'

दिनेश को काटो तो खून नहीं! यह क्या किया उसने! छिः, मां के साथ शादी का प्रस्ताव?
'हाथ जुड़ते हुए उसने बस इतना कहा, 'मैडम! मैंने आपको पहचानने में भूल की. मैं बहुत ही शर्मिंदा हूं. मुझे क्षमा करो, मां! वाकई भटक गया था मैं.'

'यह उम्र ही भटकाव की है, बेटे!' शशि मैडम ने समझाया, 'अभी तुम्हारी उम्र न् तो शादी की है और न ही इस विषय में उल-ज़लूल सोचने की. अभी तो तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य होना चाहिये - कड़ी मेहनत से परीक्षा में अधिक-से-अधिक अंग प्राप्त करने का और उत्तरोत्तर अपनी प्रतिभा को विकसित करने का. जब भविष्य में तुम ऊँची शिक्षा ग्रहण कर आत्मनिर्भर बन जाना, तब फिर शादी की बात सोचना, समझे.'
दिनेश को मैडम से आज बहुत बड़ी सीख मिल गई थी. जब वह होस्टल लौटने की इज़ाज़त लेकर आँगन से होकर गुजरने लगा, तो हडबड़ी में नल के पास फिसलते-फिसलते बचा. शशि मैडम ने पास आकार फिर समझाया, 'देखो बेटे, जीवें में कदम-कदम पर फिसलन-ही-फिसलन है. इसलिए हर व्यक्ति को संभल-संभलकर कदम बढ़ाना चाहिए.'

दिनेश को लगा शशि मैडम ने आज उसे जीवन की बहुत बड़ी फिसलन से उबार लिया, वर्ना वह फिसलते-फिसलते न जाने कहाँ से कहाँ चला जाता.

(स्रोत: मेरी प्रिय बाल कहानियाँ-भगवती प्रसाद द्विवेदी/मदन बुक हाउस/दिल्ली-५१, मूल्य: २९५/= रूपये )

Sunday, November 20, 2011

अगस्त्य मुनि -अमृतलाल नागर

शिखरस्थ कथाकार अमृतलाल नागर की एक बाल रचना जो मिथकीय साहित्य को ऐतिहासिक दृष्टि से देखने का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है:



अगस्त्य मुनि

हिंदू पुराणों में अगस्त्यजी का नाम बहुत बार आता है. दक्षिण भारत में इन्हें कूटमुनि भी कहा जाता है. इन्हीं कूटमुनि अथवा अगस्त्यजी के साथ हमारी एक दक्षिण भारतीय भाषा का भी घना संबंध माना जाता है. कहते हैं कि अगस्त्य मुनि ने ही तमिल भाषा की पहली व्याकरण बनायी.
इन अगस्त्य ऋषि की एक कथा आमतौर से बहुत प्रसिद्ध है. कहते हैं कि एक बार विन्ध्याचल पर्वत इतना ऊंचा उठ गया कि सूर्य देवता के आने-जाने के मार्ग में बाधा पड़ने लगी. तब देवों को बड़ी चिंता हुई. उन्होंने विन्ध्याचल के गुरु अगस्त्य मुनि से प्रार्थना की कि महाराज आप ही कोई उपाय सुझा सकते हैं. अगस्त्य मुनि ने विचार किया और देवों से कहा कि आप निश्चिन्त हो जाइए. मैंने उपाय सोच लिया है. यह कहकर अगस्त्य मुनि विन्च्याचल की ओर चल दिए.
गुरु को आया जानकर विन्ध्याचल ने सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा कि गुरूजी, मेरे लिए आपकी क्या आज्ञा है?'
गुरूजी ने कहा-'हे शिष्य जब तक मैं लौटकर न आऊँ, तब तक तू यों ही झुका रह.' यह कहकर अगस्त्य मुनि विन्ध्याचल के पास दक्षिण भारत में चले गए.
इस कथा में किसी पहाड़ के इंसानी गुरु का अविश्वसनीय करिश्मा जुडा देखकर अक्सर लोग इसके महत्त्व पर ध्यान नहीं देते हैं. हमारे पुराण की कथा के अनुसार राजा सगर का महायज्ञ हिमालय और विन्ध्याचल के बीच की भूमि पर हुआ था. इसका अर्थ हुआ कि तब तक आर्य लोग विन्ध्याचल के पार न जा सके थे. अगस्त्य मुनि अलबेले घुमंतू थे. उन्होंने इसी विन्ध्याचल में कहीं से दक्षिण में जाने के लिए एक खिड़की खोल ली. अगस्त्य मुनि के संबंध में दक्षिण भारत में कई कथाएं प्रचलित हैं और इसका ज़िक्र ऋग्वेद के ऋषियों में भी आता है.
दक्षिण भारत से समुद्र पार हिंद-चींन और इंडोनेशिया तक घूम-घूमकर सभ्यता का प्रचार करने वाले इन अलबेले ऋषि के पुरखे अगस्त्य प्रथम मैत्रा वरुण नामक देव कबीले के थे. उनकी माता उर्वशी थी. इस तरह वह वशिष्ठ के भाई थे. उनका विवाह लोपामुद्रा नाम की एक विदुषी महिला से हुआ था, जो स्वयं भी ऋषि थी. लोपामुद्रा के पति अगस्त्य ऋषि और विन्ध्याचल पार करके दक्षिण जाने वाले अगस्त्य मुनि एक कुल के होने पर भी दो अलग-अलग ज़मानों में पैदा हुए थे. बहरहाल, जो अगस्त्य मुनि दक्षिण भारत और ठेठ-चींन , इंडोनेशिया तक पूज्य हैं. वे भी ईसा से कई सौ वर्ष पहले ही हुए होंगे.
एक तमिल कहानी के हिसाब से अगस्त्यजी महाराष्ट्र के कोंकण वाले क्षेत्र से होकर समुद्र के द्वारा कुर्ग पहुंचे थे. इस कुर्ग देश में कुडग जाति के लोग रहते थे और एक नदी का उद्गम-स्थान भी वहीं था. यह नदी बाद में कावेरी के नाम से प्रसिद्ध हुई. वहां के तमिल या द्रविड़ राजा कुबेर ने अगस्त्य के सामान विद्वान को अपने यहाँ आया जानकर उन्हें सादर बुलवाया और उनसे बातें की. राजा कुबेर अगस्त्यजी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने पहले तो उन्हें अपना मंत्री बनाया और बाद में अपनी बेटी कावेरी का विवाह भी उन्ही के साथ कर दिया.
उन दिनों चोल राज्य में कोई भी नदी न होने से सारा क्षेत्र सिंचाई के बिना सूखा पड़ा था. चोल राजा ने जब सुना कि कुबेर के जमाई और मंत्री बड़े हुनरमंद हैं, तब उसने कुबेर राजा की मार्फ़त उनसे प्राथना की. उसने अगस्त्य से कहा कि किसी उपाय से एक नदी आप हमारे देश में भी बहा दीजिए तो हमारा बड़ा कल्याण हो. अगस्त्य मुनि ने उसकी बात पर गहरा विचार किया और सब नदियों की शक्ति पहचान कर उन्होंने कावेरी नदी की धारा को, जो अरब सागर में गिरती थी, पूर्व की ओर एक नहर निकालकर बढ़ा दिया. इस तरह कावेरी नदी चोल देश में बहती हुई बंगाल की खाडी में गिरने लगी. सारी भूमि हरी-भरी हो उठी. जन-जन अगस्त्यजी की महिमा गाने लगा. लोगों ने अगस्त्य का इतना उपकार माना कि इस नदी का नामकरण उनकी परम प्रिय पत्नी के नाम पर ही किया. अगस्त्य ऋषि ने तमिल भाषा का संस्कार किया. वहां की संस्कृति को कई तरह से उन्नत किया और फिर अपने भ्रमण के हौसले से वे समुद्र पार कर हिंद-चींन और इंडोनेशिया तक गए. इंडोनेशिया में अगस्त्यजी को शिव का अवतार, एक महान गुरु और भगवान बुद्ध के बराबर माना जाता है. धन्य हैं वे जन, जिन्होंने दूर-दूर तक मानव सभ्यता को सुसंस्कार देने के लिए उस पुराने ज़माने में समुद्री यात्राएं की, जब कि ऐसा करना भय से खाली नहीं था. अगस्त्य मुनि ने निर्भीक होकर यात्राएं कीं और सभ्यता की आवाज़ दूर देशों तक पहुंचाई.
इसी प्रकार चिड़ियों जैसे निरीह प्राणियों की संतानों को उबारने के लिए अगस्त्य मुनि सचमुच ही समुद्र को सोख गए थे.

(-सम्पूर्ण बाल रचनाएं: अमृतलाल नागर से साभार)

Wednesday, November 9, 2011

किस्सा बनो बुआ का

किस्सा बनो बुआ का
-रमेश तैलंग



बनो बुआ की गप्प मंडली और खिलखिलाती हंसी दोनो ही सारे मोहल्ले में मशहूर थीं। उनके मोती जैसे दांत जब चमकते ता बिजली सी कौंध जाती आंखों के आगे। पर हाय री किस्मत! एक दिन उनका पैर सीढ़ी से क्या फिसला, चारों खाने चित्त हो कर पड़ गईं बनो बुआ। दायीं टांग और कमर में तो चोट आयी ही, आगे के चार दांत टूट कर गिर गए सो अलग।
अब असली दांत टूट गए तो या तो नकली दांत लगवाती बनो बुआ या फिर इस तीस साल की उम्र में छोटे-बड़ों से ‘बोंगी बुआ’, ‘बोंगी बुआ’ कहलवाती खुद को।
सोच में डूबी बनो बुआ कुछ फैसला नहीं कर पा रही थीं कि सलमा चाची ने उनके दिल के घावों को और हरा कर दिया। बोलीं- ‘ हाय बनो! तुम्हारी तो चांद सी सूरत ही बिगड़ गई। सुना है अब नकली दांत लगबाओगी तुम! मेरी मानो तो ये मसाले के दांत मती लगवाना, पता नहीं मरे क्या गंद-संद मिलावे हैं मसाले में। वो क्या कहें, आजकल तो सोने के दांत भी बन जावे हैं, वही लगवाना। दमक उठेगा ये मुखड़ा।’
सलमा चाची की बात बनो बुआ के कलेजे में सीधी उतर गई। उन्होंने निश्चय कर लिया कि लगवाऊंगी तो सोने के दांत ही लगवाऊंगी। बस, घर में जो थोड़ा-बहुत सोना था लगा दिया ठिकाने और बनवा लिये सोने के दांत।
कुछ दिन ही बीते थे कि सलमा चाची ने फिर एक उल्टा पांसा फेंक दिया। बोलीं-‘अरी बनो! ये क्या सुबह-शाम खीं ..खीं ..कर हंसती रहे है। सोने के दांत हैं, सबकी नजर में आते हैं। किसी दिन किसी चोर उचक्के की नीयत बिगड़ गई देख कर तो सीधा टेंटुआ दबा देगा। मैं कहूं हूं जरा मुंह बंद रखा कर अपना।’
सलमा चाची की बात सुन कर बनो बुआ के बदन में काटो तो खून नहीं। ये तो और मुसीबत मोल ले ली सोने के दांत लगवा कर। अब मोहल्ले की औरतें, बच्चे हंसी-ठठ्ठा करेंगे तो बनो बुआ क्या मुंह पर ताला लगा कर बैठेगी? हंसी के मौके पर हंसी तो आयेगी ही, हंसी आयेगी तो मुंह खुलेगा ही और मुंह खुलेगा तो सोने के दांत भी चमकेंगे चम-चम। पर किसी की नीयत सच में खराब हो गई तो? किसी ने सचमुच लालच में आकर गला दबा दिया तो। इन सवालों ने बनो बुआ की हंसी-खुशी सब छीन ली।
बनो बुआ को गुस्सा आता सलमा चाची पर। आखिर उन्ही के कहने पर तो लगवाये थे सोने के दांत। अब वो ही बातों-बातों में जान-माल का खतरा जता गईं।
पशोपेश में फंसी बनो बुआ एक दिन आईने के सामने बैठी थीं कि खुद को देख कर हैरान रह गईं। चेहरे पर आधा बुढ़ापा झलक आया था कुछ ही दिनों में। जब हंसी ही चली गई रूठ कर तो बनो बुआ की जवानी किसके बल पर ठहरती?
बस........बैठे-बैठे ही बनो बुआ को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक झटके से अपने मुंह में फंसे सोने के दांत निकाल लिए और कमरे में पड़ी पेटियों के पीछे फेंक कर खुद से ही बोली- ‘ ले बनो! खत्म हुआ ये बबाल। अब खूब हंसा कर।
खिल-खिल...खिल।
बनो बुआ की गप्प मंडली, जिसमें अब सलमा चाची को छोड़ कर मोहल्ले की लगभग सभी औरतें और बच्चे हाते, फिर पहले की तरह जुड़ने लगीं। खूब चुहलबाजियां होतीें, मजाब होते और बनो बुआ जी खोल कर हंसतीं। बनो बुआ का बोंगा मुंह देख कर बच्चे भी खुश होते और बार-बार कहते- ‘बनो बुआ! और हंसो! बेंगी बुआ, और हंसो!’ बच्चों के साथ बनो बुआ हंसती ही चली जाती, खिल...खिल...खिल...खिल!


चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

Wednesday, November 2, 2011

आज पढ़िए डॉ हेमंत कुमार का जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित यह लेख

आज के जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित मेरे लेख का विषय हैं बेटियां,परिवार और उनके साथ होने वाला भेदभाव्। आप इसे इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं।---http://jansandeshtimes.com/images/lucknow_03_11_2011_page11.jpg

Sunday, September 25, 2011

सूर्य जैसे आसमान से..........





तीर जिस तरह कमान से निकलता है, निकलो.
सूर्य जैसे आसमान से निकलता है, निकलो.

लोगों को पता चले कि अब जगार हो गई
और सहने की हरेक हद भी पार हो गई
मेरे बच्चो! देर न करो, पुकार हो गई
आज की सुबह समझ लो यादगार हो गई
शब्द जैसे स्वाभिमान से निकलता है, निकलो.
सूर्य जैसे आसमान से निकलता है, निकलो.

ठूंठ हो गए जो पेड़ उनको भूल कर अभी
कर भरोसा अपने ही जवान खून पर अभी
बढ़ना होगा आगे रथ की डोरियों को थामने
मेरे बच्चो, अब चुनौतिया खड़ी हैं सामने
वीर जैसी आन-बान से निकलता है निकलो.
सूर्य जैसे आसमान से निकलता है, निकलो.


- रमेश तैलंग : 26-9-2011


चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

Thursday, September 15, 2011

मेरी कुछ नयी बाल/किशोर कवितायें

खींच लो जुबान उसकी

आस-पास नज़र रखो
लोगों की खबर रखो
कौन अजनबी कहां घात है लगा रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा.

छोड़कर निशानियां
फूट की. जो आए दिन,
गढ़ रहे कहानियां
झूठ की जो आए दिन,
उनका चिटठा खोलो,
क्या है सच्चा, बोलो,

खींच लो जुबान उसकी जो है बरगला रहा.
सावधान. वक्त आज तुमको जगा रहा.

पथ है अनजाना तो
कुछ डर भी होंगे ही,
हर सवाल के लेकिन
उत्तर भी होंगे ही,

जिन्हें तुम्हे पाना है,
हौसला बनाना है,
कन्धों पर भार तुम्हारे है अब आ रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा!

*****

जूते की पुकार


फट गया हूं मैं तले से,
कट गया हूं मैं गले से,
लद गया मेरा जमाना,
हो गया हूं अब पुराना,
आ पड़ी है जान पर. रुकने लगे सब काम मेरे.
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

एक बूढ़े दादा जी हैं,
छोड़ते मुझको नहीं हैं,
थक गया हूं रोज कहकर,
चल रहा हूं बस घिसटकर,
व्यर्थ ही, लगता, गए सब मिन्नतें, 'परनाम' मेरे.
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

ऑपरेशन की जरूरत,
है यही बचने की सूरत,
देर कर दी और थोड़ी,
जान जायेगी निगोडी,
वो कबाड़ी भी न देगा चार पैसे दाम मेरे.
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

*****

ताले दिखवा लो.


जंग लगे हों, बंद पड़े हों,
या होकर बदरंग पड़े हों
सबका है इलाज सस्ते में, एक बार करवा लो.
तालों का डाक्टर आया है, ताले दिखवा लो.

मुन्नू ने खो दी है चाबी
चिंता क्यों करते हो?
मार-मार, हर बार, हथोडी
हिंसा क्यों करते हो?
एक अगर खोने का डर है दो चाबी बनवा लो.
तालों का डाक्टर आया है, ताले दिखवा लो.

नया खरीदोगे तो ज्यादा
पैसे खर्च करोगे,
और बिना ताले के, चोरों-
से किस तरह बचोगे?
समझदार को एक इशारा काफी है, घर वालो!
तालों का डाक्टर आया है, ताले दिखवा लो.

*****

सम्मान बड़ों का


कठपुतली की तरह नाचता रहूँ अगर मैं
तो सब खुश हैं.
और नहीं नाचूं तो है अपमान बड़ों का.

समझ नहीं आता, ये कैसे नियम-दायरे
जिनके अंदर मुझे बांधना चाह रहे हैं,
अनदेखा कर मेरी इच्छाएं, घर वाले
मनमानी हर रोज लादना चाह रहे हैं.

जैसे मेरा अपना कुछ सम्मान नहीं है
जो कुछ है बस
पूरे घर में, तो केवल सम्मान बड़ों का.

धीरे से है अगर बोलना तो मैं बोलूँ,
बड़े भले कितना चिल्लाएं मेरे ऊपर,
मैं विनम्रता में ही झुका रहूँ चरणों में,
वे कितनी ही सजा सुनाएँ मेरे ऊपर,

अहंकार के वाक्-युद्ध में ह्रदय हमारा
आहत करके
क्या पा जाएगा बोलो ज्ञान बड़ों का.

*****

एक नया किशोर गीत

यह किशोरावस्था मुझमें
रंग कितने भर रही है.

आ रहे हैं कुछ नये बदलाव मुझमें,
जग रहे हैं कामना के भाव मुझमें,
एक बेचैनी-सी मुझमें
आज नर्तन कर रही है.

हो गया है स्वर अचानक आज भारी,
और एक हल्की, गुलाबी-सी खुमारी
लग रहा है धीरे-धीरे
देह में पग धर रही है.

सच कहूँ तो हां, बहुत हैरान हूं मैं,
इस नए बदलाव से अनजान हूं मैं,
एक खुशी आने को है,
आते हुए, पर, डर रही है.

******


माँ समझती क्यों नहीं है?

अब नहीं मैं दूध पीता एक बच्चा
माँ समझती क्यों नहीं है?

चाहता हूं, मैं बिताऊं वक्त ज्यादा
दोस्तों के बीच जा कर,
चाहता हूं, मैं रखूँ दो-चार बातें
सिर्फ अपने तक छुपाकर,

पर मेरे आगे से डर की श्याम छाया
दूर हटती क्यों नहीं है ?

छोड़ आया हूं कभी का बचपना, जो
सिर्फ जिद्दी, मनचला था,
हो गया है अब बड़ा सपना कभी जो
थाम कर उंगली चला था,

पर बड़ों की टोका-टोकी वाली आदत
क्यों, बदलती क्यों नहीं है?

-रमेश तैलंग

Thursday, August 18, 2011

बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का 300वां अंक

बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का आगामी 300वां अंक पत्रिका के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण अंक होगा. इस पत्रिका के बारे में श्री प्रेम पाल शर्मा का एक जानकारीयुक्त आलेख लेखकमंच.कॉम से साभार यहां प्रस्तुत है:

बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की चकमक : प्रेमपाल शर्मा




बाल पत्रिका ‘चकमक’ का तीन सौवां अंक प्रकाशन की तैयारी में है। पत्रिका के शुरुआती वर्षों से लेकर आज तक की यात्रा पर कथाकार प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

सितम्बर, 2011 का अंक बाल विज्ञान पत्रिका ‘चकमक’ का तीन सौवां अंक होगा। पच्चीस साल की अनवरत यात्रा। जुलाई, 1985 में ‘चकमक’ का पहला अंक आया था। शिक्षा में नवाचार के लिए मशहूर एकलव्य संस्थान से। संपादक : विनोद रायना। मेरी स्मृतियों में ‘चकमक’ अपने शुरुआती अंकों से बसी हुई है। शाम को मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर में नियमित जाना होता था और पहली बार ‘चकमक’ वहीं देखी और उसके बाद आज तक इसे देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता। जितना खूबसूरत नाम उतनी ही खूबसूरत साज-सज्जा और सामग्री। निश्चित रूप से वक्त के साथ इसमें भी बदलाव आया है। स्मृति का सहारा लूँ तो शुरू की ‘चकमक’ अपेक्षाकृत छोटे बच्चों के लिए थी यानि पाँचवीं-छठी तक के बच्चों के लिए। मेरा लगातार ‘चकमक’ की तरफ झुकाव उन दिनों इसलिए भी था कि मेरे बच्चे उसी उम्र में प्रवेश कर रहे थे। उसमें छपे चित्र, कहानियाँ, रोचक घटनाएं- कभी रेल की, कभी पृथ्वी की, कभी सूरज की जितना उन्हें आकर्षित करतीं उतनी ही मुझे। मेरे गाँव के बचपन में ऐसी कोई पत्रिका नहीं थी। कभी-कभी ‘चंदामामा’ की याद थोड़ी बहुत जरूर आती है। बहुत सादा कागज पर ‘चकमक’ के अनेक नियमित स्तम्‍भ आकर्षित करते थे जैसे- माथापच्ची, माह की पहेली, सवाली राम, एक मजेदार खेल आदि। ‘पाठक लिखते हैं’ में बच्चों के पत्र उनकी अनगढ़ भाषा, बोली में भी खूब छपते थे। यानि बच्चों और शिक्षा की एक मुकम्मिल दुनिया। बाल पत्रिकाएं तो इस बीच और भी छप रही हैं लेकिन ‘चकमक’ जैसी बाल मनोविज्ञान और शिक्षा दोनों को एक साथ साधने वाली पत्रिका शायद ही कोई हो।

चकमक में जो चीज पच्चीस वर्षों में लगातार कायम रही है वह है बच्चों के अंदर बहुत चुपके से एक वैज्ञानिक दृष्टि को रोप देना। साथ ही साथ उनकी रचनात्मकता को भी आगे बढ़ाना। किसी भी रूप में। चित्र, खेल, विज्ञान के प्रयोग, छोटी कहानियाँ, पत्र यानि कि जो कुछ उनकी जिन्दगी में सहज घटता है। ‘चकमक’ की यह आत्मा पहले संपादक विनोद रायना से लेकर मौजूदा संपादक सुशील शुक्ल और शशि सबलोक ने यथावत रखी है । बाजार के दबाव, चिकने पेपर पर आकर्षित चित्रों की मांग को देखते हुए पिछले सात-आठ सालों में ‘चकमक’ ने नये प्रयोगों को भी बखूबी निभाया है। निश्चित रूप से पुराने कथा कॉलम कम हुए हैं तो कुछ नये जुड़े भी हैं। मौजूदा ‘चकमक’ थोड़े और बड़े यानि कि आठवीं क्लास तक के बच्चों की जरूरतों को भी पूरा करती है।



‘चकमक’ का हर अंक बेहद खूबसूरत साजसज्जा के साथ सामने आता है दिलीप चिंचालकर जैसे वरिष्ठ चित्रकार और कनक आदि के सहयोग से। हाल ही में प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को श्रद्धांजलि देते हुए जुलाई, 2011 अंक में उन पर बहुत सुन्दर सामग्री दी गई है। इतना खूबसूरत कवर हुसैन की पैंटिग्‍स पर शायद ही किसी पत्रिका ने निकाला हो। बच्चों की दुनिया में चित्रकार के जीवन को कैसे ले जाया जाए इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए सुशील शुक्ल का लेख ‘एक चित्रकार था’ अद्वितीय कहा जा सकता है- ‘एक देश था। नहीं। एक चित्रकार था। वह घूमता रहता। गलियों में निकल जाता तो गलियों के साथ-साथ चलता चला जाता। नंगे पाँव चलने से गलियाँ उसके पाँव में लगती रहती।’ इतने बड़े चित्रकार की जीवनी ऐसी ही आत्मीयता और रचनात्मक भाषा में लिखी जा सकती है। इसी अंक में ‘हुसैन की कहानी अपनी जुबानी’ के भी कुछ अंश दिये हुए हैं। याद आ रहा है ऐसे ही एक अंक में कथाकार स्वयंप्रकाश द्वारा लिखा हुआ लेख- ‘जब गांधी जी की घड़ी चोरी चली गई।’ वाइस राय के साथ गांधी जी के छपे चित्रों के साथ इस कहानी को शुरू करते ही आप अधूरा नहीं छोड़ सकते । स्वयंप्रकाश पिछले दिनों से लगातार ‘चकमक’ में लिख रहे हैं। उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का बच्चों पर लिखा उपन्यास इसमें धारावाहिक रूप से छपा है और अब पुस्तक रूप में उपलब्ध है। नाटककार असगर वजाहत भी लगातार पिछले दिनों से हाजिर हैं। हिन्दी के जाने-माने कवि राजेश जोशी, देवी प्रसाद मिश्र, तेजी ग्रोवर, प्रभात से लेकर पुराने दिग्‍गज सहादत हसन मंटो, हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, संजीव लगातार इधर के अंकों में उपस्थित हैं। यानि कि नये रूप में पूरी पीढ़ी का रुख अपनी भाषा की ओर मोड़ती एक अनोखी पत्रिका।

यहाँ एक और अंक की याद आ रही है जिसमें हेलेन केलर के जीवन के कुछ अंश दिये गये थे। हेलन केलर प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका हैं जो दुर्भाग्‍य से डेढ़ वर्ष की उम्र में ही तेज बुखार से बहरी और अंधी हो गई थीं। उनकी शिक्षिका एनी सुलिवन की सूझबूझ और मेहनत ने उनको नया जीवन दान दिया। हेलेन केलर का यह कथन भूले नहीं भूलता कि हर स्वस्थ आँख वाले व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि यदि तीन दिन उसको दिखाई न दे तो कैसा लगेगा। ऐसी सैंकड़ों प्रेरणास्‍पद कहानियाँ ‘चकमक’ के अंकों में आ रही हैं। विज्ञान लेखक और ‘स्रोत’ के संपादक सुशील जोशी के लेखों के लिए भी य‍ह पत्रिका मेरी स्मृतियों में बसी हुई हैं। न्यूटन से लेकर बड़ी से बड़ी वैज्ञानिक घटनाओं, खोजों पर सुशील जोशी के लेख किस बच्चे में वैज्ञानिक बनने की जुंबिश पैदा नहीं कर देगें?

‘चकमक’ के तीन सौवें अंक पर बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच के लिए समर्पित समस्त एकलव्य परिवार को हार्दिक बधाई।

चकमक- बाल मासिक पत्रिका
संपादक : सुशील शुक्ल, शशि सबलोक
एक प्रति : 30 रुपये, सालाना व्यक्तिगत सदस्यता 300 तथा संस्थागत सदस्यता 500, आजीवन : 4000 रुपये
पता : एकलव्य,
ई-10, शंकर नगर, बीडीए कॉलोनी, शिवाजी नगर,
भोपाल, मध्य् प्रदेश-462016.
फोन नं. 0755-4252927,2550976, 2671017.
फैक्स : 0755-2551108.

Saturday, August 13, 2011

एंड्रयू लैंग की क्लासिक रचना प्रिंस प्रिजियो का हिंदी रूपांतर


एंड्रयू लैंग -परिचय


३१ मार्च, १८४४ को सेल्किर्क में जन्मे. एडिनबरो, ग्लास्स्गो और आक्सफोर्ड में शिक्षा पाई. पत्रकार, कवि, इतिहासकार, जीवनी लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रियता लोक कथाओं के संकलन तैयार करने से मिली. विश्व की प्रसिद्ध लोककथाओं का पहला संकलन "ब्ल्यू फेयरी टेल बुक" शीर्षक से सन १८८९ में क्रिसमस के अवसर पर प्रकाशित हुआ. पुस्तक बहुत पसंद की गई. फिर तो हर वर्ष इसी अवसर पर लैंग लोककथाओं का नया संग्रह प्रस्तुत करते गए और इस श्रंखला पर लैंग लोककथाओं का नया संग्रह प्रस्तुत करते गए और इस श्रंखला में उनकी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हुईं. इनके अतिरिक्त यूनान और रोम की लोककथाओं पर एक संग्रह अलग से पुस्तक रूप में आया. आलोचक लैंग को दुनिया में लोककथाओं के सबसे बड़े संग्रहकर्ता के रूप में मानते हैं. यहाँ हम उनके प्रसिद्ध बाल उपन्यास "प्रिंस प्रिजियो" का संक्षिप्त कथा-सार दे रहे हैं. यह उपन्यास सन १८८९ में छपा था.

एंड्रयू लैंग का निधन २० जुलाई, १९१२ को हुआ था.

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प्रिंस प्रिजियो


पंटोफिला की रानी ने बेटे को जन्म दिया तो वह उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी. क्योंकि विवाह के अनेक वर्ष बीत जाने के बाद ही राज्य के उत्तराधिकारी ने जन्म लिया था. उन दिनों भी आज की तरह परियां आकाश में रहती थीं, लेकिन किसी के बुलाने पर वे झट धरती पर उतर आया करती थीं. कोई प्रश्न कर सकता है कि तब आज परियां धरती पर उस तरह क्यों नहीं आतीं. हम उन्हें देख क्यों नहीं पाते?

इसका उत्तर है उन दिनों लोग आम तौर पर परियों को सच मानते थे, इसलिए वे धरती के लोगों से निकट संबंध बनाए रखती थीं. अगर आज हम उन्हें नहीं देख पाते तो इसलिए कि ज्यादातर लोग परियों को कपोल कल्पना मानते हैं. इसलिए परियां भी हमसे दूर-दूर रहती हैं. वैसे वे आज भी रोज धरती पर उतरती हैं दुखियों की सहायता के लिए, लेकिन यह सब वे अदृश्य रहकर करती हैं.

पंटोफिला के राजा की दादी थी सिंड्रेला. उसकी कहानी हम सभी जानते हैं. सिंड्रेला परी की मदद से ही रानी बन सकी थी. राजा परियों को सच मानता था इसलिए परियां भी उसके बुलाने पर आ जाती थीं. लेकिन रानी परियों को कल्पना मानती थी. इसलिए जब राजा ने बेटे के नामकरण समारोह में परियों को निमंत्रण देने की बात कही तो रानी झट बोली-"यह क्या मनगढंत बातें कर रहे हैं आप. परियां अगर होती भी हैं तो किस्से-कहानियों में."

राजा जानता था रानी से बहस करना बेकार है. वह चुप रह गया. उसने चुपचाप परियों को निमंत्रण भेज दिया. परीलोक से परियां नवजात शिशु के लिए तरह-तरह के जादुई उपहार लेकर आईं . राजा ने परियों का स्वागत किया. लेकिन रानी ने तो जैसे परियों को देखकर भी नहीं देखा. परियों ने उपहार मेज पर रख दिए और चुपचाप चली गईं. रानी की इस उपेक्षा से एक परी नाराज हो गई. उसने राजा से कहा-"तुम्हारा बेटा दुनिया में सबसे ज्यादा चतुर होगा." राजा सोचता रह गया - परी ने उसके बेटे को वरदान दिया है या शाप."

परियों के जाने के बाद रानी ने उपहार देखे तो भुनभुना उठी - मेज पर रखा था एक छोटा सा बटुआ - उसमे तीन सिक्के थे, एक जोड़ी जूते, दो छोटी-छोटी टोपियां, जादुई जल से भरा एक पात्र और एक छोटा सा गलीचा. देखने में ये सभी चीजें अत्यंत साधारण लगीं रानी को. दूसरी तरफ बाहरी विशाल कक्ष में राजा के मंत्रियों और दरबारियों द्वारा लाए गए शानदार उपहार रखे थे. रानी ने परियों के लाये हुए उपहारों को कोने वाली कोठरी में रखवा दिया और फिर समारोह में व्यस्त हो गई.

लड़के का नाम रखा गया राजकुमार प्रिजियो. उसके बाद रानी ने दो बेटों को और जन्म दिया. उनके नामे थे अल्फांसो और एनरिको. लेकिन प्रिजियो सबसे अलग था. वह छुटपन में ही ऐसी चतुराई भरी बातें कर्ता कि लोग दांतों तले उंगली दबाए देखते रह जाते. वह हर किसी को नई-नई बातें बताता. कभी-कभी अपने पिता से ऐसे प्रश्न पूछता कि उनके लिए उत्तर देना कठिन हो जाता. धीरे-धीरे सबको महसूस होने लगा जैसे प्रिजियो उनकी हंसी उड़ाता है. और तो और उसके पिता भी यही सोचने लगे. लोग प्रिजियो के सामने बोलने से भी घबराने लगे. मंत्री और दरबारी अंदर ही अंदर उससे चिढने लगे, क्योंकि दरबारी राजा से प्रिजियो की झूठी शिकायतें बार-बार वह उनकी गलतियाँ बताकर उन्हें लज्जित करता है तो न जाने राजा बनकर वह उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा.

दुष्ट मंत्री और दरबारी राजा से प्रिजियो की शिकायतें करने लगे. वे कहते-"महाराज, हो सकता है, प्रिजियो समय से पहले ही राज्य पर अधिकार करने की कोशिश करे. आप सावधान रहें."

आखिर राजा भी सोचने लगे -"क्या प्रिजियो के स्थान पर उसके किसी छोटे भाई को युवराज बनाना चाहिए."

उन्ही दिनों एक बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई. राजधानी में एकाएक गर्मी बहुत बढ़ गई. फसलें झुलस गईं. पेड़ सूख गए, पानी ज़मीन में कहीं गहरे उतर गया. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था. पता चला, केवल राजधानी में ही नहीं सारे राज्य में गर्मी लगातार बढ़ती जा रही है. दूर-दूर से लोग सहायता मांगने राजा के पास आने लगे.

पता चला, पहाड़ों के बीच एक गहरी घाटी में एक विचित्र पक्षी उड़ता दिखाई देता है. उसकी चोंच से धुआं निकलता है, पंखों से अंगारे झरते हैं - यह आफत उसी के कारण आई है. पहाड़ पर पेड़ झुलस कर काले पड़ गए हैं. वन्य जीव व परिंदे तो कब के मर चुके हैं. ऊँचे पहाड़ों से गिरने वाला झरना सूख गया है. लोगों ने कहा -"उस अग्निपक्षी को मारने से ही प्राण बच सकते हैं." राजा ने सोचा -"अगर वह भयानक पक्षी उड़ता हुआ राजधानी के ऊपर आ गया तब ओ न जाने क्या अनर्थ हो जाएगा.

मंत्री ने राजा से कहा - "महाराज, राजकुमार प्रिजियो की चतुराई की परीक्षा लेनी चाहिए. क्यों न उसे ही अग्निपक्षी को मारने के लिए भेजा जाए." राजा ने कहा -"बुलाओ प्रिजियो को."

प्रिजियो आया . उसने पिता का आदेश सुना. कुछ सोचा, फिर बोला -"पिताजी, मैंने ऐसे अनेक कथाएं पढ़ी हैं जिनमें सबसे छोटा बेटा ही दैत्य को मारता है. क्यों न आप एनरिको को अग्निपक्षी से लड़ने के लिए भेजें. मेरा मन कहता है, अभी मुझे नहीं जाना चाहिए." वैसे भी अग्निपक्षी केवल कल्पना ही है."

राजा ने कहा -"तुम कायर हो, मैं तुम्हें राजपाट नहीं दूंगा." राजा के कहने पर एनरिको को अग्निपक्षी से युद्ध करके उसे मारने के लिए भेजा आया. एनरिको गया, लेकिन कभी लौटकर नहीं आया.

राजा फूट-फूटकर रोया. सबने कहा -प्रिजियो स्वार्थी है, कायर है. राजा ने कहा -"प्रिजियो, अब तुम्हें जाना है. पर उसने कहा -"पिताजी अल्फांसो से कही. अगर वह नहीं मार सका तब मैं जाऊंगा. मैं आपसे फिर कहता हूं, अग्निपक्षी एक कपोल कल्पना है."

राजा ने कहा -"तुम मेरे बेटे नहीं, मेरे शत्रु हो. अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता." इसके बाद राजा ने अल्फांसो को अग्निपक्षी से लड़ने भेजा, पर वह भी लौटकर नहीं आया.

राजा ने घोषणा करा दी-"प्रिजियो आज से मेरा बेटा नहीं रहा." इसके बाद राजा उस नगर को छोड़कर पास के दूसरे नगर में चले गए. उनके साथ रानी, मंत्री,दरबारी, राजधानी के सब बड़े व्यापारी और महल के नौकर चाकर, सब चले गए. राजा के आदेश पर राजमहल को पूरी तरह खाली कर दिया गया. बच गए मुठ्ठी भर साधारण जन और विशाल महल में अकेला राजकुमार प्रिजियो.

प्रिजियो ने देखा महल में न खाने को भोजन था, न पहनने को कपडे. उसके पिता ने नाराज हो कर प्रिजियो को महल में भूखों मरने को छोड दिया था. प्रिजियो विशाल राजमहल के हर कमरे में देखता फिरा, पर कहीं कुछ नहीं था. आखिर भटकता हुआ वह एक छोटी-सी अँधेरी कोठरी में पहुंचा. वहाँ उसे कुछ चीजें पड़ी मिलीं. सब पर धूल जमी थी. ये परियों के वही उपहार थे जिन्हें रानी ने उस कमरे में फेंक दिया था.

प्रिजियो ने सोच -"चलो कुछ तो मिला." वह उन चीजों को उठा-उठाकर देखने लगा. उसने जूते उठाए और पैरों में पहन लिए. एक टोपी सिर पर लगा ली. बटुवे में तीन सिक्के देखकर वह हंस पड़ा. उसकी समझ में न आया कि ये चीजें वहाँ कौन लाया होगा. प्रिजियो कमरे से बाहर निकल आया. उसे जोरों की भूख लग रही थी, लेकिन महल में तो खाने को एक दाना भी नहीं था. एक बार मन में आया कि वह नगर में चला जाए, वहां कुछ न कुछ तो मिल ही जाएगा पेट भरने के लिए. फिर सोचा-क्या यह ठीक रहेगा! क्या इस तरह उसके पिता की बदनामी नहीं होगी. लोग कहेंगे - देखो-देखो कैसा अन्यायी राजा है, जो अपने युवराज बेटे को भूखों मरने के लिए छोड़ गया है.

प्रिजियो को याद आ रहा था वः पिछले वर्ष ग्ल्कस्टिन नगर में घूमने गया था. वेश बदलकर. उसने वहाँ एक भोजनालय में स्वादिष्ट भोजन किया था, आम लोगों के बीच बैठकर. वाह, कितना मजा आया था. काश, इस समय भी कुछ वैसा ही खाने को मिल जाए तो..." वह सोच रहा था, और तभी उसने देखा, वह उसी भोजनालय के सामने खड़ा था, जिसके बारे में उसने सोचा था.

वह चकित रह गया कि वहाँ कैसे आ गया. असल में प्रिजियो के पैरों में परी लोक से आए इच्छा-जूते थे. वे पल भर में पहनने वाले को कहीं भी पहुंचा सकते थे. लेकिन प्रिजियो भला इसे क्यों मानता. अपनी मां की ऐसे बातें सुन-सुनकर ही वह बड़ा हुआ था कि जादू नहीं होता. परियां तो बस कहानियों में ही होती है इसलिए प्रिजियो भी परियों पर विश्वास नहीं करता था.

प्रिजियो बड़बड़ाया -"क्या मैं सपना देख रहा हूं." जो कुछ वह देख रहा था, उस पर प्रिजियो को विश्वास नहीं हो रहा था. लेकिन सच में तो यह परियों के उपहारों काही चमत्कार था. क्योंकि उसने जादुई जूते पहन रखे थे जो पहनने वाले को इच्छानुसर पल भर में कहीं से कहीं ले जा सकते थे.

तभी प्रिजियो नीचे झुका और जादुई टोपी उसके सिर से गिर गई. तुरंत भोजनालय में शोर मच गया - अरे देखो! हमारे बड़े राजकुमार लोग घबराते हुए राजकुमार के सामने झुकने लगे. यह देखकर राजकुमार को अजीब लगा, क्योंकि वह तो काफी देर से भोजनालय में खड़ा था. लेकिन तब किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, फिर एकाएक सिर से टोपी गिरते ही लोग उसका
नाम पुकारने लगे थे. तो क्या टोपी में कुछ जादू था? या फिर उन जूतों में जो सोचते ही उसे वहां ले आए थे?

राजकुमार प्रिजियो ने फिर से टोपी पहन ली. इसके बाद भोजनालय में मौजूद लोगों के चकित स्वर सुनाई देने लगे -"अरे, राजकुमार एकाएक कहां गायब हो गए? अभी-अभी तो वह यहीं थे. यह क्या हुआ!

राजकुमार प्रिजियो स्वयं चकित था, लेकिन वह इतनी आसानी से चमत्कार वाली बात मानने को तैयार नहीं था. उसने सोचा -"काश, मैं इस समय मां के पास होता, तो उनसे सलाह ले पाता कि यह क्या चक्कर है. शायद वह कुछ बता सकें."

लेकिन प्रिजियो जानता था कि उसकी मां नए नगर की राजमहल में मौजूद थीं, जहां उसके जाने पर रोक थी. हालांकि रानी मां अपने बेटे से बहुत प्यार करती थीं, लेकिन प्रिजियो के अजीब विचारों ने उसके पिता को बहुत ही नाराज कर दिया था.लेकिन अगले ही पल प्रिजियो ने एक कमरे में बैठी आंसू बहती अपनी मां को देखा. वह सुबकती हुई कह रही थी -"पता नहीं महल में प्रिजियो का क्या हाल होगा? काश मैं उसकी कुछ मदद कर सकती." और फिर रानी की सिसकियाँ हवा में गूंजने लगीं."

तभी प्रिजियों ने सिर से टोपी उतार ली और फिर रानी आश्चर्य से चीख उठी -"प्रिजियो, तुम कहां थे, कब आ गए! क्या तुम्हें किसी ने नहीं रोका?" और अगले ही पल मां ने बेटे को गले से लगा लिया.

तब प्रिजियो ने मां को पूरी घटनाएं कह सुनाईं उसने कहा -माँ, मैं चाहता हूं तुम इन विचित्र घटनाओं के बारे में मुझे बताओ. क्या जो कुछ घट रहा है, वह सपना है या सच?"

तब प्रिजियो की मां ने भी जादुई टोपी लगाकर शीशे में देखा तो वह स्वयं को नहीं देख पाई. उसने कई बार जादुई टोपी को उतारा और पहनकर देखा और हर बार गहरे आश्चर्य में डूब गई.

जो कुछ हो रहा था, वह विचित्र और विश्वास करने लायक नहीं था, लेकिन फिर भी वह सच था, इस बात से रानी इनकार नहीं कर सकती थी.

पूछने पर उसने प्रिजियो को उसके जन्म के बाद वाली घटना बता दी और माना कि प्रिजियो को महल की पुरानी कोठरी में जो चीजें मिली थीं, उन्हें उसने स्वयं ही कोठरी में बेकार की वस्तुएँ मानकर फेंक दिया था. और फिर उस बारे में सब कुछ भूल गई.

इसके बाद प्रिजियो अपनी मां के साथ काफी समय तक इस बारे में विचार करता रहा. आखिर रानी ने हिचकिचाते हुए कहा-"बेटा प्रिजियो, आज मुझे पहली बार लग रहा है कि शायद परियां एकदम कपोल कल्पना नहीं है. हो सकता है उनके अस्तित्व भी हो."

प्रिजियो ने कहा-"मां में भी यही सोचता हूं कि हम दुनिया के सारे रहस्यों के बारे में नहीं जानते. अन्यथा इन जादुई जूतों और अद्रश्य कर देने वाली टोपी के बारे में तुम क्या कहोगी."

रानी मां ने कहा -"बेटा, अगर यह बात सच हो तब तो अग्निपक्षी का होना भी संभव है और..." इसके बाद रानी चुप हो गई. वह अग्निपक्षी को मारने गए अपने दोनों छोटे बेटों के बारे में सोच रही थी जो अब तक लौटकर नहीं आए थे.और स्वयं प्रिजियो भी वही बात सोच रहा था-क्या मैंने जानबूझकर अपने दोनों भाइयों को मौत के मुंह में भेज दिया. आखिर क्यों? वह एकाएक बोला -"माँ, मैं अल्फांसो और एनरिको की खोज में जाना चाहता हूं.

"हां, अगर परियों के उपहार जादुई हैं तो फिर अग्निपक्षी भी सच हो सकता है." रानी ने उदास स्वर में कहा -"न जाने मेरे दोनों बेटों का क्या हाल होगा."

"माँ, मैं अग्निपक्षी की खोज में जा रहा हूं- और दोनों छोटे भाइयों की भी खोज करूँगा. मुझे आशीर्वाद दो माँ. कहकर प्रिजियो ने मां से विदा ली. उसने जादुई टोपी सिर पर लगा रखी थी और पैरों में विशेष जूते थे जो इच्छा करते ही व्यक्ति को मनचाही जगह पहुंचा सकते थे.

कुछ देर बाद राजकुमार प्रिजियो एक पहाड़ी के शिखर पर खड़ा था. नीचे घाटी भयानक अग्निकुंड बनी हुई थी. उसी अग्निकुंड के ऊपर अग्निपक्षी उड़ रहा था. उसके विशाल पंखों से अंगारे झर रहे थे, चोंच से लपटें और धुआं उठ रहा था. हवा में गरम लहरें उठ रही थीं. दूर-दूर तक हरियाली का नाम निशाँ नहीं था.

प्रिजियो समझ गया था कि अग्निपक्षी के सामने कोई टिक नहीं सकता. "तब मुझे क्या करना चाहिए?" इसी सोच में डूबा हुआ राजकुमार प्रिजियो परेशान हो उठा. वह जादुई जूतों के सहारे हवा में ऊंचा उठ गया. उसके कानों में एक विचित्र शब्द गूंज रहा था -"रमोरा-रमोरा."

"यह रमोरा कौन है, कहां है. मैं उसे देखना चाहता हूं." राजकुमार प्रिजियों ने जैसे यह खुद से कहा. और अगले ही पल वह एक ऊँचे पर्वत पर खड़ा था-वहां भयानक ठण्ड थी. सब तरफ जमीन बर्फ से ढंकी थी. गुफाओं से एक आवाज आ रही थी-"अग्निपक्षी. मैं रमोरा हूं -हिम दानव! मैं उसकी आग को जमा दूंगा, उसे समाप्त कर दूंगा.

प्रिजियो के होंठों पर एक मुस्कान आ गई. वह सोचने लगा-अगर हिम दानव रमोरा और अग्निपक्षी आपस में भिड़ जाएं तो शायद...उसने जोर से कहा-"हिम दानव रमोरा. अग्निपक्षी ने कहा है-तुम उससे डरते हो. अगर वह आ गया तो तुम पिघलकर बह जाओगे."

"आने दो अग्निपक्षी को. एक गुफा में उसकी समाधि बन जाएगी." रमोरा की आवाज आई.

"अग्निपक्षी आ रहा है. युद्ध को तैयार हो जाओ." प्रिजियो ने कहा.

"तुम कौन हो मुझे दिखाई क्यों नहीं देते?" रमोरा की ठंडी आवाज आई. जब हिम दानव बोलता तो भयानक तूफानी हवा बहने लगती थी और फिर हिमपात होने लगता.

प्रिजियो ने हिम दानव की बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह अदृश्य रहकर अग्निपक्षी वाली घाटी के ऊपर पर्वत शिखर पर जा खड़ा हुआ उसने जोर से कहा -"अग्निपक्षी सुनो! पहाड़ों के पार हिम दानव रमोरा लड़ने को तैयार है. लेकिन तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे. वह तुम्हारी ज्वालाएँ बुझाकर तुम्हे हिम में बदल देगा."

प्रिजियो की इस बात ने अग्निपक्षी को उत्तेजित कर दिया. वह आग की घाटी से ऊपर उठा, और अपने विशाल पंखों को झटकारा तो दूर-दूर तक अंगारे बिखर गए. सब तरफ धुआं फ़ैल गया. गरम हवा बहने लगी. फिर अग्निपक्षी हिम में ढंके पर्वत शिखरों की तरफ उड़ चला. आकाश से अंगारे बरस रहे थे. झुलसाने वाली तेज हवा बह रही थी.

प्रिजियो अदृश्य रहकर अग्निपक्षी और हिम दानव की लड़ाई देखने लगा-अग्निपक्षी की गर्मी से हिम दानव पिघलने लगा. पर्वत शिखरों पर जमी बर्फ पिघलकर बहने लगी. अग्निपक्षी की गर्मी से हिम दानव पिघलने लगा. पर्वत शिखरों पर जमी बर्फ पिघलकर बहने लगी. अग्निपक्षी की गर्मी से हिम दानव की देह पिघलने लगी थी.

लेकिन यह तो लड़ाई की शुरुआत थी. एकाएक हिम दानव ऊपर उछला -"आकाश में जैसे बर्फ की चादर तन गई. अग्निपक्षी के पंखों से झरते अंगारे बुझ कर काली-काली चट्टानों की तरह नीचे गिरने लगे - उसकी चोंच से निकलने वाली आग की लपटें बुझने लगीं.

"अग्निपक्षी, मरने को तैयार हो जा. अब तू अग्निपक्षी नहीं, हिम पक्षी बन जाएगा." रमोरा की आवाज गूंजी और अग्निपक्षी थककर आकाश से नीचे गिरने लगा. उसके पंखों पर हिमकन जमते जा रहे थे. तभी अग्निपक्षी ने अपने पंख झटकारे. सब तरफ अंगारों की बौछार होने लगी-उसके पंखों पर जमती बर्फ पिघलकर बूंदों के रूप में नीचे गिरने लगी. "मैं जीत गया." अग्निपक्षी ने कहा.

"नहीं, अभी नहीं..." हिम दानव ने कहा और फिर से ठंडी हवा बह चली. बर्फ का पिघलना रुक गया. जगह-जगह बर्फ दोवारा जमने लगे. ऐसा कई बार कभी लगा कि अग्निपक्षी हिम दानव

को पिघलाकर समाप्त कर देगा, तो कभी ऐसा मालूम दिया कि हिम दानव ने अग्निपक्षी को हिम पक्षी में बदल दिया.

लड़ाई चलती रही -अग्निपक्षी और हिम दानव दोनों ही थकते चले गए फिर अग्निपक्षी थककर चट्टानों पर जा गिरा.

आग का फब्बारा सा छूटा, सब तरफ अंगारे बिखरे और फिर बुझ गए. अग्निपक्षी मर गया था. लेकिन हिम दानव भी नहीं बच सका. दोनों ने एक दूसरे का काम तमाम कर दिया था. आज भी उस युद्ध के अवशेष दो पहाडियों पर मौजूद हैं. एक पहाड़ पर हिम का विशाल पक्षी बना हुआ है-वही है अग्निपक्षी जिसका शरीर बर्फ बन गया है. पास में ही एक झील है. यह पहले हिम दानव था जो अग्निपक्षी की गर्मी से पिघलकर पानी की झील में बदल गया.

अब मौसम एकाएक ठीक हो गया था-न बहुत गर्मी थी, न ज्यादा ठण्ड, अग्निपक्षी और हिम दानव रमोरा दोनों का आतंक समाप्त हो चुका था. लेकिन अभी राजकुमार प्रिजियो का असली काम पूरा नहीं हुआ था. क्योंकि अभी एनरिको और अल्फांसों को ढूँढना बाकी था. आखिर प्रिजियो के दोनों छोटे भाई कहां थे?

पहले प्रिजियो ने दोनों को हिम दानव वाले क्षेत्र में ढूँढा. वहां सब तरफ बर्फ की चादर बिछी थी. उसे कैसा भी कोई संकेत नहीं मिला और फिर वह अग्निपक्षी वाली घाटी के पास आया, जहां अब पहले जितनी भयानक गर्मी नहीं थी. घाटी में जलती आग कब की बुझ चुकी थी.

वहीँ पहाड़ी पर एक जगह उसे राख की दो ढेरियाँ पास-पास दिखाई दीं. हर ढेर के पास एक तलवार जमीन पर पड़ी थी. प्रिजियो ने तलवारें उठाईं तो उन पर एनरिको और अल्फांसो के नाम खुदे दिखाई दिए. वह समझ गया कि उसके दोनों भाई अग्निपक्षी के पास पहुंचकर राख के ढेर में बदल गए थे. अब इसमें कोई संदेह नहीं था.

प्रिजियो ने अपने थैले से जल का पात्र निकला जो उसे महल की कोठरी में मिला था. उसने जल की कुछ बूँदें बारी-बारी से राख की दोनों ढेरियों पर डाल दीं. जैसे चमत्कार हुआ. राख की ढेरियाँ गायब हो गई. वहां एनरिको और अल्फांसो खड़े नजर आने लगे. तीनों भाई गले मिले.

एनरिको और अल्फांसो के साथ प्रिजियो नए नगर में आ गया. लेकिन महल में नहीं गया. उसने अल्फांसो और एनरिको को पूरी बात बता दी. कहा - "पिताजी मुझसे नाराज हैं. मैं वहीं जा रहा हूं जहां उन्होंने मुझे अकेला छोड़ा था." फिर प्रिजियो राजधानी के सुनसान महल में चला गया. उसने जादुई टोपी और जूते उतारे और उसी कोठरी में रख दिए जहां से उन्हें उठाया था.

अब तक प्रिजियो बहुत थक चुका था. वह अपने कमरे में पलंग पर जा लेटा और गहरी नींद में डूब गया.

उधर एनरिको और अल्फांसो को जीवित लौटा देख, राजा और रानी बहुत प्रसन्न हुए. उन्हें पता चल गया कि वह चमत्कार प्रिजियो ने ही किया था. उसी क्षण राजा ने राजधानी लौटने का आदेश दिया. सबसे पहले राजा-रानी एनरिको और अल्फांसो के साथ राजधानी लौट आए.

राजा ने कमरे में प्रिजियो को सोते हुए देखा तो सिरहाने बैठकर उसके माथे पर हाथ फिराने लगा. राजा ने कहा-"प्रिजियो मेरे बेटे, मुझे माफ कर दो. रानी भी वहां खड़ी आंसू बहा रही थी."

तभी प्रिजियो की नीद टूट गई. वह हडबडाकर उठा. उसने कहा -"पिताजी, क्या बात है? आप सब यहाँ क्यों खड़े हैं? और मां क्यों रो रही है?"
राजा ने कहा -"बेटा, तुम अपने दोनों भाइयों को मौत के मुंह से लौटा लाए हो..."

सुनकर प्रिजियो जोर से हंसा. उसने कहा -"पिताजी, आप सुबह-सुबह यह क्या कहानी सुना रहे हैं मुझे?"

उन्होंने सच कहा था - उसी पल राजा-रानी, स्वयं प्रिजियो, एनरिको, अल्फांसो पुराणी सब बातें भूल गए. किसी को पिछला कुछ यद् न रहा. सब को लगा कि वे अभी भरपूर नीद लेकर उठे हैं.

लेकिन वे खुश थे. वहाँ नहीं थे. न जाने उन्हें कौन ले गया था.

पता नहीं परियां हैं या नहीं, पर उनकी कहानियां तो आज भी हम सभी कहते-सुनते हैं.

-रूपांतर प्रस्तुति : देवेन्द्र कुमार : रमेश तैलंग


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Wednesday, August 10, 2011

प्रकाश मनु का हास्य बाल नाटक -पप्पू बन गया दादा जी!

पिछली बार इस ब्लॉग पर आपने डॉक्टर प्रताप सहगल का बाल नाटक -अंकुर पढ़ा. इस बार प्रस्तुत है हिंदी के सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉक्टर प्रकाश मनु का हास्य बाल नाटक - पप्पू बन गया दादा जी!




बच्चों में बड़ों की नक़ल करने की नैसर्गिक प्रतिभा होती है और ऐसा करते हुए वे न केवल पूरे परिवार का स्वस्थ मनोरंजन करते हैं वल्कि इस माध्यम से वे अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति करने का रास्ता भी खोज लेते हैं. पर नाटक तो नाटक ही होता है, पटाक्षेप हुआ नहीं कि फिर वही ढाक के तीन पात.अच्छे बाल नाटकों का हिंदी में अभी भी काफी अभाव है और इस जेनर में जो अपना सार्थक अवदान दे रहें हैं उनमे प्रकाश मनु का नाम उल्लेखनीय है. उनके बाल नाटकों की चार पुस्तकें हाल में ही डायमंड बुक्स से प्रकाशित हो कर आई हैं. तो लीजिए, यहाँ प्रस्तुत है उनका हास्य बाल नाटक -पप्पू बन गया दादा जी!


पप्पू बन गया दादा जी!

-प्रकाश मनु




पात्र-परिचय
पप्पू की मम्मी
पप्पू के पापा
सोना दीदी
दादा जी

पहला दृश्य
(एक दिन पप्पू बैठा-बैठा पढ़ रहा था, तभी उसे कमरे के कोने में राखी दादा जी की छड़ी दिखाई दे गई)

पप्पू: (खुश होकर) अरे वाह, अब आएगा मजा. दादाजी अक्सर इस छड़ी से हम बच्चों को धमकाते हैं. आज ज़रा इस छड़ी से हम भी कुछ कमाल करें तो बन जाएगी बात.
(पप्पू दौड़ा-दौड़ा गया, झट दादा जी की छड़ी उठा लाया . फिर उसे हाथ में पकड़कर बड़े रोब से सामने वाले कमरे की आरामकुर्सी पर बैठ गया. पास में ही मेज पर रखा दादा जी का चश्मा भी उसने उठाकर पहन लिया)
पप्पू: (हवा में हाथ लहराकर) अरे वाह, मैं तो सचमुच दादा जी बन गया! एकदम दादाजी बन गया! ...क्या बात है, हा-हा-हा!
पप्पू: (थोड़ी देर बाद अपने आप से) पर भाई, अभी एक कमी है - अखबार! दादा जी को तो जब भी देखो, चश्मा लगाए अखबार पढते नज़र आते हैं. भला बगैर अखबार के मैं दादा जी कैसे लगूंगा?
(पप्पू कुछ देर सोचता है. फिर एकाएक हवा में चुटकी बजाते हुए उठा...)
पप्पू: (हंसकर) चलो इसका भी कुछ इंतजाम करते हैं,
(पप्पू दौड़ा-दौड़ा गया, ड्राइंगरूम से अखबार उठा लाया. फिर आरामकुर्सी पर बड़ी शान से बैठकर अखवार पढ़ने लगा)

दूसरा दृश्य

(थोड़ी देर बाद सोना दीदी आई. पप्पू को देखकर हैरान हो गई)

सोना दीदी: (अचरज के मारे आँखें फैलाकर) अरे वाह, पप्पू, वाह! तेरे भी क्या ठाट हैं.
पप्पू: (दिखावटी गुस्से से) क्या पप्पू-पप्पू कर रही हो, दादा जी नहीं कह सकती? पता नहीं क्या हो गया है आजकल के बच्चों को? मैनर्स तक नहीं हैं, मैनर्स तक. ये बच्चे क्या करेंगे पढ़-लिखकर?...राम-राम हे राम. मेरा तो दिल दुखी हो गया इन बच्चों को देखकर. ये बड़े होकर क्या करेंगे? बहू, ओ बहू, कुछ इन बच्चों को अच्छी सीख भी देती हो या बस यों ही...?
(सोना दीदी का हँसते-हँसते बुरा हाल था. वह दौडी-दौडी गई, मम्मी को बुला लाई. मम्मी भी हैरान...)
मम्मी: (मुस्कराते हुए) यह क्या पप्पू? क्या किसी नाटक की तैयारी है?
पप्पू: (बिलकुल दादा जी वाले स्टाइल में, आवाज को थोडा भारी बनाकर) अरे बहू, तंग न किया करो. मैंने बोल दिया ना, अभी खाना नहीं खाना, अखबार पढ़ रहा हूं. हां, चाहो तो जरा सा दूध और साबूदाने की खिचड़ी दे दो! खिचड़ी अभी गरम गरम बनाई है न? कहीं ज्यादा नमक तो नहीं डाल दिया? कई बार तो बहू, तुम भी...! खैर जाओ. मुझे अखबार पढ़ना है.
मम्मी: (गुस्से में) ओ पप्पू, अब नाटक बंद कर. अभी दादा जी आएँगे, तो खूब खबर लेंगे.
पप्पू: (उसी अदा से) बहू, बोल दिया न, मेरा सिर न खाओ. वैसे ही मैं परेशान हूं. उफ़, आजकल के ये बच्चे...! और ऊपर से ये बहुएं! किसी को चिंता ही नहीं है.
पप्पू की मम्मी: चल, तेरे पापा को भेजती हूं. आकार तुझे सीधा करेंगे.
(इतने में दादा जी भी आ गए. वे नहाने गए थे. लौटकर आए तो पप्पू का स्वांग देखकर दंग रह गए.)
दादा जी: (मनुहार करते हुए) मेरे प्यारे पप्पू, ला मेरी छड़ी, ला मेरा चश्मा, जरा मंडी हो आऊँ.
पप्पू: ओह, कर दिया न मूड खराब! भाई मुन्ने, यह पांच रुपये का सिक्का ले जा, बाजार से टाफियां-वाफियाँ ले लेना. देख नहीं रहा, कितनी जरूरी खबर है. प्राइम मिनिस्टर ने बोल दिया है, हमें देश का चौतरफा विकास करना है. कितनी जरूरी खबर है और ऊपर से...जा भाई मुन्ने, जा. बाहर जाकर खेल.
(कहकर पप्पू फिर अखबार पढ़ने वाले पोज में आ गया)
दादा जी : गुस्से में आकार) ठहर, अभी निकालता हूं तेरी जरूरी खबर! ला, दे मेरी छड़ी और चश्मा.
(पप्पू अभी कुछ और कहने वाला था कि इतने में पापा आ गए. मम्मी ने वाकई उनके पास जाकर शिकायत कर दी थी.)
पापा: (रोबदार आवाज में) ओ पप्पू, यह क्या नाटक हो रहा है? तू दादा को क्यों तंग कर रहा है?
(पापा की कड़क आवाज सुनी तो पप्पू के होश फाख्ता हो गए. झटपट मेज पर चश्मा और छड़ी रखकर बाहर दौड गया.)

तीसरा दृश्य

(कुछ देर बाद पप्पू धीरे-धीरे संभल-संभलकर कदम रखता और चोकन्ने होकर आसपास की खबर लेता घर आया. लौटकर आया तो देखा, दादा जी चश्मा पहने अखबार पढ़ रहे हैं. पास में छड़ी रखी है. और मूड बढ़िया है.)
पप्पू: (धीरे से चलकर दादा जी की कुर्सी के पास खड़ा होकर) सॉरी दादा जी, मै नाटक कर रहा था. आपने बुरा तो नहीं माना?
दादा जी: (हँसते हुए) कुछ भी कहो, टू एक्टिंग में उस्ताद है पप्पू! पांच साल के मुन्ने से लेकर सत्तर साल तक के बुड्ढे तक का रोल खूब बढ़िया कर सकता है.
पप्पू: (अविश्वास से) सच्ची दादा जी , सच्ची?
दादा जी: (उत्फुल्ल मुद्रा में) हां, सच्ची!
(कहकर दादा पप्पू की पीठ थपथपाते हुए जोर से हँस पड़ते हैं. हँसते-हँसते दादा जी की मूंछे अजब ढंग से फडफडाने लगती हैं.)
पप्पू: (अपने आप से) तो इसका मतलब, दादा जी खुश हैं, बहुत खुश!
पप्पू: (चेहरे पर खुशी की चमक) अरे वाह, फिर तो मैं पास हो गया!
(कहकर पप्पू उछल पड़ा. फिर हँसते-हँसते मम्मी को यह बताने के लिए दौड पड़ा.)

पर्दा गिरता है.



image courtesy: google search

Friday, August 5, 2011

एंड्रयू लैंग की क्लासिक रचना प्रिंस प्रिजियो का हिंदी रूपांतर

विश्व बाल साहित्य की श्रृंखला में अगली कड़ी है एंड्रयू लैंग की क्लासिक रचना प्रिंस प्रिजियो. बाल/किशोर पाठकों के लिए इसका हिंदी रूपांतर शीघ्र nanikichiththiyan.blogspot.com तथा vishwabalsahitya.wordpress.com पर प्रकाशित होगा. बस, थोड़ी-सी प्रतीक्षा कीजिए अगले रविवार तक.....

इस ब्लॉग का अवलोकन करने के लिए आपका आभार

आप इस ब्लॉग का देश/विदेश की अनेक जगहों से अवलोकन कर रहे हैं इसके लिए हम आपके ह्रदय से आभारी हैं. हमारा निवेदन है कि इस ब्लॉग की रचना सामग्री पर अपने विचारों/सुझावों से भी हमें अवगत कराएं ताकि हम इसे और भी बेहतर और समृद्ध बना सकें.

Sunday, July 31, 2011

डॉक्टर प्रताप सहगल का बाल-नाटक "अंकुर"





[डॉक्टर प्रताप सहगल हमारे समय के सुप्रसिद्ध लेखक, कवि, नाटककार, शिक्षाविद और आलोचक हैं. वे अनेक विधाओं में निरंतर रचनारत हैं.मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह प्रसन्नता की बात है कि उन्होंने अपने लेखन के दायरे से बच्चों को अछूता नहीं रखा है. उनकी बाल-नाटकों की पुस्तक " छू मंतर" से लिया गया एक लघु नाटक अंकुर यहाँ पुनर्प्रकाशित करने का मोह मैं नहीं छोड़ पा रहा हूँ. इसके कई कारण हैं: भगतसिंह जैसे महान व्यक्तित्व के बचपन एवं उनके देशप्रेम से जुड़ा रोमांचक कथ्य, देशकाल और पात्रों के अनुरूप प्रयुक्त बोलचाल की भाषा, और भागाँ वाले पुत्तर भगतसिंह के जन्मोत्सव पर पंजाब की पंजाबियत को साकार करने वाला जीवंत गीत -"पुत जम्याँ भागां वाला/पतासे मैं बन्डदी फिरां". आजादी की नई वर्षगाँठ अगले महीने आ रही है. आशा है इस पुनीत अवसर पर बच्चे/बड़े इस रोचक नाटक को पढकर/मंचित कर देश के इस अमर शहीद को सामूहिक स्मरणांजलि भेंट कर सकेंगे.]




पात्र
स्त्री-स्वर
दूसरा स्त्री-स्वर
बूढा स्त्री-स्वर
बाल भगत सिंह
विद्यावती
गायन मण्डली

दृश्य एक
समय: २७ सितम्बर, १९०७ :: स्थान : बंगा (लायलपुर)

(मंच पर एकदम अँधेरा. धीरे-धीरे एक प्रकाश -वृत्त मंच के पीछे वाली दीवार पर फैलता है. उसी पर २७ सितम्बर और स्थान बंगा लिखा है. कुछ क्षणों के अंतराल के बाद नेपथ्य से पंजाबी लोकधुन उभरती है. ढोलक पर तेज थाप, जो धीरे-धीरे मंद पड़ती है.)

स्त्री-स्वर : वधाई होवे.
दूसरा स्त्री-स्वर: तुसी वधो.
(ढोलक पर थाप)

स्त्री-स्वर: लै भैणे, चंगी खबर आई आ.
दूसरा स्त्री-स्वर: बोल वी.
पहला स्वर: किशन सिंह दी ज़मानत मंजूर हो गई, आ ते नाले स्वर्णसिंह दी वी, दोवें पुजदे ही होणगे.
दूसरा स्वर: वाहे गुरु दी मेहर ए !

(ढोलक पर थाप)

पहला स्वर: मांडले तों तार आई आ.
दूसरा स्वर: की?
पहला स्वर: अजीतसिंह दी रिहाई.
बूढा स्त्री-स्वर: बाबाजी दी मेहर होई ए - मेरे तिन्नो पुतर छूट गए-पुतर भागां वाला ए.

(ढोलक की थाप के साथ कुछ स्त्रियाँ मंच के बीचोबीच आकार बैठ जाती हैं और प्रकाश उन पर केंद्रित हो जाता है. एक औरत ढोलक घुटने के नीचे दबाकर बैठ जाती है, दूसरी चम्मच लेकर ढोलक के फ्रेम पर मारने लगती है. गीत के स्वर उठते हैं:)

पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां

इक पतासा चाचे खादा -इक पतासा चाचे खादा
जंग लई औ' तैयार फिरंगियाँ नूँ मारे गबरू
पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां

इक पतासा प्यो ने खादा-इक पतासा प्यो ने खादा
जिंदड़ी देश तों वारे ते वैरियाँ ने भन्ने पासे
पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां.

(गायन में एक स्त्री-नाचने लगती है. तालियाँ बजाकर शेष उसका साथ देती हैं. धीरे-धीरे गीत मंद होता है.)

(दृश्य लोप)

(समवेत गान गाती मण्डली मंच के अगर भाग पर आती है. गीत के दौरान मंच के एक भाग पर दृश्य उभरते हैं, बदलते हैं और लोप हो जाते हैं.)



कैसा था भगतसिंह - कहो कैसा था भगतसिंह
देखने में हमें तुम्हीं जैसा था भगतसिंह
कैसा था भगतसिंह - कहो कैसा था भगतसिंह
उसके बदन की मिटटी का कुछ रंग और था
सोचने का, ठोकने का ढंग और था
ऐसा नहीं, वैसा नहीं, जैसा भी था वह
वैसा था भगतसिंह
वैसा था भगत सिंह
सत्ताईस सितम्बर ने नौ बार दोहराया
इस दिन पिता के संग बेटा खेत में आया
खेत में मिलने किशनसिंह को
आ पहुंचे नंदकिशोर
वे देखते हैं क्या
ज़रा कीजिएगा गौर
मिट्टी की कुछ ढेरियाँ
उनके इर्द-गिर्द भगत
लगा रहा है फेरियां
हर ढेरी पर सजा-सजाकर
गाड रहा है तिनका
सोचते थे जो
वही सब सोचता था
बेटा था वह जिनका
कुछ देर तों देखा गौर से
फिर पूछा नंदकिशोर ने
तुम्हारा नाम क्या बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?
मेरा नाम भगतसिंह, मेरा नाम भगत सिंह!
क्या कर रहे हो तुम यहाँ, क्या कर रहे हो?
फसल की यह तैयारी है बंदूकों की
बंदूकें?
हां जी हां, बंदूकें ! हां जी हां, बंदूकें!
बंदूकों का क्या काम
तुम्हारे लिए है बच्चे?अब तों बंदूकें सिर्फ मेरे काम आएँगी.
देश की आज़ादी के लिए गज़ब ढाएंगी
धांय....धांय....धांय
चाचा अजीतबंदूकों की कमी है
जकड़ी गई माता की आँखों में नमी है
मैं कर रहा हूँ काम अपना देश के लिए
यह बंदूकें दन दनाएं देश के लिए
माँ का लाडला बड़ा न्यारा था भगतसिंहसिंह
प्यारा था भगतसिंह, बड़ा प्यारा था भगतसिंह
(गायन मण्डली अपना स्थान ग्रहण करती है)

(दृश्य दो)

समय: अप्रैल १९१९ स्थान: भगतसिंह का घर

(भगतसिंह की माँ विद्यावती एक ओर बेठी डाल बीन रही है. बाल भगतसिंह आता है और चुपचाप माँ के पास बैठ जाता है.)

विद्यावती: कित्थों आ रयां?
भगतसिंह: अमृतसरों.
विद्यावती: (हैरानी से) अमृतसरों ...कल्ला गुरूद्वारे गया सैं?
भगतसिंह: नईं ...जलियावाले बाग.
विद्यावती: (थोडा चौंककर) ओत्थे? कादे वास्ते?
भगतसिंह: ऐना गोरे वैरियाँ ने हजारां बंदे मार छड्डे ने!
विद्यावती: तू अजे पढ़ाई वल ध्यान रख!
भगतसिंह: (एक शीशी जेब से निकालकर मान को दिखाता है. शीशी में लाल मिट्टी भरी है.) ए वेख माँ, ए ओना बहादरां दी मिटटी, जेडे ओत्थे शहीद हो गए..माँ, ओनां राह चलदे लोकां नूँ मारया , घसीटया , ओनां दा सामान खो लया ..ऐना फिरंगियाँ नूँ मैं छड्डागा नईं माँ!
विद्यावती: (उठकर एक सेब लाती है) अच्छा...अच्छा...लै खा लै, भूख लग्गी होएगी आ!
भगतसिंह: हां माँ, भूख ते लगी है, पर सेब दी नईं
विद्यावती : वेख पुत्तर, देश की आज़ादी वास्ते तेरा तेरा चाचा अजीतसिंह लड़ रया है, स्वर्णसिंह लड़ रया है. ए आप वी लड़ रये ने..तूं वी लड़ लई, पर अजे पढ़ाई कर लै.
भगतसिंह: पढ़ाई...कादे वास्ते?
विद्यावती: अपणे वास्ते...कौम डे वास्ते...सेब खा लै. (उसके सिर पर हाथ फेरती है और चली जाती है.)
(भगतसिंह के एक हाथ में सेब तथा दूसरे में मिट्टी वाली शीशी है. वह कभी शीशी को और कभी सेब को देखता है.)
भगतसिंह: (शीशी को सामने कर्ता हुआ) एस शहीद लहू दी सौंह, फिरंगियाँ दा खात्मा करके ही दम लवांगा. (शीशी को जेब में रख लेता है और सेब को एक ओर फेंक देता है)

(दृश्य लोप).




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डॉक्टर डू लिटिल हिंदी रूपांतर का दूसरा अंतिम भाग


एक जोर की आवाज हुई. पूरा जहाज बुरी तरह हिल उठा. फिर धीरे-धीरे जहाज एक तरफ को झुकने लगा. डबडब बत्तख हिम्मत करके पानी में कूद पडी.वह जैसे-तैसे तैरकर जहाज के नीचे गई. उसने लौटकर बुरी खबर सुनाई. बोली-"डॉक्टर साहेब, हमारा जहाज एक चट्टान से टकरा गया है. उसकी तली में छेद होने के कारण पानी अंदर भर रहा है."

डॉक्टर साहेब ने कहा-"जल्दी से जहाज से नीचे उतरो, नहीं तों हम सब डूब जाएंगे

सारे जानवर पानी में कूद पड़े और फिर किसी तरह जमीन पर पहुंच गए. पानी अब भी तेजी से बरस रहा था. ऊंची-ऊंची लहरें आकर चट्टान पर अटके जहाज से टकरा रही थीं. वह पानी में डूबता जा रहा था.

तट से थोड़ी दूर ऊँचे स्थान पर एक गुफा थी. डॉक्टर डू लिटिल और उनके मित्र गुफा में पहुंचे. कम से कम अब तूफानी बारिश से तों बचा ही जा सकता था.

"पता नहीं हम कहां आ गए हैं." डॉक्टर ने कहा और गहरे सोच में डूब गए. वह सोच रहे थे-"न जाने मैं बीमार बंदरों का इलाज कब शुरू कर सकूंगा? कुछ देर बाद बारिश बंद हो गई. तब तक रात हो गई थी. थकान के कारण सबको नींद आ रही थी.

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर डॉक्टर डू लिटिल की नींद टूट गई. दिन निकल आया था. आसमान साफ़ था. गुफा से निकल कर डॉक्टर साहेब और उनके साथी तट की ओर गए. वहाँ जहाज एक चट्टान पर अटका दिखाई दिया. ये लोग तूफानी समुद्र में डूबने से बाल-बाल बचे थे.

पोलिनेशिया उड़कर पता करने गया. उसने लौटकर बताया-"डॉक्टर साहेब, हम अफ्रीका महाद्वीप पर आ पहुंचे हैं. अब कोई चिंता नहीं है. हमें आगे के रास्ते का पता भी जल्दी ही लग जाएगा." तब तक चिड़िया बंदरों को सन्देश देने उड़ गई थी.

तभी एक व्यक्ति हाथ में भाला लेकर गुफा की तरफ आता दिखाई दिया. डू लिटिल ने अपने साथियों से चुप होने का संकेत किया. वह व्यक्ति सीधा डॉक्टर डू लिटिल के पास आया. उसने कहा-"तुम कौन हो?"

"मैं हूँ डॉक्टर डू लिटिल, एम.डी. इंग्लैंड से आया हूँ. मुझे अफ्रीका के वानरों ने अपने इलाज के लिए बुलाया है.

"लेकिन कहीं भी जाने से पहले तुम्हे हमारे राजा से अनुमति लेनी होगी." भालाधारी सैनिक ने तेज स्वर में कहा.

"राजा, कौन राजा"? डू लिटिल ने पूछा.

"हमारे देश जोलिजिंकी के महाराज , और कौन? उनकी आज्ञा के बिना तों चिड़िया भी अपनी चौंच नहीं खोल सकती. समझे डॉक्टर! चुपचाप मेरे साथ महाराज के पास चलो." उस सैनिक ने कहा.

" उसकी बात सुनकर पेड़ पर बैठी चिड़िया चोंच खोलकर चूंचिर्र करने लगी.वह डॉक्टर से कह रही थी-"यह आडमी झूठ बोल रहा है."
"डॉक्टर डू लिटिल सैनिक के साथ राजा के पास जा पहुंचे.

"जोलजिंकी का राजा एक महल में रहता था. उसके पूछने पर डू लिटिल ने बता दिया कि वह बीमार बंदरों का इलाज करने के लिए अफ्रीका आए हैं.

राजा ने कहा-"बंदरों के देश का रास्ता मेरे राज्य से होकर जाता है. मैं तुम्हे कभी नहीं जाने दूंगा. क्योंकि तुम्हारी ही तरह एक आदमी यहाँ आया आते. मैंने उसका स्वागत किया पर उसने

मुझे धोखा दिया. उसने चुपचाप सोना इकठ्ठा किया. हाथीदांत के लिए निदोष हाथियों को मार डाला, फिर चुपचाप यहाँ से भाग गया.राजा जोलजिंकी ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके पशु मित्रों को कैदखाने में बंद कर दिया. डॉक्टर डू लिटिल सोच रहे थे-"क्या हम लोग बीमार बंदरों के पास कभी नहीं जा सकेंगे. तभी पोलिनेशिया तोता डू लिटिल की जेब से बाहर निकल आया.

डू लिटिल ने पूछा-"पोलिनेशिया, क्या तुम डरकर मेरी जेब में छिप गए थे."

तोते ने कहा-"डॉक्टर साहब, अगर सैनिक मुझे देख लेते तो शायद पिंजरे में बंद कर देते, इसलिए मैं आपकी जेब में छिप गया था." फिर उसने कहा-"मैंने एक तरकीब सोची है, शायद उससे काम बन जाए."

"कैसी तरकीब?" - डू लिटिल ने पूछा. पोलिनेशिया ने धीरे से कहा-"बस, देखते रही." इसके बाद वह कैदखाने की दीवार में बने झरोखे से बाहर उड़ गया. राट का अँधेरा फैला था. सब तरफ सन्नाटा था. पोलिनेशिया एक खुली खिड़की से महल में घुस गया. सब तरफ प्रहरी ऊंघ रहे थे. एक कमरे में राजा जोलिजिंकी पलंग पर सो रहा था. पोलिनेशिया राजा के पलंग के नीचे छिप गया फिर किसी आदमी की तरह खांसने लगा.

खांसी सुनकर जोलिजिंकी जाग गया. उसने पूछा-"कौन?"

"मैं डॉक्टर डू लिटिल." पोलिनेशिया ने कहा-"तुमने मुझे और मेरे साथियों को जेल में बंद कर दिया था. में जादू जानता हूँ. इसीलिए अद्रश्य होकर यहाँ आया हूँ. मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, पर तुम मुझे देख नहीं पा रहे हो."

जोलिजिंकी ने इधर-उधर देखा, पर कोई दिखाई नहीं दिया. वह डर गया. उसने पूछा-"तुम क्या चाहते हो डॉक्टर?"

"तुरंत मेरे साथियों को कैद से आज़ाद कर दो. नहीं तों मैं अपने जादू से तुम्हारे महल में आग लगा दूंगा. महामारी फैला दूंगा." डॉक्टर बने पोलिनेशिया ने कहा.

राजा वैसे भी जादू-टोने में विश्वास करता था. वह डरकर कांपने लगा. उसने इधर-उधर नज़र दौडाई पर छोटा-सा पोलिनेशिया तों पलंग के पाए के पीछे छिपकर बोल रहा था. राजा जोलिजिंकी ने सचमुच डॉक्टर डू लिटिल को जादूगर समझा. उसने तुरंत सैनिकों को बुलाया. उन्हें कैदखाने का दरवाजा खोलने का आदेश दिया.

तभी रानी कमरे में आई. उसने पोलिनेशिया को उड़कर बाहर जाते हुए देख लिया. राजा ने रानी को पूरी बात बताई तों उसने तोते के बारे में कहां. बोली-"हमें खुद कैदखाने चलकर देखना चाहिए. यह जादू की बात बकवास है." राजा जोलिजिंकी रानी के साथ जल्दी-जल्दी कारागार जा पहुंचा. लेकिन तब तक प्रहरियों ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके पशु मित्रों को आज़ाद कर दिया था. पोलिनेशिया ने जोलिजिंकी को खूब मूर्ख बनाया था.

राजा ने तुरंत सैनिकों को डॉक्टर डू लिटिल की खोज में भेज दिया. वह बेहद क्रोध में था. उधर डॉक्टर जंगल में आगे बढ़े जा रहे थे. चीची बंदर अफ्रीका का ही रहने वाला था. उसे जंगल के सारे रास्ते मालूम थे. उसने कहा-डॉक्टर साहेब जोलिजिंकी के सैनिक हमारी खोज में अवश्य आ रहे होंगे. हमें सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.

थोडी देर बाद सैनिक उनके पास पहुंच गए. डॉक्टर साहेब ने कहा-"अब क्या करें?"

चीची बंदर अपने साथियों को एक विशाल पेड़ के पास ले गया. पेड़ का तना अंदर खोखला था. बस, डॉक्टर डू लिटिल तथा उनके पशु मित्र खोखल में छिप गए. तब तक जोलिजिंकी के सैनिक आ पहुंचे. पर वे खोखल में छिपे डू लिटिल और उनके साथियों के बारे में कुछ नहीं जान सके. ये थककर राजधानी वापस चले गए.

डॉक्टर डू लिटिल वानर देश की तरफ आगे बढ़ चले. पोलिनेशिया तोता तथा टूटू उल्लू जंगल में उड़कर पहरेदारी कर रहे थे कि अगर सैनिक फिर से आए तों डॉक्टर साहब को चेतावनी दी जा सके. दो दिन यात्रा निर्विघ्न चलती रही. पहरेदारी करते-करते पोलिनेशिया और टूटू थक चुके थे. उन्हें नींद आ गई. अब वे वानर देश के निकट पहुँच चुके थे. तभी पीछे हो हल्ला सुनाई दिया. जोलिजिंकी ने सैनिकों को दोबारा डॉक्टर डू लिटिल का पीछा करने भेज दिया था . और इस बार वे इनके काफी निकट आ गए थे.

डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथी तेजी से आगे की और दौड चले. सामने एक गहरी खाई थी. उसमे एक नदी तेज आवाज करती हुई बह रही थी. चीची ने कहा-"डॉक्टर साहेब, हमें वानर देश पहुँचने के लिए यह खाई पार करनी होगी."

डॉक्टर डू लिटिल ने देखा पर कोई पुल नहीं था. और उधर जोलिजिंकी के हथियार बंद सैनिक एकदम निकट आ चुके थे. डॉक्टर डू लिटिल ने अपने साथियों से कहा-"लगता है इस बार हम जरूर पकडे जाएंगे."

खाई के दूसरी ओर अनेक वानर डॉक्टर डू लिटिल का स्वागत करने को तैयार खड़े थे. तभी चीची ने पुकारा-"अब हम क्या करें. खाई पर पुल नहीं है और सैनिक पकड़ने के लिए एकदम पास जा चुके हैं?

यह सुनकर खाई के पार खड़े कई विशाल वानर उछलकर इस तरफ चले आए. उन्होंने पुकारा-"साथियो! पुल बनाओ तुरंत. एक-एक पल कीमती है." और देखते-देखते दोनों तरफ से वानर एक ऊँचे पेड़ से लटककर एक दूसरे का हाथ थामते हुए खाई में किसी रस्सी की तरफ आपस में जुड़ते गए. इस तरह एक दूसरे से पंजे जोड़ते हुए मिलकर उन्होंने चौड़ी खाई के आर-पार एक अनोखा वानर पुल तैयार कर दिया.

डॉक्टर डू लिटिल आश्चर्य से यह चमत्कार देखते रहे. तभी चीची चिल्लाया-"डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे हैं! तुरंत इस पुल को पार करके दूसरी तरफ पहुँच जाइए."

पोलिनेशिया और टूटू पहले ही उड़कर दूसरी तरफ चले गए थे. डॉक्टर साहब ने डब-डब बत्तख, ज़िप कुत्ते, गब-गब सूअर तथा मगरमच्छ के साथ जल्दी-जल्दी वानर पुल पार कर लिया.तबतक जोलिजिंकी के सैनिक भी आ पहुंचे. वे भी वानर पुल से खाई पार करने का विचार करने लगे. पर यह क्या. डॉक्टर साहब के पार जाते ही वानर एक-एक करके अलग होते गए और देखते-देखते वानर पुल गायब हो गया. अब जोलिजिंकी के सैनिक किसी भी तरफ खाई के पार नहीं जा सकते थे.

वानर डॉक्टर साहब को आगे का रास्ता दिखा रहे थे. कह रहे थे-"डॉक्टर साहेब, कृपया जल्दी कीजिए."

आगे एक खुले मैंदान में सैकड़ों बीमार बंदर दिखाई दिए. डॉक्टर डू लिटिल ने कल्पना भी नहीं की थी कि उन्हें एक साथ इतने अधिक बीमार बंदरों का इलाज करना होगा. एक पल गवांए बिना डॉक्टर साहेब बीमार बंदरों के इलाज में जुट गए. इस काम में वानर देश के अनेक पशु उनकी मदद करने लगे. पहले डू लिटिल ने बीमार बंदरों को दवा दी , फिर जो बीमारी की चपेट में आने से बच गए थे उनको रोग-निरोधी टीके लगाने शुरू किए.

लेकिन केवल दवा देने से ही बात बनने वाली नहीं थी . बीमार बंदरों की देखभाल भी तों जरूरी थी. आखिर उन्होंने वानरों से कहा कि वे मदद के लिए जंगल के सभी जानवरों को बुलाएं.

डॉक्टर डू लिटिल का सन्देश सुनकर जंगल के सभी जानवर आ गए. डॉक्टर डू लिटिल ने जिसे जो काम सौंपा वही खुशी-खुशी करने लगा. जानवरों ने कहा-"डॉक्टर साहब, बस एक घमंडी

शेर ही नहीं आया है. वह कहता है-"मैं हूँ जंगल का राजा. मैं गंदे, बीमार बंदरों को हाथ भी नहीं लगाऊंगा."

डॉक्टर साहेब ने शेर को सन्देश भेजा तों वह अकड़ता, गुर्राता आया. उसने कहा-"डॉक्टर डू लिटिल, मैंने आपकी बहुत तारीफ़ सुनी है. लेकिन आप मुझसे बंदरों की नर्सिंग करनी उम्मीद न करें."मैं हूँ जंगल का राजा."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-" शेर भाई, बीमारी राजा-प्रजा में भेद नहीं करटी. तुम्हे इस तरह घमंड नहीं करना चाहिए." पर शेर ने डू लिटिल की सलाह नहीं मानी. वह दहाड़ता हुआ वापस चला गया. उसे जाते देख तेंदुए, हिरन, रीछ तथा दूसरे जानवरों ने भी बीमार बंदरों की देखभाल करने से इनकार कर दिया. उन्हें तों जैसे एक बहाना मिल गया था. वे कह रहे थे -"कुछ भी
हो, हम अपने राजा को नाराज नहीं कर सकते." जानवरों के असहयोग ने डू लिटिल को परेशान कर दिया. वह सोच रहे थे-"अब क्या होगा?"

उधर शेर गुर्राता हुआ अपनी मांद में पहुंचा. तभी शेरनी उसके पास आई. घबराए स्वर में बोली-"हमारा एक बच्चा मुझे बीमार लग रहा है. उसने कल से कुछ नहीं खाया है. आँखे बंद किए लेटा है, धीरे-धीरे काराह रहा है."

शेर ने गर्वीले स्वर में बताया कि वह डॉक्टर से झगडा करके आ गया है. सुनकर शेरनी की आँखें गुस्से से लाल हो गईं. दहाड़कर बोली-"बस, इसी बात पर इतरा रहे हो. डॉक्टर साहेब हज़ारों मील दूर से यहाँ बीमारों का इलाज करने आयें. और तुमने उनसे झगडा कर लिया. अब हमारे बीमार बेटे का इलाज कैसे होगा. मैं माँ हूँ. मैं जाकर उनसे क्षमा मांग लूंगी. आज के बाद तुम
मुझसे बात न करना. घमंडी, मूर्ख कहीं का."

घमंडी शेर भी बच्चे की बीमारी की बात सुनकर बेचैन हो गया. उसे डू लिटिल के शब्द याद आ गए-"बीमार राजा-प्रजा में भेद नहीं करती." उसने शेरनी से कहा-"मैं तों सोच भी नहीं सकता था कि मेरे घर में भी बीमारी आ सकती है. डॉक्टर साहेब से झगडना मेरी भूल थी. मैं जाकर क्षमा मांगता हूँ, तब तक तुम बच्चे को लेकर आ जाओ."

शेर ने जाकर डॉक्टर साहेब से अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी. उन्होंने कहा-"गलती इंसान और जानवर दोनों से होती है. जाओ, बीमारों की सेवा करो." शेर को बीमारों की सेवा करते देख, वे जंगली जानवर भी लौट आए जो बहाना बनाकर चले गए थे. और हां, इस बीच शेरनी भी अपने बीमार बच्चे को लेकर वहाँ आ गई थी. डॉक्टर डू लिटिल ने उसे भी दवादे दी.

धीरे-धीरे महामारी का पकोप घटने लगा . बंदर स्वस्थ होने लगे, फिर एक दिन ऐसा भी आया जब एक भी बंदर अस्वस्थ नहीं रहा. पूरा जंगल डॉक्टर डू लिटिल का आभार मान रहा था.

जंगल के बीच एक खुले मैदान में सब जानवरों की सभा हुई. विचार होने लगा कि डॉक्टर साहेब को उपहारस्वरूप क्या दिया जाए. सब जानवरों ने एक स्वर से कहा. "हम डॉक्टर डू लिटिल से प्रार्थना करेंगे कि वह यहीं पर रह जाएँ. एक दवाखाना खोलें. हम हर तरह से उनका ध्यान रखेंगे."

चीची उस सभा में मौजूद था. उसने कहा-"मित्रों! आप केवल अपने बारे में सोच रहे हैं. लेकिन डॉक्टर डू लिटिल की आवश्यकता पूरी दुनिया को है. उनके अपने शहर में ही न जाने कितने बीमार हैं. वे उत्सुकता से उनके अफ्रीका से लौटने की प्रतीक्ष कर रहे हें. उन्हें यहीं रोकना गलत होगा.

पहले पशु सभा ने चीची का विरोध किया, पर फिर बात सबकी समझ में आ गई. तय हुआ कि डॉक्टर साहेब को उपहारस्वरूप पुश्मी पुल्लू नामक विचित्र जीव भेंट किया जाए. पुश्मी पुल्लू के दो सिर थे. एक आगे और दूसरा पूंछ की तरफ. पूरी दुनिया में वह अपनी तरह के एक ही जीव था. पहले तो पुश्मी पुल्लू ने मना किया, फिर डॉक्टर साहेब की प्रशंसा सुनकर उनके साथ जाने को तैयार हो गया.

विदाई का क्षण आ पहुंचा. पूरा जंगल उदास था. अनेक वानर रो रहे थे. सबने भारी मन से अपने प्रिय डॉक्टर डू लिटिल को विदा किया. फिर वानर पुल बनाकर उन्हें खाई से पार छोड़ आए.

डॉक्टर डू लिटिल प्रसन्न थे कि उन्हें बंदरों की महामारी दूर करने में सफलता मिल गई थी.

लेकिन अब फिर जोलिजिंकी के राज्य से गुजरना था. न जाने क्या होने वाला था. और वही हुआ जिसका डर था. जोलिजिंकी के सैनिकों ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथियों को जेल में डाल दिया. जोलिजिंकी ने आदेश दिया-"इस बार मैं अपने हाथ से इस शैतान डॉक्टर का सिर काटूंगा. देखता हूँ, किस तरह बचता है."

पोलिनेशिया चतुराई से इस बार भी पकडे जाने से बच गया था. वह राजमहल के बाग में एक पेड़ पर छिप गया. वह सोच रहा था-"इस बार क्या किया जाए?"

कुछ देर बाद जोलिजिंकी का बेटा राजकुमार बम्पो परी कथाओं की पुस्तक पढ़ रहा था. कथाओं में ऐसी परी का जिक्र था जो अपनी जादुई छड़ी से चमत्कार दिखाती थी. बम्पो सोच रहा था-"काश! कोई परी मुझे मिल जाए तों अपने को गोरा सुंदर बनवा लूं. मेरे चेहरे पर जो बड़े-बड़े फफोले हैं उनको ठीक करने का तरीका पूंछ लूं.

फिर उसने जोर से कहा-"ओ परी, क्या तुम मेरी मदद करोगी. मुझे गोरा-सुंदर बना दो. मेरे चेहरे के फफोले ठीक करदो."

पत्तों में छिपे पोलिनेशिया ने झट कहा-राजकुमार बम्पो, मैं हूँ परी रानी त्रिपस्तिंका. तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी. बोलो, क्या चाहिए, मैं तुम्हारे सामने हूँ, पर तुम मुझे देख नहीं सकते."

"परी रानी, क्या सच? क्या री इच्छा पूरी होगी?" राजकुमर तों मारे खुशी के जैसे पागल हो गया."

"हां, अवश्य पूरी होगी. मैंने कुछ दिन पहले डू लिटिल डॉक्टर को जादुई दवाओं का रहस्य बताया है. लेकिन उस डॉक्टर को तुम्हारे पिता ने कहीं कैद में डाल रखा है.

"तों, क्या वह डॉक्टर मुझे ठीक कर सकता है." बम्पो ने पूछा.

पोलिनेशिया ने कहा-"अवश्य वह कैद में है और मुझे तुरंत परी लोक वापस जाना है. नहीं तों मैं डॉक्टर को कैद से निकाल देती पर अफ़सोस मैं नहीं रुक सकती. मेरी परी माँ बीमार है. मैं जा रही हूँ." कहकर पोलिनेशिया चुप हो गया.

राजकुमार बम्पो तुरंत कैदखाने की तरफ चल दिया. पोलिनेशिया राजकुमार से पहले ही कैदखाने की खिड़की से डॉक्टर के पास जा पहुंचा. उसने डू लिटिल को पूरी बात बता डी. कहा-"राजकुमार बम्पो, अगर आकर आपसे पूछे तों आप कह देना के हां परी त्रिपस्तिंका ने आपको जादुई शक्तियां डी हैं."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"पोलिनेशिया, मैं गलत नहीं कर सकता. दुनिया में ऐसी कोई दवा नहीं जो काले को गोरा बना डे. हां, बीमारी का इलाज संभव है."

पोलिनेशिया ने कहा_"डॉक्टर साहेब, मैं जानता हूँ आप झूठ नहीं बोलते, लेकिन एक झूठ हम सबके प्राण बचा सकता है. नहीं तों सब मारे जाएंगे. जोलिजिंकी इस बार बहुत गुस्से में है.

तभी राजकुमाँर बम्पो कैदखाने में आ गया. उसने डू लिटिल को परी वाली बात बताई, फिर इलाज के लिए कहने लगा. डॉक्टर साहेब बोले-"कैदखाने में कुछ भी संभव नहीं है."

बम्पो ने तुरंत पहरेदारों को आदेश दिया. ताले खोल दिए गए. राजकुमार बम्पो ने पहरेदारों को समझा दिया कि वे किसी से कुछ न् कहें. डॉक्टर डू लिटिल के कहे अनुसार बम्पो उन्हें तथा उनके साथियों को सागरतट पर ले गया. डॉक्टर की इच्छा के अनुसार उसने पानी का जहाज मंगवा दिया. फिर डू लिटिल ने उसके लिए दवा तैयार की. कहा-"इसे अपने मुंह पर लगा लो. इससे तुम्हारी एक इच्छा पूरी हो जाएगी." और फिर जहाज पर बैठते समय उन्होंने बम्पो को एक पत्र दिया. कहा-"इसे जहाज जाने के बाद पढ़ना." पत्र में लिखा था-"बम्पो, तुम्हारा रंग नहीं बदलेग पर चेहरे के फफोले अवश्य ठीक हो जाएंगे. परी बन कर मेरे साथी पोलिनेशिया ने तुम्हे धोखा दिया है. क्षमा करना. ऐसा न करते तों तुम्हारे पिता हमें अवश्य मार डालते जबकि हमारा कोई दोष नहीं है."

इंग्लैण्ड लौटते समय डॉक्टर डू लिटिल के जहाज को समुद्री डाकुओं ने घेर लिया. उन्होंने सुना था कि डॉक्टर अफ्रीका से सोना लेकर जा रहे हैं. डॉक्टर साहब अपने जहाज को एक द्वीप पर ले गए. डाकुओं ने वहाँ भी उनका पीछा किया. डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथी द्वीप पर जा छिपे. डाकू उनके जहाज पर चढ़कर सोना ढूँढने लगे. तभी जहाज के पेंदी में छेद हो गया.

जहाज डूबने लगा. डाकू कूदकर तैरने लगे. इतनी देर में शार्क माछ्लियों ने उन्हें घेर लिया. शार्क डॉक्टर साहब के बारे में सुनकर वहाँ आई थीं. विशाल मछलियों ने डॉक्टर साहब से पूछा-"अगर आप कहें तों हम इन डाकुओं को अपना भोजन बना लें."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"डाकुओं को मारना नहीं है, पर दंड भी देना है. इन्होने न जाने कितने जहाज़ों को लूटा है. कितने निर्दोषों के प्राण लिए है."

मछलियों ने डाकुओं को धकेल कर द्वीप पर पहुंचा दिया. फिर डॉक्टर डू लिटिल ने डाकुओं से कहा-"अब तुम लोग हमेशा इसी द्वीप पर कैद रहोगे. ये मछलियाँ सदा द्वीप की पहरेदारी करेंगी. अगर तुममे से किसी ने भी पानी में उतरने की कोशिश की तों ये विशाल मछलियाँ तुम्हें खा जाएंगीं."

इस तरह समुद्री डाकुओं का आतंक समाप्त हुआ. डॉक्टर डू लिटिल ने आगे की यात्रा डाकुओं के जहाज से की. जहाज पर एक बन कमरे में उन्हें एक बच्चा कैद मिला. वह बहुत दुखी था. उसने बताया कि डाकुओं ने उसके चाचा को न् जाने कहां कैद कर दिया. तभी ज़िप कुत्ते ने कहा-"डॉक्टर साहेब, मेरी सूंघने की ताकत का कमाल देखी." लड़के ने ज़िप को अपने चाचाजी का रूमाल सुंघा दिया. जहाज चलता रहा. ज़िप डेक पर खड़ा होकर जोर-जोर से सूंघता रहा. कुछ देर बाद उसने कहा-"डॉक्टर साहब, इस रूमाल के मालिक की गंध दक्षिण दिशा से आने वाली हवा में है. आप जहाज को उधर ही बढ़ाइए."

दक्षिण दिशा में कुछ दूरी पर एक द्वीप था. डॉक्टर और उनके साथी द्वीप पर उतरे. ज़िप सबसे आगे चल रहा था. वह एक गुफा के सामने रुक गया. उस बच्चे के चाचाजी वहीँ कैद थे. डॉक्टर साहेब उन दोनों को पास के दूसरे द्वीप पर बसे उनके गाँव में छोड़ आए. पूरे द्वीप के निवासियों ने इसके लिए डॉक्टर डू लिटिल को धन्यवाद दिया. इस पर उन्होंने कहा-"मित्रों, यह चमत्कार तों ज़िप के कारण हुआ है." इसके बाद द्वीप पर एक बड़ी सभा हुई. ज़िप के गले में सोने का पदक पहनाया गया. इस समय ज़िप की खुशी देखने वाली थी. क्योंकि अब तक तों हर बार पोलिनेशिया तोते की चतुराई की ही चर्चा होती थी.आगे की यात्रा सकुशल समाप्त हुई. डॉक्टर डू लिटिल एक कठिन यात्रा के बाद एक बार फिर अपने नगर में आ पहुंचे थे. उनके आने का समाचर सुनते ही उनके घ के आगे बीमार पशु-पक्षियों की भीड़ जमा हो गई. डॉक्टर साहेब ने कहा-"दोस्तों, मैं जल्दी ही आप सबको स्वास्थ कर दूंगा."

इसके बाद डॉक्टर साहब अपने नाविक मित्र से मिलने गए. उन्होंने कहा-मित्र, अगर तुम मेरी सहायता न करते तों मैं कभी अफ्रीका न जा पाता. मैंने तुमसे कहा था कि यात्रा से लौटकर तुम्हारा उधार चुका दूंगा, पर वहाँ मुझे पैसे नहीं, केवल प्रशंसा मिली है. मैं लज्जित हूँ."

इस पर नाविक ने कहा-"डॉक्टर डू लिटिल, मैंने आपको जहाज व दूसरा सब सामन उधार नहीं भेंटस्वरूप दिए थे. आप दुनिया के अनोखे पशु चिकित्सक हैं. भला दूसरा कौन है जो बीमार पशु-पक्षियों का हाल उनकी भाषा में पूछ सकें. आप महान हैं." सुनकर डॉक्टर डू लिटिल मुस्कराने लगे.#

Wednesday, July 27, 2011

बच्चों की दुनिया : कुछ इधर की कुछ उधर की

डॉक्टर हेमंत कुमार बाल साहित्य और बच्चों के सम्पूर्ण संसार पर निरंतर वैचारिक लेख लिख रहें है. उनके सामयिक लेखों में से कुछ की लिंक्स इस ब्लॉग पर देना मैंने उचित समझा है. मुझे विश्वास है कि इससे इस ब्लॉग के पाठकों का भरपूर लाभ होगा. हाल में प्रकाशित उनके एक लेख की लिंक यहाँ दी जा रही है :
http://www.jansandeshtimes.com/images/lucknow_28_07_2011_page11.jpg

बच्चों की दुनिया : कुछ इधर की कुछ उधर की

डॉक्टर हेमंत कुमार बाल साहित्य और बच्चों के सम्पूर्ण संसार पर निरंतर वैचारिक लेख लिख रहें है. उनके सामयिक लेखों में से कुछ की लिंक्स इस ब्लॉग पर देना मैंने उचित समझा है. मुझे विश्वास है कि इससे इस ब्लॉग के पाठकों का भरपूर लाभ होगा. हाल में प्रकाशित उनके एक लेख की लिंक यहाँ दी जा रही है :

http://www.jansandeshtimes.com​/images/lucknow_27_07_2011_pag​e9.jpg

Wednesday, July 20, 2011

ह्यू लाफिंग -डॉक्टर डू लिटिल का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर

ह्यू लाफिंग


ह्यू लाफिंग का जन्म १४ जनबरी १८८६ को मेडन हैड, बर्कशायर, इंग्लैंड में हुआ. जब वे ८ वर्ष के हुए तो डर्बीशायर के जेसुइट बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई शुरू की. आगे चलकर १९०६ लन्दन स्कूल ऑफ पोलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. काम के सिलसिले में उन्होंने अफ्रीका, कनाडा वेस्ट इंडीज की यात्राएं कीं, बाद में न्युयोर्क में रहने लगे. न जाने कब इंजीनियर ह्यू लाफिंग के मन में लेखक बनने की इच्छा जाग उठी. पर कुछ विशेष लिखने से पहले प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेना पड़ा. कहते हैं जब लाफिंग मोर्चे पर जा रहे थे तो बच्चों ने कहा कि वह मोर्चे से पत्र लिखें.
मोर्चे पर लाफिंग का सामना गोला-बारूद के धुएं सनसनाती गोलियों और बमों के धमाकों से हुआ. सब तरफ मरे हुए सैनिकों के विकृत शब् दिखाई देते और कानों में घायलों की चीख-पुकार गूंजती रहती थी. पत्रों में बच्चों के लिए उस मृत्यु के तांडव का विवरण कैसे लिखा जा सकता था भला. पर मन में बच्चों के लिए लिखने की इच्छा लगातार उन्हें प्रेरित करती रही और तब एक पात्र का जन्म हुआ. वह थे डॉक्टर जान डू लिटिल एम.डी. डॉक्टर डू लिटिल को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था. एक तोता पोलिनिशिया डॉक्टर डू लिटिल को पशु-पक्षियों के बोलियां सिखा देता है. और फिर वह जानवरों का इलाज करने लगते हैं. वह दुनिया के पहले ऐसे डॉक्टर बन जाते हैं जो हर पशु-पक्षी से उसकी भाषा में बात करता. उनके घर में रहते हैं चीची बंदर, ज़िप कुत्ता, टूटू उल्लू, डब-डब बत्तख और सबसे बड़ा मित्र पोलिनिशिया.

इन्ही पात्रों को लेकर उन्होंने जो पुस्तक लिखीं वह १९२० में प्रकाशित हुईं. शीर्षक था-"द स्टोरी ऑफ डॉक्टर डू लिटिल." छपते ही पुस्तक लोकप्रिय हो गई. पाठक डॉक्टर डू लिटिल के बारे में और अधिक जानने के इच्छुक हो उठे और ह्यू

लाफिंग ने १९२७ तक डू लिटिल श्रंखला की सात पुस्तकें लिख डालीं.लेकिन बीच में शायद कही ह्यू लाफिंग को ऐसा लगा जैसे वह डॉक्टर डू लिटिल ही बन गए हैं. वह खुद को "टाइप्ड" महसूस करने लगे. और तब उन्होंने अपनी एक पुस्तक "डॉक्टर डू लिटिल इन द मून " (१९२८) में डॉक्टर को चाँद पर भेजकर उस पात्र से छुटकारा पाने का प्रयास किया. पर पाठकों के आग्रह पर उन्हें
डॉक्टर डू लिटिल को वापस बुलाने पर विवश होना पड़ा और उन्होंने पुस्तक लिखी"डॉक्टर डू लिटिल्ज रिटर्न" (१९३३) इस श्रंखला की अंतिम पुस्तक "डॉक्टर डू लिटिल एंड द सीक्रेट लेक" १९४८ में उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई. अपनी कृतियों का चित्रांकन भी ह्यू लाफिंग ने स्वयं किया जिसे बहुत सराहा गया.

ह्यू लाफिंग की कुछ अन्य कृतियाँ हैं-
"द स्टोरी ऑफ मिसेज तबज"-१९२३, टामी, टिल्ली एंड मिसेज टब्स. इनमे डॉक्टर डू लिटिल मौजूद नहीं हैं. कहने की आवश्यकता नहीं है कि ह्यू लाफिंग अपनी "डू लिटिल" श्रंखला के लिए ही अधिक जाने जाते हैं. शायद उसी तरह जैसे दुनिया आर्थर कानन डायल को उनके जासूस शर्लक होम्स के लिए पहचानती है.
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डॉक्टर डू लिटिल (संक्षिप्त हिंदी रूपांतर: देवेन्द्रकुमार:रमेश तैलंग)

एक थे डॉक्टर जान डू लिटिल. वह इंग्लैण्ड के छोटे से कस्बे पद्लबाई में रहते थे. अत्यंत कुशल डॉक्टर थे डू लिटिल. वह लालची नहीं थे. बड़े ध्यान से रोगियों की जांच करके दवाई देते. रोगी जल्दी ही स्वस्थ हो जाते. डॉक्टर साहब कम फीस लेते और गरीबों का मुफ्त इलाज करते. पद्ल्वाई के सभी निवासी डॉक्टर डू

लिटिल का बहुत सम्मान करते थे.
डॉक्टर डू लिटिल के घर की देखरेख उनकी बहन सारा करती थी. डॉक्टर को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था. डॉक्टर ने अपने मित्रों के अनोखे नाम रखे थे -जैसे डब-डब बत्तख, कुत्ता ज़िप, गब-गब सूअर, टू-टू उल्लू और पोलिनेशिया तोता. सारा को डॉक्टर भैया के पालतू पशु-पक्षियों से चिढ थी. वह कहती-विचित्र शौक है तुम्हारा, तुम्हारे पशु-मित्र सारा दिन घर को गन्दा रखते हैं. इस पर डू लिटिल मुस्कराकर चुप रह जाते, वह मानते थे कि उनके घर पर उनके मित्र पशु-पक्षियों को भी उतना ही अधिकार था जितना खुद उनका या बहन सारा का.मरीज़ आते तो पूरे घर में पशु-पक्षियों को घूमते देख घबरा जाते.

धीरे-धीरे कुछ लोगों ने दवाखाने में आना बंद कर दिया. वे लोग चाहते थे कि डॉक्टर डू लिटिल अपने पालतू पशु-पक्षियों को घर से भगा दें, पर डॉक्टर ने वैसा नहीं किया. एक दिन कोई औरत दवा लेने आई तो उसने देखा सोफे पर कुछ पशु बेठे हैं. वह डर कर भाग खड़ी हुई. तब दूसरे रोगी भी बिना दिखाए चले गए. इस तरह डॉक्टर डू लिटिल के दवाखाने में आने वाले रोगियों के संख्या बहुत कम हो गई. पर डॉक्टर डू लिटिल ने इस बात की चिंता नहीं की. फिर भी मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं. डॉक्टर की आमदनी तो कम हो गई लेकिन पालतू पशु-पक्षियों पर होने वाला खर्च बढ़ता गया. ऐसा भला कितने दिन चल सकता था.

लोग डॉक्टर डू लिटिल के घर को चिड़ियाघर कहने लगे. एक दिन डू लिटिल का एक परिचित उनसे मिलने आया. वह हँस कर बोला-डॉक्टर साहब, जब आप मनुष्यों का इलाज़ करना छोड़ दीजिए और पशु पक्षियों के डॉक्टर बन जाइए. शायद तब आपको थोड़ी-बहुत आमदनी होने लगे. वह तो अपनी बात कहकर चला गया पर डॉक्टर डू लिटिल सोच में डूब गए. तभी पोलिनेशिया तोता बोला, "डॉक्टर साहब, मैंने उस आदमी की बात ध्यान से सुनी थी. उसका आइडिया बुरा नहीं है."

डू लिटिल बोले-"पोलिनेशिया, शहर में पहले ही जानवरों के कई डॉक्टर हैं. और फिर भला मैं जानवरों की बातें कैसे समझूंगा, तुम ठहरे चतुर. मनुष्यों की बोली समझते हो और बोलते हो. मैं भी तुम्हारी बात का मतलब समझ जाता हूँ. लेकिन भला बताओ तो अगर कोई बिल्ली, भालू, बंदर, हाथी आकर मुझसे बोलने लगे तो मैं उनका मतलब कैसे समझूंगा? किसी बीमार का इलाज करने के लिए यह जरूरी है कि डॉक्टर उसकी बात सुनकर अपनी बात उनसे कह सके."

इस पर पोलिनेशिया ने कहा-"डॉक्टर साहब, आज अपने बारे में मैं आपको एक नई बात बता रहा हूँ. मैं दुनिया के लगभग सभी पशु-पक्षियों की बोलियां समझता हूँ. हर जानवर से उसकी बोली में बात कर सकता हूँ. यदि आप कहें तो मैं आपको भी पशु-पक्षियों की बोलियां समझा सकता हूँ. इसमें आपको ज्यादा परेशानी नहीं होगी. भला ऐसे डॉक्टर कहाँ मिलेंगे जो जानवरों से उनकी बोली में बात करें."

डॉक्टर डू लिटिल को पोलिनेशिया की बातें मजेदार लग रही थीं. बोले-"वाह! पोलिनेशिया, तुम मेरे गुरु बन जाओ. अगर मैं पशु-पक्षियों की बोलियां सीखकर उनका इलाज़ कर सका तो मुझे खुशी होगी. वैसे भी मुझे पशु-पक्षियों के साथ रहना अच्छा लगता है."
बस उसी दिन से पोलिनेशिया तोता डॉक्टर डू लिटिल को जानवरों की बोलियां सिखाने लगा. शुरू-शुरू में उन्हें कठिनाई अवश्य हुई पर वह मन लगाकर सीखते रहे. उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वह हर पशु-पक्षी से उसकी बोली में बात कर सकने वाले डॉक्टर बनकर रहेंगे. इस तरह गुरु पोलिनेशिया अपने शिष्य बने डॉक्टर डू लिटिल को जानवरों की बोलियां सिखाता रहा. और फिर एक दिन डॉक्टर डू लिटिल के दरवाजे पर एक नया बोर्ड दिखाई दिया. उस पर लिखा था-डॉक्टर डू लिटिल. जानवरों के डॉक्टर



इस नए बोर्ड ने तो डॉक्टर साहब के रहे-सहे रोगियों को भी डरा दिया. अब लोग उनके पास अपने पालतू पशु-पक्षियों को इलाज के लिए लाने लगे. एक दिन एक घोडा डॉक्टर साहब के दवाखाने में आया. डॉक्टर डू लिटिल को अपनी बोली में बोलते सुन घोडा बहुत खुश हुआ. उसने कहा-"डॉक्टर साहब, तकलीफ मेरी आँखों में है, पर दवा मुझे पेट-दर्द की दी जा रही थी. मुझे आँखों से कम दिखाई देता है. मैंने मनुष्यों को चश्मा लगाए देखा है. क्या आप मेरे लिए हरे-लेंस वाला चश्मा बना देंगे?"

डॉक्टर साहब ने घोडे के लिए हरा चश्मा बना दिया. घोडा बहुत खुश हुआ. फिर तो शहर में कई घोड़े हरा चश्मा पहने दिखाई देने लगे. डॉक्टर डू लिटिल के पास इलाज़ के लिए आने वाला हर पशु-पक्षी उनके पक्का दोस्त बन जाता था. धीरे-धीरे सारे जानवर इस अनोखे डॉक्टर के बारे में जान गए. पक्षियों ने उनकी खबर दूसरे देशों में भी पहुंचा दी..

अफ्रीका से आया सन्देश:



एक दिन डॉक्टर के मोहल्ले में एक मदारी आया. उसके साथ एक बंदर था. मदारी बंदर का खेल दिखाने लगा. देखने वालों की भीड़ लग गई. भीड़ में खड़े बच्चे तालियाँ बजा रहे थे. डॉक्टर डू लिटिल ने बंदर को देखा तो जान गए कि बंदर खुश नहीं है. और फिर मदारी तो बंदर से भीख मंगवाता था. डू लिटिल ने बंदर से उसकी भाषा में बात की तो पता चल गया कि बंदर कितना परेशान था. वह मदारी की कैद से छुटकारा पाना चाहता था. डॉक्टर और बंदर के बीच हुई बातचीत को कोई नहीं समझ पाया. उन्होंने मदारी को कुछ पैसे देकर बंदर को खरीद लिया. पैसे लेकर जाते समय मदारी झगडा करने लगा. डू लिटिल ने कहा-"जानवरों को दुःख देना बुरी बात है. मैं अभी पुलिस को बुलवाता हूँ." पुलिस का नाम सुनते ही मदारी डरकर भाग गया.

घर में रहने वाले दूसरे जानवरों ने बंदर का नाम चीची रख दिया. चीची बंदर के करतबों से सभी खुश रहते थे. उन्हीं दिनों शहर में सर्कस लगा. सर्कस में था एक मगरमच्छ. उसका नाच दर्शकों को बहुत पसंद आता था. लेकिन इधर कई दिनों से मगरमच्छ के दांत में दर्द था. वह खेल दिखाए तो कैसे? उसे जानवरों के डॉक्टर का पता चला तो रात के अँधेरे में डॉक्टर डू लिटिल के दवाखाने में आ पहुंचा. डॉक्टर डू लिटिल ने मगरमच्छ के दांतों में दवा लगा दी. उसका दांत दर्द ठीक हो गया. उसने डॉक्टर डू लिटिल से कहा -"मैं सर्कस में वापस नहीं जाना चाहता. वे लोग मुझसे जबरदस्ती करते हैं. क्या मैं आपके बाग के तालाब में रह सकता हूँ. मैं वादा करता हूँ कि यहाँ रहते हुए किसी जानवर को नहीं खाऊंगा.डॉक्टर डू लिटिल ने मगरमच्छ को अपने घर में रहने की अनुमति दे दी. सर्कस वालों ने भागे हुए मगरमच्छ को बहुत ढूँढा पर वे उसका पता नहीं लगा सके.

लेकिन अब एक नई समस्या खड़ी हो गई. लोग अपने बीमार पशु-पक्षियों को दवाखाने लाने से घबराने लगे. हालांकि घड़ियाल ने डॉक्टर से किसी जानवर को न खाने का वादा किया था, लेकिन यह बात दूसरे लोग भला कैसे समझ सकते थे.

धीरे-धीरे पशु-पक्षी रोगियों की संख्या भी कम हो गई. डॉक्टर डू लिटिल जानते थे कि यह आफत मगरमच्छ के कारण आई है, पर वह अपने दयालु स्वभाव के कारण मगरमच्छ से घर छोड़कर जाने के लिए नहीं कह सके. डॉक्टर डू लिटिल की बहन सारा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकी. एक दिन वह कहीं और रहने चली गई. डॉक्टर साहब ने सारा को समझाना चाहा, लेकिन वह नहीं माना. डॉक्टर डू लिटिल अपने जानवर मित्रों के साथ अकेले रह गए. अब कोई भी उनसे मिलने नहीं आता था.एक रात डॉक्टर साहब सो रहे थे, तो चीची बंदर, पोलिनेशिया तोता और टूटू उल्लू आपस में बात करने लगे कि अब क्या किया जाए. क्योंकि उन्ही के कारण

डॉक्टर डू लिटिल पर मुश्किल आई थी. डॉक्टर के पालतू जानवरों ने फैसला किया कि घर के सभी काम वे खुद करेंगे. लेकिन काम सिर्फ चीची ही कर सकता था, जिसके दो हाथ थे. फिर सर्दी का मौसम आ गया. खूब बर्फ गिरी. ऐसे में तो भोजन मिलना भी दुर्लभ हो गया.

सर्दियों की ठंडी और अँधेरी रात थी. डॉक्टर और उनके मित्र रसोईघर में बैठे बातें कर रहे थे. पूरे मकान में रसोईघर ही कुछ गरम था. लेकिन चीची बंदर का पता नहीं था. डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"चीची कहाँ हो इस समय? तभी दरवाजा खुला और चीची बंदर अंदर आया. वह हांफ रहा था. इससे पहले कि डू लिटिल उसे सर्दी में घर से बाहर रहने के लिए डांटते, चीची घबराए स्वर में बोला-"डॉक्टर साहब, अफ्रीका में आफत आ गई है.
"क्या मतलब?" डॉक्टर साहब ने पूछा-"आफत अफ्रीका में आई है, पर तुम इतना क्यों घबरा रहे हो?"
"वहाँ बंदरों में एक विचित्र महामारी फ़ैल गई है. हजारों बंदर बीमार हैं, अनेक हर रोज मर रहे हैं. आपको वहाँ चलना होगा." कहकर चीची ने डॉक्टर डू लिटिल का हाथ थाम लिया. डॉक्टर डू लिटिल ने महसूस कर लिया कि चीची का हाथ कांप रहा है.
"सन्देश कहां से मिला, किसने दिया?" उन्होंने पूछा.
"एक अफ्रीकी चिड़िया यहाँ सन्देश लेकर आई है. मेरे चचेरे भाई ने सन्देश भेजा है." चीची बोला.
"चिड़िया कहाँ है?"
"बाहर."
"पहले उसे अंदर तो लाओ, नहीं तो वह सर्दी में ठिठुर कर मर जाएगी." डू लिटिल बोले.
चीची अफ्रीका से आई चिड़िया को अंदर बुला लाया. चिड़िया सचमुच ठण्ड से कांप रही थी. अंगीठी के गरमाई से उसके गीले पंख सूख गए. फिर उसने डॉक्टर को अफ्रीका के समाचार सुनाए. सचमुच अफ्रीका में बंदरों की स्थिति बहुत खराब थी. डॉक्टर डू लिटिल ने चिड़िया से कहा-"देखो, तुमसे क्या छिपाना. मैं वहाँ जरूर जाना चाहता हूँ, पर आजकल पैसों का संकट है. बिना पैसों के मैं कैसे यात्रा करूँगा."

तभी पोलिनेशिया ने कहा-"डॉक्टर साहब, एक नाविक आपका मित्र है. एक बार आपने उसकी बुलबुल का बुखार ठीक किया था. आपको उससे बात करनी चाहिए, शायद वह कोई प्रबंध कर सके." डू लिटिल बोले-"अब तो कल दिन में ही कुछ हो सकेगा ." फिर उन्होंने चिड़िया से कहा-"तुम इतनी लंबी यात्रा करके आई हो, अब आराम करो. कल आगे का कार्यक्रम बनायेंगे." इसके बाद डू लिटिल सोने चले गए, पर उनके पशु-पक्षी मित्र जागते ही रहे. वे सभी अफ्रीका की यात्रा पर जाना चाहते थे.

दिन निकलते ही डॉक्टर साहब अपने नाविक मित्र से मिलने गए. पूरी बात सुनकर उसने कहा-"जैसे भी होगा आपकी अफ्रीका यात्रा के लिए एक जहाज और दूरी आवश्यक सामग्री का प्रबंध कर दूंगा." डू लिटिल ने नाविक को वचन दिया-"मैं अफ्रीका से लौटकर तुम्हारे सारे पैसे चुका दूंगा." इस तरह बात बन गई. अफ्रीका जाने की सबसे ज्यादा खुशी मगरमच्छ, तोते पोलिनेशिया और चीची बंदर को थी. क्योंकि वे तीनों ही अफ्रीका से आए थे. पोलिनिशिया तो इससे पहले भी कई लंबी यात्राएं कर चुका था. पर एक समस्या थी-अफ्रीका तक की यात्रा में रास्ता कौन बताएगा? डॉक्टर डू लिटिल तो पहले कभी अफ्रीका गए नहीं थे. तब अफ़्रीकी चिड़िया ने कहा-"रास्ता मैं दिखाऊंगी. मैं जहाज के आगे-आगे उडती चलूंगी."

यात्रा शुरू हुई. मौसम अच्छा था. जहाज चिड़िया की पीछे-पीछे समुद्र में चलता रहा. जब चिड़िया कुछ थक जाती तो आराम करने के लिए जहाज पर उतर आती. दिन ढलने लगा. तभी पोलिनेशिया ने कहा-"रात में भला हम चिड़िया को कैसे देख पाएंगे? इस तरह तो रास्ता भटक सकते हैं.

चिड़िया ने हंसकर कहा-"मैंने इस समस्या पर पहले ही सोच लिया है." किसी की समझ में नहीं आया कि आखिर चिड़िया रात के अँधेरे मैं उन सबको कैसे दिखाई देगी. पर चिड़िया थी समझदार. योजना के अनुसार उसके पंखों से चिपककर कुछ जुगनू उड़ने लगे. उनकी रौशनी बार-बार जल-बुझ रही थी. लगता था जैसे चिड़िया अपनी चोंच में एक नन्ही लालटेन लेकर उड़ रही हो. बस, इस तरह अँधेरे में भी दिशा ज्ञान बना रहा. डॉक्टर डू लिटिल तथा उनके साथी चिड़िया को आसानी से देख सकते थे.

जहाज आगे बढ़ा तो मौसम गरम हो गया. पोलिनेशिया, चीची और मगरमच्छ को यह मौसम पसंद था लेकिन सूअर. कुत्ता और टूटू उल्लू परेशान थे. वे हर समय छाया में ही दुबके रहते थे. दब-दब बत्तख थोड़ी-थोड़ी देर में पानी में कूद जाती. कुछ देर तैरती और फिर ऊपर आ जाती. उसे इस खेल में खूब मजा आ रहा था. डब-डब ने डॉक्टर से कहा-"मुझे पता नहीं था कि अफ्रीका यात्रा में इतना आनंद आएगा. डब-डब ने डॉक्टर से कहा-"मुझे पता नहीं था कि अफ्रीका यात्रा में इतना आनंद आएगा." डू लिटिल कुछ बोले नहीं. वह आकाश की ओर देख रहे थे, जहां काले-काले बदल उमड़-उमड़ रहे थे.

कुछ देर बाद बड़ी-बड़ी मछलियों का एक झुण्ड जहाज की तरफ आया. मछलियों ने जहाज को घेर लिया. फिर एक मछली पानी से मुंह निकलकर बोली-"क्या इस जहाज में डॉक्टर डू लिटिल यात्रा कर आहें हैं?"
पोलिनेशिया ने कहा-"हां, कहो क्या बात है?"
मछली बोली-"असल में बंदरों के सरदार ने हमें यह देखने भेजा था कि डॉक्टर डू लिटिल कहाँ तक आ पहुंचे हैं? कुछ बंदरों को संदेह हो रहा है कि क्या डॉक्टर साहब उनका इलाज करने के लिए सचमुच अफ्रीका आएँगे?"
तब डॉक्टर डू लिटिल ने मछली से कहा-"मैं तो किसी बीमार पशु-पक्षी का इलाज करने के लिए दुनिया में कहीं भी जा सकता हूँ. तुम सब जाकर बंदरों से कह दो कि मैं जल्दी ही पहुँचने वाला हूँ."

थोड़ी देर बाद डॉक्टर का सन्देश लेकर मछलियों का झुण्ड वापस चला गया. उन्होंने डॉक्टर डू लिटिल से कहा था कि अफ्रीका महाद्वीप का तट बस ढोडी ही दूर है.
लेकिन क्या सच में अफ्रीका इतना पास था? क्योंकि थोड़ी देर बाद ही आकाश में बिजली कौंधने लगी, फिर तेज बारिश शुरू हो गई. समुद्र में ऊंची-ऊंची लहरें

उठ रही थीं. डॉक्टर डू लिटिल का जहाज ऊंची लहरों पर तिनके की तरह डोलने लगा. फिर अँधेरा घिर आया. बारिश उसी तरह तेजी से हो रही थी. डॉक्टर डू लिटिल नहीं जानते थे कि जहाज किधर जा रहा है. क्योंकि उस तूफानी बारिश में चिड़िया भी आकाश में उनकर उन्हें रास्ता नहीं दिखा सकती थी.



जारी ......शेष भाग के लिए थोड़ी..बस थोड़ी सी प्रतीक्षा करें
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चित्र सौजन्य: गूगल सर्च