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Monday, May 30, 2011

नानी की चिट्ठी - ७

मेरे चिरंजीवो
सभी खुश रहो, स्वस्थ रहो, कर्मशील रहो .

इस बार सचमुच देर हो गई चिठ्ठी लिखने में. कुछ तो तबीअत ढीली रही और कुछ अपनी बडकी बिटिया के आ जाने से व्यस्तता बढ़ गई.

बडकी बिटिया के दो तुम्हारे जैसे ही प्यारे-प्यारे जुड़वां बेटे हैं- चिंटू और मिंटू. पर तुम तो जानते हो मैं जिस फ्लैट में रहती हूँ वहाँ छत नाम की कोई चीज नहीं. अपार्टमेंट संस्कृति ने हमारे आँगन, छत,चौबारे सब छीन लिए. इसलिए दोनों बच्चे घर में ही धमा-चोकडी मचाते रहते हैं. बडकी बिटिया तो परेशान हो कर कभी डांट भी देती है पर मुझ से नहीं होता. मैं सोचती हूँ, कुछ ही दिनों के लिए आये हैं बच्चे, ऊधम नहीं करेंगे तो क्या भाड झोंकेगे.

कल की ही बात लो. सुबह बिस्तर से उठी तो क्या देखती हूँ कि चिंटू और मिंटू दोनों एक दूसरे पर तकिया फेंक-फेंक कर खुश हो रहे है और अपनी बडकी बिटिया है कि दोनों के पीछे हाथ धो कर पड़ी हुई है.अब तुम सब तो शैतान के भी चाचा हो इसलिय जानते ही होगे कि तकिये का ये खेल अक्सर बच्चे खेलते हैं. यही नहीं इस खेल को किसी-किसी फिल्म में भी फिल्माया जा चुका है. पर इसे जब सामने के फ्लैट वाले बबलू ने देखा तो भागता आया एक कर्रेंट समाचार देने .

बबलू को हम फ्लैट वाले आजतक चैनल के नाम से पुकारते हैं. वह पूरी सोसाइटी की ख़बरें अपनी जेब में जो रखता है. तो उसने बताया कि नानी, पता है-अमरीका के ब्रूकलिन न्यूयोर्क शहर में पिल्लो फायटिंग एक बहुत बड़ा गेम हो गया है और इस पर वर्ल्ड कप दिया जाने लगा है.

बबलू की बात सुन कर मैं चौंकी. पर बबलू अपनी बात पर अडा रहा." विश्वास नहीं हो रहा नानी? मैं जानता हूँ आप आसानी से किसी बात पर विश्वास नहीं करती इसलिए मैं अभी सबूत ले कर आता हूँ. आपकी जानकारी के लिए मैं ये भी बता दूं कि विश्व की सबसे पहली पिल्लो फाइट वर्ल्ड कप चेम्पियन आस्ट्रिया की २४ वर्षीय Gudrun Grondinger बन गई है .

मैंने जानबूझ कर बबलू को प्यार भरी झिडकी दी - चल-चल ज्यादा गप्प गपोड़ी मत बन. भला ऐसे तकिया मार खेल पर कोई वर्ल्ड कप मिलता है.

पर बबलू कुछ ही मिनटों में अपने लैपटॉप के साथ हाज़िर था. उसने जो वेबसाइट दिखाई तो मेरी भी आँखें फटी रह गई. चिंटू और मिंटू तो लैपटॉप की स्क्रीन से ही चिपक गए.

वेब साईट की लिंक थी:http://www.dogonews.com/2011/5/22/pillow-fighting-becomes-a-legitimate-sport

अब हर बार तो नानी पग्लाती नहीं पर इस बार नानी सचमुच कुछ देर के लिए पगला गई और तकिया उठा कर चिंटू की ओर फेंकती हुई बोली -

चल चिंटू ले लपक तकिया/ खेल ये सचमुच है बढ़िया/तकिये नए खरीद के ला/अगला वर्ल्ड कप जीत के ला/

बडकी बिटिया सचमुच हैरान है कि नानी यह क्या कह रही है. पर में उसे बताऊंगी थोड़े, आखिर सीक्रेट नाम की भी कोई चीज होती है न.

तुम्हारी अपनी नानी

Wednesday, May 25, 2011

नानी की चिट्ठी -६

मेरे प्यारे-प्यारे नन्हे मुन्नो!
जीते रहो और सब के प्रति निश्छल प्रेम भाव रखो.

आज सुबह का अखबार देखा तो पहली खबर पढते ही मन खराब हो गया. खबर थी फरीदाबाद में हुई विमान दुर्घटना की.
हो सकता है अब तक तुमने भी इसे पढ़ लिया होगा . वैसे तो अखबार में रोज कोई न कोई हादसे की खबर होती ही है पर इस समय मैं खबर पर कम खबर से बेचैन करने वाली उस अनुभूति के बारे में सोच रही हूँ जो दिनों दिन खत्म होती जा रही है. आम तौर पर आज आदमी संवेदना शून्य होता जा रहा है. मशीनी पुतले की तरह. कोई अच्छी बुरी खबर उसे विचलित नहीं करती जब तक कि वह खबर उससे या उसके बिलकुल निकटवर्ती प्रियजन से सम्बंधित न हो.क्या कभी तुम भी ऐसा ही महसूस करते हो? दूसरे के सुख में तो सहभागी सभी बनना चाहते हैं पर दुःख में कोई नहीं. यही जग की रीत है. अब तुम सोच रहे होगे कि नानी फिर नया फलसफा ले के बैठ गई. तुम्हारी नज़र में ही क्यों कभी-कभी मुझे खुद भी लगता है की मैं खामख्वाह दुखों को गले लगा के रखती हूँ जो कि अच्छी बात नहीं है.

इस सन्दर्भ में मैं एक बात तुम सबसे शेयर करना चाहती हूँ.फेसबुक पर मेरे एक युवा दोस्त राजेश तैलंग ने अमिताभ बच्चन के ट्विट्टर पर दिये गये एक सन्देश को शेयर किया है. बड़े ही काम का है ये सन्देश. लो तुम भी पढ़ो:

" एक joker ने लोगों को एक joke सुनाया तो सब लोग बहुत हँसे.
उसने वही joke दुबारा सुनाया तो कम लोग हँसे .
उसने वही joke फिर से सुनाया तो कोई भी नहीं हँसा.
फिर उसने एक बहुत ही प्यारी बात बोली -
" अगर तुम एक ख़ुशी को लेकर बार बार नहीं खुश हो सकते तो फिर एक ग़म को लेकर बार बार रोते क्यूँ हो ?"
(Tweeted by Mr. Bachchan)"

कई बार चलते-चलते ऐसे ही मतलब की बातें सामने आ जाती हैं जो सुनने में भी अच्छी लगती हैं और गुनने में भी.

तो अमित जी के इस सन्देश को तुम भी गुनो.

आज की बात मैं यहीं खत्म करती हूँ.

शुभाशीर्वाद सहित

तुम्हारी अपनी नानी

Monday, May 23, 2011

नानी की चिठ्ठी - ५

मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी ,
चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली

खुश रहो, स्वस्थ रहो और जुग-जुग जियो.

कहते हैं, खुशी एक ऐसी दौलत है जो जितनी बांटो, उतनी ही बढती है. ऐसा कह कर मैं तुम्हे कोई उपदेश नहीं दे रही. बस, एक वाकये को शेयर कर रही हूँ जो पिंकी ने अपनी चिठ्ठी में मुझे लिख भेजा है.

दरअसल पिछले पांच सितम्बर को पिंकी के स्कूल में एक फंक्शन था. अब तुम तो जानते हो, पांच सितम्बर को सभी स्कूलों में शिक्षक दिवस मनाया जाता है. तो पिंकी के स्कूल में भी कुछ इसी तरह था. उस फंक्शन में उसके स्कूल में एक डॉक्युमेंटरी फिल्म भी दिखाई गई ; "चिल्ड्रन फुल ऑफ लाइफ". पिंकी लिखती है कि इस डॉक्युमेंटरी फिल्म में चौथी कक्षा को पढाने वाले एक ऐसे जापानी शक्षक की कहानी है जो बच्चों कि जिंदगी संवारने के लिए पूरी समर्पित है. शिक्षक का नाम है - तोशीरो कनामोरी जो टोक्यो के उत्तर-पश्चिम में बसे कंजावा के एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हैं.

तोशीरो अपने शिष्यों से कहते हैं कि व न केवल अच्छे विद्यार्थी बनें बल्कि अपने जीवन को भी पूरी तरह से जियें. क्योंकि ऐसी शिक्षा किसी काम की नहीं जो उनके जीवन में काम न आए. इसके लिए तोशीरो एक प्रयोग करते हैं. वे अपनी कक्षा के बच्चों से कहते हैं कि वे अपने या दूसरों के बारे में जो कुछ भी सोचते हों, उसे वे एक चिठ्ठी में लिख कर पूरी कक्षा के सामने जोर से पढ़ कर सुनाएं. इससे होगा यह कि बच्चों को एक दूसरे के बारे में जानने का ज्यादा मौक़ा मिलेगा और इस तरह न केवल वे अपने विचारों को खुल कर प्रकट कर सकेंगे बल्कि एक दुसरे के दुःख-सुख में शामिल होने के लिए भी तैयार हो सकेंगे.

अब होता क्या है कि आज की दुनिया में हर आदमी सिर्फ अपने बारे में सोचता है और दूसरों की परवाह ही नहीं करता है. भला ऐसे काम चलता है क्या? इकल्खोर बन कर ही जिंदगी को जी लिया जाता तो समाज की रचना ही क्यों होती? फिर तुम लोग जिसे "टीम स्पिरिट" कहते हो वह तो कहीं भी नज़र नहीं आती. तो तोशीरो इसी "टीम स्पिरिट" को शिक्षा के ज़रिये अपनी कक्षा के बच्चों में जगाने की कोशिश करते हैं.

पिंकी ने लिखा है - " नानी तुम तो स्वयं एक शिक्षिका रही हो और शिक्षा के महत्त्व को समझती हो, इसलिए तोशीरो कनामोरी के काम को भी मन से सराहती होगी? तो मेरे नन्हे-मुन्नो, अच्छे काम को भला कौन नहीं सराहता? वो कहते हैं न, कर भला हो भला. अब तुम कहोगे कि नानी ने फिर एक कहावत चिपका दी. तो इसके जवाब में मैं इतना ही कहूँगी कि वह नानी ही क्या जिसके पास किस्से-कहानियों या मुहावरों-कहावतों के टोटे हों.

येल्लो, बातों-बातों में पिंकी की एक बात बताना तो भूल ही गई. वह बात यह है कि अगर तुम इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म यानी "चिल्ड्रेन फुल ऑफ लाइफ" को देखना चाहो तो डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू.यूट्यूब.कोम पर जब चाहे देख सकते हो मुफ्त में.

तो अब तुम यह फिल्म देखो और मुझे छुट्टी दो रात भर के लिए. शुभ-रात्रि .

तुम्हारी अपनी नानी

नानी की चिठ्ठी-४

मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी ,
चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली

खुश रहो, स्वस्थ रहो और जुग-जुग जियो.

आज बबली के फोन से पता चला कि वह अपने स्कूल के साथियों के साथ दस दिनों का असाम टुअर लगा कर लौटी है. बड़ी खुश लग रही थी. न जाने कितनी बातें बता रही थी असाम के बारे में. ब्रह्मपुत्र का विशाल सौंदर्य, चाय बागानों की हरीतिमा, महा भैरव और भैरवी के मंदिर, नामेरी और काजीरंगा, नेशनल पार्क, ओरांग सेंक्चुअरी आदि...आदि.

भई, असाम की खूबसूरती है ही प्रशंसा की चीज. और असाम ही क्या अपना तो पूरा देश ही खूबसूरत है. पर असाम की बात चली है तो असाम की एक और मशहूर चीज बताती हूँ तुमको.
जानती हो क्या?
अरे, चाय नहीं शैतानों, मिर्ची.
तेजपुर की मिर्ची. नाम है भूत्जोलकिया.

तुम सोच रहे होगे, वाह, क्या नाम है भूत्जोलकिया. पर मेरे नन्हे-मुन्नो, इसी भूत्जोलकिया ने मेक्सिको की हॉट-हॉट मिर्ची "रेड सेविना हवानेरो" को टक्कर दे कर संसार में धूम मचा दी है.

अच्छा एक बात बताओ, मिर्ची में ऐसा क्या है जो जीभ पर रखी नहीं की सी-सी करता हुआ आदमी नाचने लगता है.
अच्छा चलो, मैं ही बताती हूँ. मिर्ची के अंदर बीजों से भरा जो सफ़ेद-सा धागा या टिशु होता है वही तो होता है सारे फसाद की जड़.
सबसे तेज, सबसे गर्म.

इस गर्म मिजाज़ मिर्ची का असर क्या होता है इसका एक और उदाहरण देती हूँ. छोटे बच्चों को जब किसी की नज़र लग जाती है तो घर में बड़ी-बूढ़ीं जिनमे माँ, नानी, दादी, बुआ कोई भी हो सकती है, पता है क्या करती हैं? शनिवार या इतवार को लाल मिर्ची जलाकर उनकी नज़र उतारती हैं. कहते हैं कि मिर्ची जलने की जितनी ज्यादा महक फैलती है उतनी ही जल्दी बच्चे की नज़र उतर जाती है. ऐसे टोटके तुम्हे आज के ज़माने में बेवकूफी भरे लगते होंगे पर हमारे सामाँजिक जीवन में इनकी अच्छी खासी घुसपैठ है. चलो, यह तो हुई टोटके की बात पर अब इसी तरह की एक वैज्ञानिक कोशिश का उदाहरण देती हूँ तुम्हे . और वह भी असाम का है.
किस्सा यूँ है की असाम में किसानो को अपने खेतों में जानवरों ,खासकर हाथियों के झुण्ड के घुस आने से काफी नुक्सान उठाना पड़ता था तो वहाँ के वैज्ञानिकों ने इस घुसपैठ को रोकने का ऐसा तरीका खोज निकाला जिसे सुन कर तुम्हे आश्चर्य होगा. उन्होंने असाम की इसी गर्म मिजाज़ मिर्ची भूत्जोल्किया को जला कर उसका धुआं फैलाना शुरू किया. बस, किसानों के लिए यही तेज धुआं सुरक्षा दीवार की तरह साबित हुआ. इस धुएं की वजह से हाथियों की घुसपैठ बिलकुल बंद हो गई. मज़े की बात यह है कि यह खबर जब साउथ अफ्रीका पहुंची तो वहाँ भी इस तरीके को सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया गया. अब असाम की यही गर्म मिजाज़ मिर्ची भारतीय सीमा को लांघ कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुकी है.

तो बबली बेटी, असाम की खूबसूरत चीजों में इस गर्म मिजाज़ मिर्ची का नाम जोड़ना मत भूलना. और सुन, तेरी लवली बहन किस्सा कहानी की फर्माइश कर रही है तो उससे कहना, " बेटा, वैसे तो मेरी हर चिठ्ठी में एक किस्सा होता है पर चलो अगली चिठ्ठी में कोई अच्छी-सी कहानी भी सुनाऊंगी. पर अभी तो इस नानी की आँखें नींद से भारी हो रही हैं. इसलिए तब तक के लिए शुभ-रात्रि.

तुम्हारी अपनी नानी

नानी की चिठ्ठी-३

मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, भोलू, गोलू, किट्टी, बिट्टी,

चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली,

खुश रहो, स्वस्थ रहो और जुग जुग जियो!

आज सबसे पहले तुम्हे एक कहानी सूनाती हूँ. जीते -जागते उस सच्चे इंसान की जो अपने ही देश का है और जिसे बच्चों से अगाध प्यार है. इस इंसान का नाम है वी. मणि.

वी मणि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया बंगुलुरु में सहायक महाप्रबंधक रहे हैं. वे जब भी घर से अपने कार्यालय जाते तो उनके रास्ते में वहां का केंद्रीय कारागार पड़ता जिसके दरवाजे के आगे ऐसे बंदियों के सगे सम्बन्धी और उनके बच्चे रोते-बिलखते दीखते जिनके अभिभावक किसी न किसी अपराध में कारागार की सजा भुगत रहे थे. ऐसे बेसहारा बच्चों को देख कर वी मणि का मन अन्दर ही अन्दर पसीज उठता. उन्होंने निश्चय किया कि वे किसी भी तरह इन बच्चों का वर्त्तमान और भविष्य सुधारेंगे.

वी मणि जब सेवानिवृत्त हुए तो अपनी पत्नी सरोज के सहयोग से उन्होंने १९९९ में एक स्वेच्छिक संस्था बनाई. सो केयर नाम कि इस संस्था को बनाने में उन्होंने रिटायर्मेंट का सारा पैसे खर्च कर दिया. आज इस संस्था में सौ से अधिक बच्चे आश्रय ले कर अपना भविष्य संवार रहे हैं. वी. मणि कि पत्नी तो अब इस दुनिया में नहीं है पर मणि-दम्पति द्वारा देखा गया सपना अब सच हो कर एक दशक से ऊपर का हो चुका है.

वी. मणि हृदय रोग के आघात से उबर चुके हैं फिर भी वे निरंतर अपना समय इस संस्था को देते हैं और बंदियों के बच्चों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा सहित सभी तरह से स्वालंबी बनाने कि व्यवस्था करते हैं. कभी-कभी जब कोई बंदी अपनी सज़ा काट कर या पेरोल पर छूट कर अपने बच्चों से मिलने आता है तो वी. मणि की इस संस्था का तहे दिल से आभार व्यक्त करने से नहीं चूकता. चाहने पर भी बंदियों का मन अपने बच्चों को वापस घर ले जाने का नहीं होता. वे कहते हैं - "उन जैसे हत्या, डकेती के अपराधियों के बच्चों को समाज सहजता व सम्मान सहित कैसे स्वीकारेगा. उनके माता पिता तो अब वी मणि ही हैं.

मैं सोच रही हूँ कि कहाँ तो अपने देश में वी. मणि जैसे लोग जो अपना सर्वस्व सौंप कर बच्चों का जीवन संवार रहे हैं और कहाँ ऐसे निर्मम, देशद्रोही, दानवीय प्रवृत्ति के लोग जो अपनी स्वस्थ्लिप्सा की पूर्ति हेतु मासूम बच्चों को सौ-सौ रुपये देकर बम रखवाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

तुम लोगों से दूर पड़ी मैं दिन रात तुम सबके बारे सोचती रहती हूँ कि कहीं कोई बुरा साया तुम्हारे सर पर न पड़े. भय लालच या भावावेश के कारण ही तुम्हारे जैसे मासूम बच्चे आतंकवादी संगठनों के चंगुल में फंस जाते हैं और जब कोई भाग्यशाली बच्चा उस चंगुल से बाहर निकलता है तो उसके पास एक भयावह कहानी सुनाने को होती है.

ईश्वर तुम सबकी रक्षा करे और संसार के सही भटके हुए लोगों को सद्बुद्धि और सही रास्ता चुनने के प्रेरणा दे, इस आशीर्बाद के साथ

तुम्हारी अपनी नानी.

नानी की चिठ्ठी-२

मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी
चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली!
देखा, पहली ही चिट्ठी ने जादू का असर कर दिया न तुम सब पर.
चम्पू का तो फोन भी आ गया, बोल रहा था - "आपकी चिट्ठी पा कर मज़ा आ गया नानी! पर एक शिकायत हिया जब मैंने पूछा कि क्या तो बोला - अब मैं बड़ा हो गया हूँ नानी पर आप हैं कि अभी भी चम्पू...चम्पू... लिखती रहती हैं. अरे चम्पक नाम है मेरा, वाही लिखा करो न. पता है, मेरे क्लास के लड़के और यहाँ तक कि मेरे इंग्लिश के सर सब मुझे चैम्प कहते हैं. अपनी टीम का चैम्पियन जो हूँ.
सुन कर मुझे हंसी आ गई. मैं बोली...अरे बेटा, ये नानी न तो तुम्हारी क्लास मेट है और न ही तुम्हारी क्लास टीचर इसलिए उनके लिए भले ही तुम चैम्प बन जाओ पर मेरे लिए तो वाही बने रहोगे चम्पू के चम्पू . वो क्या हैं न बेटा, ऐसे नाम होम मेड रेसिपी कि तरह होते हैं जो दर असल बनाये नहीं जाते, आप ही बन जाते हिना जैसे दाल-भात के लिए दल्लू-भत्तु. अब बच्चों से दल्लू-भत्तु कहने में जितना मज़ा आता है उतना मज़ा दाल-भात कहने में थोड़े ही आता है.
ज़रा अपनी भी तो सोचो तुम लोग अंग्रेजी में माँ को मम्मी, मम्मा, पापा को पैप और डैडी को डेड पता नहीं क्या क्या अटरम-शटरम बोलते रहते हो. क्या तुमने कभी सोच है कि डेड का मतलब क्या होता है. पर तुम्हारे पिता ने तो तुमसे कभी नहीं कहा कि तुम उन्हें डेड क्यों कहते हो?
दरअसल कोई भी भाषा या बोली स्थिर नहीं होती, देश-काल के साथ उसमे बदलाव आते रहते हैं. पता नहीं तुमने सुना है कि नहीं, एक शब्द है -ज़िह्वालाघव. थोडा कठिन है पर बोल सकते हो. इसका मोटा मतलब कि हमारी जबान को जो भी सहज लगे.
संस्कृत के बड़े-बड़े कठिन और तत्सम शब्द कैसे देशज रूप में आ कर हमारी हिंदी में घुल-मिल गया इसकी बड़ी ही रोचक कहानी है. एक तरह से यह पीछे की यात्रा है. सूत्र कहीं से भी पकड़ो और पीछे चलते-चलते उस शब्द के मूल या उद्गम स्थल तक पहुँच जाओ.
नानी शब्द ने मातामही से चल कर कितने पडाव पार किये और कितनी अन्य भाषाओँ तथा बोलियों से दोस्ती गांठी इसकी कहानी कभी फुर्सत में सुनाऊंगी. अभी तो बस मेरे लिटिल चैम्प , अपनी प्यारी नानी के लिए चम्पू ही बने रहो.
ये लो, अब तुम कहोगे कि ये पूरी चिट्ठी तो चम्पू के गोरख धंधे में ही फंस कर रह गई, बाकी किसी कि तो खबर ही नहीं ली नानी ने पर मेरे नन्हे-मुन्नों और मुनियों, चम्पू का तो बहाना था. बात तो मैं तुम सभी से कर रही थी.
इधर एक अजीब सी खबर पढ़ी है. अपने देश के एक सीमावर्ती राज्य में एक चरमपंथी संगठन १०० रुपयों के बदले सार्वजनिक स्थलों पर बम रख्बाने के लिया बच्चों का इस्तेमाल कर रहा है. या तो बच्चों के साथ भयावह दुष्कर्म है और देश के लिए घातक भी.
अगली चिट्ठी में इस बारे में तुमसे बात करूंगी.
तब तक के लिए ढेर सारे आशीर्वाद.

तुम्हारी अपनी नानी...

नानी की चिठ्ठी-१

मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी
चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली!
पता है, आज सुबह दस बजते ही मैं सीधे डाकखाने गई और पूरे तीन सौ पैंसठ लिफाफे खरीद कर ले आई. अब आज से हर दिन एक चिट्ठी लिख कर तुम्हे भेजा करूंगी.
तुम सब सोच रहे होगे की नानी तो पगला गई है, रोज़ एक चिट्ठी लिख कर भेजेगी. भाट ए जोक? बुढापे मैं क्यों अपने रिटायर्ड हाथों को तकलीफ दे रही है बेचारी. अरे, ज़माना बदल गया है, सबके पास मोबाइल फोन हो गए हैं, बस मोबाइल फोन उठाओ, नंबर मिलाओ और जब जी चाहे, जितनी चाहे बातें करो.
सो बिटवा, बात तो तुम्हारी सोलह आने सच है. पर उसमे भी झोल है अब देखो, तुम्हारी नानी सो काल्ड बूढी ज़रूर हो गई है पर उसके हाथ-पैर, आँख-कान और दिल, दिमाग भगवान् की दया से अभी भी सही काम कर रहे हैं. इसलिए सोचती हूँ कि इनकी कसरत करते रहनी चाहिए. और भई, देखो, मोबाइल पर तुम जिसे बातचीत करना कहते हो, मैं उसे बकर-बकर करना कहती हूँ. पांच मिनट भी बकर-बकर करो तो कान गर्म हो जाते हैं. पर चिट्ठी की बात कुछ और है. चिट्ठी सामने होती है तो लगता है जैसे भेजने वाला बिलकुल सामने खड़ा है.
अब तुम्हारा खुराफाती दिमाग फिर किलबिल-किलबिल कर रहा होगा की मैं क्या उलटी बात कर रही हूँ. मोबाइल फोन से भी आगे अब तो विडियो फोन आ गए हैं. कंप्यूटर...इन्टरनेट... भी तो हैं, चैटिंग-शैटिंग करो नानी...क्या दकियानूसी चिट्ठी राग अलापे जा रही हो. अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी हो तो मोडर्न बनो नानी...मोडर्न .
अब मैं तुम्हारी बात मान भी लूं तो फिर उनके बारे में कैसे सोचूँ जिनके पास मोबाइल तो क्या ठीक से दो जून खाने को रोटी भी नहीं है. और मोबाइल फोन क्या मुफ्त की चीज है? उसमे पैसे नहीं लगते? मुझसे पूछो तो क्या मोबाइल, क्या कंप्यूटर, क्या इन्टरनेट सब के सब एक छोटी सी चिट्ठी के आगे पानी भरे हैं. तुम ही सोचो, क्या ये सब उस इंतज़ार का मज़ा देसकते हैं जो तुम आँखें बिछाकर नानी की चिट्ठी के लिए करोगे.
जानते हो जब मेरे ज़माने में इकन्नी के पोस्टकार्ड पर किसी भी अपने की चिट्ठी आती थी तो पूरे घर में छीना- झपटी हो जाती थी इस बात पर की कौन सबसे पहले पढ़ेगा. हाय, कितनी प्यारी लगती थी वह मोती जैसे अक्षरों से लिखी चिट्ठी. पता है आज भी मैंने ऐसी कितनी ही चिट्ठियां अपने बक्से में सम्भाल कर राखी हुई है. कभी-कभी अकेले में
उन्हें निकाल कर पढ़ती हूँ तो पूरा का पूरा वक्त पलटी मार जाता है. आँखों के आगे धुंधलाई तस्वीरें अपना रंगफिर पकड़ने लगती हैं. एक-एक चिट्ठी
देख कर कभी रोती हूँ तो कभी हंसती हूँ.
आज एक बात कहती हूँ तुम सबसे. जिंदगी में कितना भी तेज दौड़ना तुम क्यों न सीख लो पर उस पल को
सदा याद रखोजब तुम पहली बार पंजों के बल पर खड़े हुए थे. नए के चक्कर में गए को बिलकुल भुला देना
बेईमानी है. संभाल कर रखो उन पलों को अपने सीने में जो आज एंटिक चीज हो गए हैं.
हर एंटिक चीज कीमती होती है. कल, यह चिट्ठी भी होने वाली है बिलकुल वैसे ही....जैसे.........

तुम्हारी अपनी नानी.नानी की चिट्ठियां -1
मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी
चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली!
पता है, आज सुबह दस बजते ही मैं सीधे डाकखाने गई और पूरे तीन सौ पैंसठ लिफाफे खरीद कर ले आई. अब आज से हर दिन एक चिट्ठी लिख कर तुम्हे भेजा करूंगी.
तुम सब सोच रहे होगे की नानी तो पगला गई है, रोज़ एक चिट्ठी लिख कर भेजेगी. भाट ए जोक? बुढापे मैं क्यों अपने रिटायर्ड हाथों को तकलीफ दे रही है बेचारी. अरे, ज़माना बदल गया है, सबके पास मोबाइल फोन हो गए हैं, बस मोबाइल फोन उठाओ, नंबर मिलाओ और जब जी चाहे, जितनी चाहे बातें करो.
सो बिटवा, बात तो तुम्हारी सोलह आने सच है. पर उसमे भी झोल है अब देखो, तुम्हारी नानी सो काल्ड बूढी ज़रूर हो गई है पर उसके हाथ-पैर, आँख-कान और दिल, दिमाग भगवान् की दया से अभी भी सही काम कर रहे हैं. इसलिए सोचती हूँ कि इनकी कसरत करते रहनी चाहिए. और भई, देखो, मोबाइल पर तुम जिसे बातचीत करना कहते हो, मैं उसे बकर-बकर करना कहती हूँ. पांच मिनट भी बकर-बकर करो तो कान गर्म हो जाते हैं. पर चिट्ठी की बात कुछ और है. चिट्ठी सामने होती है तो लगता है जैसे भेजने वाला बिलकुल सामने खड़ा है.
अब तुम्हारा खुराफाती दिमाग फिर किलबिल-किलबिल कर रहा होगा की मैं क्या उलटी बात कर रही हूँ. मोबाइल फोन से भी आगे अब तो विडियो फोन आ गए हैं. कंप्यूटर...इन्टरनेट... भी तो हैं, चैटिंग-शैटिंग करो नानी...क्या दकियानूसी चिट्ठी राग अलापे जा रही हो. अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी हो तो मोडर्न बनो नानी...मोडर्न .
अब मैं तुम्हारी बात मान भी लूं तो फिर उनके बारे में कैसे सोचूँ जिनके पास मोबाइल तो क्या ठीक से दो जून खाने को रोटी भी नहीं है. और मोबाइल फोन क्या मुफ्त की चीज है? उसमे पैसे नहीं लगते? मुझसे पूछो तो क्या मोबाइल, क्या कंप्यूटर, क्या इन्टरनेट सब के सब एक छोटी सी चिट्ठी के आगे पानी भरे हैं. तुम ही सोचो, क्या ये सब उस इंतज़ार का मज़ा देसकते हैं जो तुम आँखें बिछाकर नानी की चिट्ठी के लिए करोगे.
जानते हो जब मेरे ज़माने में इकन्नी के पोस्टकार्ड पर किसी भी अपने की चिट्ठी आती थी तो पूरे घर में छीना- झपटी हो जाती थी इस बात पर की कौन सबसे पहले पढ़ेगा. हाय, कितनी प्यारी लगती थी वह मोती जैसे अक्षरों से लिखी चिट्ठी. पता है आज भी मैंने ऐसी कितनी ही चिट्ठियां अपने बक्से में सम्भाल कर राखी हुई है. कभी-कभी अकेले में
उन्हें निकाल कर पढ़ती हूँ तो पूरा का पूरा वक्त पलटी मार जाता है. आँखों के आगे धुंधलाई तस्वीरें अपना रंगफिर पकड़ने लगती हैं. एक-एक चिट्ठी
देख कर कभी रोती हूँ तो कभी हंसती हूँ.
आज एक बात कहती हूँ तुम सबसे. जिंदगी में कितना भी तेज दौड़ना तुम क्यों न सीख लो पर उस पल को
सदा याद रखोजब तुम पहली बार पंजों के बल पर खड़े हुए थे. नए के चक्कर में गए को बिलकुल भुला देना
बेईमानी है. संभाल कर रखो उन पलों को अपने सीने में जो आज एंटिक चीज हो गए हैं.
हर एंटिक चीज कीमती होती है. कल, यह चिट्ठी भी होने वाली है बिलकुल वैसे ही....जैसे.........

तुम्हारी अपनी नानी.नानी की चिट्ठियां -1
मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी
चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली!
पता है, आज सुबह दस बजते ही मैं सीधे डाकखाने गई और पूरे तीन सौ पैंसठ लिफाफे खरीद कर ले आई. अब आज से हर दिन एक चिट्ठी लिख कर तुम्हे भेजा करूंगी.
तुम सब सोच रहे होगे की नानी तो पगला गई है, रोज़ एक चिट्ठी लिख कर भेजेगी. भाट ए जोक? बुढापे मैं क्यों अपने रिटायर्ड हाथों को तकलीफ दे रही है बेचारी. अरे, ज़माना बदल गया है, सबके पास मोबाइल फोन हो गए हैं, बस मोबाइल फोन उठाओ, नंबर मिलाओ और जब जी चाहे, जितनी चाहे बातें करो.
सो बिटवा, बात तो तुम्हारी सोलह आने सच है. पर उसमे भी झोल है अब देखो, तुम्हारी नानी सो काल्ड बूढी ज़रूर हो गई है पर उसके हाथ-पैर, आँख-कान और दिल, दिमाग भगवान् की दया से अभी भी सही काम कर रहे हैं. इसलिए सोचती हूँ कि इनकी कसरत करते रहनी चाहिए. और भई, देखो, मोबाइल पर तुम जिसे बातचीत करना कहते हो, मैं उसे बकर-बकर करना कहती हूँ. पांच मिनट भी बकर-बकर करो तो कान गर्म हो जाते हैं. पर चिट्ठी की बात कुछ और है. चिट्ठी सामने होती है तो लगता है जैसे भेजने वाला बिलकुल सामने खड़ा है.
अब तुम्हारा खुराफाती दिमाग फिर किलबिल-किलबिल कर रहा होगा की मैं क्या उलटी बात कर रही हूँ. मोबाइल फोन से भी आगे अब तो विडियो फोन आ गए हैं. कंप्यूटर...इन्टरनेट... भी तो हैं, चैटिंग-शैटिंग करो नानी...क्या दकियानूसी चिट्ठी राग अलापे जा रही हो. अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी हो तो मोडर्न बनो नानी...मोडर्न .
अब मैं तुम्हारी बात मान भी लूं तो फिर उनके बारे में कैसे सोचूँ जिनके पास मोबाइल तो क्या ठीक से दो जून खाने को रोटी भी नहीं है. और मोबाइल फोन क्या मुफ्त की चीज है? उसमे पैसे नहीं लगते? मुझसे पूछो तो क्या मोबाइल, क्या कंप्यूटर, क्या इन्टरनेट सब के सब एक छोटी सी चिट्ठी के आगे पानी भरे हैं. तुम ही सोचो, क्या ये सब उस इंतज़ार का मज़ा देसकते हैं जो तुम आँखें बिछाकर नानी की चिट्ठी के लिए करोगे.
जानते हो जब मेरे ज़माने में इकन्नी के पोस्टकार्ड पर किसी भी अपने की चिट्ठी आती थी तो पूरे घर में छीना- झपटी हो जाती थी इस बात पर की कौन सबसे पहले पढ़ेगा. हाय, कितनी प्यारी लगती थी वह मोती जैसे अक्षरों से लिखी चिट्ठी. पता है आज भी मैंने ऐसी कितनी ही चिट्ठियां अपने बक्से में सम्भाल कर राखी हुई है. कभी-कभी अकेले में
उन्हें निकाल कर पढ़ती हूँ तो पूरा का पूरा वक्त पलटी मार जाता है. आँखों के आगे धुंधलाई तस्वीरें अपना रंगफिर पकड़ने लगती हैं. एक-एक चिट्ठी
देख कर कभी रोती हूँ तो कभी हंसती हूँ.
आज एक बात कहती हूँ तुम सबसे. जिंदगी में कितना भी तेज दौड़ना तुम क्यों न सीख लो पर उस पल को
सदा याद रखोजब तुम पहली बार पंजों के बल पर खड़े हुए थे. नए के चक्कर में गए को बिलकुल भुला देना
बेईमानी है. संभाल कर रखो उन पलों को अपने सीने में जो आज एंटिक चीज हो गए हैं.
हर एंटिक चीज कीमती होती है. कल, यह चिट्ठी भी होने वाली है बिलकुल वैसे ही....जैसे.........

तुम्हारी अपनी नानी.