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Thursday, June 23, 2011

मेरे कुछ और बाल गीत

ठुमुक-ठुमुक-ठुम मुनवा नाचे



आसमान पर मेघा नाचे
वन में नाचे मोरा ।
ठुमुक-ठुमुक-ठुम मुनुआ नाचे
जैसे नंदकिसोरा ।

हरे पेड़ पर पत्ते नाचें
डाली ऊपर फुलवा ।
टप्पर ऊपर बुंदियां नाचें
अमुवा ऊपर झुलवा ।
दसों दिशा में छननन नाचे
रे बिजुरी का छोरा ।

चूल्हा चढ़ी बटुलिया नाचे
खंभा चढ़ी गिलहरी ।
इंदरजी का धनुआ नाचे
सतरंगी दोपहरी ।
गैया संग-संग बछड़ा नाचे
नाचे दूध कटोरा ।

ठुमुक-ठुमुक-ठुम मुनुआ नाचे
जैसे नंदकिसोरा ।

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घर है छोटा देश हमारा।

घर है छोटा देश हमारा।

चाची तो गुजरात से आई
और पंजाब की हैं भरजाई
ताई जी हैं राजस्थानी
बोलें- ‘म्हारा...थारा..!



सुबह ढोकले पूरन-पूरी
शाम बने रोटी तंदूरी
उसके ऊपर हरी मिर्च की
चटनी का चटकारा।

मम्मी-पापा ताया-ताई
भाई जी उनकी भरजाई
छोटे-से घर में हिलमिल कर
सारे करें गुज़ारा।

घर है छोटा देश हमारा।
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फूलों की टोपी

फूलों का कुर्ता
फूलों की टोपी।
फूलों की टोपी में
देखा एक मोती।


मोती वह ओस का
धूप खिली खो गया।
फूलों की टोपी का
मन उदास हो गया।
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कल की दुनिया हमको चाहिए

न तो बंदूक की न ही बारूद की
कल की दुनिया हमको चाहिए
नए रंगरूप की।



जिसमें न पाठ
पढ़ाया जाए नफ़रत का
जिसमें न राज
चलाया जाए दहशत का
जिसमें सच्चाई की जीत हो
और हार झूठ की।
कल की दुनिया हमको चाहिए
नए रंगरूप की।

जिसमें मेहनत वालों को
अपना फल मिले
जीने को साफ़ हवा
मिट्टी और जल मिले
जिसमें बीमारी न
फैली हो भूख की।
कल की दुनिया हमको चाहिए
नए रंगरूप की।

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रात हो गई

रात हो गई तू भी सो जा
मेरे साथ किताब मेरी!




बिछा दिया है बिस्तर तेरा
बस्ते के अंदर देखो
लगा दिया कलर-बॉक्स का
तकिया भी सुंदर देखो

मुँहफुल्ली अब तो खुश हो जा
मेरे साथ किताब मेरी!

सुबह-सुबह फिर जल्दी-जल्दी
जगना है हम दोनों को
भागम-भागी में स्कूल
निकलना है हम दोनों को

फड़-फड़ न कर अब चुप हो जा
मेरे साथ किताब मेरी!

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पापा की तनख़्वाह में

पापा की तनख़्वाह में
घर भर के सपने।

चिंटू का बस्ता
मिंटी की गुड़िया
अम्मा की साड़ी
दादी की पुड़िया
लाएँगे लाएँगे
पापा जी अपने।


पिछला महीना तो
मुश्किल में काटा
आधी कमाई में
सब्जी और आटा
अगले में घाटे
पड़ेंगे जी भरने।

पापा की तनख़्वाह में
घर भर के सपने।

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माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर तारों की हर गली
माँ की गोदी में हम घूम आए ।
नीला-नीला गगन चूम आए ।



पंछियों की तरह पंख अपने न थे
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन हर तपन भूल आए ।

दूसरों के लिए सारा संसार था
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए ।

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आशीर्वाद दीजो


छोटों के नमस्कार लीजो
नानी!हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

आएँगे जब हम ननिहाल में
पूछेंगे-‘तुम हो किस हाल में?’
अपने सब हाल-चाल दीजो ।
नानी!हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

घुटनों का दर्द हुआ कम कितना
बतलाना जब हो अपना मिलना
बातों में नहीं टाल दीजो
नानी!हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

भूल नहीं पाए हैं हम अभी
नानाजी की वो हा-हा ही-ही
एक बार फिर निहाल कीजो
नानी!हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

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फूलों का गजरा

बहना तेरी चोटी में
फूलों का गजरा ।

फूलों के गजरे ने
घर-भर महकाया
बतलाना बतलाना
कौन इसे लाया?
साँसों में छोड़ गया
ख़ुशबू का लहरा ।

गजरे में फूल खिले
बेला-जुही के
आँखों में तेरी हैं
आँसू खुशी के
चेहरे पर बिखरा है
जादू सुनहरा ।

तुझ पर ही नज़रें हैं
छोटे-बड़ों की
बात हुई बहना
आज क्या अनोखी?
क्या इसमें है कोई
राज बड़ा गहरा ?

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दीदी की आँखों में




दीदी लिपस्टिक के नखरे करे ।
छुटकू डोलें मुँह में मिट्टी भरे ।

दीदी को मिली नई फूलदार साड़ी
छुटकू को मिली तीन पहियों की गाड़ी
दीदी कमाऊ है फैशन करे ।
छुटकू डोलें मुँह में मिट्टी भरे ।



दीदी संभालती रहे काला चश्मा
छुटकू चिल्लाते रहें अम्माँ! अम्माँ!
दीदी की आंखों में सपने भरे ।
छुटकू डोलें मुँह में मिट्टी भरे ।

दीदी का सैलफ़ोन बजता ही रहता
कोई है जो बातें करता ही रहता
दीदी हँस-हँस कर क्या बातें करे?
छुटकू के पल्ले न कुछ भी पड़े ।

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चंदोवा तना

पूनम की उजियारी खिली रे जुन्हाई
सिर पर चंदोवा तना ।
हो जी सिर पर चंदोवा तना ।



दूधो नहाए जी महले दुमहले
काले-कलूटे दिखे सब रुपहले
जग-मग हुआ आँगना ।
हो जी सिर पर चंदोवा तना ।

अम्माँ रसोई की करके सफ़ाई
कोठे पे जा बैठी लेकर चटाई
बानक ख़ुशी का बना ।
हो जी सिर पर चंदोवा तना ।

भाग बड़े खुला आकाश पाया
माथे पर है पूरे चाँद का साया
शीतल सुखदायी घना ।
हो जी सिर पर चंदोवा तना ।

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बस्ते में चिप



बस्ते में चिप लगी हुई है सबका अता-पता देगी ।
कौन कहाँ क्या गड़बड़ करता है ये
सभी बता देगी ।

जासूसों की दादी है ये
वह भी नए ज़माने की
ख़बर इसे हो जाती है
पल में हर ठौर-ठिकाने की ।
अगर किसी ने ग़लती की तो ये भरपूर सज़ा देगी ।
कौन कहां क्या गड़बड़ करता है
ये सभी बता देगी ।

छोटी-सी इस चिप का है
कंट्रोल सधे कुछ हाथों में
इस चिप को न ले लेना तुम
हँसी-हँसी की बातों में
ख़तरा होते ही ख़तरे की घंटी कहीं बजा देगी ।
कौन कहाँ क्या गड़बड़ करता है
ये सभी बता देगी।
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images courtesy: Google search.

Sunday, June 19, 2011

चित्रकार शौन टैन आलमा (Astrid Lindgren Memorial Award) पुरस्कार से सम्मानित


पिछले महीने आस्ट्रेलिया के युवा चित्रकार शौन टैन (Shaun Tan ) को स्वीडन के स्टॉकहोम कंसर्ट हाल में आलमा (Astrid Lindgren Memorial Award) पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस पुरस्कार की राशि ५ मिलियन स्वीडिश क्रोन (लगभग ७५०,००० यू.एस.डॉलर) है. राशि के लिहाज़ से बाल एवं युवा साहित्य के लिए विश्व भर में दिए जाने वाले सभी पुरस्कारों में यह पुरस्कार सबसे बड़ा है.

३७ वर्षीय शौन टैन (Shaun Tan ) फ्रीलांस चित्रकार हैं और उन्होंने २० से ज्यादा पुस्तकों का चित्रांकन किया है. “द एराइवल” उनकी सबसे ज्यादा चर्चित शब्द रहित पुस्तक है जिसने सारी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है और उस पर एनिमेशन फिल्म भी बन चुकी है. लेखक, चित्रकार होने के अलावा शौन टैन (Shaun Tan ) फिल्मकार भी हैं और उनकी लघु फिल्म “द लोस्ट थिंग” को सर्वश्रेष्ठ एनीमेटड फिल्म की श्रेणी में ऑस्कर एकेडेमी पुरस्कार मिल चुका है. शौन टैन (Shaun Tan ) ज्यादार अपनी चित्र-पुस्तकों (Picture books) के लिए विख्यात हैं और उनकी कूची शब्दों से कहीं ज्यादा बोलती है.

शौन टैन (Shaun Tan ) की ख्याति और उनके सम्मान को देखते हुए कम से कम यह आशा तो की ही जानी चाहिए कि भारत में उन चित्रकारों की चिंताजनक स्थिति पर गंभीरता से गौर फ़रमाया जाए जों पुस्तकों के लिए मुश्किल से ३०० से ५०० रुपये प्रति चित्र का पारिश्रमिक पाते हैं और जिनका पुस्तक के प्रकाशकीय विवरण में कहीं नाम तक दर्ज नहीं होता.

Saturday, June 18, 2011

प्रिय चैतन्य शर्मा के लिए : माँ पर दो बाल गीत


१.
घर में अकेली माँ ही बस
सबसे बड़ी पाठशाला है.
जिसने जगत को पहले पहल
ज्ञान का दिया उजाला है.

माँ से हमने जीना सीखा
माँ में हमको ईश्वर देखा
हम तो हैं माला के मनके
माँ मनकों की माला है.

माँ आँखों का मीठा सपना
माँ साँसों में बहता झरना
माँ है एक बरगद की छाया
जिसने हमको पाला है.

माँ कितनी तकलीफें झेले
बांटे सुख सबके दुःख ले ले
दया-धर्म सब रूप हैं माँ के,
और हर रूप निराला है.

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२.

अम्मां को क्या सूझी
मुझको कच्ची नींद सुलाकर
बैठ गई हैं धूप सेंकने
ऊपर छत पर जाकर

जाग गया हूँ मैं अब कैसे
खबर उन्हें पहुँचाऊँ?
अम्मां!अम्मां! कहकर उनको
कितनी बार बुलाऊँ?

पाँव अभी हैं छोटे मेरे
डगमग डगमग करते,
गिरने लगता हूँ मैं नीचे
थोडा-सा ही चलते.

कैसे चढ पाऊंगा मैं अब
इतना ऊंचा जीना?
सोच-सोच कर मुझे अभी से
है आ रहा पसीना.

हिंदी बाल साहित्य में चुटकुले


image courtesy:downloadcheapapp.com

बाल साहित्य में चुटकुलों का सर्वप्रथम प्रवेश कब और कैसे हुआ, इसका कोई प्रामाणिक विवरण इस समय मेरे पास नहीं है परन्तु यह कहने में मुझे कतई संकोच नहीं है कि बाल साहित्य में चुटकुलों को सबसे जयादा प्रचार एवं प्रसार बाल पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों के साहित्यिक परिशिष्टों के द्वारा ही मिला है. आज शायद ही बच्चो की कोई पत्रिका होगी जिसमे चुटकुलों को एकाधिक पृष्ठ की जगह न दी जाती हो. “पराग”, “नंदन”, “बाल भारती”. “बाल-वाटिका”, सुमन सौरभ”, “चंपक”, “लोटपोट”, “स्नेह” जैसी अनेक पत्रिकाएं अन्य बालोपयोगी सामग्री के साथ-साथ चुटकुलों का भी प्रकाशन करती रही हैं. चटपट, कहकहे, चुटकुले, देखों हंस न देना जैसे नियमित स्तंभ इसका साक्षात प्रमाण है.

चुटकुलों की लोकप्रियता का आखिर रहस्य क्या है और उनमे वह कौन-सा तत्व है जों हमारी मनहूसियत की गर्द को झाड कर हमारे अंदर गुदगुदी पैदा करता है? मुझे लगता है कि चुटकुलों में हाज़िर-जवाबी का जों बांका अंदाज़ होता है वही उनकी जान होता है. सहज-सा लगने वाला एक छोटा-सा गतिशील संवाद, कभी-कभी कितना मनोरंजक और चुटीला हो सकता है इसका अंदाज स्वयं बोलने वाले को नहीं होता परन्तु उसी संवाद को जब तीसरे माध्यम द्वारा रोचक शैली में अभिव्यक्त किया जाता है तो उसे सुन कर श्रोताओं के मुखड़ों पर अनायास मंद मुस्कान खिल उठती है या फिर उनके उन्मुक्त ठहाके गूंजने लगते हैं.

चुटकुलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हमारे जीवन में हास्य और जिंदादिली को जीवित रखते हैं. एक पल को सोचिये, हमारे जीवन से हंसी-खुशी दोनों ही गायब हो जाएँ तो क्या बचेगा? सिर्फ तनाव! और विडंबना देखिये कि तनाव से बचने के लिए लोग या तो अस्पताल पहुँचते हैं या फिर ऐसी जगह जहाँ एक तनाव अपना अस्तित्व खो कर रक्तबीज की तरह अनेक तनावों के रूप में प्रकट हो जाता है. परन्तु यह विडंबना सामान्यतः हम बडों की ही है, बच्चों की नहीं. बच्चों की सबसे बड़ी पूँजी उनकी मुस्कराहट और खिलखिलाहट होती है जिसे वे बीज की तरह भूमि में बोते हैं और लहलहाती फसल की तरह काटते हैं. बड़ों की अपेक्षा बच्चों की मनोभूमि अधिक उर्वरा होती है और शायद यही कारण है कि उनके पास हंसने और हंसाने के अनगिनत उपकरण होते हैं और अवसर भी. परन्तु इस सन्दर्भ में हम बड़ों की स्थिति सचमुच दयनीय है और हस्यास्पद भी. जरा अपने दिल पर ईमानदारी से हाथ रखकर पूछिये, क्या आपके पास चार चुटकुले भी ऐसे हैं जों आप यहां उपस्थित श्रोताओं को अभी-२ सुनाकर उनके मौन को ठहाकों में बदल सकें? नहीं ना? परन्तु यही बात अगर बच्चों से पूछी जाए तो वे अपने खजाने से एक नहीं दस-२ चुटकुले सुनाकर आपको अवाक कर देंगे. भले ही उनके सुनने का अंदाज अटपटा हो परन्तु उनका यही अटपटापन तो हमें भाता है.

यूँ एक तरह से देखा जाए तो चुटकुलों की प्रकृति कुछ-२ बुलबुलों के समान होती है जो अपनी चुलबुलाहट और खिलखिलाहट का सौंदर्य कुछ क्षणों के लिए बिखरा कर तिरोहित हो जाते हैं परन्तु इस क्षणिक सौंदर्य की चमक हमारी स्मृति में बार-बार कौंधती है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप अपने एकान्तिक अथवा सामूहिक क्षणों में उस कौंध से चमत्कृत होकर अपने आप ही मुस्कराने अथवा ठहाके भरने लगते हैं.

“चुटकुला”शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई इस सन्दर्भ में मैं दों विद्वान बाल सहित्य्रकारों के मतों के उल्लेख करना चाहूंगा.

डॉ. हरिकृष्ण देवसरे के शोध-प्रबंध “हिंदी-बालसाहित्य-एक अध्ययन” में दिए गए विवरण के अनुसार चुटकुला “चुट” और “कुला” दो शब्दों के योग से बना है. “चुट” का अर्थ है चुटकी अर्थात मजाक बनाना या हंसना और “कुला” का अर्थ है कुलेल यानी गुदगुदी. इस तरह “चुटकुला” का अर्थ हुआ गुदगुदाने वाली चुटकी..

दूसरा सन्दर्भ मैं डॉ. देवसरे द्वारा ही सम्पादित बाल साहित्य रचना और समीक्षा में प्रकाशित स्व० राधेश्याम प्रगल्भ के लेख “चुटकुले और पहेलियाँ” से देना चाहूंगा जिसके अनुसार “चुटकुला” या “चुटकला” “चोट” और “कला” शब्दों से मिल कर बना है और चोट करने वाली कला को चुटकुला या चुटकला कहा जाता है. यह (चुटकला) एक ऐसी कला है जों गहरे विषाद में डूबे हुए व्यक्ति को भी हंसाने-गुदगुदाने की सामर्थ्य रखती है. आश्रय-आलंबन, श्रोता-वक्ता सभी उल्लसित हो उठते हैं.”

प्रगल्भ जी के अनुसार व्युत्पत्ति कुछ भी हो इसमें दो मत नहीं कि चुटकुला हास्य रस का एक अद्भुत प्रयोग है. इस अद्भुत प्रयोग के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ इससे पूर्व मैं प्रगल्भजी की कुछ और मान्यताओं का उल्लेख करना चाहूंगा जिन पर हमारी-आपकी सहमति हो या न हो परन्तु इनसे हम सभी को एक दिशा अवश्य मिलती है. प्रगल्भजी मानते हैं कि चुटकुला लोक की थाती है, इसीलिये वह आनन-फानन हजारों किलोमीटर की यात्रा कर लेता है. दूसरे, चुटकुले को जन्म विद्वान लोग नहीं दे पाते. उनकी ज्ञान- गरिमा इसमें बाधक होती है. मूर्ख लोग भी चुटकुले नहीं गढ़ पाते, क्योंकि यह उनके वश की बात ही नहीं. वास्तव में चुटकुलों को जन्म देते हैं वे बुद्धिमान लोग जों प्रत्युत्पन्नमति संपन्न होते हैं.

अपनी सहूलियत के लिए मैं प्रगल्भजी के इन प्रत्युत्पन्नमति संपन्न लोगों में उन बच्चों को शामिल कर लेता हूँ जिनके भोले सवाल-जवाब ऐसे चुटकुलों की ज़मीन तैयार करते हैं जिनसे आज बाल साहित्य संपन्न हो रहा है. वैसे इसमें दो राय नहीं कि चुटकुले श्रुति-परंपरा की ही उपज रहे हैं और यह परंपरा हमारे प्राचीन कथासाहित्य एवं राज-दरबारों में नियुक्त विदूषकों की हाजिरजवाबी के प्रसंगों में खोजी जा सकती है, भले ही उनका रूप अब प्रक्षिप्त हो गया हो.

रूप, गुण, और आकार के आधार पर चुटकुलों की संख्या यद्यपि अनगिनत है क्योंकि उनका प्रचलन हर समाज में सदियों से रहा है. परन्तु अगर हम अपने विषय तक सीमित रहें तो खेद की बात यह है कि हिंदी में बच्चों के चुटकुलों की अच्छी किताबें आज कहीं नहीं है. बहुत खोजबीन के बाद एक पुस्तक मुझे प्राप्त हुई है-“बच्चों के जोक्स” जों डायमंड पाकेट बुक्स (प्र०) लि० , नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है. इसमें महेश शर्मा द्वारा संकलित लगभग पांच सौ से ऊपर बच्चों के चुटकुले प्रकाशित हैं. अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में मेरी जानकारी नहीं परन्तु अंग्रेजी में बच्चों के चुटकुलों पर सैंकडों किताबें उपलब्ध हैं जिनकी विस्तृत सूची Amazon.com वेब साईट पर देखी जा सकती है. ऐसी कुछ पुस्तकों के नाम मैं आपकी जानकारी के लिए यहाँ उद्धृत करना चाहूंगा: ये पुस्तकें हैं:

“ 500 Hilarious Jokes for kids by Jeff Rovin, 1000 jokes knock knock jokes for kids by Michel Kilgariff, The Treasury of clean Children’s jokes by Tal D Burham, The Australian Children’s jokes book by Heath Billon, More jokes for Children by Margurite Kohl, The A-Z Encyclopedia of Jokes by Sandy Ramsford, Children’s Little Jokes Book by Derek Fortune, Children’s humour: A joke for every Occasion by Michael Dahl, 1000 crazy jokes for kids by Michel Johnstone,

Amazon.com के अलावा इन्टरनेट पर सैंकडों और ऐसे वेब साईट हैं जिन पर बच्चों के लिए अनगिनत चुट्कुलें उपलब्ध हैं उदहारण के लिए : www.kidsjokes.com, www.kidsmahal.com आदि.

चुटकुले कब और कहाँ जन्म लेते हैं, उन्हें कौन संकलित करता है और प्रकाशन के लिए उनका कौन कहाँ कैसे उपयोग करता है, इन प्रश्नों के उत्तर खोजना आसान नहीं है. सामान्यतः चुटकुलों पर मौलिकता की मोहर नहीं लगी होती और न ही इस विधा में हिंदी के जाने-माने बाल साहित्यकार आज सक्रिय हैं. फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी कृपा से हमें हास्य रस-पूरित इस साहित्यिक विधा की थोड़ी-बहुत खुराक समय-समय पर मिलती रही है. इनमे सर्वश्री सुरेन्द्र श्रीवास्तव, अयोध्या प्रसाद “भारती”, एस.प्रेम, कृष्ण कुमार “अचूक”, रेहांना खातून, नैयर आज़म, पी.एस. सचदेव, अजहरूदीन फरीदी शीबू, प्रीती गुप्ता, पंकज द्विवेदी, ध्रुव कुमार, भाई लाल सेन, तरुण के साहू, रश्मि रावत, शादाब खान आदि शामिल हैं.

बच्चों के जवाब कितने चतुराई भरे होते हैं इसकी एक झलक इन चुटकुलों में देखी जा सकती है _ एक दोस्त दूसरे से पूछ रहा है – “ खेलने से क्या फायदा होता है? दूसरा दोस्त जवाब देता है – “ उतनी देर हमें पढ़ना नहीं पड़ता.” दूसरा चुटकुला अध्यापक और एक शैतान छात्र से सम्बंधित है. अध्यापक शैतान छात्र से कह रहा है – “मैं नालायक को लायक नहीं बना सकता.” छात्र जवाब देता –“ लेकिन मैं बना सकता हूँ.” अध्यापक पूछता है-“वो कैसे?” छात्र कहता –“”ना” शब्द हटाकर. इसी तरह अध्यापक एक छात्र से पूछता है कि घोड़े और गधे में क्या अंतर है? तो छात्र का जवाब होता है-“सर, घोडा तेज लोगों की सवारी है और गधा आलसियों की सवारी.”

अब ज़रूरी नहीं कि बच्चों के चुटकुलों में बातचीत करने वाले मुख्य पात्र बच्चे ही हों, वे छोटे-बड़े, स्त्री –पुरुष, सींकिया-पहलवान, डॉक्टर-मरीज़, या समाज के अन्य किसी भी वर्ग के लोग हो सकते हैं. बस मुख्य बात यह है कि उन चुटकुलों से बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन होना चाहिए और मनोरंजन के साथ-साथ अगर उनकी बुद्धि का विकास होता है तो सोने में सुहागा हो जाएगा.

दो सहेलियों की यह बातचीत आपकी जानकारी में काफी इजाफा कर सकती हैं. रानी अपनी सहेली से कह रही है – “क्या बात है बहन, आजकल तुम्हारे भाई का रंग बड़ा साफ़ होता जा रहा है.” सहेली मुस्करा कर अपने भाई की ब्यूटी का रहस्य खोलती है –“दरअसल पहले वह कोयले की दूकान चलते थे, अब उनकी आटे की दूकान है.”

कुछ चुटकुले कभी-कभी आपकी कुछ ज्यादा ही समझदारी का बयान कर देते हैं. उदाहरण के लिए जरा इन दो मित्रों की बातचीत सुनिए. विवेक पूछ रहा है –“अरे, रवि, तुम्हारे हाथ में चोट कैसे लगी? रवि दर्द से कराहते हुए कहता है –“क्या बताऊँ यार, मैंने गाय के दांत गिनने के लिए उसके मुंह में हाथ डाला और उसने मेरी उंगली गिनने के लिए मुंह बंद कर लिया. ” इसी तरह की एक्स्ट्रा समझदारी का एक और चुटकुला है – अध्यापक छात्र से पूछ रहा है – “यदि नाव में पानी भरने लगे तो क्या करना चाहिए? छात्र जवाब देता है – “जी, उस पानी को निकालने के लिए नाव की पेंदी में छेद कर देना चाहिए.”

चुटकुलों के इन चंद उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि चुटकुलों में सामान्य उक्ति अपना असर नहीं दिखाती. असर दिखाती है “वक्रोक्ति”, परन्तु इस वक्रोक्ति का प्रयोग इतनी सहजता और भोलेपन के साथ होता है कि वह आपके अंदर तिलमिलाहट नहीं वरन गुदगुदाहट पैदा करती है. शायद इसीलिये चुटकुला व्यंग्य की अपेक्षा हास्य का ज्यादा अभिन्न अंग लगता है.

आप-हम सभी जानते हैं कि जीवन में विनोद के क्षण दिनों-दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं इसलिए चुटकुला जैसी लोकप्रिय विधा को बाल साहित्य में उसका गरिमामय स्थान मिलना ही चाहिए परन्तु यह तभी संभव है जब बालोपयोगी चुटकुलों की अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की जाएँ. इस आग्रह के साथ अंत में मैं अपनी बात एक चुटकुले से ही खत्म करना चाहूंगा. अध्यापक अपने छात्र से पूछता है_
”क्या बात है, कक्षा में तुम हरदम मुस्कराते हो.”
छात्र जवाब देता है- “ सर, मेरा नाम ही “इस्माइल खां” है..

-रमेश तैलंग
(त्रिवर्णा से साभार)

Thursday, June 16, 2011

बाल साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए क्या करें बच्चे?


बाल-साहित्य के जन्म, पोषण एवं प्रसार में लेखक तथा प्रकाशक की भूमिका तो महत्वपूर्ण है ही पर इससे भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिका बाल-पाठकों की है जिन तक पहुँच कर बाल-साहित्य अपने श्रेय और प्रेय को प्राप्त करता है.



बाल साहित्य के इस सिद्ध अवस्था तक पहुँचने के मार्ग में कई प्रश्न सामने आते हैं. जैसे बच्चों को बाल साहित्य अथवा पाठ्य सामग्री की जानकारी होना. यहाँ पाठ्य सामग्री से मेरा अभिप्राय पाठ्य पुस्तकों से न होकर इतर पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं एवं पांडुलिपियाँ आदि सभी से है.

बच्चों में पढ़ने की रूचि होना, पाठ्य सामग्री का बच्चों के लिए उपलब्ध होना, पढ़ने के लिए बच्चों के पास समय होने और पढ़ने के बाद उनके मन में यदि कुछ सवाल अथवा शंकाएं उठें तो उनका समुचित निवारण होना. इन सभी प्रश्नों के हल ढूँढने में स्वयं बच्चे किस तरह पहल कर सकते हैं, मेरा यह लघु आलेख इसी दिशा में कुछ विनम्र सुझाव प्रस्तुत करता है:

जहाँ तक पढने योग्य बाल साहित्य या सामग्री की जानकारी प्राप्त करने का प्रश्न है यह जानकारी बच्चे अपने परिवारजनों, मित्रों, सहपाठियों, या गुरुजनों किसी से भी प्राप्त कर सकते हैं. शर्त बस यही है कि उनमे पढ़ने का उत्साह होना चाहिए.

बच्चे आपस में बात-चीत करते समय या पत्र-व्यवहार द्वारा एक-दूसरे से पूछ सकते हैं कि क्या उन्होंने इन दिनों कोई अच्छी रचना या पुस्तक पढ़ी हैं. अगर पढ़ी है तो कहाँ पढ़ी है उसमे क्या अच्छा लगा या बुरा. हो सकता है ऐसे प्रश्न करते समय कुछ बच्चों को संकोच महसूस हो पर भई, जब आप एक दूसरे से यह पूछ सकते हो कि फलानी पिक्चर किस थिएटर पर चल रही है. आज टी.वी.पर क्रिकेट मेच कितने बजे आ रहा है या लल्लू को कक्षा में मास्टर जी ने कितने घंटे मुर्गा बनाया तो पुस्तक आदि की जानकारी लेने में ही कोई हर्ज या शर्म नहीं होनी चाहिए. पत्र-मित्र क्लब जैसी संस्थाएं भी इस दिशा में सहयोग कर सकती है.

कुछ बच्चों को, हो सकता है, स्वयं लिखने का शौक हो. और यदि ऐसा है तो वे आपस में एक-दूसरे की लिखी हुई रचनाओं का आदान-प्रदान या पठन-पाठन कर सकते हैं. इस ज़रिये उन्हें स्वयं के एवं दूसरों की लेखन क्षमता का पता चलेगा. दूसरे, वे एक दूसरे की रचनाओं के पाठक भी बन सकेंगे.

अब आता है पुस्तकों या रचनाओं में बच्चों की रूचि जागृत होने का सवाल. यह आवश्यक नहीं कि हर बच्चे की हर विषय में रूचि हो. किसी को साहित्यिक विषयों में रूचि हो सकती है तो किसी को गैर-साहित्यिक विषयों में या हो सकता है कि किसी को पढ़ने में ही रूचि न हो. परन्तु अगर पढ़ना खेल खेलने की तरह दिमागी कसरत एवं मनोरंजन करने का साधन बन जाए तो शायद हर बच्चा पढ़ना चाहेगा. थोडा बहुत कौतूहल तो हर बच्चे में होता है. मान लो कि कुछ बच्चो को फिल्म में रूचि है. वे फिल्मे चलचित्र गृहों में अथवा टी.वी. पर देखते हैं परन्तु कभी-कभी कुछ बच्चों में यह जानकारी प्राप्त करने की ललक अवश्य पैदा होती होगी कि फ़िल्में बनती कैसे हैं? कौन होते हैं जों उन्हें बनाते हैं आदि-आदि. अब यदि ये जानकारी चाहिए और बच्चों की इस विषय में रूचि है तो किससे पता चलेगा यह सब. टी.वी पर बैताल-पच्चीसी, चंद्रकांता, एलिस इन द वंडरलैंड, मिस्टर बीन, आदि धारावाहिक ज्यादातर बच्चों ने देखे होंगे पर कितने बच्चे होंगे जिन्होंने इन रचनाओं के लेखकों के बारे में पता लगाया होगा. वे कौन थे, उन्होंने कब लिखी ये रचनाएँ आदि.

रूचि और कौतुहल दोनों ज्ञान प्राप्त करने की पूर्व आवश्यकताएं हैं चाहे वह् ज्ञान नया हो या पुराना . एक कहावत है कि साहित्य पढ़ो तो प्राचीन, विज्ञानं पढ़ो तो नवीन. इस कहावत से मेरा आशय नए-पुराने के विवाद में पड़ना नहीं, अपितु मेरा निवेदन यही है कि हमें ज्ञान-विज्ञानं के शिखर पर दृष्टि रखते हुए भी अपनी प्राचीन परम्पराओं एवं प्राचीन साहित्य को नहीं भूलना चाहिए. विकास की पहली सीढी अगली सीढी से कम महत्वपूर्ण नहीं होती. इसलिए बच्चों को पुरातन और नवीन दोनों में अपनी रूचि बढानी चाहिए. पुरातन की समीक्षा करते रहना चाहिए और नए की खोज करते रहना चाहिए.

जहाँ तक पढ़ने योग्य पुस्तकों या रचनाओं के उपलब्ध होने का सवाल है तो ये पुस्तकालयों का सदस्य बनकर प्राप्त की जा सकती हैं. जिन बच्चों को कोई पुस्तक या पत्रिका आसानी से मिल जाती है चाहे खरीद कर या पुस्तकालय से वेकम-से कम एक दूसरे को ले देकर अपनी समस्या का हल कर सकते हैं. यदि दस-बारह बच्चे एक ग्रुप बनाकर इस दिशा में पहल करें तो पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर प्रकाशित लेखों, कहानियो आदि की जीरोएक्स कापियां भी एक दूसरे को भेज सकते हैं. समर्थ ही असमर्थ की सहायता करता है एवं ज्ञान का प्रसार भी इसी तरह होता है. ठीक है, जीरोएक्स कोपी करवाना भी धन साध्य है पर कभी-कभी "अंकल" शब्द बड़ा काम आता है. किसी एक जीरोएक्स वाले से, जों आप के आस-पास हो, संपर्क करके दस-बारह बच्चों का ग्रुप सस्ती दर् पर नियमित रूप से यह काम करवा सकता है. फिर पत्रिकाओं का तो भाई ऐसे है कि एक दो महीने पुरानी पत्रिकाएं बड़े शहरों के फुट-पाथों पर आधे-चौथाई मूल्य पर मिल जाती हैं. थोडा सा जेब खर्च इस मद पर भी लगा दिया जाय तो बुरा नहीं.

सबसे बड़ी समस्या है समय की. ज्यादातर बच्चे स्कूल और होमे वर्क में इतने फंसे रहते हैं कि उनको अन्य पुस्तकें पत्रिकाएं पढ़ने का समय ही नहीं मिलता पर क्या सचमुच ऐसा है? आप खाना तो खाते ही होंगे. दैनिक चर्चा भी करते होंगे, सोते भी होंगे, इन सब कामों में भी तो समय खर्च होता है. मूल बात है समय का सही उपयोग करना. केवल यही नहीं, कि पुस्तकें पढ़ने के लिए आप ही समय दें. होना तो यह चाहिए कि इसमें अपने माता-पिता अथवा अभिभावक गण को भी शामिल करें. किसी ने कहा है कि बड़े लोगों का बच्चों के लिए सवसे बड़ा विनियोजन उनके द्वारा बच्चों के लिए दिया गया समय है - "The best investment, you can make for the children is to give them your time." बच्चे होने के नाते अभिभावकों से समय प्राप्त करना तो बच्चों का अधिकार है और कर्त्तव्य भी. क्योंकि जो आज बच्चे हैं वे ही आज के पाठक हैं और कल के लेखक भी.

Tuesday, June 14, 2011

बच्चों की दुनिया में कुछ इधर से - कुछ उधर से


image courtesy: clipartof.com

* अमरीका में अब कारों के अंदर, जिनमे १४ साल से कम उम्र के बच्चे सफर कर रहे हों , धूम्रपान पर कानूनी प्रतिवंध लग गया है. खबर ये है कि जों वयस्क व्यक्ति इस कानून का उल्लंघन करता पाया जाएगा उसे १०० अमरीकी डॉलर तक का जुरमाना भरना पड़ सकता है. हमारे देश में सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान न करने का क़ानून तो लागू हो गया है पर देखने की बात यह है कि कारों में बच्चों के साथ सफर करने वाले वयस्कों के धूम्रपान पर भी हमारा देश प्रतिवंध लगाता है कि नहीं..

* पोश कोलोंनियों में बने आलीशान घरों में खिड़कियों पर "विंडो ब्लाइंड्स " का प्रयोग आम बात है. पर अमेरिका में इस उत्पाद के खतरे सामने आ रहे हैं. एक खबर के अनुसार औसतन वहाँ (लिंक: http://www.latimes.com/health/ct-met-blinds-20110608,0,3864096.story) हर महीना कोई न कोई नन्हा बच्चा इन "विंडो ब्लाइंड्स " की रस्सियों में गर्दन उलझाकर मर जाता है. ऐसा घर वालों की लापरवाही से भी हो सकता है जों बच्चे पर ठीक से नज़र नहीं रख पाते या फिर इस उत्पाद से जुड़े उपकरण ही नन्हे बच्चों के जीवन के लिए खतरा बन सकते हैं. इन खतरों से बचने के उपायों पर वहाँ विशेषज्ञों के बीच एक बहस छिड़ी हुई है.

Sunday, June 12, 2011

नानी की चिठ्ठी -८

मेरे चिरंजीवो
सभी खुश रहो, स्वस्थ रहो, कर्मशील रहो .

आजकल लगता है तुम्हारी नानी को बुढापा कुछ ज्यादा ही परेशान कर रहा है. अब तुम्ही देखो ना मैंने तुमसे रोज एक चिठ्ठी लिखने का वादा किया था और अब मैं ही नागा पर नागा किये जा रही हूँ. ऐसा नहीं है कि मुझे तुम सबकी याद नहीं आती. सच तो ये है कि तुम सब के चेहरे मेरी आँखों के आगे सदैव घूमते रहते हैं. हाँ, थोडा मन उदास अवश्य जाता है. तब और ज्यादा जब किसी की हारी-बीमारी की खबर सुन लेती हूँ. कुछ ऐसी ही खबर अभी पिछले दो दिनों में सुन ली.

पता नहीं तुम सबने बच्चों की एक पत्रिका "सुना बहुनि" का नाम सुना है कि नहीं. यह पत्रिका उड़ीसा के बिजय मोहपात्र एक सौ से अधिक भाषाओँ में सम्पादित एवं प्रकाशित करते हैं. छरहरे बदन के सरल व्यक्तित्व वाले विजय मोहापात्र को उनके इस अद्वितीय कार्य के लिए अनेकों सम्मान और इनाम मिले हैं और उनका नाम लिम्का बुक्स ऑफ रिकोर्ड्स में भी दर्ज हुआ है.
विजय खुद बताते हैं कि उन्होंने इस पत्रिका के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और घरबार, पैसा सभी कुछ लगा दिया. इस ब्लॉग पर उनकी एक तस्वीर भी तुम देख सकते हो. विजय जितने सरल व्यक्ति हैं उतनी ही सरल उनकी पत्नी श्रीमती विजयलक्ष्मी हैं.

दुःख की बात यह है कि विजय आजकल पेट में हुए रेनल केंसर से गंभीर रूप से बीमार हैं और उनका इलाज़ कटक के आचार्य हरिहर रीजनल केंसर सेंटर में चल रहा है. इलाज बहुत मंहगा है और उसके लिए बहुत पैसे कि आवश्यकता है. विजय बहुत ही स्वाभिमानी व्यक्ति हैं और किसी के आगे हाथ फैलाना पसंद नहीं करते. कुछ सहृदय व्यक्ति उनकी सहायता के लिए आगे आ रहें हैं.

मैं तुम सब को यह समाचार सुना कर चिंता में नहीं डालना चाहती थी पर मैं यह भी जानती हूँ कि तुम सब इक्क्सीवीं सदी के बच्चे हो और हर दुःख, हर मुसीबत के पार जा सकते हो. साथ ही यह भी सच है कि रोग को दूर करने में दवा से ज्यादा दुआ काम करती है. तो हम इतना तो कर ही सकते हैं कि ईश्वर से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें कि वह विजय मोहापात्र को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करे और वे जल्दी ही स्वस्थ हो कर अपने घर लौटें. सामूहिक प्रार्थना चमत्कारिक असर करती है, तो चलो, अपनी-अपनी जगह पर रहते हुए हम सब विजय के रोग निवारण हेतु प्रार्थना करें. ईश्वर सचमुच बड़ा दयालु है वह हम सबकी प्रार्थनाअवश्य सुनेगा.

शेष फिर,

तुम्हारी अपनी नानी

SUNA BAHUNI -सुना बहनी के संपादक बिजोय मोहापात्र रेनल केंसर से पीड़ित

अभी कल के टाइम्स ऑफ इंडिया के कटक एडिशन में एक समाचार ने मुझे हतप्रभ कर दिया है. समाचार सुना बहनी के ४२ वर्षीय संपादकबिजोय मोहापात्र के बारे में है जों रेनल कंसर से पीड़ित है और कटक के आचार्य हरिहर रीजनल कंसर सेण्टर में अपना इलाज करा रहे हैं.बिजोय मोहापात्र अभी पिछले सितम्बर में मुझे भीलवारा राजस्थान में आयोजित बालसाहित्य समारोह में अपनी पत्नी विजयलक्ष्मी के साथ मिले थे तत् काफी प्रसन्न चित्त और उत्साही नज़र आ रहे थे. पिछले महीने भी शायद वे दिल्ली में थे तब उन्होंने मुझे फोन किया था पर तब इस बीमारी के बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया. विजय के बारे में क्या कहूँ, बच्चों की एक पत्रिका को निकलने में उन्हें यश जरूर मिला पर अपना घरबार तथा सब पैसा खर्च कर दिया उन्होंने. स्वाभिमान इतना कि किसी से भी कभी कुछ नहीं माँगा. पत्रिका मुफ्त में बांटी और एक मौन द्वारा सहयोग की कामना की.

ईश्वर से करबद्ध प्रार्थना है कि विजय शीघ्र स्वस्थ हो कर अस्पताल से लौटें और उनके मित्रवर्गों से उन्हें भरपूर दुआएं तथा सहयोग मिले. उड़ीसा सरकार से भी अपेक्षा है कि वह बिजोय मोहापात्र को स्वस्थ्य लाभ पाने के लिए हर तरह से मदद करे.

बिजोय मोहापात्र के समाचार से सम्बंधित लिंक नीचे दे रहा हूँ
:http://timesofindia.indiatimes.com/city/bhubaneswar/Publisher-of-childrens-magazine-battles-cancer/articleshow/8817695.cms

Thursday, June 9, 2011

गाओ-गुनगुनाओ


गुब्बारा लाए बज्जी से, फुट्ट-फुट्ट हो गया फटाक

ऊं..ऊं..ऊं.. मम्मी, अब मैं क्या करूँ बताओं ना.
देर करो न, चलो, दूसरा नया दिलाओं ना,
कब तक बैठा रहूँ फुलाकर मैं गुस्से में नाक.

किसे पता था वह टकरा जाएगा पंखे से
फुट्ट-फुट्ट हो जाएगा पल भर में झटके से
देखा तो रह गया अचानक मैं ओंचक्क-अवाक.

एक बार बस एक बार फिर मन की कर दो ना,
पांच रुपये का नोट हथेली पर बस धर दो ना,
पांच रुपये में हो जाएगी अपनी धूम-धमाक.

गाओ-गुनगुनाओ


गोरी-गोरी बिजुरी, कारे-कारे बदरा.
नन्हीं-नन्हीं बूंदों का गूंथ रहे गजरा.

गजरा खरीदने छोटी मुन्नी जाएगी.
रिब्बन वाली चोटियों में बाँधके सजाएगी.
आँखें मटकाएगी, करेगी खूब नखरा.

गजरा खरीदने बूढ़ी नानी जाएगी.
नाक-भों सिकोडके वापस आ जाएगी
"गजरे वाले अच्छा नहीं है तेरा गजरा".

गजरा खरीदने गिलू गिलहरी जाएगी.
कुट-कुट, कुट-कुट करके अपनी पूंछ हिलाएगी
पूंछ में उलझ रह जाएगा जी गजरा.

गजरा खरीदने चींची चाची जाएगी.
रस्ते के बीच थोड़ी धूप निकल आएगी
बूंदें उड़ जाएंगीं, उड़ जाएगा जी गजरा.


image courtesy: loadstorm.com

Saturday, June 4, 2011

गाओ-गुनगुनाओ


सूखी नदी देख कर......


सूखी नदी देख कर सचमुच अच्छा नहीं लगा.

पहले कैसी भरी-भरी थी
ऊपर तक जल से,
रोज नया संगीत सुनाती
थी कल-कल-कल से,
जब से सूने पड़े किनारे, मेला नहीं लगा.

कहाँ खो गए वृक्ष, लताएँ,
फूल, पात तट के,
क्या हो गया परिंदों को
जो पास नहीं फटके,
सब कुछ अपना हो कर भी कुछ अपना नहीं लगा.

कुछ तो भूल हुई है हमसे
हे पर्वत देवा!
या फिर हमने सच्चे मन से
करी नहीं सेवा,
बड़े दिनों से जुगल चरण पर मत्था नहीं लगा.


(image:courtesy-understandinggov.org)

Friday, June 3, 2011

गाओ-गुनगुनाओ


चाँद के चेहरे पे....

चाँद के चेहरे पे रात का डिठौना.
देखो जी, देखो जी,देखो, देखो न.

चौदह दिनों तक था आधा अधूरा,
पूनम के घर आया आज भरा-पूरा.
चाँदी की थाली में गोल-गोल सोना.
देखो जी, देखो जी, देखो,देखो न.

आएगी काली-कलूटी अमावस
ले जाएगी फिर चुराकर इसे बस
आँखों से दूर जा बसेगा सलोना.
देखो जी, देखो जी, देखो, देखो न.

chitra:courtesy:cofiboi.wordpress.com