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Thursday, June 16, 2011

बाल साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए क्या करें बच्चे?


बाल-साहित्य के जन्म, पोषण एवं प्रसार में लेखक तथा प्रकाशक की भूमिका तो महत्वपूर्ण है ही पर इससे भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिका बाल-पाठकों की है जिन तक पहुँच कर बाल-साहित्य अपने श्रेय और प्रेय को प्राप्त करता है.



बाल साहित्य के इस सिद्ध अवस्था तक पहुँचने के मार्ग में कई प्रश्न सामने आते हैं. जैसे बच्चों को बाल साहित्य अथवा पाठ्य सामग्री की जानकारी होना. यहाँ पाठ्य सामग्री से मेरा अभिप्राय पाठ्य पुस्तकों से न होकर इतर पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं एवं पांडुलिपियाँ आदि सभी से है.

बच्चों में पढ़ने की रूचि होना, पाठ्य सामग्री का बच्चों के लिए उपलब्ध होना, पढ़ने के लिए बच्चों के पास समय होने और पढ़ने के बाद उनके मन में यदि कुछ सवाल अथवा शंकाएं उठें तो उनका समुचित निवारण होना. इन सभी प्रश्नों के हल ढूँढने में स्वयं बच्चे किस तरह पहल कर सकते हैं, मेरा यह लघु आलेख इसी दिशा में कुछ विनम्र सुझाव प्रस्तुत करता है:

जहाँ तक पढने योग्य बाल साहित्य या सामग्री की जानकारी प्राप्त करने का प्रश्न है यह जानकारी बच्चे अपने परिवारजनों, मित्रों, सहपाठियों, या गुरुजनों किसी से भी प्राप्त कर सकते हैं. शर्त बस यही है कि उनमे पढ़ने का उत्साह होना चाहिए.

बच्चे आपस में बात-चीत करते समय या पत्र-व्यवहार द्वारा एक-दूसरे से पूछ सकते हैं कि क्या उन्होंने इन दिनों कोई अच्छी रचना या पुस्तक पढ़ी हैं. अगर पढ़ी है तो कहाँ पढ़ी है उसमे क्या अच्छा लगा या बुरा. हो सकता है ऐसे प्रश्न करते समय कुछ बच्चों को संकोच महसूस हो पर भई, जब आप एक दूसरे से यह पूछ सकते हो कि फलानी पिक्चर किस थिएटर पर चल रही है. आज टी.वी.पर क्रिकेट मेच कितने बजे आ रहा है या लल्लू को कक्षा में मास्टर जी ने कितने घंटे मुर्गा बनाया तो पुस्तक आदि की जानकारी लेने में ही कोई हर्ज या शर्म नहीं होनी चाहिए. पत्र-मित्र क्लब जैसी संस्थाएं भी इस दिशा में सहयोग कर सकती है.

कुछ बच्चों को, हो सकता है, स्वयं लिखने का शौक हो. और यदि ऐसा है तो वे आपस में एक-दूसरे की लिखी हुई रचनाओं का आदान-प्रदान या पठन-पाठन कर सकते हैं. इस ज़रिये उन्हें स्वयं के एवं दूसरों की लेखन क्षमता का पता चलेगा. दूसरे, वे एक दूसरे की रचनाओं के पाठक भी बन सकेंगे.

अब आता है पुस्तकों या रचनाओं में बच्चों की रूचि जागृत होने का सवाल. यह आवश्यक नहीं कि हर बच्चे की हर विषय में रूचि हो. किसी को साहित्यिक विषयों में रूचि हो सकती है तो किसी को गैर-साहित्यिक विषयों में या हो सकता है कि किसी को पढ़ने में ही रूचि न हो. परन्तु अगर पढ़ना खेल खेलने की तरह दिमागी कसरत एवं मनोरंजन करने का साधन बन जाए तो शायद हर बच्चा पढ़ना चाहेगा. थोडा बहुत कौतूहल तो हर बच्चे में होता है. मान लो कि कुछ बच्चो को फिल्म में रूचि है. वे फिल्मे चलचित्र गृहों में अथवा टी.वी. पर देखते हैं परन्तु कभी-कभी कुछ बच्चों में यह जानकारी प्राप्त करने की ललक अवश्य पैदा होती होगी कि फ़िल्में बनती कैसे हैं? कौन होते हैं जों उन्हें बनाते हैं आदि-आदि. अब यदि ये जानकारी चाहिए और बच्चों की इस विषय में रूचि है तो किससे पता चलेगा यह सब. टी.वी पर बैताल-पच्चीसी, चंद्रकांता, एलिस इन द वंडरलैंड, मिस्टर बीन, आदि धारावाहिक ज्यादातर बच्चों ने देखे होंगे पर कितने बच्चे होंगे जिन्होंने इन रचनाओं के लेखकों के बारे में पता लगाया होगा. वे कौन थे, उन्होंने कब लिखी ये रचनाएँ आदि.

रूचि और कौतुहल दोनों ज्ञान प्राप्त करने की पूर्व आवश्यकताएं हैं चाहे वह् ज्ञान नया हो या पुराना . एक कहावत है कि साहित्य पढ़ो तो प्राचीन, विज्ञानं पढ़ो तो नवीन. इस कहावत से मेरा आशय नए-पुराने के विवाद में पड़ना नहीं, अपितु मेरा निवेदन यही है कि हमें ज्ञान-विज्ञानं के शिखर पर दृष्टि रखते हुए भी अपनी प्राचीन परम्पराओं एवं प्राचीन साहित्य को नहीं भूलना चाहिए. विकास की पहली सीढी अगली सीढी से कम महत्वपूर्ण नहीं होती. इसलिए बच्चों को पुरातन और नवीन दोनों में अपनी रूचि बढानी चाहिए. पुरातन की समीक्षा करते रहना चाहिए और नए की खोज करते रहना चाहिए.

जहाँ तक पढ़ने योग्य पुस्तकों या रचनाओं के उपलब्ध होने का सवाल है तो ये पुस्तकालयों का सदस्य बनकर प्राप्त की जा सकती हैं. जिन बच्चों को कोई पुस्तक या पत्रिका आसानी से मिल जाती है चाहे खरीद कर या पुस्तकालय से वेकम-से कम एक दूसरे को ले देकर अपनी समस्या का हल कर सकते हैं. यदि दस-बारह बच्चे एक ग्रुप बनाकर इस दिशा में पहल करें तो पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर प्रकाशित लेखों, कहानियो आदि की जीरोएक्स कापियां भी एक दूसरे को भेज सकते हैं. समर्थ ही असमर्थ की सहायता करता है एवं ज्ञान का प्रसार भी इसी तरह होता है. ठीक है, जीरोएक्स कोपी करवाना भी धन साध्य है पर कभी-कभी "अंकल" शब्द बड़ा काम आता है. किसी एक जीरोएक्स वाले से, जों आप के आस-पास हो, संपर्क करके दस-बारह बच्चों का ग्रुप सस्ती दर् पर नियमित रूप से यह काम करवा सकता है. फिर पत्रिकाओं का तो भाई ऐसे है कि एक दो महीने पुरानी पत्रिकाएं बड़े शहरों के फुट-पाथों पर आधे-चौथाई मूल्य पर मिल जाती हैं. थोडा सा जेब खर्च इस मद पर भी लगा दिया जाय तो बुरा नहीं.

सबसे बड़ी समस्या है समय की. ज्यादातर बच्चे स्कूल और होमे वर्क में इतने फंसे रहते हैं कि उनको अन्य पुस्तकें पत्रिकाएं पढ़ने का समय ही नहीं मिलता पर क्या सचमुच ऐसा है? आप खाना तो खाते ही होंगे. दैनिक चर्चा भी करते होंगे, सोते भी होंगे, इन सब कामों में भी तो समय खर्च होता है. मूल बात है समय का सही उपयोग करना. केवल यही नहीं, कि पुस्तकें पढ़ने के लिए आप ही समय दें. होना तो यह चाहिए कि इसमें अपने माता-पिता अथवा अभिभावक गण को भी शामिल करें. किसी ने कहा है कि बड़े लोगों का बच्चों के लिए सवसे बड़ा विनियोजन उनके द्वारा बच्चों के लिए दिया गया समय है - "The best investment, you can make for the children is to give them your time." बच्चे होने के नाते अभिभावकों से समय प्राप्त करना तो बच्चों का अधिकार है और कर्त्तव्य भी. क्योंकि जो आज बच्चे हैं वे ही आज के पाठक हैं और कल के लेखक भी.

2 comments:

  1. बहुत सुंदर बात बताती पोस्ट...... फोटो भी सुंदर हैं

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  2. धन्यवाद चैतन्य तुम्हे और तुम्हारी प्यारी-प्यारी ममा डॉ.मोनिका शर्मा को. मैंने तुम्हारा और तुम्हारी प्यारी-प्यारी ममा दोनों के ब्लोग्स देखे हैं. इतने प्यारे हैं कि देखते ही अनुसरण कर दिया. ममा से तुम बहुत प्यार करते हो और ममा भी तुमसे प्यार करती है. माँ होती ही है ऐसे. माँ पर लिखे अपने दो बाल गीत इस ब्लॉग पर डाल रहा हूँ सिर्फ तुम्हारे लिए (सॉरी तुम्हारे जैसे सभी बच्चों के लिए) जों ममा से बहुत बहुत बहुत प्यार करते हैं. लिखना कैसे लगे:

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