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Saturday, June 18, 2011

हिंदी बाल साहित्य में चुटकुले


image courtesy:downloadcheapapp.com

बाल साहित्य में चुटकुलों का सर्वप्रथम प्रवेश कब और कैसे हुआ, इसका कोई प्रामाणिक विवरण इस समय मेरे पास नहीं है परन्तु यह कहने में मुझे कतई संकोच नहीं है कि बाल साहित्य में चुटकुलों को सबसे जयादा प्रचार एवं प्रसार बाल पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों के साहित्यिक परिशिष्टों के द्वारा ही मिला है. आज शायद ही बच्चो की कोई पत्रिका होगी जिसमे चुटकुलों को एकाधिक पृष्ठ की जगह न दी जाती हो. “पराग”, “नंदन”, “बाल भारती”. “बाल-वाटिका”, सुमन सौरभ”, “चंपक”, “लोटपोट”, “स्नेह” जैसी अनेक पत्रिकाएं अन्य बालोपयोगी सामग्री के साथ-साथ चुटकुलों का भी प्रकाशन करती रही हैं. चटपट, कहकहे, चुटकुले, देखों हंस न देना जैसे नियमित स्तंभ इसका साक्षात प्रमाण है.

चुटकुलों की लोकप्रियता का आखिर रहस्य क्या है और उनमे वह कौन-सा तत्व है जों हमारी मनहूसियत की गर्द को झाड कर हमारे अंदर गुदगुदी पैदा करता है? मुझे लगता है कि चुटकुलों में हाज़िर-जवाबी का जों बांका अंदाज़ होता है वही उनकी जान होता है. सहज-सा लगने वाला एक छोटा-सा गतिशील संवाद, कभी-कभी कितना मनोरंजक और चुटीला हो सकता है इसका अंदाज स्वयं बोलने वाले को नहीं होता परन्तु उसी संवाद को जब तीसरे माध्यम द्वारा रोचक शैली में अभिव्यक्त किया जाता है तो उसे सुन कर श्रोताओं के मुखड़ों पर अनायास मंद मुस्कान खिल उठती है या फिर उनके उन्मुक्त ठहाके गूंजने लगते हैं.

चुटकुलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हमारे जीवन में हास्य और जिंदादिली को जीवित रखते हैं. एक पल को सोचिये, हमारे जीवन से हंसी-खुशी दोनों ही गायब हो जाएँ तो क्या बचेगा? सिर्फ तनाव! और विडंबना देखिये कि तनाव से बचने के लिए लोग या तो अस्पताल पहुँचते हैं या फिर ऐसी जगह जहाँ एक तनाव अपना अस्तित्व खो कर रक्तबीज की तरह अनेक तनावों के रूप में प्रकट हो जाता है. परन्तु यह विडंबना सामान्यतः हम बडों की ही है, बच्चों की नहीं. बच्चों की सबसे बड़ी पूँजी उनकी मुस्कराहट और खिलखिलाहट होती है जिसे वे बीज की तरह भूमि में बोते हैं और लहलहाती फसल की तरह काटते हैं. बड़ों की अपेक्षा बच्चों की मनोभूमि अधिक उर्वरा होती है और शायद यही कारण है कि उनके पास हंसने और हंसाने के अनगिनत उपकरण होते हैं और अवसर भी. परन्तु इस सन्दर्भ में हम बड़ों की स्थिति सचमुच दयनीय है और हस्यास्पद भी. जरा अपने दिल पर ईमानदारी से हाथ रखकर पूछिये, क्या आपके पास चार चुटकुले भी ऐसे हैं जों आप यहां उपस्थित श्रोताओं को अभी-२ सुनाकर उनके मौन को ठहाकों में बदल सकें? नहीं ना? परन्तु यही बात अगर बच्चों से पूछी जाए तो वे अपने खजाने से एक नहीं दस-२ चुटकुले सुनाकर आपको अवाक कर देंगे. भले ही उनके सुनने का अंदाज अटपटा हो परन्तु उनका यही अटपटापन तो हमें भाता है.

यूँ एक तरह से देखा जाए तो चुटकुलों की प्रकृति कुछ-२ बुलबुलों के समान होती है जो अपनी चुलबुलाहट और खिलखिलाहट का सौंदर्य कुछ क्षणों के लिए बिखरा कर तिरोहित हो जाते हैं परन्तु इस क्षणिक सौंदर्य की चमक हमारी स्मृति में बार-बार कौंधती है और कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप अपने एकान्तिक अथवा सामूहिक क्षणों में उस कौंध से चमत्कृत होकर अपने आप ही मुस्कराने अथवा ठहाके भरने लगते हैं.

“चुटकुला”शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई इस सन्दर्भ में मैं दों विद्वान बाल सहित्य्रकारों के मतों के उल्लेख करना चाहूंगा.

डॉ. हरिकृष्ण देवसरे के शोध-प्रबंध “हिंदी-बालसाहित्य-एक अध्ययन” में दिए गए विवरण के अनुसार चुटकुला “चुट” और “कुला” दो शब्दों के योग से बना है. “चुट” का अर्थ है चुटकी अर्थात मजाक बनाना या हंसना और “कुला” का अर्थ है कुलेल यानी गुदगुदी. इस तरह “चुटकुला” का अर्थ हुआ गुदगुदाने वाली चुटकी..

दूसरा सन्दर्भ मैं डॉ. देवसरे द्वारा ही सम्पादित बाल साहित्य रचना और समीक्षा में प्रकाशित स्व० राधेश्याम प्रगल्भ के लेख “चुटकुले और पहेलियाँ” से देना चाहूंगा जिसके अनुसार “चुटकुला” या “चुटकला” “चोट” और “कला” शब्दों से मिल कर बना है और चोट करने वाली कला को चुटकुला या चुटकला कहा जाता है. यह (चुटकला) एक ऐसी कला है जों गहरे विषाद में डूबे हुए व्यक्ति को भी हंसाने-गुदगुदाने की सामर्थ्य रखती है. आश्रय-आलंबन, श्रोता-वक्ता सभी उल्लसित हो उठते हैं.”

प्रगल्भ जी के अनुसार व्युत्पत्ति कुछ भी हो इसमें दो मत नहीं कि चुटकुला हास्य रस का एक अद्भुत प्रयोग है. इस अद्भुत प्रयोग के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ इससे पूर्व मैं प्रगल्भजी की कुछ और मान्यताओं का उल्लेख करना चाहूंगा जिन पर हमारी-आपकी सहमति हो या न हो परन्तु इनसे हम सभी को एक दिशा अवश्य मिलती है. प्रगल्भजी मानते हैं कि चुटकुला लोक की थाती है, इसीलिये वह आनन-फानन हजारों किलोमीटर की यात्रा कर लेता है. दूसरे, चुटकुले को जन्म विद्वान लोग नहीं दे पाते. उनकी ज्ञान- गरिमा इसमें बाधक होती है. मूर्ख लोग भी चुटकुले नहीं गढ़ पाते, क्योंकि यह उनके वश की बात ही नहीं. वास्तव में चुटकुलों को जन्म देते हैं वे बुद्धिमान लोग जों प्रत्युत्पन्नमति संपन्न होते हैं.

अपनी सहूलियत के लिए मैं प्रगल्भजी के इन प्रत्युत्पन्नमति संपन्न लोगों में उन बच्चों को शामिल कर लेता हूँ जिनके भोले सवाल-जवाब ऐसे चुटकुलों की ज़मीन तैयार करते हैं जिनसे आज बाल साहित्य संपन्न हो रहा है. वैसे इसमें दो राय नहीं कि चुटकुले श्रुति-परंपरा की ही उपज रहे हैं और यह परंपरा हमारे प्राचीन कथासाहित्य एवं राज-दरबारों में नियुक्त विदूषकों की हाजिरजवाबी के प्रसंगों में खोजी जा सकती है, भले ही उनका रूप अब प्रक्षिप्त हो गया हो.

रूप, गुण, और आकार के आधार पर चुटकुलों की संख्या यद्यपि अनगिनत है क्योंकि उनका प्रचलन हर समाज में सदियों से रहा है. परन्तु अगर हम अपने विषय तक सीमित रहें तो खेद की बात यह है कि हिंदी में बच्चों के चुटकुलों की अच्छी किताबें आज कहीं नहीं है. बहुत खोजबीन के बाद एक पुस्तक मुझे प्राप्त हुई है-“बच्चों के जोक्स” जों डायमंड पाकेट बुक्स (प्र०) लि० , नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित है. इसमें महेश शर्मा द्वारा संकलित लगभग पांच सौ से ऊपर बच्चों के चुटकुले प्रकाशित हैं. अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में मेरी जानकारी नहीं परन्तु अंग्रेजी में बच्चों के चुटकुलों पर सैंकडों किताबें उपलब्ध हैं जिनकी विस्तृत सूची Amazon.com वेब साईट पर देखी जा सकती है. ऐसी कुछ पुस्तकों के नाम मैं आपकी जानकारी के लिए यहाँ उद्धृत करना चाहूंगा: ये पुस्तकें हैं:

“ 500 Hilarious Jokes for kids by Jeff Rovin, 1000 jokes knock knock jokes for kids by Michel Kilgariff, The Treasury of clean Children’s jokes by Tal D Burham, The Australian Children’s jokes book by Heath Billon, More jokes for Children by Margurite Kohl, The A-Z Encyclopedia of Jokes by Sandy Ramsford, Children’s Little Jokes Book by Derek Fortune, Children’s humour: A joke for every Occasion by Michael Dahl, 1000 crazy jokes for kids by Michel Johnstone,

Amazon.com के अलावा इन्टरनेट पर सैंकडों और ऐसे वेब साईट हैं जिन पर बच्चों के लिए अनगिनत चुट्कुलें उपलब्ध हैं उदहारण के लिए : www.kidsjokes.com, www.kidsmahal.com आदि.

चुटकुले कब और कहाँ जन्म लेते हैं, उन्हें कौन संकलित करता है और प्रकाशन के लिए उनका कौन कहाँ कैसे उपयोग करता है, इन प्रश्नों के उत्तर खोजना आसान नहीं है. सामान्यतः चुटकुलों पर मौलिकता की मोहर नहीं लगी होती और न ही इस विधा में हिंदी के जाने-माने बाल साहित्यकार आज सक्रिय हैं. फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जिनकी कृपा से हमें हास्य रस-पूरित इस साहित्यिक विधा की थोड़ी-बहुत खुराक समय-समय पर मिलती रही है. इनमे सर्वश्री सुरेन्द्र श्रीवास्तव, अयोध्या प्रसाद “भारती”, एस.प्रेम, कृष्ण कुमार “अचूक”, रेहांना खातून, नैयर आज़म, पी.एस. सचदेव, अजहरूदीन फरीदी शीबू, प्रीती गुप्ता, पंकज द्विवेदी, ध्रुव कुमार, भाई लाल सेन, तरुण के साहू, रश्मि रावत, शादाब खान आदि शामिल हैं.

बच्चों के जवाब कितने चतुराई भरे होते हैं इसकी एक झलक इन चुटकुलों में देखी जा सकती है _ एक दोस्त दूसरे से पूछ रहा है – “ खेलने से क्या फायदा होता है? दूसरा दोस्त जवाब देता है – “ उतनी देर हमें पढ़ना नहीं पड़ता.” दूसरा चुटकुला अध्यापक और एक शैतान छात्र से सम्बंधित है. अध्यापक शैतान छात्र से कह रहा है – “मैं नालायक को लायक नहीं बना सकता.” छात्र जवाब देता –“ लेकिन मैं बना सकता हूँ.” अध्यापक पूछता है-“वो कैसे?” छात्र कहता –“”ना” शब्द हटाकर. इसी तरह अध्यापक एक छात्र से पूछता है कि घोड़े और गधे में क्या अंतर है? तो छात्र का जवाब होता है-“सर, घोडा तेज लोगों की सवारी है और गधा आलसियों की सवारी.”

अब ज़रूरी नहीं कि बच्चों के चुटकुलों में बातचीत करने वाले मुख्य पात्र बच्चे ही हों, वे छोटे-बड़े, स्त्री –पुरुष, सींकिया-पहलवान, डॉक्टर-मरीज़, या समाज के अन्य किसी भी वर्ग के लोग हो सकते हैं. बस मुख्य बात यह है कि उन चुटकुलों से बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन होना चाहिए और मनोरंजन के साथ-साथ अगर उनकी बुद्धि का विकास होता है तो सोने में सुहागा हो जाएगा.

दो सहेलियों की यह बातचीत आपकी जानकारी में काफी इजाफा कर सकती हैं. रानी अपनी सहेली से कह रही है – “क्या बात है बहन, आजकल तुम्हारे भाई का रंग बड़ा साफ़ होता जा रहा है.” सहेली मुस्करा कर अपने भाई की ब्यूटी का रहस्य खोलती है –“दरअसल पहले वह कोयले की दूकान चलते थे, अब उनकी आटे की दूकान है.”

कुछ चुटकुले कभी-कभी आपकी कुछ ज्यादा ही समझदारी का बयान कर देते हैं. उदाहरण के लिए जरा इन दो मित्रों की बातचीत सुनिए. विवेक पूछ रहा है –“अरे, रवि, तुम्हारे हाथ में चोट कैसे लगी? रवि दर्द से कराहते हुए कहता है –“क्या बताऊँ यार, मैंने गाय के दांत गिनने के लिए उसके मुंह में हाथ डाला और उसने मेरी उंगली गिनने के लिए मुंह बंद कर लिया. ” इसी तरह की एक्स्ट्रा समझदारी का एक और चुटकुला है – अध्यापक छात्र से पूछ रहा है – “यदि नाव में पानी भरने लगे तो क्या करना चाहिए? छात्र जवाब देता है – “जी, उस पानी को निकालने के लिए नाव की पेंदी में छेद कर देना चाहिए.”

चुटकुलों के इन चंद उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि चुटकुलों में सामान्य उक्ति अपना असर नहीं दिखाती. असर दिखाती है “वक्रोक्ति”, परन्तु इस वक्रोक्ति का प्रयोग इतनी सहजता और भोलेपन के साथ होता है कि वह आपके अंदर तिलमिलाहट नहीं वरन गुदगुदाहट पैदा करती है. शायद इसीलिये चुटकुला व्यंग्य की अपेक्षा हास्य का ज्यादा अभिन्न अंग लगता है.

आप-हम सभी जानते हैं कि जीवन में विनोद के क्षण दिनों-दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं इसलिए चुटकुला जैसी लोकप्रिय विधा को बाल साहित्य में उसका गरिमामय स्थान मिलना ही चाहिए परन्तु यह तभी संभव है जब बालोपयोगी चुटकुलों की अधिक से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की जाएँ. इस आग्रह के साथ अंत में मैं अपनी बात एक चुटकुले से ही खत्म करना चाहूंगा. अध्यापक अपने छात्र से पूछता है_
”क्या बात है, कक्षा में तुम हरदम मुस्कराते हो.”
छात्र जवाब देता है- “ सर, मेरा नाम ही “इस्माइल खां” है..

-रमेश तैलंग
(त्रिवर्णा से साभार)

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