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Saturday, June 18, 2011

प्रिय चैतन्य शर्मा के लिए : माँ पर दो बाल गीत


१.
घर में अकेली माँ ही बस
सबसे बड़ी पाठशाला है.
जिसने जगत को पहले पहल
ज्ञान का दिया उजाला है.

माँ से हमने जीना सीखा
माँ में हमको ईश्वर देखा
हम तो हैं माला के मनके
माँ मनकों की माला है.

माँ आँखों का मीठा सपना
माँ साँसों में बहता झरना
माँ है एक बरगद की छाया
जिसने हमको पाला है.

माँ कितनी तकलीफें झेले
बांटे सुख सबके दुःख ले ले
दया-धर्म सब रूप हैं माँ के,
और हर रूप निराला है.

-------

२.

अम्मां को क्या सूझी
मुझको कच्ची नींद सुलाकर
बैठ गई हैं धूप सेंकने
ऊपर छत पर जाकर

जाग गया हूँ मैं अब कैसे
खबर उन्हें पहुँचाऊँ?
अम्मां!अम्मां! कहकर उनको
कितनी बार बुलाऊँ?

पाँव अभी हैं छोटे मेरे
डगमग डगमग करते,
गिरने लगता हूँ मैं नीचे
थोडा-सा ही चलते.

कैसे चढ पाऊंगा मैं अब
इतना ऊंचा जीना?
सोच-सोच कर मुझे अभी से
है आ रहा पसीना.

4 comments:

  1. बहुत सुंदर बालगीत .......

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  2. हार्दिक आभार आपका ...ये प्यारी रचनाएँ मेरे लिए अनमोल शब्द हैं जो आपने रचे हैं....... बहुत बहुत धन्यवाद ......

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  3. अंकल आपकी कविताएं सचमुच बहुत ही सुन्दर हैं...मुझे तो पता ही नहीं था... आज चैतन्य के ब्लॉग पर आपकी कविताएं देखी तो यहाँ चली आयी और आपकी सभी कविताएँ पढ़ी... ये सब मुझे बहुत-बहुत अच्छी लगीं... हम बच्चों के लिए इतनी सुन्दर कविताएं लिखने के लिए आपको ढेर सारा थैंक्यू अंकल!!!

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  4. प्रिय रुनझुन बेटी,
    तुम्हारे कमेंट्स पढ़ कर अच्छा लगा. तुम्हारा नाम नन्हीदीप भी है. एक दीप से दूसरा दीप ऐसे ही जलता है. पहले चैतन्य फिर तुम. तुम्हारा ब्लॉग देखा. बहुत सुंदर तस्वीरें सजा रखीं हैं वहाँ. ये स्मृतियाँ संजो कर रखना. और हाँ, कवितायें पढ़ती हो तो लिखती भी होगी. नहीं लिखती हो तो कोशिश करो. एक ओपेन टिप दे रहा हूँ अपनी एक कविता के जरिये:

    आओ हम भी प्यारी-प्यारी
    कविता एक बनाएँ
    जोड़ें तुक, शब्दों की माला
    सुंदर एक सजाएं .

    जिसमे अपना दुःख-सुख
    और कहानी बस अपनी हो,
    कविता कैसी भी हो लेकिन
    वानी बस अपनी हो.

    नहीं चाहिए भारी-भरकम
    नहीं चाहिए मोटी ,
    हम छोटे-छोटे बच्चों की
    कविता भी हो छोटी.

    जिसे सीखना पड़े किसी से
    क्या वह भी कविता है?
    जिसे स्वयं आ जाए गाना
    वह अच्छी कविता है.

    सस्नेह-रमेश तैलंग

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