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Sunday, July 31, 2011

डॉक्टर प्रताप सहगल का बाल-नाटक "अंकुर"





[डॉक्टर प्रताप सहगल हमारे समय के सुप्रसिद्ध लेखक, कवि, नाटककार, शिक्षाविद और आलोचक हैं. वे अनेक विधाओं में निरंतर रचनारत हैं.मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह प्रसन्नता की बात है कि उन्होंने अपने लेखन के दायरे से बच्चों को अछूता नहीं रखा है. उनकी बाल-नाटकों की पुस्तक " छू मंतर" से लिया गया एक लघु नाटक अंकुर यहाँ पुनर्प्रकाशित करने का मोह मैं नहीं छोड़ पा रहा हूँ. इसके कई कारण हैं: भगतसिंह जैसे महान व्यक्तित्व के बचपन एवं उनके देशप्रेम से जुड़ा रोमांचक कथ्य, देशकाल और पात्रों के अनुरूप प्रयुक्त बोलचाल की भाषा, और भागाँ वाले पुत्तर भगतसिंह के जन्मोत्सव पर पंजाब की पंजाबियत को साकार करने वाला जीवंत गीत -"पुत जम्याँ भागां वाला/पतासे मैं बन्डदी फिरां". आजादी की नई वर्षगाँठ अगले महीने आ रही है. आशा है इस पुनीत अवसर पर बच्चे/बड़े इस रोचक नाटक को पढकर/मंचित कर देश के इस अमर शहीद को सामूहिक स्मरणांजलि भेंट कर सकेंगे.]




पात्र
स्त्री-स्वर
दूसरा स्त्री-स्वर
बूढा स्त्री-स्वर
बाल भगत सिंह
विद्यावती
गायन मण्डली

दृश्य एक
समय: २७ सितम्बर, १९०७ :: स्थान : बंगा (लायलपुर)

(मंच पर एकदम अँधेरा. धीरे-धीरे एक प्रकाश -वृत्त मंच के पीछे वाली दीवार पर फैलता है. उसी पर २७ सितम्बर और स्थान बंगा लिखा है. कुछ क्षणों के अंतराल के बाद नेपथ्य से पंजाबी लोकधुन उभरती है. ढोलक पर तेज थाप, जो धीरे-धीरे मंद पड़ती है.)

स्त्री-स्वर : वधाई होवे.
दूसरा स्त्री-स्वर: तुसी वधो.
(ढोलक पर थाप)

स्त्री-स्वर: लै भैणे, चंगी खबर आई आ.
दूसरा स्त्री-स्वर: बोल वी.
पहला स्वर: किशन सिंह दी ज़मानत मंजूर हो गई, आ ते नाले स्वर्णसिंह दी वी, दोवें पुजदे ही होणगे.
दूसरा स्वर: वाहे गुरु दी मेहर ए !

(ढोलक पर थाप)

पहला स्वर: मांडले तों तार आई आ.
दूसरा स्वर: की?
पहला स्वर: अजीतसिंह दी रिहाई.
बूढा स्त्री-स्वर: बाबाजी दी मेहर होई ए - मेरे तिन्नो पुतर छूट गए-पुतर भागां वाला ए.

(ढोलक की थाप के साथ कुछ स्त्रियाँ मंच के बीचोबीच आकार बैठ जाती हैं और प्रकाश उन पर केंद्रित हो जाता है. एक औरत ढोलक घुटने के नीचे दबाकर बैठ जाती है, दूसरी चम्मच लेकर ढोलक के फ्रेम पर मारने लगती है. गीत के स्वर उठते हैं:)

पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां

इक पतासा चाचे खादा -इक पतासा चाचे खादा
जंग लई औ' तैयार फिरंगियाँ नूँ मारे गबरू
पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां

इक पतासा प्यो ने खादा-इक पतासा प्यो ने खादा
जिंदड़ी देश तों वारे ते वैरियाँ ने भन्ने पासे
पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां.

(गायन में एक स्त्री-नाचने लगती है. तालियाँ बजाकर शेष उसका साथ देती हैं. धीरे-धीरे गीत मंद होता है.)

(दृश्य लोप)

(समवेत गान गाती मण्डली मंच के अगर भाग पर आती है. गीत के दौरान मंच के एक भाग पर दृश्य उभरते हैं, बदलते हैं और लोप हो जाते हैं.)



कैसा था भगतसिंह - कहो कैसा था भगतसिंह
देखने में हमें तुम्हीं जैसा था भगतसिंह
कैसा था भगतसिंह - कहो कैसा था भगतसिंह
उसके बदन की मिटटी का कुछ रंग और था
सोचने का, ठोकने का ढंग और था
ऐसा नहीं, वैसा नहीं, जैसा भी था वह
वैसा था भगतसिंह
वैसा था भगत सिंह
सत्ताईस सितम्बर ने नौ बार दोहराया
इस दिन पिता के संग बेटा खेत में आया
खेत में मिलने किशनसिंह को
आ पहुंचे नंदकिशोर
वे देखते हैं क्या
ज़रा कीजिएगा गौर
मिट्टी की कुछ ढेरियाँ
उनके इर्द-गिर्द भगत
लगा रहा है फेरियां
हर ढेरी पर सजा-सजाकर
गाड रहा है तिनका
सोचते थे जो
वही सब सोचता था
बेटा था वह जिनका
कुछ देर तों देखा गौर से
फिर पूछा नंदकिशोर ने
तुम्हारा नाम क्या बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?
मेरा नाम भगतसिंह, मेरा नाम भगत सिंह!
क्या कर रहे हो तुम यहाँ, क्या कर रहे हो?
फसल की यह तैयारी है बंदूकों की
बंदूकें?
हां जी हां, बंदूकें ! हां जी हां, बंदूकें!
बंदूकों का क्या काम
तुम्हारे लिए है बच्चे?अब तों बंदूकें सिर्फ मेरे काम आएँगी.
देश की आज़ादी के लिए गज़ब ढाएंगी
धांय....धांय....धांय
चाचा अजीतबंदूकों की कमी है
जकड़ी गई माता की आँखों में नमी है
मैं कर रहा हूँ काम अपना देश के लिए
यह बंदूकें दन दनाएं देश के लिए
माँ का लाडला बड़ा न्यारा था भगतसिंहसिंह
प्यारा था भगतसिंह, बड़ा प्यारा था भगतसिंह
(गायन मण्डली अपना स्थान ग्रहण करती है)

(दृश्य दो)

समय: अप्रैल १९१९ स्थान: भगतसिंह का घर

(भगतसिंह की माँ विद्यावती एक ओर बेठी डाल बीन रही है. बाल भगतसिंह आता है और चुपचाप माँ के पास बैठ जाता है.)

विद्यावती: कित्थों आ रयां?
भगतसिंह: अमृतसरों.
विद्यावती: (हैरानी से) अमृतसरों ...कल्ला गुरूद्वारे गया सैं?
भगतसिंह: नईं ...जलियावाले बाग.
विद्यावती: (थोडा चौंककर) ओत्थे? कादे वास्ते?
भगतसिंह: ऐना गोरे वैरियाँ ने हजारां बंदे मार छड्डे ने!
विद्यावती: तू अजे पढ़ाई वल ध्यान रख!
भगतसिंह: (एक शीशी जेब से निकालकर मान को दिखाता है. शीशी में लाल मिट्टी भरी है.) ए वेख माँ, ए ओना बहादरां दी मिटटी, जेडे ओत्थे शहीद हो गए..माँ, ओनां राह चलदे लोकां नूँ मारया , घसीटया , ओनां दा सामान खो लया ..ऐना फिरंगियाँ नूँ मैं छड्डागा नईं माँ!
विद्यावती: (उठकर एक सेब लाती है) अच्छा...अच्छा...लै खा लै, भूख लग्गी होएगी आ!
भगतसिंह: हां माँ, भूख ते लगी है, पर सेब दी नईं
विद्यावती : वेख पुत्तर, देश की आज़ादी वास्ते तेरा तेरा चाचा अजीतसिंह लड़ रया है, स्वर्णसिंह लड़ रया है. ए आप वी लड़ रये ने..तूं वी लड़ लई, पर अजे पढ़ाई कर लै.
भगतसिंह: पढ़ाई...कादे वास्ते?
विद्यावती: अपणे वास्ते...कौम डे वास्ते...सेब खा लै. (उसके सिर पर हाथ फेरती है और चली जाती है.)
(भगतसिंह के एक हाथ में सेब तथा दूसरे में मिट्टी वाली शीशी है. वह कभी शीशी को और कभी सेब को देखता है.)
भगतसिंह: (शीशी को सामने कर्ता हुआ) एस शहीद लहू दी सौंह, फिरंगियाँ दा खात्मा करके ही दम लवांगा. (शीशी को जेब में रख लेता है और सेब को एक ओर फेंक देता है)

(दृश्य लोप).




photo credits: google search.

डॉक्टर डू लिटिल हिंदी रूपांतर का दूसरा अंतिम भाग


एक जोर की आवाज हुई. पूरा जहाज बुरी तरह हिल उठा. फिर धीरे-धीरे जहाज एक तरफ को झुकने लगा. डबडब बत्तख हिम्मत करके पानी में कूद पडी.वह जैसे-तैसे तैरकर जहाज के नीचे गई. उसने लौटकर बुरी खबर सुनाई. बोली-"डॉक्टर साहेब, हमारा जहाज एक चट्टान से टकरा गया है. उसकी तली में छेद होने के कारण पानी अंदर भर रहा है."

डॉक्टर साहेब ने कहा-"जल्दी से जहाज से नीचे उतरो, नहीं तों हम सब डूब जाएंगे

सारे जानवर पानी में कूद पड़े और फिर किसी तरह जमीन पर पहुंच गए. पानी अब भी तेजी से बरस रहा था. ऊंची-ऊंची लहरें आकर चट्टान पर अटके जहाज से टकरा रही थीं. वह पानी में डूबता जा रहा था.

तट से थोड़ी दूर ऊँचे स्थान पर एक गुफा थी. डॉक्टर डू लिटिल और उनके मित्र गुफा में पहुंचे. कम से कम अब तूफानी बारिश से तों बचा ही जा सकता था.

"पता नहीं हम कहां आ गए हैं." डॉक्टर ने कहा और गहरे सोच में डूब गए. वह सोच रहे थे-"न जाने मैं बीमार बंदरों का इलाज कब शुरू कर सकूंगा? कुछ देर बाद बारिश बंद हो गई. तब तक रात हो गई थी. थकान के कारण सबको नींद आ रही थी.

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर डॉक्टर डू लिटिल की नींद टूट गई. दिन निकल आया था. आसमान साफ़ था. गुफा से निकल कर डॉक्टर साहेब और उनके साथी तट की ओर गए. वहाँ जहाज एक चट्टान पर अटका दिखाई दिया. ये लोग तूफानी समुद्र में डूबने से बाल-बाल बचे थे.

पोलिनेशिया उड़कर पता करने गया. उसने लौटकर बताया-"डॉक्टर साहेब, हम अफ्रीका महाद्वीप पर आ पहुंचे हैं. अब कोई चिंता नहीं है. हमें आगे के रास्ते का पता भी जल्दी ही लग जाएगा." तब तक चिड़िया बंदरों को सन्देश देने उड़ गई थी.

तभी एक व्यक्ति हाथ में भाला लेकर गुफा की तरफ आता दिखाई दिया. डू लिटिल ने अपने साथियों से चुप होने का संकेत किया. वह व्यक्ति सीधा डॉक्टर डू लिटिल के पास आया. उसने कहा-"तुम कौन हो?"

"मैं हूँ डॉक्टर डू लिटिल, एम.डी. इंग्लैंड से आया हूँ. मुझे अफ्रीका के वानरों ने अपने इलाज के लिए बुलाया है.

"लेकिन कहीं भी जाने से पहले तुम्हे हमारे राजा से अनुमति लेनी होगी." भालाधारी सैनिक ने तेज स्वर में कहा.

"राजा, कौन राजा"? डू लिटिल ने पूछा.

"हमारे देश जोलिजिंकी के महाराज , और कौन? उनकी आज्ञा के बिना तों चिड़िया भी अपनी चौंच नहीं खोल सकती. समझे डॉक्टर! चुपचाप मेरे साथ महाराज के पास चलो." उस सैनिक ने कहा.

" उसकी बात सुनकर पेड़ पर बैठी चिड़िया चोंच खोलकर चूंचिर्र करने लगी.वह डॉक्टर से कह रही थी-"यह आडमी झूठ बोल रहा है."
"डॉक्टर डू लिटिल सैनिक के साथ राजा के पास जा पहुंचे.

"जोलजिंकी का राजा एक महल में रहता था. उसके पूछने पर डू लिटिल ने बता दिया कि वह बीमार बंदरों का इलाज करने के लिए अफ्रीका आए हैं.

राजा ने कहा-"बंदरों के देश का रास्ता मेरे राज्य से होकर जाता है. मैं तुम्हे कभी नहीं जाने दूंगा. क्योंकि तुम्हारी ही तरह एक आदमी यहाँ आया आते. मैंने उसका स्वागत किया पर उसने

मुझे धोखा दिया. उसने चुपचाप सोना इकठ्ठा किया. हाथीदांत के लिए निदोष हाथियों को मार डाला, फिर चुपचाप यहाँ से भाग गया.राजा जोलजिंकी ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके पशु मित्रों को कैदखाने में बंद कर दिया. डॉक्टर डू लिटिल सोच रहे थे-"क्या हम लोग बीमार बंदरों के पास कभी नहीं जा सकेंगे. तभी पोलिनेशिया तोता डू लिटिल की जेब से बाहर निकल आया.

डू लिटिल ने पूछा-"पोलिनेशिया, क्या तुम डरकर मेरी जेब में छिप गए थे."

तोते ने कहा-"डॉक्टर साहब, अगर सैनिक मुझे देख लेते तो शायद पिंजरे में बंद कर देते, इसलिए मैं आपकी जेब में छिप गया था." फिर उसने कहा-"मैंने एक तरकीब सोची है, शायद उससे काम बन जाए."

"कैसी तरकीब?" - डू लिटिल ने पूछा. पोलिनेशिया ने धीरे से कहा-"बस, देखते रही." इसके बाद वह कैदखाने की दीवार में बने झरोखे से बाहर उड़ गया. राट का अँधेरा फैला था. सब तरफ सन्नाटा था. पोलिनेशिया एक खुली खिड़की से महल में घुस गया. सब तरफ प्रहरी ऊंघ रहे थे. एक कमरे में राजा जोलिजिंकी पलंग पर सो रहा था. पोलिनेशिया राजा के पलंग के नीचे छिप गया फिर किसी आदमी की तरह खांसने लगा.

खांसी सुनकर जोलिजिंकी जाग गया. उसने पूछा-"कौन?"

"मैं डॉक्टर डू लिटिल." पोलिनेशिया ने कहा-"तुमने मुझे और मेरे साथियों को जेल में बंद कर दिया था. में जादू जानता हूँ. इसीलिए अद्रश्य होकर यहाँ आया हूँ. मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, पर तुम मुझे देख नहीं पा रहे हो."

जोलिजिंकी ने इधर-उधर देखा, पर कोई दिखाई नहीं दिया. वह डर गया. उसने पूछा-"तुम क्या चाहते हो डॉक्टर?"

"तुरंत मेरे साथियों को कैद से आज़ाद कर दो. नहीं तों मैं अपने जादू से तुम्हारे महल में आग लगा दूंगा. महामारी फैला दूंगा." डॉक्टर बने पोलिनेशिया ने कहा.

राजा वैसे भी जादू-टोने में विश्वास करता था. वह डरकर कांपने लगा. उसने इधर-उधर नज़र दौडाई पर छोटा-सा पोलिनेशिया तों पलंग के पाए के पीछे छिपकर बोल रहा था. राजा जोलिजिंकी ने सचमुच डॉक्टर डू लिटिल को जादूगर समझा. उसने तुरंत सैनिकों को बुलाया. उन्हें कैदखाने का दरवाजा खोलने का आदेश दिया.

तभी रानी कमरे में आई. उसने पोलिनेशिया को उड़कर बाहर जाते हुए देख लिया. राजा ने रानी को पूरी बात बताई तों उसने तोते के बारे में कहां. बोली-"हमें खुद कैदखाने चलकर देखना चाहिए. यह जादू की बात बकवास है." राजा जोलिजिंकी रानी के साथ जल्दी-जल्दी कारागार जा पहुंचा. लेकिन तब तक प्रहरियों ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके पशु मित्रों को आज़ाद कर दिया था. पोलिनेशिया ने जोलिजिंकी को खूब मूर्ख बनाया था.

राजा ने तुरंत सैनिकों को डॉक्टर डू लिटिल की खोज में भेज दिया. वह बेहद क्रोध में था. उधर डॉक्टर जंगल में आगे बढ़े जा रहे थे. चीची बंदर अफ्रीका का ही रहने वाला था. उसे जंगल के सारे रास्ते मालूम थे. उसने कहा-डॉक्टर साहेब जोलिजिंकी के सैनिक हमारी खोज में अवश्य आ रहे होंगे. हमें सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.

थोडी देर बाद सैनिक उनके पास पहुंच गए. डॉक्टर साहेब ने कहा-"अब क्या करें?"

चीची बंदर अपने साथियों को एक विशाल पेड़ के पास ले गया. पेड़ का तना अंदर खोखला था. बस, डॉक्टर डू लिटिल तथा उनके पशु मित्र खोखल में छिप गए. तब तक जोलिजिंकी के सैनिक आ पहुंचे. पर वे खोखल में छिपे डू लिटिल और उनके साथियों के बारे में कुछ नहीं जान सके. ये थककर राजधानी वापस चले गए.

डॉक्टर डू लिटिल वानर देश की तरफ आगे बढ़ चले. पोलिनेशिया तोता तथा टूटू उल्लू जंगल में उड़कर पहरेदारी कर रहे थे कि अगर सैनिक फिर से आए तों डॉक्टर साहब को चेतावनी दी जा सके. दो दिन यात्रा निर्विघ्न चलती रही. पहरेदारी करते-करते पोलिनेशिया और टूटू थक चुके थे. उन्हें नींद आ गई. अब वे वानर देश के निकट पहुँच चुके थे. तभी पीछे हो हल्ला सुनाई दिया. जोलिजिंकी ने सैनिकों को दोबारा डॉक्टर डू लिटिल का पीछा करने भेज दिया था . और इस बार वे इनके काफी निकट आ गए थे.

डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथी तेजी से आगे की और दौड चले. सामने एक गहरी खाई थी. उसमे एक नदी तेज आवाज करती हुई बह रही थी. चीची ने कहा-"डॉक्टर साहेब, हमें वानर देश पहुँचने के लिए यह खाई पार करनी होगी."

डॉक्टर डू लिटिल ने देखा पर कोई पुल नहीं था. और उधर जोलिजिंकी के हथियार बंद सैनिक एकदम निकट आ चुके थे. डॉक्टर डू लिटिल ने अपने साथियों से कहा-"लगता है इस बार हम जरूर पकडे जाएंगे."

खाई के दूसरी ओर अनेक वानर डॉक्टर डू लिटिल का स्वागत करने को तैयार खड़े थे. तभी चीची ने पुकारा-"अब हम क्या करें. खाई पर पुल नहीं है और सैनिक पकड़ने के लिए एकदम पास जा चुके हैं?

यह सुनकर खाई के पार खड़े कई विशाल वानर उछलकर इस तरफ चले आए. उन्होंने पुकारा-"साथियो! पुल बनाओ तुरंत. एक-एक पल कीमती है." और देखते-देखते दोनों तरफ से वानर एक ऊँचे पेड़ से लटककर एक दूसरे का हाथ थामते हुए खाई में किसी रस्सी की तरफ आपस में जुड़ते गए. इस तरह एक दूसरे से पंजे जोड़ते हुए मिलकर उन्होंने चौड़ी खाई के आर-पार एक अनोखा वानर पुल तैयार कर दिया.

डॉक्टर डू लिटिल आश्चर्य से यह चमत्कार देखते रहे. तभी चीची चिल्लाया-"डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे हैं! तुरंत इस पुल को पार करके दूसरी तरफ पहुँच जाइए."

पोलिनेशिया और टूटू पहले ही उड़कर दूसरी तरफ चले गए थे. डॉक्टर साहब ने डब-डब बत्तख, ज़िप कुत्ते, गब-गब सूअर तथा मगरमच्छ के साथ जल्दी-जल्दी वानर पुल पार कर लिया.तबतक जोलिजिंकी के सैनिक भी आ पहुंचे. वे भी वानर पुल से खाई पार करने का विचार करने लगे. पर यह क्या. डॉक्टर साहब के पार जाते ही वानर एक-एक करके अलग होते गए और देखते-देखते वानर पुल गायब हो गया. अब जोलिजिंकी के सैनिक किसी भी तरफ खाई के पार नहीं जा सकते थे.

वानर डॉक्टर साहब को आगे का रास्ता दिखा रहे थे. कह रहे थे-"डॉक्टर साहेब, कृपया जल्दी कीजिए."

आगे एक खुले मैंदान में सैकड़ों बीमार बंदर दिखाई दिए. डॉक्टर डू लिटिल ने कल्पना भी नहीं की थी कि उन्हें एक साथ इतने अधिक बीमार बंदरों का इलाज करना होगा. एक पल गवांए बिना डॉक्टर साहेब बीमार बंदरों के इलाज में जुट गए. इस काम में वानर देश के अनेक पशु उनकी मदद करने लगे. पहले डू लिटिल ने बीमार बंदरों को दवा दी , फिर जो बीमारी की चपेट में आने से बच गए थे उनको रोग-निरोधी टीके लगाने शुरू किए.

लेकिन केवल दवा देने से ही बात बनने वाली नहीं थी . बीमार बंदरों की देखभाल भी तों जरूरी थी. आखिर उन्होंने वानरों से कहा कि वे मदद के लिए जंगल के सभी जानवरों को बुलाएं.

डॉक्टर डू लिटिल का सन्देश सुनकर जंगल के सभी जानवर आ गए. डॉक्टर डू लिटिल ने जिसे जो काम सौंपा वही खुशी-खुशी करने लगा. जानवरों ने कहा-"डॉक्टर साहब, बस एक घमंडी

शेर ही नहीं आया है. वह कहता है-"मैं हूँ जंगल का राजा. मैं गंदे, बीमार बंदरों को हाथ भी नहीं लगाऊंगा."

डॉक्टर साहेब ने शेर को सन्देश भेजा तों वह अकड़ता, गुर्राता आया. उसने कहा-"डॉक्टर डू लिटिल, मैंने आपकी बहुत तारीफ़ सुनी है. लेकिन आप मुझसे बंदरों की नर्सिंग करनी उम्मीद न करें."मैं हूँ जंगल का राजा."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-" शेर भाई, बीमारी राजा-प्रजा में भेद नहीं करटी. तुम्हे इस तरह घमंड नहीं करना चाहिए." पर शेर ने डू लिटिल की सलाह नहीं मानी. वह दहाड़ता हुआ वापस चला गया. उसे जाते देख तेंदुए, हिरन, रीछ तथा दूसरे जानवरों ने भी बीमार बंदरों की देखभाल करने से इनकार कर दिया. उन्हें तों जैसे एक बहाना मिल गया था. वे कह रहे थे -"कुछ भी
हो, हम अपने राजा को नाराज नहीं कर सकते." जानवरों के असहयोग ने डू लिटिल को परेशान कर दिया. वह सोच रहे थे-"अब क्या होगा?"

उधर शेर गुर्राता हुआ अपनी मांद में पहुंचा. तभी शेरनी उसके पास आई. घबराए स्वर में बोली-"हमारा एक बच्चा मुझे बीमार लग रहा है. उसने कल से कुछ नहीं खाया है. आँखे बंद किए लेटा है, धीरे-धीरे काराह रहा है."

शेर ने गर्वीले स्वर में बताया कि वह डॉक्टर से झगडा करके आ गया है. सुनकर शेरनी की आँखें गुस्से से लाल हो गईं. दहाड़कर बोली-"बस, इसी बात पर इतरा रहे हो. डॉक्टर साहेब हज़ारों मील दूर से यहाँ बीमारों का इलाज करने आयें. और तुमने उनसे झगडा कर लिया. अब हमारे बीमार बेटे का इलाज कैसे होगा. मैं माँ हूँ. मैं जाकर उनसे क्षमा मांग लूंगी. आज के बाद तुम
मुझसे बात न करना. घमंडी, मूर्ख कहीं का."

घमंडी शेर भी बच्चे की बीमारी की बात सुनकर बेचैन हो गया. उसे डू लिटिल के शब्द याद आ गए-"बीमार राजा-प्रजा में भेद नहीं करती." उसने शेरनी से कहा-"मैं तों सोच भी नहीं सकता था कि मेरे घर में भी बीमारी आ सकती है. डॉक्टर साहेब से झगडना मेरी भूल थी. मैं जाकर क्षमा मांगता हूँ, तब तक तुम बच्चे को लेकर आ जाओ."

शेर ने जाकर डॉक्टर साहेब से अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी. उन्होंने कहा-"गलती इंसान और जानवर दोनों से होती है. जाओ, बीमारों की सेवा करो." शेर को बीमारों की सेवा करते देख, वे जंगली जानवर भी लौट आए जो बहाना बनाकर चले गए थे. और हां, इस बीच शेरनी भी अपने बीमार बच्चे को लेकर वहाँ आ गई थी. डॉक्टर डू लिटिल ने उसे भी दवादे दी.

धीरे-धीरे महामारी का पकोप घटने लगा . बंदर स्वस्थ होने लगे, फिर एक दिन ऐसा भी आया जब एक भी बंदर अस्वस्थ नहीं रहा. पूरा जंगल डॉक्टर डू लिटिल का आभार मान रहा था.

जंगल के बीच एक खुले मैदान में सब जानवरों की सभा हुई. विचार होने लगा कि डॉक्टर साहेब को उपहारस्वरूप क्या दिया जाए. सब जानवरों ने एक स्वर से कहा. "हम डॉक्टर डू लिटिल से प्रार्थना करेंगे कि वह यहीं पर रह जाएँ. एक दवाखाना खोलें. हम हर तरह से उनका ध्यान रखेंगे."

चीची उस सभा में मौजूद था. उसने कहा-"मित्रों! आप केवल अपने बारे में सोच रहे हैं. लेकिन डॉक्टर डू लिटिल की आवश्यकता पूरी दुनिया को है. उनके अपने शहर में ही न जाने कितने बीमार हैं. वे उत्सुकता से उनके अफ्रीका से लौटने की प्रतीक्ष कर रहे हें. उन्हें यहीं रोकना गलत होगा.

पहले पशु सभा ने चीची का विरोध किया, पर फिर बात सबकी समझ में आ गई. तय हुआ कि डॉक्टर साहेब को उपहारस्वरूप पुश्मी पुल्लू नामक विचित्र जीव भेंट किया जाए. पुश्मी पुल्लू के दो सिर थे. एक आगे और दूसरा पूंछ की तरफ. पूरी दुनिया में वह अपनी तरह के एक ही जीव था. पहले तो पुश्मी पुल्लू ने मना किया, फिर डॉक्टर साहेब की प्रशंसा सुनकर उनके साथ जाने को तैयार हो गया.

विदाई का क्षण आ पहुंचा. पूरा जंगल उदास था. अनेक वानर रो रहे थे. सबने भारी मन से अपने प्रिय डॉक्टर डू लिटिल को विदा किया. फिर वानर पुल बनाकर उन्हें खाई से पार छोड़ आए.

डॉक्टर डू लिटिल प्रसन्न थे कि उन्हें बंदरों की महामारी दूर करने में सफलता मिल गई थी.

लेकिन अब फिर जोलिजिंकी के राज्य से गुजरना था. न जाने क्या होने वाला था. और वही हुआ जिसका डर था. जोलिजिंकी के सैनिकों ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथियों को जेल में डाल दिया. जोलिजिंकी ने आदेश दिया-"इस बार मैं अपने हाथ से इस शैतान डॉक्टर का सिर काटूंगा. देखता हूँ, किस तरह बचता है."

पोलिनेशिया चतुराई से इस बार भी पकडे जाने से बच गया था. वह राजमहल के बाग में एक पेड़ पर छिप गया. वह सोच रहा था-"इस बार क्या किया जाए?"

कुछ देर बाद जोलिजिंकी का बेटा राजकुमार बम्पो परी कथाओं की पुस्तक पढ़ रहा था. कथाओं में ऐसी परी का जिक्र था जो अपनी जादुई छड़ी से चमत्कार दिखाती थी. बम्पो सोच रहा था-"काश! कोई परी मुझे मिल जाए तों अपने को गोरा सुंदर बनवा लूं. मेरे चेहरे पर जो बड़े-बड़े फफोले हैं उनको ठीक करने का तरीका पूंछ लूं.

फिर उसने जोर से कहा-"ओ परी, क्या तुम मेरी मदद करोगी. मुझे गोरा-सुंदर बना दो. मेरे चेहरे के फफोले ठीक करदो."

पत्तों में छिपे पोलिनेशिया ने झट कहा-राजकुमार बम्पो, मैं हूँ परी रानी त्रिपस्तिंका. तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी. बोलो, क्या चाहिए, मैं तुम्हारे सामने हूँ, पर तुम मुझे देख नहीं सकते."

"परी रानी, क्या सच? क्या री इच्छा पूरी होगी?" राजकुमर तों मारे खुशी के जैसे पागल हो गया."

"हां, अवश्य पूरी होगी. मैंने कुछ दिन पहले डू लिटिल डॉक्टर को जादुई दवाओं का रहस्य बताया है. लेकिन उस डॉक्टर को तुम्हारे पिता ने कहीं कैद में डाल रखा है.

"तों, क्या वह डॉक्टर मुझे ठीक कर सकता है." बम्पो ने पूछा.

पोलिनेशिया ने कहा-"अवश्य वह कैद में है और मुझे तुरंत परी लोक वापस जाना है. नहीं तों मैं डॉक्टर को कैद से निकाल देती पर अफ़सोस मैं नहीं रुक सकती. मेरी परी माँ बीमार है. मैं जा रही हूँ." कहकर पोलिनेशिया चुप हो गया.

राजकुमार बम्पो तुरंत कैदखाने की तरफ चल दिया. पोलिनेशिया राजकुमार से पहले ही कैदखाने की खिड़की से डॉक्टर के पास जा पहुंचा. उसने डू लिटिल को पूरी बात बता डी. कहा-"राजकुमार बम्पो, अगर आकर आपसे पूछे तों आप कह देना के हां परी त्रिपस्तिंका ने आपको जादुई शक्तियां डी हैं."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"पोलिनेशिया, मैं गलत नहीं कर सकता. दुनिया में ऐसी कोई दवा नहीं जो काले को गोरा बना डे. हां, बीमारी का इलाज संभव है."

पोलिनेशिया ने कहा_"डॉक्टर साहेब, मैं जानता हूँ आप झूठ नहीं बोलते, लेकिन एक झूठ हम सबके प्राण बचा सकता है. नहीं तों सब मारे जाएंगे. जोलिजिंकी इस बार बहुत गुस्से में है.

तभी राजकुमाँर बम्पो कैदखाने में आ गया. उसने डू लिटिल को परी वाली बात बताई, फिर इलाज के लिए कहने लगा. डॉक्टर साहेब बोले-"कैदखाने में कुछ भी संभव नहीं है."

बम्पो ने तुरंत पहरेदारों को आदेश दिया. ताले खोल दिए गए. राजकुमार बम्पो ने पहरेदारों को समझा दिया कि वे किसी से कुछ न् कहें. डॉक्टर डू लिटिल के कहे अनुसार बम्पो उन्हें तथा उनके साथियों को सागरतट पर ले गया. डॉक्टर की इच्छा के अनुसार उसने पानी का जहाज मंगवा दिया. फिर डू लिटिल ने उसके लिए दवा तैयार की. कहा-"इसे अपने मुंह पर लगा लो. इससे तुम्हारी एक इच्छा पूरी हो जाएगी." और फिर जहाज पर बैठते समय उन्होंने बम्पो को एक पत्र दिया. कहा-"इसे जहाज जाने के बाद पढ़ना." पत्र में लिखा था-"बम्पो, तुम्हारा रंग नहीं बदलेग पर चेहरे के फफोले अवश्य ठीक हो जाएंगे. परी बन कर मेरे साथी पोलिनेशिया ने तुम्हे धोखा दिया है. क्षमा करना. ऐसा न करते तों तुम्हारे पिता हमें अवश्य मार डालते जबकि हमारा कोई दोष नहीं है."

इंग्लैण्ड लौटते समय डॉक्टर डू लिटिल के जहाज को समुद्री डाकुओं ने घेर लिया. उन्होंने सुना था कि डॉक्टर अफ्रीका से सोना लेकर जा रहे हैं. डॉक्टर साहब अपने जहाज को एक द्वीप पर ले गए. डाकुओं ने वहाँ भी उनका पीछा किया. डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथी द्वीप पर जा छिपे. डाकू उनके जहाज पर चढ़कर सोना ढूँढने लगे. तभी जहाज के पेंदी में छेद हो गया.

जहाज डूबने लगा. डाकू कूदकर तैरने लगे. इतनी देर में शार्क माछ्लियों ने उन्हें घेर लिया. शार्क डॉक्टर साहब के बारे में सुनकर वहाँ आई थीं. विशाल मछलियों ने डॉक्टर साहब से पूछा-"अगर आप कहें तों हम इन डाकुओं को अपना भोजन बना लें."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"डाकुओं को मारना नहीं है, पर दंड भी देना है. इन्होने न जाने कितने जहाज़ों को लूटा है. कितने निर्दोषों के प्राण लिए है."

मछलियों ने डाकुओं को धकेल कर द्वीप पर पहुंचा दिया. फिर डॉक्टर डू लिटिल ने डाकुओं से कहा-"अब तुम लोग हमेशा इसी द्वीप पर कैद रहोगे. ये मछलियाँ सदा द्वीप की पहरेदारी करेंगी. अगर तुममे से किसी ने भी पानी में उतरने की कोशिश की तों ये विशाल मछलियाँ तुम्हें खा जाएंगीं."

इस तरह समुद्री डाकुओं का आतंक समाप्त हुआ. डॉक्टर डू लिटिल ने आगे की यात्रा डाकुओं के जहाज से की. जहाज पर एक बन कमरे में उन्हें एक बच्चा कैद मिला. वह बहुत दुखी था. उसने बताया कि डाकुओं ने उसके चाचा को न् जाने कहां कैद कर दिया. तभी ज़िप कुत्ते ने कहा-"डॉक्टर साहेब, मेरी सूंघने की ताकत का कमाल देखी." लड़के ने ज़िप को अपने चाचाजी का रूमाल सुंघा दिया. जहाज चलता रहा. ज़िप डेक पर खड़ा होकर जोर-जोर से सूंघता रहा. कुछ देर बाद उसने कहा-"डॉक्टर साहब, इस रूमाल के मालिक की गंध दक्षिण दिशा से आने वाली हवा में है. आप जहाज को उधर ही बढ़ाइए."

दक्षिण दिशा में कुछ दूरी पर एक द्वीप था. डॉक्टर और उनके साथी द्वीप पर उतरे. ज़िप सबसे आगे चल रहा था. वह एक गुफा के सामने रुक गया. उस बच्चे के चाचाजी वहीँ कैद थे. डॉक्टर साहेब उन दोनों को पास के दूसरे द्वीप पर बसे उनके गाँव में छोड़ आए. पूरे द्वीप के निवासियों ने इसके लिए डॉक्टर डू लिटिल को धन्यवाद दिया. इस पर उन्होंने कहा-"मित्रों, यह चमत्कार तों ज़िप के कारण हुआ है." इसके बाद द्वीप पर एक बड़ी सभा हुई. ज़िप के गले में सोने का पदक पहनाया गया. इस समय ज़िप की खुशी देखने वाली थी. क्योंकि अब तक तों हर बार पोलिनेशिया तोते की चतुराई की ही चर्चा होती थी.आगे की यात्रा सकुशल समाप्त हुई. डॉक्टर डू लिटिल एक कठिन यात्रा के बाद एक बार फिर अपने नगर में आ पहुंचे थे. उनके आने का समाचर सुनते ही उनके घ के आगे बीमार पशु-पक्षियों की भीड़ जमा हो गई. डॉक्टर साहेब ने कहा-"दोस्तों, मैं जल्दी ही आप सबको स्वास्थ कर दूंगा."

इसके बाद डॉक्टर साहब अपने नाविक मित्र से मिलने गए. उन्होंने कहा-मित्र, अगर तुम मेरी सहायता न करते तों मैं कभी अफ्रीका न जा पाता. मैंने तुमसे कहा था कि यात्रा से लौटकर तुम्हारा उधार चुका दूंगा, पर वहाँ मुझे पैसे नहीं, केवल प्रशंसा मिली है. मैं लज्जित हूँ."

इस पर नाविक ने कहा-"डॉक्टर डू लिटिल, मैंने आपको जहाज व दूसरा सब सामन उधार नहीं भेंटस्वरूप दिए थे. आप दुनिया के अनोखे पशु चिकित्सक हैं. भला दूसरा कौन है जो बीमार पशु-पक्षियों का हाल उनकी भाषा में पूछ सकें. आप महान हैं." सुनकर डॉक्टर डू लिटिल मुस्कराने लगे.#

Wednesday, July 27, 2011

बच्चों की दुनिया : कुछ इधर की कुछ उधर की

डॉक्टर हेमंत कुमार बाल साहित्य और बच्चों के सम्पूर्ण संसार पर निरंतर वैचारिक लेख लिख रहें है. उनके सामयिक लेखों में से कुछ की लिंक्स इस ब्लॉग पर देना मैंने उचित समझा है. मुझे विश्वास है कि इससे इस ब्लॉग के पाठकों का भरपूर लाभ होगा. हाल में प्रकाशित उनके एक लेख की लिंक यहाँ दी जा रही है :
http://www.jansandeshtimes.com/images/lucknow_28_07_2011_page11.jpg

बच्चों की दुनिया : कुछ इधर की कुछ उधर की

डॉक्टर हेमंत कुमार बाल साहित्य और बच्चों के सम्पूर्ण संसार पर निरंतर वैचारिक लेख लिख रहें है. उनके सामयिक लेखों में से कुछ की लिंक्स इस ब्लॉग पर देना मैंने उचित समझा है. मुझे विश्वास है कि इससे इस ब्लॉग के पाठकों का भरपूर लाभ होगा. हाल में प्रकाशित उनके एक लेख की लिंक यहाँ दी जा रही है :

http://www.jansandeshtimes.com​/images/lucknow_27_07_2011_pag​e9.jpg

Wednesday, July 20, 2011

ह्यू लाफिंग -डॉक्टर डू लिटिल का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर

ह्यू लाफिंग


ह्यू लाफिंग का जन्म १४ जनबरी १८८६ को मेडन हैड, बर्कशायर, इंग्लैंड में हुआ. जब वे ८ वर्ष के हुए तो डर्बीशायर के जेसुइट बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई शुरू की. आगे चलकर १९०६ लन्दन स्कूल ऑफ पोलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. काम के सिलसिले में उन्होंने अफ्रीका, कनाडा वेस्ट इंडीज की यात्राएं कीं, बाद में न्युयोर्क में रहने लगे. न जाने कब इंजीनियर ह्यू लाफिंग के मन में लेखक बनने की इच्छा जाग उठी. पर कुछ विशेष लिखने से पहले प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेना पड़ा. कहते हैं जब लाफिंग मोर्चे पर जा रहे थे तो बच्चों ने कहा कि वह मोर्चे से पत्र लिखें.
मोर्चे पर लाफिंग का सामना गोला-बारूद के धुएं सनसनाती गोलियों और बमों के धमाकों से हुआ. सब तरफ मरे हुए सैनिकों के विकृत शब् दिखाई देते और कानों में घायलों की चीख-पुकार गूंजती रहती थी. पत्रों में बच्चों के लिए उस मृत्यु के तांडव का विवरण कैसे लिखा जा सकता था भला. पर मन में बच्चों के लिए लिखने की इच्छा लगातार उन्हें प्रेरित करती रही और तब एक पात्र का जन्म हुआ. वह थे डॉक्टर जान डू लिटिल एम.डी. डॉक्टर डू लिटिल को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था. एक तोता पोलिनिशिया डॉक्टर डू लिटिल को पशु-पक्षियों के बोलियां सिखा देता है. और फिर वह जानवरों का इलाज करने लगते हैं. वह दुनिया के पहले ऐसे डॉक्टर बन जाते हैं जो हर पशु-पक्षी से उसकी भाषा में बात करता. उनके घर में रहते हैं चीची बंदर, ज़िप कुत्ता, टूटू उल्लू, डब-डब बत्तख और सबसे बड़ा मित्र पोलिनिशिया.

इन्ही पात्रों को लेकर उन्होंने जो पुस्तक लिखीं वह १९२० में प्रकाशित हुईं. शीर्षक था-"द स्टोरी ऑफ डॉक्टर डू लिटिल." छपते ही पुस्तक लोकप्रिय हो गई. पाठक डॉक्टर डू लिटिल के बारे में और अधिक जानने के इच्छुक हो उठे और ह्यू

लाफिंग ने १९२७ तक डू लिटिल श्रंखला की सात पुस्तकें लिख डालीं.लेकिन बीच में शायद कही ह्यू लाफिंग को ऐसा लगा जैसे वह डॉक्टर डू लिटिल ही बन गए हैं. वह खुद को "टाइप्ड" महसूस करने लगे. और तब उन्होंने अपनी एक पुस्तक "डॉक्टर डू लिटिल इन द मून " (१९२८) में डॉक्टर को चाँद पर भेजकर उस पात्र से छुटकारा पाने का प्रयास किया. पर पाठकों के आग्रह पर उन्हें
डॉक्टर डू लिटिल को वापस बुलाने पर विवश होना पड़ा और उन्होंने पुस्तक लिखी"डॉक्टर डू लिटिल्ज रिटर्न" (१९३३) इस श्रंखला की अंतिम पुस्तक "डॉक्टर डू लिटिल एंड द सीक्रेट लेक" १९४८ में उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई. अपनी कृतियों का चित्रांकन भी ह्यू लाफिंग ने स्वयं किया जिसे बहुत सराहा गया.

ह्यू लाफिंग की कुछ अन्य कृतियाँ हैं-
"द स्टोरी ऑफ मिसेज तबज"-१९२३, टामी, टिल्ली एंड मिसेज टब्स. इनमे डॉक्टर डू लिटिल मौजूद नहीं हैं. कहने की आवश्यकता नहीं है कि ह्यू लाफिंग अपनी "डू लिटिल" श्रंखला के लिए ही अधिक जाने जाते हैं. शायद उसी तरह जैसे दुनिया आर्थर कानन डायल को उनके जासूस शर्लक होम्स के लिए पहचानती है.
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डॉक्टर डू लिटिल (संक्षिप्त हिंदी रूपांतर: देवेन्द्रकुमार:रमेश तैलंग)

एक थे डॉक्टर जान डू लिटिल. वह इंग्लैण्ड के छोटे से कस्बे पद्लबाई में रहते थे. अत्यंत कुशल डॉक्टर थे डू लिटिल. वह लालची नहीं थे. बड़े ध्यान से रोगियों की जांच करके दवाई देते. रोगी जल्दी ही स्वस्थ हो जाते. डॉक्टर साहब कम फीस लेते और गरीबों का मुफ्त इलाज करते. पद्ल्वाई के सभी निवासी डॉक्टर डू

लिटिल का बहुत सम्मान करते थे.
डॉक्टर डू लिटिल के घर की देखरेख उनकी बहन सारा करती थी. डॉक्टर को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था. डॉक्टर ने अपने मित्रों के अनोखे नाम रखे थे -जैसे डब-डब बत्तख, कुत्ता ज़िप, गब-गब सूअर, टू-टू उल्लू और पोलिनेशिया तोता. सारा को डॉक्टर भैया के पालतू पशु-पक्षियों से चिढ थी. वह कहती-विचित्र शौक है तुम्हारा, तुम्हारे पशु-मित्र सारा दिन घर को गन्दा रखते हैं. इस पर डू लिटिल मुस्कराकर चुप रह जाते, वह मानते थे कि उनके घर पर उनके मित्र पशु-पक्षियों को भी उतना ही अधिकार था जितना खुद उनका या बहन सारा का.मरीज़ आते तो पूरे घर में पशु-पक्षियों को घूमते देख घबरा जाते.

धीरे-धीरे कुछ लोगों ने दवाखाने में आना बंद कर दिया. वे लोग चाहते थे कि डॉक्टर डू लिटिल अपने पालतू पशु-पक्षियों को घर से भगा दें, पर डॉक्टर ने वैसा नहीं किया. एक दिन कोई औरत दवा लेने आई तो उसने देखा सोफे पर कुछ पशु बेठे हैं. वह डर कर भाग खड़ी हुई. तब दूसरे रोगी भी बिना दिखाए चले गए. इस तरह डॉक्टर डू लिटिल के दवाखाने में आने वाले रोगियों के संख्या बहुत कम हो गई. पर डॉक्टर डू लिटिल ने इस बात की चिंता नहीं की. फिर भी मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं. डॉक्टर की आमदनी तो कम हो गई लेकिन पालतू पशु-पक्षियों पर होने वाला खर्च बढ़ता गया. ऐसा भला कितने दिन चल सकता था.

लोग डॉक्टर डू लिटिल के घर को चिड़ियाघर कहने लगे. एक दिन डू लिटिल का एक परिचित उनसे मिलने आया. वह हँस कर बोला-डॉक्टर साहब, जब आप मनुष्यों का इलाज़ करना छोड़ दीजिए और पशु पक्षियों के डॉक्टर बन जाइए. शायद तब आपको थोड़ी-बहुत आमदनी होने लगे. वह तो अपनी बात कहकर चला गया पर डॉक्टर डू लिटिल सोच में डूब गए. तभी पोलिनेशिया तोता बोला, "डॉक्टर साहब, मैंने उस आदमी की बात ध्यान से सुनी थी. उसका आइडिया बुरा नहीं है."

डू लिटिल बोले-"पोलिनेशिया, शहर में पहले ही जानवरों के कई डॉक्टर हैं. और फिर भला मैं जानवरों की बातें कैसे समझूंगा, तुम ठहरे चतुर. मनुष्यों की बोली समझते हो और बोलते हो. मैं भी तुम्हारी बात का मतलब समझ जाता हूँ. लेकिन भला बताओ तो अगर कोई बिल्ली, भालू, बंदर, हाथी आकर मुझसे बोलने लगे तो मैं उनका मतलब कैसे समझूंगा? किसी बीमार का इलाज करने के लिए यह जरूरी है कि डॉक्टर उसकी बात सुनकर अपनी बात उनसे कह सके."

इस पर पोलिनेशिया ने कहा-"डॉक्टर साहब, आज अपने बारे में मैं आपको एक नई बात बता रहा हूँ. मैं दुनिया के लगभग सभी पशु-पक्षियों की बोलियां समझता हूँ. हर जानवर से उसकी बोली में बात कर सकता हूँ. यदि आप कहें तो मैं आपको भी पशु-पक्षियों की बोलियां समझा सकता हूँ. इसमें आपको ज्यादा परेशानी नहीं होगी. भला ऐसे डॉक्टर कहाँ मिलेंगे जो जानवरों से उनकी बोली में बात करें."

डॉक्टर डू लिटिल को पोलिनेशिया की बातें मजेदार लग रही थीं. बोले-"वाह! पोलिनेशिया, तुम मेरे गुरु बन जाओ. अगर मैं पशु-पक्षियों की बोलियां सीखकर उनका इलाज़ कर सका तो मुझे खुशी होगी. वैसे भी मुझे पशु-पक्षियों के साथ रहना अच्छा लगता है."
बस उसी दिन से पोलिनेशिया तोता डॉक्टर डू लिटिल को जानवरों की बोलियां सिखाने लगा. शुरू-शुरू में उन्हें कठिनाई अवश्य हुई पर वह मन लगाकर सीखते रहे. उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वह हर पशु-पक्षी से उसकी बोली में बात कर सकने वाले डॉक्टर बनकर रहेंगे. इस तरह गुरु पोलिनेशिया अपने शिष्य बने डॉक्टर डू लिटिल को जानवरों की बोलियां सिखाता रहा. और फिर एक दिन डॉक्टर डू लिटिल के दरवाजे पर एक नया बोर्ड दिखाई दिया. उस पर लिखा था-डॉक्टर डू लिटिल. जानवरों के डॉक्टर



इस नए बोर्ड ने तो डॉक्टर साहब के रहे-सहे रोगियों को भी डरा दिया. अब लोग उनके पास अपने पालतू पशु-पक्षियों को इलाज के लिए लाने लगे. एक दिन एक घोडा डॉक्टर साहब के दवाखाने में आया. डॉक्टर डू लिटिल को अपनी बोली में बोलते सुन घोडा बहुत खुश हुआ. उसने कहा-"डॉक्टर साहब, तकलीफ मेरी आँखों में है, पर दवा मुझे पेट-दर्द की दी जा रही थी. मुझे आँखों से कम दिखाई देता है. मैंने मनुष्यों को चश्मा लगाए देखा है. क्या आप मेरे लिए हरे-लेंस वाला चश्मा बना देंगे?"

डॉक्टर साहब ने घोडे के लिए हरा चश्मा बना दिया. घोडा बहुत खुश हुआ. फिर तो शहर में कई घोड़े हरा चश्मा पहने दिखाई देने लगे. डॉक्टर डू लिटिल के पास इलाज़ के लिए आने वाला हर पशु-पक्षी उनके पक्का दोस्त बन जाता था. धीरे-धीरे सारे जानवर इस अनोखे डॉक्टर के बारे में जान गए. पक्षियों ने उनकी खबर दूसरे देशों में भी पहुंचा दी..

अफ्रीका से आया सन्देश:



एक दिन डॉक्टर के मोहल्ले में एक मदारी आया. उसके साथ एक बंदर था. मदारी बंदर का खेल दिखाने लगा. देखने वालों की भीड़ लग गई. भीड़ में खड़े बच्चे तालियाँ बजा रहे थे. डॉक्टर डू लिटिल ने बंदर को देखा तो जान गए कि बंदर खुश नहीं है. और फिर मदारी तो बंदर से भीख मंगवाता था. डू लिटिल ने बंदर से उसकी भाषा में बात की तो पता चल गया कि बंदर कितना परेशान था. वह मदारी की कैद से छुटकारा पाना चाहता था. डॉक्टर और बंदर के बीच हुई बातचीत को कोई नहीं समझ पाया. उन्होंने मदारी को कुछ पैसे देकर बंदर को खरीद लिया. पैसे लेकर जाते समय मदारी झगडा करने लगा. डू लिटिल ने कहा-"जानवरों को दुःख देना बुरी बात है. मैं अभी पुलिस को बुलवाता हूँ." पुलिस का नाम सुनते ही मदारी डरकर भाग गया.

घर में रहने वाले दूसरे जानवरों ने बंदर का नाम चीची रख दिया. चीची बंदर के करतबों से सभी खुश रहते थे. उन्हीं दिनों शहर में सर्कस लगा. सर्कस में था एक मगरमच्छ. उसका नाच दर्शकों को बहुत पसंद आता था. लेकिन इधर कई दिनों से मगरमच्छ के दांत में दर्द था. वह खेल दिखाए तो कैसे? उसे जानवरों के डॉक्टर का पता चला तो रात के अँधेरे में डॉक्टर डू लिटिल के दवाखाने में आ पहुंचा. डॉक्टर डू लिटिल ने मगरमच्छ के दांतों में दवा लगा दी. उसका दांत दर्द ठीक हो गया. उसने डॉक्टर डू लिटिल से कहा -"मैं सर्कस में वापस नहीं जाना चाहता. वे लोग मुझसे जबरदस्ती करते हैं. क्या मैं आपके बाग के तालाब में रह सकता हूँ. मैं वादा करता हूँ कि यहाँ रहते हुए किसी जानवर को नहीं खाऊंगा.डॉक्टर डू लिटिल ने मगरमच्छ को अपने घर में रहने की अनुमति दे दी. सर्कस वालों ने भागे हुए मगरमच्छ को बहुत ढूँढा पर वे उसका पता नहीं लगा सके.

लेकिन अब एक नई समस्या खड़ी हो गई. लोग अपने बीमार पशु-पक्षियों को दवाखाने लाने से घबराने लगे. हालांकि घड़ियाल ने डॉक्टर से किसी जानवर को न खाने का वादा किया था, लेकिन यह बात दूसरे लोग भला कैसे समझ सकते थे.

धीरे-धीरे पशु-पक्षी रोगियों की संख्या भी कम हो गई. डॉक्टर डू लिटिल जानते थे कि यह आफत मगरमच्छ के कारण आई है, पर वह अपने दयालु स्वभाव के कारण मगरमच्छ से घर छोड़कर जाने के लिए नहीं कह सके. डॉक्टर डू लिटिल की बहन सारा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकी. एक दिन वह कहीं और रहने चली गई. डॉक्टर साहब ने सारा को समझाना चाहा, लेकिन वह नहीं माना. डॉक्टर डू लिटिल अपने जानवर मित्रों के साथ अकेले रह गए. अब कोई भी उनसे मिलने नहीं आता था.एक रात डॉक्टर साहब सो रहे थे, तो चीची बंदर, पोलिनेशिया तोता और टूटू उल्लू आपस में बात करने लगे कि अब क्या किया जाए. क्योंकि उन्ही के कारण

डॉक्टर डू लिटिल पर मुश्किल आई थी. डॉक्टर के पालतू जानवरों ने फैसला किया कि घर के सभी काम वे खुद करेंगे. लेकिन काम सिर्फ चीची ही कर सकता था, जिसके दो हाथ थे. फिर सर्दी का मौसम आ गया. खूब बर्फ गिरी. ऐसे में तो भोजन मिलना भी दुर्लभ हो गया.

सर्दियों की ठंडी और अँधेरी रात थी. डॉक्टर और उनके मित्र रसोईघर में बैठे बातें कर रहे थे. पूरे मकान में रसोईघर ही कुछ गरम था. लेकिन चीची बंदर का पता नहीं था. डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"चीची कहाँ हो इस समय? तभी दरवाजा खुला और चीची बंदर अंदर आया. वह हांफ रहा था. इससे पहले कि डू लिटिल उसे सर्दी में घर से बाहर रहने के लिए डांटते, चीची घबराए स्वर में बोला-"डॉक्टर साहब, अफ्रीका में आफत आ गई है.
"क्या मतलब?" डॉक्टर साहब ने पूछा-"आफत अफ्रीका में आई है, पर तुम इतना क्यों घबरा रहे हो?"
"वहाँ बंदरों में एक विचित्र महामारी फ़ैल गई है. हजारों बंदर बीमार हैं, अनेक हर रोज मर रहे हैं. आपको वहाँ चलना होगा." कहकर चीची ने डॉक्टर डू लिटिल का हाथ थाम लिया. डॉक्टर डू लिटिल ने महसूस कर लिया कि चीची का हाथ कांप रहा है.
"सन्देश कहां से मिला, किसने दिया?" उन्होंने पूछा.
"एक अफ्रीकी चिड़िया यहाँ सन्देश लेकर आई है. मेरे चचेरे भाई ने सन्देश भेजा है." चीची बोला.
"चिड़िया कहाँ है?"
"बाहर."
"पहले उसे अंदर तो लाओ, नहीं तो वह सर्दी में ठिठुर कर मर जाएगी." डू लिटिल बोले.
चीची अफ्रीका से आई चिड़िया को अंदर बुला लाया. चिड़िया सचमुच ठण्ड से कांप रही थी. अंगीठी के गरमाई से उसके गीले पंख सूख गए. फिर उसने डॉक्टर को अफ्रीका के समाचार सुनाए. सचमुच अफ्रीका में बंदरों की स्थिति बहुत खराब थी. डॉक्टर डू लिटिल ने चिड़िया से कहा-"देखो, तुमसे क्या छिपाना. मैं वहाँ जरूर जाना चाहता हूँ, पर आजकल पैसों का संकट है. बिना पैसों के मैं कैसे यात्रा करूँगा."

तभी पोलिनेशिया ने कहा-"डॉक्टर साहब, एक नाविक आपका मित्र है. एक बार आपने उसकी बुलबुल का बुखार ठीक किया था. आपको उससे बात करनी चाहिए, शायद वह कोई प्रबंध कर सके." डू लिटिल बोले-"अब तो कल दिन में ही कुछ हो सकेगा ." फिर उन्होंने चिड़िया से कहा-"तुम इतनी लंबी यात्रा करके आई हो, अब आराम करो. कल आगे का कार्यक्रम बनायेंगे." इसके बाद डू लिटिल सोने चले गए, पर उनके पशु-पक्षी मित्र जागते ही रहे. वे सभी अफ्रीका की यात्रा पर जाना चाहते थे.

दिन निकलते ही डॉक्टर साहब अपने नाविक मित्र से मिलने गए. पूरी बात सुनकर उसने कहा-"जैसे भी होगा आपकी अफ्रीका यात्रा के लिए एक जहाज और दूरी आवश्यक सामग्री का प्रबंध कर दूंगा." डू लिटिल ने नाविक को वचन दिया-"मैं अफ्रीका से लौटकर तुम्हारे सारे पैसे चुका दूंगा." इस तरह बात बन गई. अफ्रीका जाने की सबसे ज्यादा खुशी मगरमच्छ, तोते पोलिनेशिया और चीची बंदर को थी. क्योंकि वे तीनों ही अफ्रीका से आए थे. पोलिनिशिया तो इससे पहले भी कई लंबी यात्राएं कर चुका था. पर एक समस्या थी-अफ्रीका तक की यात्रा में रास्ता कौन बताएगा? डॉक्टर डू लिटिल तो पहले कभी अफ्रीका गए नहीं थे. तब अफ़्रीकी चिड़िया ने कहा-"रास्ता मैं दिखाऊंगी. मैं जहाज के आगे-आगे उडती चलूंगी."

यात्रा शुरू हुई. मौसम अच्छा था. जहाज चिड़िया की पीछे-पीछे समुद्र में चलता रहा. जब चिड़िया कुछ थक जाती तो आराम करने के लिए जहाज पर उतर आती. दिन ढलने लगा. तभी पोलिनेशिया ने कहा-"रात में भला हम चिड़िया को कैसे देख पाएंगे? इस तरह तो रास्ता भटक सकते हैं.

चिड़िया ने हंसकर कहा-"मैंने इस समस्या पर पहले ही सोच लिया है." किसी की समझ में नहीं आया कि आखिर चिड़िया रात के अँधेरे मैं उन सबको कैसे दिखाई देगी. पर चिड़िया थी समझदार. योजना के अनुसार उसके पंखों से चिपककर कुछ जुगनू उड़ने लगे. उनकी रौशनी बार-बार जल-बुझ रही थी. लगता था जैसे चिड़िया अपनी चोंच में एक नन्ही लालटेन लेकर उड़ रही हो. बस, इस तरह अँधेरे में भी दिशा ज्ञान बना रहा. डॉक्टर डू लिटिल तथा उनके साथी चिड़िया को आसानी से देख सकते थे.

जहाज आगे बढ़ा तो मौसम गरम हो गया. पोलिनेशिया, चीची और मगरमच्छ को यह मौसम पसंद था लेकिन सूअर. कुत्ता और टूटू उल्लू परेशान थे. वे हर समय छाया में ही दुबके रहते थे. दब-दब बत्तख थोड़ी-थोड़ी देर में पानी में कूद जाती. कुछ देर तैरती और फिर ऊपर आ जाती. उसे इस खेल में खूब मजा आ रहा था. डब-डब ने डॉक्टर से कहा-"मुझे पता नहीं था कि अफ्रीका यात्रा में इतना आनंद आएगा. डब-डब ने डॉक्टर से कहा-"मुझे पता नहीं था कि अफ्रीका यात्रा में इतना आनंद आएगा." डू लिटिल कुछ बोले नहीं. वह आकाश की ओर देख रहे थे, जहां काले-काले बदल उमड़-उमड़ रहे थे.

कुछ देर बाद बड़ी-बड़ी मछलियों का एक झुण्ड जहाज की तरफ आया. मछलियों ने जहाज को घेर लिया. फिर एक मछली पानी से मुंह निकलकर बोली-"क्या इस जहाज में डॉक्टर डू लिटिल यात्रा कर आहें हैं?"
पोलिनेशिया ने कहा-"हां, कहो क्या बात है?"
मछली बोली-"असल में बंदरों के सरदार ने हमें यह देखने भेजा था कि डॉक्टर डू लिटिल कहाँ तक आ पहुंचे हैं? कुछ बंदरों को संदेह हो रहा है कि क्या डॉक्टर साहब उनका इलाज करने के लिए सचमुच अफ्रीका आएँगे?"
तब डॉक्टर डू लिटिल ने मछली से कहा-"मैं तो किसी बीमार पशु-पक्षी का इलाज करने के लिए दुनिया में कहीं भी जा सकता हूँ. तुम सब जाकर बंदरों से कह दो कि मैं जल्दी ही पहुँचने वाला हूँ."

थोड़ी देर बाद डॉक्टर का सन्देश लेकर मछलियों का झुण्ड वापस चला गया. उन्होंने डॉक्टर डू लिटिल से कहा था कि अफ्रीका महाद्वीप का तट बस ढोडी ही दूर है.
लेकिन क्या सच में अफ्रीका इतना पास था? क्योंकि थोड़ी देर बाद ही आकाश में बिजली कौंधने लगी, फिर तेज बारिश शुरू हो गई. समुद्र में ऊंची-ऊंची लहरें

उठ रही थीं. डॉक्टर डू लिटिल का जहाज ऊंची लहरों पर तिनके की तरह डोलने लगा. फिर अँधेरा घिर आया. बारिश उसी तरह तेजी से हो रही थी. डॉक्टर डू लिटिल नहीं जानते थे कि जहाज किधर जा रहा है. क्योंकि उस तूफानी बारिश में चिड़िया भी आकाश में उनकर उन्हें रास्ता नहीं दिखा सकती थी.



जारी ......शेष भाग के लिए थोड़ी..बस थोड़ी सी प्रतीक्षा करें
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चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

डॉक्टर डू लिटिल का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर

हाइडी के बाद अब ह्यू लाफिंग की अमर रचना डॉक्टर डू लिटिल के संक्षिप्त हिंदी रूपांतर की प्रतीक्षा करें. शीघ्र ही इस ब्लॉग पर प्रस्तुत होगा.

Monday, July 11, 2011

विश्व की महान क्लासिक कृतियों का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर-हाइडी

योहन्ना स्पायरी-एक परिचय

१२ जून, १८२७ को हिर्जल, ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड में जन्म. जन्म का नाम योहन्ना लुईस ह्युसर. कई जगह जन्म का वर्ष १८२९ भी लिखा मिलता है. पिता जोह जाक ह्यूमस पेशे से शल्य चिकित्सक थे. माँ का नाम था मीरा श्वाइजर. योहन्ना माता-पिता की छः संतानों में चौथी थी. आरंभिक शिक्षा हिर्जल तथा बाद में ज्यूरिख में हुई. योहन बर्न्हार्ड स्पायरी से विवाह के बाद उनका नाम हो गया योहन्ना स्पायरी जिन्हें एक अनाथ बालिका हाइडी शीर्षक पुस्तक की विश्वप्रसिद्ध स्विस लेखिका के रूप में जाना जाता है.
योहन्ना स्पायरी की पहली कथा जे एस के संक्षिप्त नाम से प्रकाशित हुई थी. शुरू में वयस्क पाठकों के लिए लिखा, बाद में बच्चों के लिए खूब कलम चलाई.हाइडी में एक अनाथ पहाड़ी बालिका के संघर्षपूर्ण बचपन की मार्मिक कथा कही गई है. इसे आज स्विट्ज़ररलैंड की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृति माना जाता है. जर्मन भाषा में लिखी गई पुस्तक का अनुवाद विश्व की ५० से अधिक भाषाओं में हुआ. इसकी करोडों प्रतियाँ बिकी हैं, इस पर अनेक फ़िल्में बनाई गई हैं.
आज इसके लेखन को इतने वर्ष बीत जाने के बाद भे हाइडी को विश्व बाल साहित्य में ऊंचा स्थान प्राप्त है.
योहन्ना स्पायरी का निधन ७ जुलाई, १९०१ को ज्ज्युरिख में हुआ था. यहाँ हाइडी का संक्षिप्त रूपांतर दिया जा रहा है:
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हाइडी : संक्षिप्त हिंदी रूपांतर


एक थी लड़की, हाइडी. सुंदर, सलोनी लेकिन अनाथ. उसके पिता एक दुर्घटना में माँरे गए. माँ इसी दुःख में चल बसी. हाइडी को उसकी मौसी डीटाई ने पाला था. वह स्विट्जरलैंड के एक पहाड़ी गांव में रहती थी. अब एक समस्या थी.

डीटाई को शहर में नौकरी मिल गई थी. डीटाई वहाँ हाइडी को नहीं ले जा सकती थी. तब उसे हाइडी के बाबा अंकल आल्प का ध्यान आया. वह हाइडी को अंकल आल्प के पास छोड़ने चल दी.

विचित्र थे अंकल आल्प. गाँव के लोग उन्हें सनकी बूढ़े के नाम से जानते थे. आल्प गाँव से दूर, पहाड़ी पर अकेले रहते थे एक कुटिया में. आल्प कभी गाँव में नहीं आते थे. कोई मिल भी जाता तो मुंह फेरकर चले जाते.

इसी तरह एकांत वास करते हुए वर्षों बीत गए थे उन्हें. भला क्या वह आदमी नन्ही हाइडी को अपने साथ रखने के लिए तैयार होगा? गाँव वाले सोचते थे, अंकल आल्प हाइडी को भगा देंगे. डीटाई को भी यही लगता था लेकिन हाइडी को उसके भूले बिसरे, सनकी बाबा के पास छोड़ आने के अलावा कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं था उसकी मौसी डीटाई के पास.

पहाड़ी पर चढ़ते हुए हाइडी एक जगह बैठ गई. उसकी मौसी अपनी एक सहेली से बात करने लगी. तभी पीटर हाइडी के पास आया. वह उम्र में हाइडी से बड़ा था और पहाड़ों में ऊपर बकरियां चराने ले जाता था हर दिन. शाम को नीचे ले आता था. गर्मियों में यही दिनचर्या थी पीटर की. पीटर के पिता नहीं थे. घर में थीं उसकी माँ और नेत्रहीन बूढ़ी दादी.

मौसम सुहावना था, पहाड़ों पर हरियाली थी. और हवा में फूलों की सुगंध. पीटर और हाइडी खेलने लगे. फिर मौसी उसे लेकर बढ़ चली. ऊपर लंबी, सफ़ेद दाढी वाले आल्प अपनी कुटिया के बाहर बैठे थे. हाइडी दौडती हुई उनके पास जा पहुँची. उसने कहा-"बाबा नमस्कार, आप कैसे हैं?"

आल्प अचरज से हाइडी को देखने लगे. वह हाइडी के वारे में कुछ नहीं जानते थे. फिर डीटाई ने आल्प को हाइडी के वारे में सब कुछ बता दिया.
"तुम इस लड़की को यहाँ क्यों लाई हो?" आल्प ने क्रोध से कहा.
डीटाई ने कहा-"क्योंकि आप इसके बाबा हैं. अब मैं इसकी देखभाल नहीं कर सकती."
"जाओ, चली जाओ, और फिर कभी मेरे पास मत आना." आल्प डीटाई पर चिल्लाए तो वह तुरंत वापस चल दी. वह सोच रही थी-"अब हाइडी का चाहे जो हो. मैं तो यहाँ कभी नहीं आऊँगी."

आल्प ने हाइडी से कुछ नहीं कहा. वह गहरे सोच में डूबे थे. जैसे उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि हाइडी उनके पास कैसे रहेगी इस बीच हाइडी झोंपडी में घुसकर इधर-उधर घूमने लगी. वह सोच रही थी -"ओह, मेरे बाबा का घर कितना सुंदर है. अब मैं यहीं रहूँगी.

झोंपडी में एक दुछत्ती थी. वहाँ तक चढ़ने के लिए लकड़ी की सीढी लगी थी. दुछत्ती की खिड़की से पहाड और घाटी के सुंदर दृश्य दिखाई देते थे. हाइडी ने कहा-"बाबा, मैं तो यहीं सोया करूंगी." रात में तेज हवा बहने लगी. पेड़ जोर-जोर से हिल रहे थे. आल्प ने सोचा कहीं हाइडी डर न जाए. वह सीढ़ी चढ़कर ऊपर गए. देखा, हाइडी गहरी नींद में थी. छोटी खिड़की से चांदनी अंदर आ रही थी. बाबा कुछ देर वहीं खड़े रहे. वह प्यार से सोती हुई हाइडी को देख रहे थे.

हाइडी हर दिन पीटर के साथ पहाड पर चरागाह में जाती थी. पीटर से खूब गहरी दोस्ती जो हो गई थी. बाबा के साथ रहना उसे बहुत अच्छा लगा था. लेकिन फिर पतझड़ का मौसम आ गया. अब तेज हवाएँ चलने लगी थीं. बाबा ने कहा-"हाइडी,आज पीटर के साथ पहाड पर मत जाना. हो सकता है, तेज हवा तुम्हे उदा ले जाए."

सर्दियों में पीटर बकरियों को चराने नहीं ले जाता था. उन दिनों वह स्कूल जाता था. एक दिन वह आया उसने आल्प से कहा-"बाबा, आप हाइडी के साथ हमारे घर आएं एक दिन." सुनकर हाइडी खुश हो गई. पर बाबा ने कहा-"पीटर, अभी नहीं. बाहर खूब बर्फ गिर रही है."

पर एक दिन वह स्लेज में बैठकर हाइडी को पीटर के घर ले गए. स्लेज बर्फ पर नीचे की ओर तेजी से फिसलती जा रही थी. हाइडी को लग रहा था जैसे वह उड़ रही हो.

पीटर की दादी ने हाइडी को खूब प्यार किया. वह नन्ही हाइडी का चेहरा छू-छूकर महसूस करती रहीं, उनकी आँखें जो नहीं थीं. जिसने भी अंकल आल्प को हाइडी के साथ देखा वही आश्चर्य करने लगा. क्योंकि न जाने कितने वर्षों बाद आल्प नीचे गाँव में आए थे. शायद यह हाइडी का चमत्कार था.

इसी तरह दो वर्ष बीत गए. उस पहाड़ी स्थान पर आटे-जाते मौसमों के सब रंग देखे हाइडी ने. उसकी नन्ही दुनिया में थे उसके बाबा, पत्र, पत्र की माँ, नेत्रहीन दादी. नीला आकाश, हरी-भरी धरती, गिरती बर्फ, उछालते झरने, रंगबिरंगे सुगंध बिखेरते फूल, धलाओंओं पर चरती बकरियां. बहुत सुखी थी हाइडी वहाँ.

नीचे बसा था गाँव डोरफ्ली. दो बार पीटर वहाँ के स्कूल अध्यापक का सन्देश लाया था बाबा के पास. सन्देश यही था कि हाइडी अब बड़ी हो गई है. उसे स्कूल में दाखिल करना चाहिए. पर बाबा हर बार मना कर देते थे.

एक सुबह गाँव के पादरी अंकल आल्प से मिलने आए. उन्होंने आल्प को बहुत समझाया कि वह हाइडी को पढ़ने के लिए स्कूल भेजें और स्वयं भी गाँव में आकर रहें, पर सुनकर आल्प नाराज हो गए.

अगले दिन हाइडी के मौसी डीटाई वहाँ आ पहुँची. वह हाइडी को अपने साथ शहर ले जाने आई थी. उसने आल्प से कहा-"शहर में एक अमीर आदमी की बेटी बीमार है. उसके पैरों में तकलीफ है. वह चलफिर नहीं सकती. हर समय व्हील चेयर पर बैठी रहती है. उसकी माँ नहीं है. पिता अक्सर दौरे पर रहते हैं. लड़की बहुत अकेलापन महसूस करती है. अगर हाइडी जाकर उस लड़की के साथ रहने लगे तो अच्छा रहेगा. उस लड़की का अकेलापन दूर होगा और हाइडी का जीवन भी बदल जाएगा." लेकिन अंकल आल्प ने हाइडी को भेजने से मना कर दिया. फिर गुस्से में जाने कहाँ चले गए. अब डीटाई को मौका मिल गया. वह हाइडी को समझाबुझाकर अपने साथ एक तरह से जबरदस्ती ले गई. हाइडी अपने प्यारे बाबा से दूर हो गई. अगर वह गुस्से में घर से न जाते तो हाइडीकी मौसी उसे कभी अपने साथ ने ले जा पाती.

डीटाई शहर में हाइडी को सीसमान के मकान में ले गई. उनकी एकलौती बेटी क्लारा पंगु थी. उसकी देखभाल करने वाली औरत का नाम था मिस रोटनमायर. वह कड़वे स्वभाव की थीं. हँसना तो जैसे उन्होंने कभी सीखा ही न था. भला उनके साथ बेचारी क्लारा कैसे खुश रह सकती थी.

क्लारा हाइडी को देखते ही खुश हो गई पर मिस रोटनमायर उसे गाँव-देहात के गंवार लड़की समझ रही थीं. डीटाई हाइडी को क्लारा के पास छोड़कर चली गई.

रात बीती. हाइडी की नींद खुली. वह भौंचक्की सी इधर-उधर देखने लगी. फिर कुछ देर बाद उसकी समझ में आया कि वह पहाड़ी गाँव में नहीं. शहर में क्लारा के घर में है. उसने परदे हटाकर खिड़की से बाहर झाँका, पर उसे केवल दीवारें दिखाई दीं. गाँव के पहाड, झरने, फूल भला शहर में कैसे दिखाई देते.

मिस रोतान्मायर हर समय हाइडी को डाँटती रहती थीं. उनका ख्याल था कि गाँव के उस असभ्य लड़की के साथ रहकर क्लारा भी वैसी हो जाएगी. लेकिन क्लारा को तो हाइडी के रूप में एक अच्छी सहेली मिल गई थी.
हाइडी ने घर के नौकर सेबेस्तियनसे पूछा-"मैं पहाड और घाटी कहाँ देख सकती हूँ?"
सेबेस्तियन बोला-"इसके लिए तो तुम्हें गिरजाघर की ऊँची मीनार पर चढ़ना होगा.

बस, हाइडी तुरंत बिना बताए सड़क पर निकल आई. वह गिरजाघर का पता पूछती हुई सड़क पर चलने लगी.

रास्ते में उसे एक लड़का दिखाई दिया. वह बाजा बजा रहा था. उसके दूसरे हाथ में एक मेढक था. हाइडी ने उससे पूछा तो लड़का बोला-"मैं तुम्हें ले चलूँगा. पर तुम्हे पैसे देने होंगे-मेरी फीस."

हाइडी बोली-"पैसे तो नहीं हैं मेरे पास. तुम मेरे साथ क्लारा के पास चलना. मैं उससे पैसे दिलवा दूँगी.: लड़का उसे गिरजाघर की मीनार में ऊपर तक ले गया. पर वहाँ से भी हाइडी को बस ऊँचे-ऊँचे मकान ही दिखाई दिए. कहाँ थे उसके पहाड़, झरने, फूल और
नीला आकाश? वह उदास हो गई.

चलते समय गिरजाघर के चौकीदार ने उसे बिल्ली के बच्चे दिखाए. हाइडी ने बिल्ली के दो बच्चे अपनी जेबों में रख लिए. फिर बोली-"बाकी बिल्ली के बच्चों को भी मेरी सहेली क्लारा के पास ले आना. वह इनके साथ खेलेगी."

उधर पूरे घर में हाइडी को ढूंढा जा रहा था. क्लारा तो रो रही थी. हाइडी लौटी तो रोटनमायर ने गुस्से में उसे फटकारा. तभी आवाज सुनाई दी "म्याऊँ!" और बिल्ली के बच्चे उसकी जेब से निकलकर फर्श पर घूमने लगे. मिस रोटनमायर डर-डर कर चीखने लगीं. क्लारा ने सेबेस्तियन से कहा-"बिल्ली के बच्चों को ऐसी जगह रख दो जहाँ मिस रोटनमायर न देख सकें. मैं इनके साथ खेलना चाहती हूँ."


तभी बाजे वाला लड़का अपने कछुए को लेकर वहाँ आया और पैसे मांगने लगा. सेबेस्तियन समझ गया कि यह सब हाइडी के कारण हुआ है. लड़के ने बाजा बजाया तो मिस रोटनमायर वहाँ आकार चिल्लाने लगीं-फिर उन्होंने फर्श पर एक कछुए को देखा तो चीखकर भागीं. सब हँस रहे थे. सेबेस्तियन ने बाजे वाले लड़के को कुछ पैसे देकर विदा किया. कुछ देर बाद गिरजाघर का बूढा चौकीदार एक टोकरी में बिल्ली के बच्चे लेकर आ गया. सारे घर में "म्याऊँ-म्याऊँ सुनाई देने लगी. क्लारा को मजा आ रहा था. न जाने कितने समय बाद यों खिलखिलाकर हँसी थी क्लारा.

कुछ दिन बाद क्लारा के पिता सीसमान यात्रा से लौट आए, क्लारा ने पिता को बताया कि उसकी नई सहेली हाइडी कितनी अच्छी है. सीसमान सुनकर संतुष्ट हुए कि उनकी पंगु बेटी का अकेलापन दूर हो गया है.

कुछ दिन बाक क्लारा की बूढ़ी दादी वहाँ आई. उन्हें भी हाइडी अच्छी लगी. जब उन्होंने सुना कि हाइडी अनपढ़ है तो उन्होंने हाइडी से बात की. हाइडी ने बता दिया. दादी माँ ने उसे एक पुस्तक दिखाई. कहा-"पुस्तक में अच्छी-अच्छी कथाएं हैं. अगर तुम पढ़ना सीख लो तो उन कथाओं को पढ़ सकोगी.हाइडी किताब पलटने लगी. एक पृष्ठ पर पहाड, घाटी, झरने का चित्र था. चित्र में पहाड़ी ढलान पर बकरियां चर रही थीं . उसे देखते ही हाइडी रोने लगी.उसने क्लारा की दादी को बताया कि उसका घर ऐसा ही सुंदर है.

क्लारा की दादी जान गई कि हाइडी का मन गाँव से बिछुड़कर बहुत दुखी है.

क्लारा के अध्यापक हाइडी को भी पढाने लगे. हाइडी चाव से पढ़ती थी. वह जल्दी ही पढ़ना-लिखना सीख गई. वह जब भी किसी पहाड़ी गाँव की कथा पढ़ती तो रो पड़ती. सब जान चुके थे कि हाइडी अपने गाँव में बाबा के पास लौट जाने के लिए बेचैन थी. कुछ दिन बाद क्लारा की दादी चली गई. उनके जाने से अपने गाँव में बाबा के पास लौट जाने के लिए बेचैन है. और भी उदास हो गई.

एक सुबह सेबेस्तियनरोज की तरह माकन का मुख द्वार खोलने गया तो हैरान रह गया. दरवाजा खुला पड़ा था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. फिर एक रात सेबेस्तियनने अँधेरे में सीढ़ियों पर एक सफ़ेद आकृति को देखा. वह बेतरह घबरा गया.घर में सब भूत-प्रेत की चर्चा करने लगे.कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था. तुरंत क्लारा के पिता सीसमान को खबर दी गई. वह आ पहुंचे.
रात को सीसमान और क्लारा का इलाज़ करने वाले डॉक्टर भूत की प्रतीक्षा में छिपकर बैठ गए. आधी रात के बाद उनहोंने अँधेरे में दरवाजे का कुंडा खुलने की आवाज सुनी. आवाज मुख्य द्वार की ओर से आ रही थी . दोनों झट वहाँ जा पहुंचे. अँधेरे में एक धुंधली-सी आकृति खुले दरवाजे के सामने खड़ी थी.

उन्होंने टार्च की रौशनी फेंकी तो हाइडी खड़ी दिखाई दी. उन्होंने पूछा पर वह कुछ न् बता सकी कि उसने बाहरी दरवाजा क्यों खोला था. डॉक्टर ने जांच करके बताया कि हाइडी को नींद में चलने की बीमारी थी. उन्होंने कहा कि उसका रोज-रोज जाकर दरवाजा खोलना यह बताता है कि वह यहाँ से अपने गाँव जाना चाहती है. उन्होंने सीसमान से कहा कि हाइडी को तुरंत उसके गाँव भेज देना चाहिए.

हाइडी के जाने की बात सुनकर क्लारा उदास हो गई, पर हाइडी को जाना ही था. सेबेस्तियन हाइडी के साथ गया. पहले हाइडी डोरफ्ली में पीटर के घर गई और दादी से मिली, बाद में अपने बाबा के पास पहुँच गई.

उसके लौट आने से अंकल आल्प बहुत खुश हुए. और उसका दोस्त पीटर. वह तो खुशी के मारे नाचने लगा था.

बाबा को पता चला कि हाइडी ने शहर में पढ़ना लिखना सीख लिया है. उन्होंने फैसला किया कि वह आगे पढ़ने के लिए हाइडी को नीचे गाँव के स्कूल में भेजेंगे. फिर एक दिन स्वयं हाइडी के साथ गाँव पहुंचे. गाँव वाले अंकल आल्प को इतने वर्षों बाद लौटा देख कर हैरान रह गए थे.

शहर में क्लारा हाइडी के बिना बेहद उदास थी. वह हाइडी के पास जाना चाहती थी, लेकिन उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं था. वह गाँव तक की लंबी यात्रा नहीं कर सकती थी.

डोरफ्ली में सर्दियाँ आ गई. खूब बर्फ गिर रही थी. हाइडी अकेली थी. क्योंकि वह खराब मौसम में किसी से मिलने नहीं जा सकती थी. तब हाइडी के बाबा ने नीचे गाँव में जाकर रहने का निश्चय किया. सुनकर हाइडी खुश हो गई. वह समझ गई उसके लिए बाबा कुछ भी कर सकते थे. हाँ, अंकल आल्प ने गाँव में न् रहने की अपनी वर्षों पुरानी जिद हाइडी के लिए छोड़ दी थी. गाँव में रहते हुए हाइडी प्रतिदिन पीटर को दादी के पास जाकर उन्हें किताब से कथाएँ सुनाया करती थी.

सदियाँ बीत गईं. गर्मियों में हाइडी अपने बाबा की पुरानी झोंपडी में लौट आइ. कुछ दिन बाद क्लारा का पत्र मिला. वह हाइडी से मिलने आ रही थी. पढकर हाइडी बहुत प्रसन्न हुई. क्लारा के साथ उसकी दादी भी आई थीं. एक नौकर क्लारा की व्हील चेयर लेकर आया था.

क्लारा को व्हील चेयर में बैठाकर हाइडी दूर तक ले गई. पहाड के मनमोहक दृश्यों को देखकर क्लारा चकित रह गई. आज तक वह शहर में रही थी. पहाड की ताजी हवा और सुंदर दृश्यों ने उसमे जैसे नई जान फूंक दी.

कुछ दिन बाद ही क्लारा के लौटने का समय आ गया, पर उसका मन शहर लौटने का नहीं था. तब हाइडी के बाबा ने क्लारा की दादी से कहा-"मैं चाहता हूँ आप कुछ समय के लिए क्लारा को यहाँ छोड़ जाएँ. मैं और हाइडी उसका पूरा ध्यान रखेंगे." क्लारा की इच्छा जानकार दादी ने स्वीकृति दे दी.

अब तो हाइडी के साथ क्लारा पूरा दिन खुले में बिताने लगी. धूप तेज होती तो क्लारा सहेली की व्हील चेयर को पेड़ की छाया में ले जाती. नाश्ता और खाना सब खुली हवा में, नीले आकाश में नीचे चलता. क्लारा के

पीले गालों का रंग गुलाबी हो चला था. अंकल आल्प हर सुबह उसके पैरों की मालिश करते फिर कसरत करवाते. उन्हें आशा थी कि क्लारा के पैर एक न एक दिन अवश्य ठीक हो जाएंगे.

एक दिन अंकल आल्प क्लारा और क्लारा को ऊपर चरागाह तक ले गए. उन्होंने कहा-"क्लारा, यहाँ का दृश्य अद्भुत है. प्रकृति का आनंद लो.मैं बाद में आकर तुम्हे ले जाऊँगा." क्लारा वहीँ बेठी बकरियों से खिलवाड़ करती रही और हाइडी कुछ दूर फूल तोड़ने चली गई. कुछ देर बाद आकर हाइडी ने बताया-"क्लारा, मैं चाहती हूँ , तुम स्वयं चलकर फूलों की छटा देखो. अद्भुत दृश्य है."
क्लारा ने कहा-"लेकिन व्हील चेयर उतनी खड़ी चढाई पर नहीं जा सकती." तब हाइडी ने पीटर को बुलाया. दोनों दो ओर से पकड़कर धीरे-धीरे क्लारा को आगे फूलों की तरफ ले चले. क्लारा तो जैसे अपने पैरों का उपयोग करना भूल ही गई थी. शुरू-शुरू में क्लारा लडखडाई, पर फिर संभल गई. उसे लगा मानो उसके पैरों की खोई ताकत वापस आ रही हो. वह हौले-हौले सहारे से बढ़ती रही, एक-एक कदम रखती हुई.
"हाइडी, ओह हाइडी! मुझे देखो, मैं अपने पैरों से चल सकती हूँ." क्लारा उत्तेजना से चिल्ला उठी. वह हांफ रही थी. यह तो जैसे चमत्कार ही हो गया था. उन्होंने फूलों के बीच बैठकर ही दोपहर का भोजन किया. फिर अंकल आल्प उन्हें लेने आ गए. जब हाइडी ने उन्हें क्लारा के स्वयं एक-एक कदम चलने की बात बताई तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने क्लारा की पीठ थपथपा दी. बोले-"तुम हिम्मती लड़की हो क्लारा. तुम यह अवश्य कर सकती हो.

फिर तो रोज ही क्लारा को अपने आप चलने का अभ्यास कराया जाने लगा. पीटर और हाइडी उसकी दोनों तरफ चलते थे, ताकि कहीं वह गिर न् पड़े. दिन बीत रहे थे और क्लारा अपने पैरों में अधिक शक्ति महसूस करती जा रही थी. अंकल आल्प ने क्लारा की दादी को पत्र लिखा कि वह तुरंत यहाँ आएं. एक बड़ा अचरज उनकी प्रतीक्षा कर रहा है. एक दिन क्लारा की दादी वहाँ आ पहुँची. उन्हें देखकर हाइडी और क्लारा साथ-साथ उनकी तरफ बढ़ीं. क्लारा को बिना सहारे, अपने पैरों से चलते देख क्लारा की दादी तो स्तंभित रह गई. "यह चमत्कार कैसे हुआ?" उनके मुंह से निकला और उन्होंने क्लारा को गोदी में भर लिया.

कुछ दिन बाडी क्लारा के पिता सीसमान भी आ पहुंचे. उन्हें भी क्लारा के इस चमत्कार की कल्पना नहीं थी. खुशी के मारे वह तो रो पड़े. उन्होंने हाइडी के बाबा को धन्यवाद दिया तो वह बोले-"धन्यवाद दो यहाँ की प्रकृति को, धरती, आकाश को, पहाड, फूल और झरने को और सबसे बढ़कर क्लारा की दृढ इच्छाशक्ति को." फिर उन्होंने कहा-"मिस्टर सीसमान, मैं बहुत बूढा हो गया हूँ. न् जाने कब ईश्वर बुला ले. मेरे बाद इस दुनिया मे हाइडी का कोई नहीं है."

सीसमान और क्लारा की दादी ने उन्हें बीच में ही रोक दिया. दोनों बोले-"आप क्यों फ़िक्र करते हैं. हाइडी हमारी है, हम हाइडी के हैं. और सबसे बढ़कर तो हाइडी और क्लारा एक दूसरे की हैं."

"बस...बस...अब मुझे कोई चिंता नहीं." हाइडी के बाबा ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.#"



चित्र सौजन्य: गूगल सर्च
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इस श्रंखला की अगली कड़ी में पढ़िए: ह्यू लाफिंग की क्लासिक कृति- डॉक्टर डू लिटिल

Saturday, July 9, 2011

विश्व की महान क्लासिक कृतियों का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर


गत कुछ वर्षों में विश्व की गिनी-चुनी महान क्लासिक कृतियों का देवेन्द्र कुमार एवं रमेश तैलंग द्वारा किशोरों के लिए किया गया संक्षिप हिंदी रूपांतर बच्चों की प्रिय मासिक पत्रिका "बाल भारती" में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था. उसके पश्चात यह रूपांतर दो पुस्तकों के रूप में कृमशः -अमर विश्व किशोर कथाएं -प्रकाशक ए.आर.पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली तथा विश्व प्रसिद्ध किशोर कथाएं ओरिएंट क्राफ्टपब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली से मुद्रित हो कर भी आया. अब इसका डिजिटल टेक्स्ट रूप मेरे इस ब्लॉग के अलावा vishwabalsahitya.wordpress.com पर भी जिज्ञासु पाठकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है. आशा हैआप सब इसे पसंद करेंगे और अपनी प्रतिक्रिया से हमें जरूर अवगत कराएँगे. हमारा मेल आई.डी. है: rtailang@gmail.com, devendrakumar123@hotmail.com

इस श्रंखला में सबसे पहली कृति हाईडी है. बस जरा-सी प्रतीक्षा करें.

रमेश तैलंग.

image courtesy: google search

बच्चों की दुनिया के अंग संग :अवध बिहारी पाठक

(मेरे प्रिय बाल गीत -पुस्तक पर यह समीक्षा मेरे प्रिय मित्र अनुराग शर्मा द्वारा संचालित वेबसाइट : डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू.लेखकमंच .कॉम पर कुछ दिनों पूर्व प्रकाशित हुई थी. उसे इस ब्लॉग पर अपने पाठक मित्रों के अवलो नार्थ लेखकमंचसे साभार प्रस्तुत कर रहा हूँ.)

कवि रमेश तैलंग के बालगीतों में प्रयोगधर्मी विविधता है। उनके बालगीतों के संग्रह ‘मेरे प्रिय बालगीत’ पर वरिष्‍ठ कवि अवधबिहारी पाठक की आलोचनात्‍मक टिप्‍पणी-

‘हर रात/लौटता हूं/रेंगता रेंगता/उसी गली में/जहां मुस्कुराता है एक
बच्चा/हर शाम/मुझे पंख देने के लिए- राजकुमार केसवानी (‘बाकी बचें जो’ से)


बीसवीं सदी के अर्धशतक तक साहित्य सृजन, पठन पाठन आदमी की जिंदगी का एक अहम हिस्सा बना रहा, परंतु उसके बाद का समय साहित्य के पठन-पाठन की बड़ी दर्दनाक तस्वीर खींचता है। लेखन में उदात्तता आई, परंतु पढऩे वालों का अकाल पड़ गया, क्योंकि साहित्य में इन दिनों बाजारवाद की बड़ी जोरदार धमक है। अर्थ जहां जिंदगी का लक्ष्‍य बन जाए, वहां बाल साहित्‍य और बाल संवेदना कैसे जिंदा रहे। परिणामत: उसकी भी उपेक्षा हुई, किंतु ऐसी जटिल परिस्थिति में भी बाल साहित्‍य लिखा जा रहा है तो यह प्रयत्न उत्साहवर्धक है और नई संभावनाओं से लैस भी, क्योंकि बकौल राजकुमार केसवानी बच्चे समाज की जिंदगी को उड़ान भरने की ताकत देते हैं। मेरे देखने में रमेश तैलंग की पुस्‍तक ‘मेरे प्रिय बाल गीत’ अभी-अभी आई है, जो बाल सहित्‍य लेखन में एक अद्भुत प्रयत्न है। यूं रमेश तैलंग बाल साहित्य लेखन के अप्रतिम स्तंभ है। उनका योगदान इस क्षेत्र में बहुत चर्चित रहा है, सम्मानित पुरस्‍कृत भी।
जाहिर है, बच्चों की दुनिया उनकी अपनी दुनिया होती है- सभी प्रकार के काइयांपन से कोसों दूर, वहां सब कुछ नैसर्गिक है, कवि का मन और विचार चेतना बच्चों की दुनिया में बहुत गहरे डूब कर एकाकार हो गई। फलत: बच्‍चों की दुनिया का हर पहलू सोच-विचार, आचार, मान-अपमान, स्वाभिमान, प्यार, दुलार, धिक्कार और हकों की मांग भी शामिल है बच्चों की इस गीत दुनिया में। मनुष्य की ‘चतुराई का शिल्प’ नहीं उसके स्थान पर शुद्ध नैसर्गिक मन की हलचल मूर्त हुई है जो तैलंग जी के संवेदना पक्ष को उजागर करती है।
यहां रचना के कन्टेंट की बात कहना भी जरूरी-सा लगता है। पुस्‍तक में 163 बालगीत हैं जो छोटे, मझोले, बड़े सभी आकार हैं। ये गीत वस्‍तुत: बालक के मन पर आई उस मनोवैज्ञानिक स्थिति की व्याख्या है, जो बालक अपने समग्र परिवेश के प्रति व्यक्त करता है। कवि इतना समर्थ है बाल मनोविज्ञान को पढऩे में कि बालक की बात काल्पनिक हो या यथार्थ लेखक ने हर उस विचार-लहर को पकड़ा है, जहां उसके क्रियाकलाप उसके अंतर्मन के गंभीर विचार प्रस्ताव बन जाते हैं, वे रोचक हैं, त्रासक भी और चैलेंजिंग भी। हर बाल गीत की अपनी एक जमीन है और उसमें बच्चे के उस मोहक क्षण का वर्णन है, जहां बच्चा निपट अकेला खड़ा होकर अपने परिवेश को रूपायित करता है। फलत: उनमें बाल जीवन का आल्हाद भी है और विडम्‍बनाएं भी। सभी कविताओं में निहित कवि भी व्यंजना को प्रस्तुत करने में विस्तार मय है अस्तु बिल्कुल जीवंत रूपकों का दर्जा यहां इष्ट है। यथा।
बाल श्रमिक हमारे देश की दुखती रग है। हजार कानून बने, परंतु बाल श्रमिकों का शोषण अब भी जारी है। उन्हें अपने शिक्षा के अधिकार की जानकारी भी शासन नहीं दे सका। बाल श्रमिकों के माता-पिता पेट की आग की गिरफ्त में पड़कर बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते। ‘भोलू’ नामक कविता में बाल श्रमिक भोलू का साथी उसे स्कूल जाने को प्रेरित करता है तो भोलू उत्तर देता है कि ठीक है मैं पढऩे जाऊंगा, परंतु ‘अच्छा पढऩे की तनख्वाह क्या दोगे ?’ (पृष्‍ठ-34) कवि यहां उन बच्चों का हाहाकार उकेर सका, जो पेट की खातिर अपने हर क्रियाकलाप को केवल पैसे से तोलते हैं। ‘ मैं ढाबे का छोटू हूँ’ कविता होटलों में देर रात तक काम करने वाले बच्चों की पीड़ा को साकार कर सकी है- ‘देर रात में सोता हूँ/कप और प्याली धोता हूँ/रोते-रोते हँसता हूँ/हँसते- हँसते रोता हूँ।’ यहाँ बाल श्रमिक की लाचारी साकार हो उठी है जिसकी चिंता न समाज को है और न शासन को। कवि यहां एक भयंकर सच को व्यक्त कर गया कि शायद कविता के बहाने ही सही, किसी का ध्यान इस तरफ जाए और कुछ कारगर उपाय हों।
हमारे देश में प्रांतों की विविधता से विविधवर्णी संस्कृति का मेल हमें घरों में भी दिखाई देता है। ‘घर है छोटा देश हमारा’ कविता में घर में विभिन्न प्रांतों की उन मां, चाची, भरजाई का जिक्र है जो अलग होकर भी खानपान, आचार-विचार के स्‍तर पर सामन्‍जस्‍य बैठाकर घर चलाती हैं- ‘छोटे से घर में हिलमिलकर सारे करें गुजारा।’ (पृष्‍ठ 46)। जैसा कथन देश प्रेम और एकता की प्रेरणा देता है।
‘पापा की तनख्वाह’ और ‘महंगे खिलौने’ कविताएं बच्चों के मुंह से कही गई बाजार में व्याप्त महंगाई की कहानी हैं, जहां खिलौनों के अभाव में उनका बचपन छीज रहा है। बच्चा अबोध है, परंतु भीतर से कितना जागरूक कि उसके पापा ‘चिंटू का बस्ता/मिंटी की गुडिय़ा/अम्‍मा की साड़ी/दादी को पुडिय़ा’ (पृ0 64)। बाजार से उधार लाए हैं। इसका घाटा अगले महीने खर्च कम करके झेलना पड़ेगा। यहां कवि मझोले पगारधारी लोगों के बच्चों की तकलीफ को ठीक से प्रस्तुत कर गया है। आगे का दृश्य और भी मोहक है। बच्चा भले ही छोटा है, परंतु बाजार की उठक-पटक से अनजाना नहीं है। एक अन्‍य कविता ‘महंगे खिलौने’ में बच्‍चा कहता है- ’छोटे हैं, फिर भी हम इतना समझते/ कैसे गृहस्थी के खर्चे है चलते/जिद की जो हमने तो पापा जी अपने/न चाहते भी उधारी करेंगे/रहने दो, रहने दो ये महंगे खिलौने/ जेब पर अपनी ये भारी पड़ेंगे,’ (पृष्‍ठ 137)। अर्थ ने कितना समझदार बना डाला है बच्‍चों को कि वे अपना बचपन भी इस महंगाई के सामने समर्पित, नहीं सरेंडर कर देते हैं। कवि की दृष्टि यहां गहरी होकर भीतर तक हिला जाती है, बच्चों की बेबसी से।
विज्ञान की दौड़ और शहरीकरण की बीमारी के चलते आज के बच्चों का प्रकृति से निकट का वास्ता लगभग टूट ही गया है। कवि ने बच्चों के दर्द की बखूबी पकड़ा है- ‘पेड, फूल, फल पड़े ढूंढने/ हमको रोज किताबों में/हरियाली रह जाय विंधकर/सिर्फ हमारे ख्वाबों में/ ऐसा जीवन नहीं चाहिए (पृष्‍ठ 163)। चिडिय़ों की कमी से भी चिंतित है बच्चा- ‘क्या उसको/बढ़ती आबादी के दानव ने मार दिया?’ (पृष्‍ठ 76)। कविता ‘पंछी बोल रहे है’ में अपील है- ‘पंछी, पेड़, जानवर, जंगल/बचे रहे तो होगा मंगल’ (पृष्‍ठ 90)। कवि यहां समग्र पर्यावरण के प्रति बच्चों की वाणी में चौकस है। विश्व में भले ही कंप्यूटर की तूती बोले, पर धरती से जुड़ा़ बच्चा, उसे ‘दुनिया का कूड़ा’ (पृष्‍ठ 163) मानता है। बच्चे तन और मन दोनों स्तरों पर फुर्ती चाहते हैं, किंतु मशीनीकरण से फुर्ती तो आई परंतु ‘मन बूढ़ा हो गया’। उल्‍लास रहित बच्‍चे ईमेल के पक्षधर नहीं- ‘ऐसी त्वरित गति किस काम की जिसमें ‘पोस्टकार्ड हो गया फिसड्डी और चिट्ठी-पत्री फेल हो रही हो’(पृष्‍ठ 146)। पत्र अपने प्रिय के पास पहुंचकर मन में जो एक अजीब सिहरन पैदा करते थे, वो फोन-ईमेल ने छीन ली। अब ‘मेल मिलाप हो गया जल्दी, पर खतरों का है ये खेल’ उन वैयक्तिक विडंबनाओं की ओर संकेत है जो उसे सहज न रख कर तनावयुक्त ही करते है, मुक्त नहीं। फोन कर संवादों में अब वह गर्माहट कहां? बड़ा प्रश्न है, ‘फ्रिज है रईसों के घर भी निशानी/ पर भैया, अमृत है मटके का पानी’ (पृष्‍ठ 126)। कविता में सप्रमाण मटके की उपयोगिता दिखी जो आधुनिक साधनों को नकारती है।
बच्चों की प्रकृति में तर्क और जिज्ञासा सदैव से रहते आए हैं। ‘डॉक्टर अंकल’ कविता में डॉक्‍टर भी बच्‍चे के तर्क से पराजित होता दिखा। इसी तरह काली बकरी द्वारा दिया गया दूध सफेद, और हरे रंग की मेहंदी की पत्‍ती का रचाव लाल रंग का कैसे? हवा की मुट्ठी में न आना ऐसे स्थल है कविताओं के जिनमें बच्चों की प्रश्नाकुलता मूर्तिमान हुई है। यहां एक तथ्य ओर भी उल्‍लेखनीय है कि प्रत्येक कविता के साथ उसके भाव को चित्र में मूर्तिमान किया गया है। इससे कवि के मूल काव्य विम्ब योजना तक पहुंचने में सुविधा होती है।
पुस्तक फ्लेप पर उल्‍लेख है कि बाल गीतों का वय के अनुसार शिशु काल और किशोर गीतों जैसा कोई तकनीकी वर्गीकरण नहीं है। पर यह बात मेरे गले नहीं उतरी क्‍योंकि ‘धत् तेरे की अपनी किस्मत में तो बोतल का दूध लिखा है’ जैसी कविताएं शुद्धत: शिशु भाव पर केन्द्रित हैं। इसी प्रकार ‘पापा ! घोड़ा बनो’, ‘ढपलूजी रोए आँ… ऊँ’, ‘मैं त्‍या छतमुत तुतलाता हूं’ जैसी कविताएं बाल वय की एवं इसी तरह, ‘ऐसा जीवन नहीं चाहिए’ और ‘दूध वाले भैया’ आदि गीत किशोर मन की अभिव्‍यक्तियां हैं। अस्‍तु वर्गीकरण साफ है।
कवि का भाषा पर असाधारण अधिकार है। भाषा और भाव का कथनों में अद्भुत मेल है। तत्ता, म्हारा, थारा, गप्प, गुइयां जैसे विभिन्न बोलियों के शब्‍द कथ्‍य को प्रभावी बना सके हैं।
सामाजिक फलक पर बच्चों को देखें तो इस अर्थ युग में सामाजिक जीवन में बच्चे बोझ की ही अनुभूति देते हैं और यदि बोझ नहीं तो किनारे पर तो अवश्य ही कहे जायेंगे। वह यूं कि अभिजात्य वर्ग के सभी भौतिक सुविधाओं से लैस बच्चे मां-बाप के सानिध्य को तरसते हैं क्योंकि माता-पिता के पास उनसे बोलने-बताने का समय ही नहीं, मध्यवर्ग के बच्चे महंगाई और उच्च वर्ग की नकल न कर पाने से कुंठित और निम्न वर्ग के बच्चे सीमित साधनों और अभावों के कारण माता-पिता का दुलार नहीं पाते। इस प्रकार से बचपन तो साफतौर पर ठगा ही जा रहा है क्योंकि मातृ-पितृ स्‍नेह के जो दो पल बच्‍चे को मिलने चाहिए, उनसे बच्‍चे वंचित हैं और ऐसे में तैलंग जी द्वारा लिखित बाल गीत मन में गुदगुदी तो पैदा करते ही हैं, जो एक बड़ी बात है आज के वक्त में। कुल मिला कर कहा जाए तो निराश होने की बात नहीं है। राष्ट्रकवि दिनकर ने समाजवाद के पक्ष में गर्जना की थी, ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ की टोन पर तैलांग जी ‘सड़कें खाली करो कि बच्चे आते हैं’ की घोषणा करते हैं तो एक आशा बंधती है कि आगामी कल बच्चों का होगा, जिन पर भविष्य का भार है। पुस्तक बाल साहित्याकाश मैं एक सितारा बन कर चमकेगी इसी आशा के साथ और कवि के लिए सतत लेखन की शुभकामनाओं के साथ।

पुस्‍तक: मेरे प्रिय बालगीत (संग्रह, 2010), पृष्‍ठ: 180, मूल्‍य:250 रुपये प्रकाशक : कृतिका बुक्‍स, 19 रामनगर एक्‍स्‍टेंशन-2, निकट पुरानी अनारकली का गुरुद्वारा, दिल्‍ली-110051

Saturday, July 2, 2011

योहन्ना स्पायरी की विश्व विख्यात कृति " हाईडी"


अगले सप्ताह ७ जुलाई को स्विट्जरलैंड में जन्मी विश्व विख्यात लेखिका योहन्ना स्पायरी की ११० वीं पुण्य तिथि है.

स्पायरी का सन्दर्भ आया है तो एक पुरानी स्मृति पुनर्जागृत हो उठी है. कई वर्ष पूर्व मेरे अभिन्न मित्र, लेखक एवं वरिष्ठ बाल साहित्यकार देवेन्द्र कुमार ने एक पुस्तक मुझे दी थी "फूल जैसी लड़की" जिसे भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया था.
"फूल जैसी लड़की" योहन्ना स्पायरी के "हाईडी" नामक बाल उपन्यास का हिंदी रूपांतर थी. जिसे देवेन्द्र कुमार ने इस कुशलता के साथ हिंदी में रूपांतरित किया था कि मूल कृति का अभाव न के बराबर खले. वैसे "हाईडी" का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है और उसकी पाठक-संख्या लाखों में नहीं करोडो में है. यही नहीं इस कृति पर टीवी सीरियल और फुल फीचर फिल्म भी बन चुकी है. मन तो कर रहा था कि यहाँ "हाईडी" की मार्मिक कथा का सार संक्षेप भी दे दूं लेकिन इससे "हाईडी" का अपना रोमांच खत्म हो जाएगा. इसलिए अच्छा होगा कि पाठक इस पुस्तक को पुस्तकालय अथवा पुस्तक बिक्रेता से प्राप्त कर स्वयं पढ़ें और यू ट्यूब पर इस विश्व विख्यात कृति पर बनी फुल फीचर फिल्म भी देखें. लिंक ये है:http://www.youtube.com/movie?v=yG1e8_8PV-8&feature=mv_sr