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Monday, July 11, 2011

विश्व की महान क्लासिक कृतियों का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर-हाइडी

योहन्ना स्पायरी-एक परिचय

१२ जून, १८२७ को हिर्जल, ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड में जन्म. जन्म का नाम योहन्ना लुईस ह्युसर. कई जगह जन्म का वर्ष १८२९ भी लिखा मिलता है. पिता जोह जाक ह्यूमस पेशे से शल्य चिकित्सक थे. माँ का नाम था मीरा श्वाइजर. योहन्ना माता-पिता की छः संतानों में चौथी थी. आरंभिक शिक्षा हिर्जल तथा बाद में ज्यूरिख में हुई. योहन बर्न्हार्ड स्पायरी से विवाह के बाद उनका नाम हो गया योहन्ना स्पायरी जिन्हें एक अनाथ बालिका हाइडी शीर्षक पुस्तक की विश्वप्रसिद्ध स्विस लेखिका के रूप में जाना जाता है.
योहन्ना स्पायरी की पहली कथा जे एस के संक्षिप्त नाम से प्रकाशित हुई थी. शुरू में वयस्क पाठकों के लिए लिखा, बाद में बच्चों के लिए खूब कलम चलाई.हाइडी में एक अनाथ पहाड़ी बालिका के संघर्षपूर्ण बचपन की मार्मिक कथा कही गई है. इसे आज स्विट्ज़ररलैंड की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक कृति माना जाता है. जर्मन भाषा में लिखी गई पुस्तक का अनुवाद विश्व की ५० से अधिक भाषाओं में हुआ. इसकी करोडों प्रतियाँ बिकी हैं, इस पर अनेक फ़िल्में बनाई गई हैं.
आज इसके लेखन को इतने वर्ष बीत जाने के बाद भे हाइडी को विश्व बाल साहित्य में ऊंचा स्थान प्राप्त है.
योहन्ना स्पायरी का निधन ७ जुलाई, १९०१ को ज्ज्युरिख में हुआ था. यहाँ हाइडी का संक्षिप्त रूपांतर दिया जा रहा है:
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हाइडी : संक्षिप्त हिंदी रूपांतर


एक थी लड़की, हाइडी. सुंदर, सलोनी लेकिन अनाथ. उसके पिता एक दुर्घटना में माँरे गए. माँ इसी दुःख में चल बसी. हाइडी को उसकी मौसी डीटाई ने पाला था. वह स्विट्जरलैंड के एक पहाड़ी गांव में रहती थी. अब एक समस्या थी.

डीटाई को शहर में नौकरी मिल गई थी. डीटाई वहाँ हाइडी को नहीं ले जा सकती थी. तब उसे हाइडी के बाबा अंकल आल्प का ध्यान आया. वह हाइडी को अंकल आल्प के पास छोड़ने चल दी.

विचित्र थे अंकल आल्प. गाँव के लोग उन्हें सनकी बूढ़े के नाम से जानते थे. आल्प गाँव से दूर, पहाड़ी पर अकेले रहते थे एक कुटिया में. आल्प कभी गाँव में नहीं आते थे. कोई मिल भी जाता तो मुंह फेरकर चले जाते.

इसी तरह एकांत वास करते हुए वर्षों बीत गए थे उन्हें. भला क्या वह आदमी नन्ही हाइडी को अपने साथ रखने के लिए तैयार होगा? गाँव वाले सोचते थे, अंकल आल्प हाइडी को भगा देंगे. डीटाई को भी यही लगता था लेकिन हाइडी को उसके भूले बिसरे, सनकी बाबा के पास छोड़ आने के अलावा कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं था उसकी मौसी डीटाई के पास.

पहाड़ी पर चढ़ते हुए हाइडी एक जगह बैठ गई. उसकी मौसी अपनी एक सहेली से बात करने लगी. तभी पीटर हाइडी के पास आया. वह उम्र में हाइडी से बड़ा था और पहाड़ों में ऊपर बकरियां चराने ले जाता था हर दिन. शाम को नीचे ले आता था. गर्मियों में यही दिनचर्या थी पीटर की. पीटर के पिता नहीं थे. घर में थीं उसकी माँ और नेत्रहीन बूढ़ी दादी.

मौसम सुहावना था, पहाड़ों पर हरियाली थी. और हवा में फूलों की सुगंध. पीटर और हाइडी खेलने लगे. फिर मौसी उसे लेकर बढ़ चली. ऊपर लंबी, सफ़ेद दाढी वाले आल्प अपनी कुटिया के बाहर बैठे थे. हाइडी दौडती हुई उनके पास जा पहुँची. उसने कहा-"बाबा नमस्कार, आप कैसे हैं?"

आल्प अचरज से हाइडी को देखने लगे. वह हाइडी के वारे में कुछ नहीं जानते थे. फिर डीटाई ने आल्प को हाइडी के वारे में सब कुछ बता दिया.
"तुम इस लड़की को यहाँ क्यों लाई हो?" आल्प ने क्रोध से कहा.
डीटाई ने कहा-"क्योंकि आप इसके बाबा हैं. अब मैं इसकी देखभाल नहीं कर सकती."
"जाओ, चली जाओ, और फिर कभी मेरे पास मत आना." आल्प डीटाई पर चिल्लाए तो वह तुरंत वापस चल दी. वह सोच रही थी-"अब हाइडी का चाहे जो हो. मैं तो यहाँ कभी नहीं आऊँगी."

आल्प ने हाइडी से कुछ नहीं कहा. वह गहरे सोच में डूबे थे. जैसे उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि हाइडी उनके पास कैसे रहेगी इस बीच हाइडी झोंपडी में घुसकर इधर-उधर घूमने लगी. वह सोच रही थी -"ओह, मेरे बाबा का घर कितना सुंदर है. अब मैं यहीं रहूँगी.

झोंपडी में एक दुछत्ती थी. वहाँ तक चढ़ने के लिए लकड़ी की सीढी लगी थी. दुछत्ती की खिड़की से पहाड और घाटी के सुंदर दृश्य दिखाई देते थे. हाइडी ने कहा-"बाबा, मैं तो यहीं सोया करूंगी." रात में तेज हवा बहने लगी. पेड़ जोर-जोर से हिल रहे थे. आल्प ने सोचा कहीं हाइडी डर न जाए. वह सीढ़ी चढ़कर ऊपर गए. देखा, हाइडी गहरी नींद में थी. छोटी खिड़की से चांदनी अंदर आ रही थी. बाबा कुछ देर वहीं खड़े रहे. वह प्यार से सोती हुई हाइडी को देख रहे थे.

हाइडी हर दिन पीटर के साथ पहाड पर चरागाह में जाती थी. पीटर से खूब गहरी दोस्ती जो हो गई थी. बाबा के साथ रहना उसे बहुत अच्छा लगा था. लेकिन फिर पतझड़ का मौसम आ गया. अब तेज हवाएँ चलने लगी थीं. बाबा ने कहा-"हाइडी,आज पीटर के साथ पहाड पर मत जाना. हो सकता है, तेज हवा तुम्हे उदा ले जाए."

सर्दियों में पीटर बकरियों को चराने नहीं ले जाता था. उन दिनों वह स्कूल जाता था. एक दिन वह आया उसने आल्प से कहा-"बाबा, आप हाइडी के साथ हमारे घर आएं एक दिन." सुनकर हाइडी खुश हो गई. पर बाबा ने कहा-"पीटर, अभी नहीं. बाहर खूब बर्फ गिर रही है."

पर एक दिन वह स्लेज में बैठकर हाइडी को पीटर के घर ले गए. स्लेज बर्फ पर नीचे की ओर तेजी से फिसलती जा रही थी. हाइडी को लग रहा था जैसे वह उड़ रही हो.

पीटर की दादी ने हाइडी को खूब प्यार किया. वह नन्ही हाइडी का चेहरा छू-छूकर महसूस करती रहीं, उनकी आँखें जो नहीं थीं. जिसने भी अंकल आल्प को हाइडी के साथ देखा वही आश्चर्य करने लगा. क्योंकि न जाने कितने वर्षों बाद आल्प नीचे गाँव में आए थे. शायद यह हाइडी का चमत्कार था.

इसी तरह दो वर्ष बीत गए. उस पहाड़ी स्थान पर आटे-जाते मौसमों के सब रंग देखे हाइडी ने. उसकी नन्ही दुनिया में थे उसके बाबा, पत्र, पत्र की माँ, नेत्रहीन दादी. नीला आकाश, हरी-भरी धरती, गिरती बर्फ, उछालते झरने, रंगबिरंगे सुगंध बिखेरते फूल, धलाओंओं पर चरती बकरियां. बहुत सुखी थी हाइडी वहाँ.

नीचे बसा था गाँव डोरफ्ली. दो बार पीटर वहाँ के स्कूल अध्यापक का सन्देश लाया था बाबा के पास. सन्देश यही था कि हाइडी अब बड़ी हो गई है. उसे स्कूल में दाखिल करना चाहिए. पर बाबा हर बार मना कर देते थे.

एक सुबह गाँव के पादरी अंकल आल्प से मिलने आए. उन्होंने आल्प को बहुत समझाया कि वह हाइडी को पढ़ने के लिए स्कूल भेजें और स्वयं भी गाँव में आकर रहें, पर सुनकर आल्प नाराज हो गए.

अगले दिन हाइडी के मौसी डीटाई वहाँ आ पहुँची. वह हाइडी को अपने साथ शहर ले जाने आई थी. उसने आल्प से कहा-"शहर में एक अमीर आदमी की बेटी बीमार है. उसके पैरों में तकलीफ है. वह चलफिर नहीं सकती. हर समय व्हील चेयर पर बैठी रहती है. उसकी माँ नहीं है. पिता अक्सर दौरे पर रहते हैं. लड़की बहुत अकेलापन महसूस करती है. अगर हाइडी जाकर उस लड़की के साथ रहने लगे तो अच्छा रहेगा. उस लड़की का अकेलापन दूर होगा और हाइडी का जीवन भी बदल जाएगा." लेकिन अंकल आल्प ने हाइडी को भेजने से मना कर दिया. फिर गुस्से में जाने कहाँ चले गए. अब डीटाई को मौका मिल गया. वह हाइडी को समझाबुझाकर अपने साथ एक तरह से जबरदस्ती ले गई. हाइडी अपने प्यारे बाबा से दूर हो गई. अगर वह गुस्से में घर से न जाते तो हाइडीकी मौसी उसे कभी अपने साथ ने ले जा पाती.

डीटाई शहर में हाइडी को सीसमान के मकान में ले गई. उनकी एकलौती बेटी क्लारा पंगु थी. उसकी देखभाल करने वाली औरत का नाम था मिस रोटनमायर. वह कड़वे स्वभाव की थीं. हँसना तो जैसे उन्होंने कभी सीखा ही न था. भला उनके साथ बेचारी क्लारा कैसे खुश रह सकती थी.

क्लारा हाइडी को देखते ही खुश हो गई पर मिस रोटनमायर उसे गाँव-देहात के गंवार लड़की समझ रही थीं. डीटाई हाइडी को क्लारा के पास छोड़कर चली गई.

रात बीती. हाइडी की नींद खुली. वह भौंचक्की सी इधर-उधर देखने लगी. फिर कुछ देर बाद उसकी समझ में आया कि वह पहाड़ी गाँव में नहीं. शहर में क्लारा के घर में है. उसने परदे हटाकर खिड़की से बाहर झाँका, पर उसे केवल दीवारें दिखाई दीं. गाँव के पहाड, झरने, फूल भला शहर में कैसे दिखाई देते.

मिस रोतान्मायर हर समय हाइडी को डाँटती रहती थीं. उनका ख्याल था कि गाँव के उस असभ्य लड़की के साथ रहकर क्लारा भी वैसी हो जाएगी. लेकिन क्लारा को तो हाइडी के रूप में एक अच्छी सहेली मिल गई थी.
हाइडी ने घर के नौकर सेबेस्तियनसे पूछा-"मैं पहाड और घाटी कहाँ देख सकती हूँ?"
सेबेस्तियन बोला-"इसके लिए तो तुम्हें गिरजाघर की ऊँची मीनार पर चढ़ना होगा.

बस, हाइडी तुरंत बिना बताए सड़क पर निकल आई. वह गिरजाघर का पता पूछती हुई सड़क पर चलने लगी.

रास्ते में उसे एक लड़का दिखाई दिया. वह बाजा बजा रहा था. उसके दूसरे हाथ में एक मेढक था. हाइडी ने उससे पूछा तो लड़का बोला-"मैं तुम्हें ले चलूँगा. पर तुम्हे पैसे देने होंगे-मेरी फीस."

हाइडी बोली-"पैसे तो नहीं हैं मेरे पास. तुम मेरे साथ क्लारा के पास चलना. मैं उससे पैसे दिलवा दूँगी.: लड़का उसे गिरजाघर की मीनार में ऊपर तक ले गया. पर वहाँ से भी हाइडी को बस ऊँचे-ऊँचे मकान ही दिखाई दिए. कहाँ थे उसके पहाड़, झरने, फूल और
नीला आकाश? वह उदास हो गई.

चलते समय गिरजाघर के चौकीदार ने उसे बिल्ली के बच्चे दिखाए. हाइडी ने बिल्ली के दो बच्चे अपनी जेबों में रख लिए. फिर बोली-"बाकी बिल्ली के बच्चों को भी मेरी सहेली क्लारा के पास ले आना. वह इनके साथ खेलेगी."

उधर पूरे घर में हाइडी को ढूंढा जा रहा था. क्लारा तो रो रही थी. हाइडी लौटी तो रोटनमायर ने गुस्से में उसे फटकारा. तभी आवाज सुनाई दी "म्याऊँ!" और बिल्ली के बच्चे उसकी जेब से निकलकर फर्श पर घूमने लगे. मिस रोटनमायर डर-डर कर चीखने लगीं. क्लारा ने सेबेस्तियन से कहा-"बिल्ली के बच्चों को ऐसी जगह रख दो जहाँ मिस रोटनमायर न देख सकें. मैं इनके साथ खेलना चाहती हूँ."


तभी बाजे वाला लड़का अपने कछुए को लेकर वहाँ आया और पैसे मांगने लगा. सेबेस्तियन समझ गया कि यह सब हाइडी के कारण हुआ है. लड़के ने बाजा बजाया तो मिस रोटनमायर वहाँ आकार चिल्लाने लगीं-फिर उन्होंने फर्श पर एक कछुए को देखा तो चीखकर भागीं. सब हँस रहे थे. सेबेस्तियन ने बाजे वाले लड़के को कुछ पैसे देकर विदा किया. कुछ देर बाद गिरजाघर का बूढा चौकीदार एक टोकरी में बिल्ली के बच्चे लेकर आ गया. सारे घर में "म्याऊँ-म्याऊँ सुनाई देने लगी. क्लारा को मजा आ रहा था. न जाने कितने समय बाद यों खिलखिलाकर हँसी थी क्लारा.

कुछ दिन बाद क्लारा के पिता सीसमान यात्रा से लौट आए, क्लारा ने पिता को बताया कि उसकी नई सहेली हाइडी कितनी अच्छी है. सीसमान सुनकर संतुष्ट हुए कि उनकी पंगु बेटी का अकेलापन दूर हो गया है.

कुछ दिन बाक क्लारा की बूढ़ी दादी वहाँ आई. उन्हें भी हाइडी अच्छी लगी. जब उन्होंने सुना कि हाइडी अनपढ़ है तो उन्होंने हाइडी से बात की. हाइडी ने बता दिया. दादी माँ ने उसे एक पुस्तक दिखाई. कहा-"पुस्तक में अच्छी-अच्छी कथाएं हैं. अगर तुम पढ़ना सीख लो तो उन कथाओं को पढ़ सकोगी.हाइडी किताब पलटने लगी. एक पृष्ठ पर पहाड, घाटी, झरने का चित्र था. चित्र में पहाड़ी ढलान पर बकरियां चर रही थीं . उसे देखते ही हाइडी रोने लगी.उसने क्लारा की दादी को बताया कि उसका घर ऐसा ही सुंदर है.

क्लारा की दादी जान गई कि हाइडी का मन गाँव से बिछुड़कर बहुत दुखी है.

क्लारा के अध्यापक हाइडी को भी पढाने लगे. हाइडी चाव से पढ़ती थी. वह जल्दी ही पढ़ना-लिखना सीख गई. वह जब भी किसी पहाड़ी गाँव की कथा पढ़ती तो रो पड़ती. सब जान चुके थे कि हाइडी अपने गाँव में बाबा के पास लौट जाने के लिए बेचैन थी. कुछ दिन बाद क्लारा की दादी चली गई. उनके जाने से अपने गाँव में बाबा के पास लौट जाने के लिए बेचैन है. और भी उदास हो गई.

एक सुबह सेबेस्तियनरोज की तरह माकन का मुख द्वार खोलने गया तो हैरान रह गया. दरवाजा खुला पड़ा था. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. फिर एक रात सेबेस्तियनने अँधेरे में सीढ़ियों पर एक सफ़ेद आकृति को देखा. वह बेतरह घबरा गया.घर में सब भूत-प्रेत की चर्चा करने लगे.कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था. तुरंत क्लारा के पिता सीसमान को खबर दी गई. वह आ पहुंचे.
रात को सीसमान और क्लारा का इलाज़ करने वाले डॉक्टर भूत की प्रतीक्षा में छिपकर बैठ गए. आधी रात के बाद उनहोंने अँधेरे में दरवाजे का कुंडा खुलने की आवाज सुनी. आवाज मुख्य द्वार की ओर से आ रही थी . दोनों झट वहाँ जा पहुंचे. अँधेरे में एक धुंधली-सी आकृति खुले दरवाजे के सामने खड़ी थी.

उन्होंने टार्च की रौशनी फेंकी तो हाइडी खड़ी दिखाई दी. उन्होंने पूछा पर वह कुछ न् बता सकी कि उसने बाहरी दरवाजा क्यों खोला था. डॉक्टर ने जांच करके बताया कि हाइडी को नींद में चलने की बीमारी थी. उन्होंने कहा कि उसका रोज-रोज जाकर दरवाजा खोलना यह बताता है कि वह यहाँ से अपने गाँव जाना चाहती है. उन्होंने सीसमान से कहा कि हाइडी को तुरंत उसके गाँव भेज देना चाहिए.

हाइडी के जाने की बात सुनकर क्लारा उदास हो गई, पर हाइडी को जाना ही था. सेबेस्तियन हाइडी के साथ गया. पहले हाइडी डोरफ्ली में पीटर के घर गई और दादी से मिली, बाद में अपने बाबा के पास पहुँच गई.

उसके लौट आने से अंकल आल्प बहुत खुश हुए. और उसका दोस्त पीटर. वह तो खुशी के मारे नाचने लगा था.

बाबा को पता चला कि हाइडी ने शहर में पढ़ना लिखना सीख लिया है. उन्होंने फैसला किया कि वह आगे पढ़ने के लिए हाइडी को नीचे गाँव के स्कूल में भेजेंगे. फिर एक दिन स्वयं हाइडी के साथ गाँव पहुंचे. गाँव वाले अंकल आल्प को इतने वर्षों बाद लौटा देख कर हैरान रह गए थे.

शहर में क्लारा हाइडी के बिना बेहद उदास थी. वह हाइडी के पास जाना चाहती थी, लेकिन उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं था. वह गाँव तक की लंबी यात्रा नहीं कर सकती थी.

डोरफ्ली में सर्दियाँ आ गई. खूब बर्फ गिर रही थी. हाइडी अकेली थी. क्योंकि वह खराब मौसम में किसी से मिलने नहीं जा सकती थी. तब हाइडी के बाबा ने नीचे गाँव में जाकर रहने का निश्चय किया. सुनकर हाइडी खुश हो गई. वह समझ गई उसके लिए बाबा कुछ भी कर सकते थे. हाँ, अंकल आल्प ने गाँव में न् रहने की अपनी वर्षों पुरानी जिद हाइडी के लिए छोड़ दी थी. गाँव में रहते हुए हाइडी प्रतिदिन पीटर को दादी के पास जाकर उन्हें किताब से कथाएँ सुनाया करती थी.

सदियाँ बीत गईं. गर्मियों में हाइडी अपने बाबा की पुरानी झोंपडी में लौट आइ. कुछ दिन बाद क्लारा का पत्र मिला. वह हाइडी से मिलने आ रही थी. पढकर हाइडी बहुत प्रसन्न हुई. क्लारा के साथ उसकी दादी भी आई थीं. एक नौकर क्लारा की व्हील चेयर लेकर आया था.

क्लारा को व्हील चेयर में बैठाकर हाइडी दूर तक ले गई. पहाड के मनमोहक दृश्यों को देखकर क्लारा चकित रह गई. आज तक वह शहर में रही थी. पहाड की ताजी हवा और सुंदर दृश्यों ने उसमे जैसे नई जान फूंक दी.

कुछ दिन बाद ही क्लारा के लौटने का समय आ गया, पर उसका मन शहर लौटने का नहीं था. तब हाइडी के बाबा ने क्लारा की दादी से कहा-"मैं चाहता हूँ आप कुछ समय के लिए क्लारा को यहाँ छोड़ जाएँ. मैं और हाइडी उसका पूरा ध्यान रखेंगे." क्लारा की इच्छा जानकार दादी ने स्वीकृति दे दी.

अब तो हाइडी के साथ क्लारा पूरा दिन खुले में बिताने लगी. धूप तेज होती तो क्लारा सहेली की व्हील चेयर को पेड़ की छाया में ले जाती. नाश्ता और खाना सब खुली हवा में, नीले आकाश में नीचे चलता. क्लारा के

पीले गालों का रंग गुलाबी हो चला था. अंकल आल्प हर सुबह उसके पैरों की मालिश करते फिर कसरत करवाते. उन्हें आशा थी कि क्लारा के पैर एक न एक दिन अवश्य ठीक हो जाएंगे.

एक दिन अंकल आल्प क्लारा और क्लारा को ऊपर चरागाह तक ले गए. उन्होंने कहा-"क्लारा, यहाँ का दृश्य अद्भुत है. प्रकृति का आनंद लो.मैं बाद में आकर तुम्हे ले जाऊँगा." क्लारा वहीँ बेठी बकरियों से खिलवाड़ करती रही और हाइडी कुछ दूर फूल तोड़ने चली गई. कुछ देर बाद आकर हाइडी ने बताया-"क्लारा, मैं चाहती हूँ , तुम स्वयं चलकर फूलों की छटा देखो. अद्भुत दृश्य है."
क्लारा ने कहा-"लेकिन व्हील चेयर उतनी खड़ी चढाई पर नहीं जा सकती." तब हाइडी ने पीटर को बुलाया. दोनों दो ओर से पकड़कर धीरे-धीरे क्लारा को आगे फूलों की तरफ ले चले. क्लारा तो जैसे अपने पैरों का उपयोग करना भूल ही गई थी. शुरू-शुरू में क्लारा लडखडाई, पर फिर संभल गई. उसे लगा मानो उसके पैरों की खोई ताकत वापस आ रही हो. वह हौले-हौले सहारे से बढ़ती रही, एक-एक कदम रखती हुई.
"हाइडी, ओह हाइडी! मुझे देखो, मैं अपने पैरों से चल सकती हूँ." क्लारा उत्तेजना से चिल्ला उठी. वह हांफ रही थी. यह तो जैसे चमत्कार ही हो गया था. उन्होंने फूलों के बीच बैठकर ही दोपहर का भोजन किया. फिर अंकल आल्प उन्हें लेने आ गए. जब हाइडी ने उन्हें क्लारा के स्वयं एक-एक कदम चलने की बात बताई तो उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने क्लारा की पीठ थपथपा दी. बोले-"तुम हिम्मती लड़की हो क्लारा. तुम यह अवश्य कर सकती हो.

फिर तो रोज ही क्लारा को अपने आप चलने का अभ्यास कराया जाने लगा. पीटर और हाइडी उसकी दोनों तरफ चलते थे, ताकि कहीं वह गिर न् पड़े. दिन बीत रहे थे और क्लारा अपने पैरों में अधिक शक्ति महसूस करती जा रही थी. अंकल आल्प ने क्लारा की दादी को पत्र लिखा कि वह तुरंत यहाँ आएं. एक बड़ा अचरज उनकी प्रतीक्षा कर रहा है. एक दिन क्लारा की दादी वहाँ आ पहुँची. उन्हें देखकर हाइडी और क्लारा साथ-साथ उनकी तरफ बढ़ीं. क्लारा को बिना सहारे, अपने पैरों से चलते देख क्लारा की दादी तो स्तंभित रह गई. "यह चमत्कार कैसे हुआ?" उनके मुंह से निकला और उन्होंने क्लारा को गोदी में भर लिया.

कुछ दिन बाडी क्लारा के पिता सीसमान भी आ पहुंचे. उन्हें भी क्लारा के इस चमत्कार की कल्पना नहीं थी. खुशी के मारे वह तो रो पड़े. उन्होंने हाइडी के बाबा को धन्यवाद दिया तो वह बोले-"धन्यवाद दो यहाँ की प्रकृति को, धरती, आकाश को, पहाड, फूल और झरने को और सबसे बढ़कर क्लारा की दृढ इच्छाशक्ति को." फिर उन्होंने कहा-"मिस्टर सीसमान, मैं बहुत बूढा हो गया हूँ. न् जाने कब ईश्वर बुला ले. मेरे बाद इस दुनिया मे हाइडी का कोई नहीं है."

सीसमान और क्लारा की दादी ने उन्हें बीच में ही रोक दिया. दोनों बोले-"आप क्यों फ़िक्र करते हैं. हाइडी हमारी है, हम हाइडी के हैं. और सबसे बढ़कर तो हाइडी और क्लारा एक दूसरे की हैं."

"बस...बस...अब मुझे कोई चिंता नहीं." हाइडी के बाबा ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.#"



चित्र सौजन्य: गूगल सर्च
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इस श्रंखला की अगली कड़ी में पढ़िए: ह्यू लाफिंग की क्लासिक कृति- डॉक्टर डू लिटिल

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