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Sunday, July 31, 2011

डॉक्टर डू लिटिल हिंदी रूपांतर का दूसरा अंतिम भाग


एक जोर की आवाज हुई. पूरा जहाज बुरी तरह हिल उठा. फिर धीरे-धीरे जहाज एक तरफ को झुकने लगा. डबडब बत्तख हिम्मत करके पानी में कूद पडी.वह जैसे-तैसे तैरकर जहाज के नीचे गई. उसने लौटकर बुरी खबर सुनाई. बोली-"डॉक्टर साहेब, हमारा जहाज एक चट्टान से टकरा गया है. उसकी तली में छेद होने के कारण पानी अंदर भर रहा है."

डॉक्टर साहेब ने कहा-"जल्दी से जहाज से नीचे उतरो, नहीं तों हम सब डूब जाएंगे

सारे जानवर पानी में कूद पड़े और फिर किसी तरह जमीन पर पहुंच गए. पानी अब भी तेजी से बरस रहा था. ऊंची-ऊंची लहरें आकर चट्टान पर अटके जहाज से टकरा रही थीं. वह पानी में डूबता जा रहा था.

तट से थोड़ी दूर ऊँचे स्थान पर एक गुफा थी. डॉक्टर डू लिटिल और उनके मित्र गुफा में पहुंचे. कम से कम अब तूफानी बारिश से तों बचा ही जा सकता था.

"पता नहीं हम कहां आ गए हैं." डॉक्टर ने कहा और गहरे सोच में डूब गए. वह सोच रहे थे-"न जाने मैं बीमार बंदरों का इलाज कब शुरू कर सकूंगा? कुछ देर बाद बारिश बंद हो गई. तब तक रात हो गई थी. थकान के कारण सबको नींद आ रही थी.

सुबह चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर डॉक्टर डू लिटिल की नींद टूट गई. दिन निकल आया था. आसमान साफ़ था. गुफा से निकल कर डॉक्टर साहेब और उनके साथी तट की ओर गए. वहाँ जहाज एक चट्टान पर अटका दिखाई दिया. ये लोग तूफानी समुद्र में डूबने से बाल-बाल बचे थे.

पोलिनेशिया उड़कर पता करने गया. उसने लौटकर बताया-"डॉक्टर साहेब, हम अफ्रीका महाद्वीप पर आ पहुंचे हैं. अब कोई चिंता नहीं है. हमें आगे के रास्ते का पता भी जल्दी ही लग जाएगा." तब तक चिड़िया बंदरों को सन्देश देने उड़ गई थी.

तभी एक व्यक्ति हाथ में भाला लेकर गुफा की तरफ आता दिखाई दिया. डू लिटिल ने अपने साथियों से चुप होने का संकेत किया. वह व्यक्ति सीधा डॉक्टर डू लिटिल के पास आया. उसने कहा-"तुम कौन हो?"

"मैं हूँ डॉक्टर डू लिटिल, एम.डी. इंग्लैंड से आया हूँ. मुझे अफ्रीका के वानरों ने अपने इलाज के लिए बुलाया है.

"लेकिन कहीं भी जाने से पहले तुम्हे हमारे राजा से अनुमति लेनी होगी." भालाधारी सैनिक ने तेज स्वर में कहा.

"राजा, कौन राजा"? डू लिटिल ने पूछा.

"हमारे देश जोलिजिंकी के महाराज , और कौन? उनकी आज्ञा के बिना तों चिड़िया भी अपनी चौंच नहीं खोल सकती. समझे डॉक्टर! चुपचाप मेरे साथ महाराज के पास चलो." उस सैनिक ने कहा.

" उसकी बात सुनकर पेड़ पर बैठी चिड़िया चोंच खोलकर चूंचिर्र करने लगी.वह डॉक्टर से कह रही थी-"यह आडमी झूठ बोल रहा है."
"डॉक्टर डू लिटिल सैनिक के साथ राजा के पास जा पहुंचे.

"जोलजिंकी का राजा एक महल में रहता था. उसके पूछने पर डू लिटिल ने बता दिया कि वह बीमार बंदरों का इलाज करने के लिए अफ्रीका आए हैं.

राजा ने कहा-"बंदरों के देश का रास्ता मेरे राज्य से होकर जाता है. मैं तुम्हे कभी नहीं जाने दूंगा. क्योंकि तुम्हारी ही तरह एक आदमी यहाँ आया आते. मैंने उसका स्वागत किया पर उसने

मुझे धोखा दिया. उसने चुपचाप सोना इकठ्ठा किया. हाथीदांत के लिए निदोष हाथियों को मार डाला, फिर चुपचाप यहाँ से भाग गया.राजा जोलजिंकी ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके पशु मित्रों को कैदखाने में बंद कर दिया. डॉक्टर डू लिटिल सोच रहे थे-"क्या हम लोग बीमार बंदरों के पास कभी नहीं जा सकेंगे. तभी पोलिनेशिया तोता डू लिटिल की जेब से बाहर निकल आया.

डू लिटिल ने पूछा-"पोलिनेशिया, क्या तुम डरकर मेरी जेब में छिप गए थे."

तोते ने कहा-"डॉक्टर साहब, अगर सैनिक मुझे देख लेते तो शायद पिंजरे में बंद कर देते, इसलिए मैं आपकी जेब में छिप गया था." फिर उसने कहा-"मैंने एक तरकीब सोची है, शायद उससे काम बन जाए."

"कैसी तरकीब?" - डू लिटिल ने पूछा. पोलिनेशिया ने धीरे से कहा-"बस, देखते रही." इसके बाद वह कैदखाने की दीवार में बने झरोखे से बाहर उड़ गया. राट का अँधेरा फैला था. सब तरफ सन्नाटा था. पोलिनेशिया एक खुली खिड़की से महल में घुस गया. सब तरफ प्रहरी ऊंघ रहे थे. एक कमरे में राजा जोलिजिंकी पलंग पर सो रहा था. पोलिनेशिया राजा के पलंग के नीचे छिप गया फिर किसी आदमी की तरह खांसने लगा.

खांसी सुनकर जोलिजिंकी जाग गया. उसने पूछा-"कौन?"

"मैं डॉक्टर डू लिटिल." पोलिनेशिया ने कहा-"तुमने मुझे और मेरे साथियों को जेल में बंद कर दिया था. में जादू जानता हूँ. इसीलिए अद्रश्य होकर यहाँ आया हूँ. मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ, पर तुम मुझे देख नहीं पा रहे हो."

जोलिजिंकी ने इधर-उधर देखा, पर कोई दिखाई नहीं दिया. वह डर गया. उसने पूछा-"तुम क्या चाहते हो डॉक्टर?"

"तुरंत मेरे साथियों को कैद से आज़ाद कर दो. नहीं तों मैं अपने जादू से तुम्हारे महल में आग लगा दूंगा. महामारी फैला दूंगा." डॉक्टर बने पोलिनेशिया ने कहा.

राजा वैसे भी जादू-टोने में विश्वास करता था. वह डरकर कांपने लगा. उसने इधर-उधर नज़र दौडाई पर छोटा-सा पोलिनेशिया तों पलंग के पाए के पीछे छिपकर बोल रहा था. राजा जोलिजिंकी ने सचमुच डॉक्टर डू लिटिल को जादूगर समझा. उसने तुरंत सैनिकों को बुलाया. उन्हें कैदखाने का दरवाजा खोलने का आदेश दिया.

तभी रानी कमरे में आई. उसने पोलिनेशिया को उड़कर बाहर जाते हुए देख लिया. राजा ने रानी को पूरी बात बताई तों उसने तोते के बारे में कहां. बोली-"हमें खुद कैदखाने चलकर देखना चाहिए. यह जादू की बात बकवास है." राजा जोलिजिंकी रानी के साथ जल्दी-जल्दी कारागार जा पहुंचा. लेकिन तब तक प्रहरियों ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके पशु मित्रों को आज़ाद कर दिया था. पोलिनेशिया ने जोलिजिंकी को खूब मूर्ख बनाया था.

राजा ने तुरंत सैनिकों को डॉक्टर डू लिटिल की खोज में भेज दिया. वह बेहद क्रोध में था. उधर डॉक्टर जंगल में आगे बढ़े जा रहे थे. चीची बंदर अफ्रीका का ही रहने वाला था. उसे जंगल के सारे रास्ते मालूम थे. उसने कहा-डॉक्टर साहेब जोलिजिंकी के सैनिक हमारी खोज में अवश्य आ रहे होंगे. हमें सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए.

थोडी देर बाद सैनिक उनके पास पहुंच गए. डॉक्टर साहेब ने कहा-"अब क्या करें?"

चीची बंदर अपने साथियों को एक विशाल पेड़ के पास ले गया. पेड़ का तना अंदर खोखला था. बस, डॉक्टर डू लिटिल तथा उनके पशु मित्र खोखल में छिप गए. तब तक जोलिजिंकी के सैनिक आ पहुंचे. पर वे खोखल में छिपे डू लिटिल और उनके साथियों के बारे में कुछ नहीं जान सके. ये थककर राजधानी वापस चले गए.

डॉक्टर डू लिटिल वानर देश की तरफ आगे बढ़ चले. पोलिनेशिया तोता तथा टूटू उल्लू जंगल में उड़कर पहरेदारी कर रहे थे कि अगर सैनिक फिर से आए तों डॉक्टर साहब को चेतावनी दी जा सके. दो दिन यात्रा निर्विघ्न चलती रही. पहरेदारी करते-करते पोलिनेशिया और टूटू थक चुके थे. उन्हें नींद आ गई. अब वे वानर देश के निकट पहुँच चुके थे. तभी पीछे हो हल्ला सुनाई दिया. जोलिजिंकी ने सैनिकों को दोबारा डॉक्टर डू लिटिल का पीछा करने भेज दिया था . और इस बार वे इनके काफी निकट आ गए थे.

डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथी तेजी से आगे की और दौड चले. सामने एक गहरी खाई थी. उसमे एक नदी तेज आवाज करती हुई बह रही थी. चीची ने कहा-"डॉक्टर साहेब, हमें वानर देश पहुँचने के लिए यह खाई पार करनी होगी."

डॉक्टर डू लिटिल ने देखा पर कोई पुल नहीं था. और उधर जोलिजिंकी के हथियार बंद सैनिक एकदम निकट आ चुके थे. डॉक्टर डू लिटिल ने अपने साथियों से कहा-"लगता है इस बार हम जरूर पकडे जाएंगे."

खाई के दूसरी ओर अनेक वानर डॉक्टर डू लिटिल का स्वागत करने को तैयार खड़े थे. तभी चीची ने पुकारा-"अब हम क्या करें. खाई पर पुल नहीं है और सैनिक पकड़ने के लिए एकदम पास जा चुके हैं?

यह सुनकर खाई के पार खड़े कई विशाल वानर उछलकर इस तरफ चले आए. उन्होंने पुकारा-"साथियो! पुल बनाओ तुरंत. एक-एक पल कीमती है." और देखते-देखते दोनों तरफ से वानर एक ऊँचे पेड़ से लटककर एक दूसरे का हाथ थामते हुए खाई में किसी रस्सी की तरफ आपस में जुड़ते गए. इस तरह एक दूसरे से पंजे जोड़ते हुए मिलकर उन्होंने चौड़ी खाई के आर-पार एक अनोखा वानर पुल तैयार कर दिया.

डॉक्टर डू लिटिल आश्चर्य से यह चमत्कार देखते रहे. तभी चीची चिल्लाया-"डॉक्टर साहब, क्या सोच रहे हैं! तुरंत इस पुल को पार करके दूसरी तरफ पहुँच जाइए."

पोलिनेशिया और टूटू पहले ही उड़कर दूसरी तरफ चले गए थे. डॉक्टर साहब ने डब-डब बत्तख, ज़िप कुत्ते, गब-गब सूअर तथा मगरमच्छ के साथ जल्दी-जल्दी वानर पुल पार कर लिया.तबतक जोलिजिंकी के सैनिक भी आ पहुंचे. वे भी वानर पुल से खाई पार करने का विचार करने लगे. पर यह क्या. डॉक्टर साहब के पार जाते ही वानर एक-एक करके अलग होते गए और देखते-देखते वानर पुल गायब हो गया. अब जोलिजिंकी के सैनिक किसी भी तरफ खाई के पार नहीं जा सकते थे.

वानर डॉक्टर साहब को आगे का रास्ता दिखा रहे थे. कह रहे थे-"डॉक्टर साहेब, कृपया जल्दी कीजिए."

आगे एक खुले मैंदान में सैकड़ों बीमार बंदर दिखाई दिए. डॉक्टर डू लिटिल ने कल्पना भी नहीं की थी कि उन्हें एक साथ इतने अधिक बीमार बंदरों का इलाज करना होगा. एक पल गवांए बिना डॉक्टर साहेब बीमार बंदरों के इलाज में जुट गए. इस काम में वानर देश के अनेक पशु उनकी मदद करने लगे. पहले डू लिटिल ने बीमार बंदरों को दवा दी , फिर जो बीमारी की चपेट में आने से बच गए थे उनको रोग-निरोधी टीके लगाने शुरू किए.

लेकिन केवल दवा देने से ही बात बनने वाली नहीं थी . बीमार बंदरों की देखभाल भी तों जरूरी थी. आखिर उन्होंने वानरों से कहा कि वे मदद के लिए जंगल के सभी जानवरों को बुलाएं.

डॉक्टर डू लिटिल का सन्देश सुनकर जंगल के सभी जानवर आ गए. डॉक्टर डू लिटिल ने जिसे जो काम सौंपा वही खुशी-खुशी करने लगा. जानवरों ने कहा-"डॉक्टर साहब, बस एक घमंडी

शेर ही नहीं आया है. वह कहता है-"मैं हूँ जंगल का राजा. मैं गंदे, बीमार बंदरों को हाथ भी नहीं लगाऊंगा."

डॉक्टर साहेब ने शेर को सन्देश भेजा तों वह अकड़ता, गुर्राता आया. उसने कहा-"डॉक्टर डू लिटिल, मैंने आपकी बहुत तारीफ़ सुनी है. लेकिन आप मुझसे बंदरों की नर्सिंग करनी उम्मीद न करें."मैं हूँ जंगल का राजा."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-" शेर भाई, बीमारी राजा-प्रजा में भेद नहीं करटी. तुम्हे इस तरह घमंड नहीं करना चाहिए." पर शेर ने डू लिटिल की सलाह नहीं मानी. वह दहाड़ता हुआ वापस चला गया. उसे जाते देख तेंदुए, हिरन, रीछ तथा दूसरे जानवरों ने भी बीमार बंदरों की देखभाल करने से इनकार कर दिया. उन्हें तों जैसे एक बहाना मिल गया था. वे कह रहे थे -"कुछ भी
हो, हम अपने राजा को नाराज नहीं कर सकते." जानवरों के असहयोग ने डू लिटिल को परेशान कर दिया. वह सोच रहे थे-"अब क्या होगा?"

उधर शेर गुर्राता हुआ अपनी मांद में पहुंचा. तभी शेरनी उसके पास आई. घबराए स्वर में बोली-"हमारा एक बच्चा मुझे बीमार लग रहा है. उसने कल से कुछ नहीं खाया है. आँखे बंद किए लेटा है, धीरे-धीरे काराह रहा है."

शेर ने गर्वीले स्वर में बताया कि वह डॉक्टर से झगडा करके आ गया है. सुनकर शेरनी की आँखें गुस्से से लाल हो गईं. दहाड़कर बोली-"बस, इसी बात पर इतरा रहे हो. डॉक्टर साहेब हज़ारों मील दूर से यहाँ बीमारों का इलाज करने आयें. और तुमने उनसे झगडा कर लिया. अब हमारे बीमार बेटे का इलाज कैसे होगा. मैं माँ हूँ. मैं जाकर उनसे क्षमा मांग लूंगी. आज के बाद तुम
मुझसे बात न करना. घमंडी, मूर्ख कहीं का."

घमंडी शेर भी बच्चे की बीमारी की बात सुनकर बेचैन हो गया. उसे डू लिटिल के शब्द याद आ गए-"बीमार राजा-प्रजा में भेद नहीं करती." उसने शेरनी से कहा-"मैं तों सोच भी नहीं सकता था कि मेरे घर में भी बीमारी आ सकती है. डॉक्टर साहेब से झगडना मेरी भूल थी. मैं जाकर क्षमा मांगता हूँ, तब तक तुम बच्चे को लेकर आ जाओ."

शेर ने जाकर डॉक्टर साहेब से अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी. उन्होंने कहा-"गलती इंसान और जानवर दोनों से होती है. जाओ, बीमारों की सेवा करो." शेर को बीमारों की सेवा करते देख, वे जंगली जानवर भी लौट आए जो बहाना बनाकर चले गए थे. और हां, इस बीच शेरनी भी अपने बीमार बच्चे को लेकर वहाँ आ गई थी. डॉक्टर डू लिटिल ने उसे भी दवादे दी.

धीरे-धीरे महामारी का पकोप घटने लगा . बंदर स्वस्थ होने लगे, फिर एक दिन ऐसा भी आया जब एक भी बंदर अस्वस्थ नहीं रहा. पूरा जंगल डॉक्टर डू लिटिल का आभार मान रहा था.

जंगल के बीच एक खुले मैदान में सब जानवरों की सभा हुई. विचार होने लगा कि डॉक्टर साहेब को उपहारस्वरूप क्या दिया जाए. सब जानवरों ने एक स्वर से कहा. "हम डॉक्टर डू लिटिल से प्रार्थना करेंगे कि वह यहीं पर रह जाएँ. एक दवाखाना खोलें. हम हर तरह से उनका ध्यान रखेंगे."

चीची उस सभा में मौजूद था. उसने कहा-"मित्रों! आप केवल अपने बारे में सोच रहे हैं. लेकिन डॉक्टर डू लिटिल की आवश्यकता पूरी दुनिया को है. उनके अपने शहर में ही न जाने कितने बीमार हैं. वे उत्सुकता से उनके अफ्रीका से लौटने की प्रतीक्ष कर रहे हें. उन्हें यहीं रोकना गलत होगा.

पहले पशु सभा ने चीची का विरोध किया, पर फिर बात सबकी समझ में आ गई. तय हुआ कि डॉक्टर साहेब को उपहारस्वरूप पुश्मी पुल्लू नामक विचित्र जीव भेंट किया जाए. पुश्मी पुल्लू के दो सिर थे. एक आगे और दूसरा पूंछ की तरफ. पूरी दुनिया में वह अपनी तरह के एक ही जीव था. पहले तो पुश्मी पुल्लू ने मना किया, फिर डॉक्टर साहेब की प्रशंसा सुनकर उनके साथ जाने को तैयार हो गया.

विदाई का क्षण आ पहुंचा. पूरा जंगल उदास था. अनेक वानर रो रहे थे. सबने भारी मन से अपने प्रिय डॉक्टर डू लिटिल को विदा किया. फिर वानर पुल बनाकर उन्हें खाई से पार छोड़ आए.

डॉक्टर डू लिटिल प्रसन्न थे कि उन्हें बंदरों की महामारी दूर करने में सफलता मिल गई थी.

लेकिन अब फिर जोलिजिंकी के राज्य से गुजरना था. न जाने क्या होने वाला था. और वही हुआ जिसका डर था. जोलिजिंकी के सैनिकों ने डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथियों को जेल में डाल दिया. जोलिजिंकी ने आदेश दिया-"इस बार मैं अपने हाथ से इस शैतान डॉक्टर का सिर काटूंगा. देखता हूँ, किस तरह बचता है."

पोलिनेशिया चतुराई से इस बार भी पकडे जाने से बच गया था. वह राजमहल के बाग में एक पेड़ पर छिप गया. वह सोच रहा था-"इस बार क्या किया जाए?"

कुछ देर बाद जोलिजिंकी का बेटा राजकुमार बम्पो परी कथाओं की पुस्तक पढ़ रहा था. कथाओं में ऐसी परी का जिक्र था जो अपनी जादुई छड़ी से चमत्कार दिखाती थी. बम्पो सोच रहा था-"काश! कोई परी मुझे मिल जाए तों अपने को गोरा सुंदर बनवा लूं. मेरे चेहरे पर जो बड़े-बड़े फफोले हैं उनको ठीक करने का तरीका पूंछ लूं.

फिर उसने जोर से कहा-"ओ परी, क्या तुम मेरी मदद करोगी. मुझे गोरा-सुंदर बना दो. मेरे चेहरे के फफोले ठीक करदो."

पत्तों में छिपे पोलिनेशिया ने झट कहा-राजकुमार बम्पो, मैं हूँ परी रानी त्रिपस्तिंका. तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी. बोलो, क्या चाहिए, मैं तुम्हारे सामने हूँ, पर तुम मुझे देख नहीं सकते."

"परी रानी, क्या सच? क्या री इच्छा पूरी होगी?" राजकुमर तों मारे खुशी के जैसे पागल हो गया."

"हां, अवश्य पूरी होगी. मैंने कुछ दिन पहले डू लिटिल डॉक्टर को जादुई दवाओं का रहस्य बताया है. लेकिन उस डॉक्टर को तुम्हारे पिता ने कहीं कैद में डाल रखा है.

"तों, क्या वह डॉक्टर मुझे ठीक कर सकता है." बम्पो ने पूछा.

पोलिनेशिया ने कहा-"अवश्य वह कैद में है और मुझे तुरंत परी लोक वापस जाना है. नहीं तों मैं डॉक्टर को कैद से निकाल देती पर अफ़सोस मैं नहीं रुक सकती. मेरी परी माँ बीमार है. मैं जा रही हूँ." कहकर पोलिनेशिया चुप हो गया.

राजकुमार बम्पो तुरंत कैदखाने की तरफ चल दिया. पोलिनेशिया राजकुमार से पहले ही कैदखाने की खिड़की से डॉक्टर के पास जा पहुंचा. उसने डू लिटिल को पूरी बात बता डी. कहा-"राजकुमार बम्पो, अगर आकर आपसे पूछे तों आप कह देना के हां परी त्रिपस्तिंका ने आपको जादुई शक्तियां डी हैं."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"पोलिनेशिया, मैं गलत नहीं कर सकता. दुनिया में ऐसी कोई दवा नहीं जो काले को गोरा बना डे. हां, बीमारी का इलाज संभव है."

पोलिनेशिया ने कहा_"डॉक्टर साहेब, मैं जानता हूँ आप झूठ नहीं बोलते, लेकिन एक झूठ हम सबके प्राण बचा सकता है. नहीं तों सब मारे जाएंगे. जोलिजिंकी इस बार बहुत गुस्से में है.

तभी राजकुमाँर बम्पो कैदखाने में आ गया. उसने डू लिटिल को परी वाली बात बताई, फिर इलाज के लिए कहने लगा. डॉक्टर साहेब बोले-"कैदखाने में कुछ भी संभव नहीं है."

बम्पो ने तुरंत पहरेदारों को आदेश दिया. ताले खोल दिए गए. राजकुमार बम्पो ने पहरेदारों को समझा दिया कि वे किसी से कुछ न् कहें. डॉक्टर डू लिटिल के कहे अनुसार बम्पो उन्हें तथा उनके साथियों को सागरतट पर ले गया. डॉक्टर की इच्छा के अनुसार उसने पानी का जहाज मंगवा दिया. फिर डू लिटिल ने उसके लिए दवा तैयार की. कहा-"इसे अपने मुंह पर लगा लो. इससे तुम्हारी एक इच्छा पूरी हो जाएगी." और फिर जहाज पर बैठते समय उन्होंने बम्पो को एक पत्र दिया. कहा-"इसे जहाज जाने के बाद पढ़ना." पत्र में लिखा था-"बम्पो, तुम्हारा रंग नहीं बदलेग पर चेहरे के फफोले अवश्य ठीक हो जाएंगे. परी बन कर मेरे साथी पोलिनेशिया ने तुम्हे धोखा दिया है. क्षमा करना. ऐसा न करते तों तुम्हारे पिता हमें अवश्य मार डालते जबकि हमारा कोई दोष नहीं है."

इंग्लैण्ड लौटते समय डॉक्टर डू लिटिल के जहाज को समुद्री डाकुओं ने घेर लिया. उन्होंने सुना था कि डॉक्टर अफ्रीका से सोना लेकर जा रहे हैं. डॉक्टर साहब अपने जहाज को एक द्वीप पर ले गए. डाकुओं ने वहाँ भी उनका पीछा किया. डॉक्टर डू लिटिल और उनके साथी द्वीप पर जा छिपे. डाकू उनके जहाज पर चढ़कर सोना ढूँढने लगे. तभी जहाज के पेंदी में छेद हो गया.

जहाज डूबने लगा. डाकू कूदकर तैरने लगे. इतनी देर में शार्क माछ्लियों ने उन्हें घेर लिया. शार्क डॉक्टर साहब के बारे में सुनकर वहाँ आई थीं. विशाल मछलियों ने डॉक्टर साहब से पूछा-"अगर आप कहें तों हम इन डाकुओं को अपना भोजन बना लें."

डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"डाकुओं को मारना नहीं है, पर दंड भी देना है. इन्होने न जाने कितने जहाज़ों को लूटा है. कितने निर्दोषों के प्राण लिए है."

मछलियों ने डाकुओं को धकेल कर द्वीप पर पहुंचा दिया. फिर डॉक्टर डू लिटिल ने डाकुओं से कहा-"अब तुम लोग हमेशा इसी द्वीप पर कैद रहोगे. ये मछलियाँ सदा द्वीप की पहरेदारी करेंगी. अगर तुममे से किसी ने भी पानी में उतरने की कोशिश की तों ये विशाल मछलियाँ तुम्हें खा जाएंगीं."

इस तरह समुद्री डाकुओं का आतंक समाप्त हुआ. डॉक्टर डू लिटिल ने आगे की यात्रा डाकुओं के जहाज से की. जहाज पर एक बन कमरे में उन्हें एक बच्चा कैद मिला. वह बहुत दुखी था. उसने बताया कि डाकुओं ने उसके चाचा को न् जाने कहां कैद कर दिया. तभी ज़िप कुत्ते ने कहा-"डॉक्टर साहेब, मेरी सूंघने की ताकत का कमाल देखी." लड़के ने ज़िप को अपने चाचाजी का रूमाल सुंघा दिया. जहाज चलता रहा. ज़िप डेक पर खड़ा होकर जोर-जोर से सूंघता रहा. कुछ देर बाद उसने कहा-"डॉक्टर साहब, इस रूमाल के मालिक की गंध दक्षिण दिशा से आने वाली हवा में है. आप जहाज को उधर ही बढ़ाइए."

दक्षिण दिशा में कुछ दूरी पर एक द्वीप था. डॉक्टर और उनके साथी द्वीप पर उतरे. ज़िप सबसे आगे चल रहा था. वह एक गुफा के सामने रुक गया. उस बच्चे के चाचाजी वहीँ कैद थे. डॉक्टर साहेब उन दोनों को पास के दूसरे द्वीप पर बसे उनके गाँव में छोड़ आए. पूरे द्वीप के निवासियों ने इसके लिए डॉक्टर डू लिटिल को धन्यवाद दिया. इस पर उन्होंने कहा-"मित्रों, यह चमत्कार तों ज़िप के कारण हुआ है." इसके बाद द्वीप पर एक बड़ी सभा हुई. ज़िप के गले में सोने का पदक पहनाया गया. इस समय ज़िप की खुशी देखने वाली थी. क्योंकि अब तक तों हर बार पोलिनेशिया तोते की चतुराई की ही चर्चा होती थी.आगे की यात्रा सकुशल समाप्त हुई. डॉक्टर डू लिटिल एक कठिन यात्रा के बाद एक बार फिर अपने नगर में आ पहुंचे थे. उनके आने का समाचर सुनते ही उनके घ के आगे बीमार पशु-पक्षियों की भीड़ जमा हो गई. डॉक्टर साहेब ने कहा-"दोस्तों, मैं जल्दी ही आप सबको स्वास्थ कर दूंगा."

इसके बाद डॉक्टर साहब अपने नाविक मित्र से मिलने गए. उन्होंने कहा-मित्र, अगर तुम मेरी सहायता न करते तों मैं कभी अफ्रीका न जा पाता. मैंने तुमसे कहा था कि यात्रा से लौटकर तुम्हारा उधार चुका दूंगा, पर वहाँ मुझे पैसे नहीं, केवल प्रशंसा मिली है. मैं लज्जित हूँ."

इस पर नाविक ने कहा-"डॉक्टर डू लिटिल, मैंने आपको जहाज व दूसरा सब सामन उधार नहीं भेंटस्वरूप दिए थे. आप दुनिया के अनोखे पशु चिकित्सक हैं. भला दूसरा कौन है जो बीमार पशु-पक्षियों का हाल उनकी भाषा में पूछ सकें. आप महान हैं." सुनकर डॉक्टर डू लिटिल मुस्कराने लगे.#

1 comment:

  1. बहुत बेसब्री से इन्तज़ार था इस कड़ी का...और आज ऑन लाइन होते ही पढ़ने को मिल गई... सचमुच बहुत मज़ा आया... बहुत अच्छी लगी ये कहानी... थैंक्यू वेरी मच अंकल!!!

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