Translate

Sunday, July 31, 2011

डॉक्टर प्रताप सहगल का बाल-नाटक "अंकुर"





[डॉक्टर प्रताप सहगल हमारे समय के सुप्रसिद्ध लेखक, कवि, नाटककार, शिक्षाविद और आलोचक हैं. वे अनेक विधाओं में निरंतर रचनारत हैं.मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह प्रसन्नता की बात है कि उन्होंने अपने लेखन के दायरे से बच्चों को अछूता नहीं रखा है. उनकी बाल-नाटकों की पुस्तक " छू मंतर" से लिया गया एक लघु नाटक अंकुर यहाँ पुनर्प्रकाशित करने का मोह मैं नहीं छोड़ पा रहा हूँ. इसके कई कारण हैं: भगतसिंह जैसे महान व्यक्तित्व के बचपन एवं उनके देशप्रेम से जुड़ा रोमांचक कथ्य, देशकाल और पात्रों के अनुरूप प्रयुक्त बोलचाल की भाषा, और भागाँ वाले पुत्तर भगतसिंह के जन्मोत्सव पर पंजाब की पंजाबियत को साकार करने वाला जीवंत गीत -"पुत जम्याँ भागां वाला/पतासे मैं बन्डदी फिरां". आजादी की नई वर्षगाँठ अगले महीने आ रही है. आशा है इस पुनीत अवसर पर बच्चे/बड़े इस रोचक नाटक को पढकर/मंचित कर देश के इस अमर शहीद को सामूहिक स्मरणांजलि भेंट कर सकेंगे.]




पात्र
स्त्री-स्वर
दूसरा स्त्री-स्वर
बूढा स्त्री-स्वर
बाल भगत सिंह
विद्यावती
गायन मण्डली

दृश्य एक
समय: २७ सितम्बर, १९०७ :: स्थान : बंगा (लायलपुर)

(मंच पर एकदम अँधेरा. धीरे-धीरे एक प्रकाश -वृत्त मंच के पीछे वाली दीवार पर फैलता है. उसी पर २७ सितम्बर और स्थान बंगा लिखा है. कुछ क्षणों के अंतराल के बाद नेपथ्य से पंजाबी लोकधुन उभरती है. ढोलक पर तेज थाप, जो धीरे-धीरे मंद पड़ती है.)

स्त्री-स्वर : वधाई होवे.
दूसरा स्त्री-स्वर: तुसी वधो.
(ढोलक पर थाप)

स्त्री-स्वर: लै भैणे, चंगी खबर आई आ.
दूसरा स्त्री-स्वर: बोल वी.
पहला स्वर: किशन सिंह दी ज़मानत मंजूर हो गई, आ ते नाले स्वर्णसिंह दी वी, दोवें पुजदे ही होणगे.
दूसरा स्वर: वाहे गुरु दी मेहर ए !

(ढोलक पर थाप)

पहला स्वर: मांडले तों तार आई आ.
दूसरा स्वर: की?
पहला स्वर: अजीतसिंह दी रिहाई.
बूढा स्त्री-स्वर: बाबाजी दी मेहर होई ए - मेरे तिन्नो पुतर छूट गए-पुतर भागां वाला ए.

(ढोलक की थाप के साथ कुछ स्त्रियाँ मंच के बीचोबीच आकार बैठ जाती हैं और प्रकाश उन पर केंद्रित हो जाता है. एक औरत ढोलक घुटने के नीचे दबाकर बैठ जाती है, दूसरी चम्मच लेकर ढोलक के फ्रेम पर मारने लगती है. गीत के स्वर उठते हैं:)

पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां

इक पतासा चाचे खादा -इक पतासा चाचे खादा
जंग लई औ' तैयार फिरंगियाँ नूँ मारे गबरू
पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां

इक पतासा प्यो ने खादा-इक पतासा प्यो ने खादा
जिंदड़ी देश तों वारे ते वैरियाँ ने भन्ने पासे
पुत जम्याँ भागां वाला
पतासे मैं बन्डदी फिरां.

(गायन में एक स्त्री-नाचने लगती है. तालियाँ बजाकर शेष उसका साथ देती हैं. धीरे-धीरे गीत मंद होता है.)

(दृश्य लोप)

(समवेत गान गाती मण्डली मंच के अगर भाग पर आती है. गीत के दौरान मंच के एक भाग पर दृश्य उभरते हैं, बदलते हैं और लोप हो जाते हैं.)



कैसा था भगतसिंह - कहो कैसा था भगतसिंह
देखने में हमें तुम्हीं जैसा था भगतसिंह
कैसा था भगतसिंह - कहो कैसा था भगतसिंह
उसके बदन की मिटटी का कुछ रंग और था
सोचने का, ठोकने का ढंग और था
ऐसा नहीं, वैसा नहीं, जैसा भी था वह
वैसा था भगतसिंह
वैसा था भगत सिंह
सत्ताईस सितम्बर ने नौ बार दोहराया
इस दिन पिता के संग बेटा खेत में आया
खेत में मिलने किशनसिंह को
आ पहुंचे नंदकिशोर
वे देखते हैं क्या
ज़रा कीजिएगा गौर
मिट्टी की कुछ ढेरियाँ
उनके इर्द-गिर्द भगत
लगा रहा है फेरियां
हर ढेरी पर सजा-सजाकर
गाड रहा है तिनका
सोचते थे जो
वही सब सोचता था
बेटा था वह जिनका
कुछ देर तों देखा गौर से
फिर पूछा नंदकिशोर ने
तुम्हारा नाम क्या बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?
मेरा नाम भगतसिंह, मेरा नाम भगत सिंह!
क्या कर रहे हो तुम यहाँ, क्या कर रहे हो?
फसल की यह तैयारी है बंदूकों की
बंदूकें?
हां जी हां, बंदूकें ! हां जी हां, बंदूकें!
बंदूकों का क्या काम
तुम्हारे लिए है बच्चे?अब तों बंदूकें सिर्फ मेरे काम आएँगी.
देश की आज़ादी के लिए गज़ब ढाएंगी
धांय....धांय....धांय
चाचा अजीतबंदूकों की कमी है
जकड़ी गई माता की आँखों में नमी है
मैं कर रहा हूँ काम अपना देश के लिए
यह बंदूकें दन दनाएं देश के लिए
माँ का लाडला बड़ा न्यारा था भगतसिंहसिंह
प्यारा था भगतसिंह, बड़ा प्यारा था भगतसिंह
(गायन मण्डली अपना स्थान ग्रहण करती है)

(दृश्य दो)

समय: अप्रैल १९१९ स्थान: भगतसिंह का घर

(भगतसिंह की माँ विद्यावती एक ओर बेठी डाल बीन रही है. बाल भगतसिंह आता है और चुपचाप माँ के पास बैठ जाता है.)

विद्यावती: कित्थों आ रयां?
भगतसिंह: अमृतसरों.
विद्यावती: (हैरानी से) अमृतसरों ...कल्ला गुरूद्वारे गया सैं?
भगतसिंह: नईं ...जलियावाले बाग.
विद्यावती: (थोडा चौंककर) ओत्थे? कादे वास्ते?
भगतसिंह: ऐना गोरे वैरियाँ ने हजारां बंदे मार छड्डे ने!
विद्यावती: तू अजे पढ़ाई वल ध्यान रख!
भगतसिंह: (एक शीशी जेब से निकालकर मान को दिखाता है. शीशी में लाल मिट्टी भरी है.) ए वेख माँ, ए ओना बहादरां दी मिटटी, जेडे ओत्थे शहीद हो गए..माँ, ओनां राह चलदे लोकां नूँ मारया , घसीटया , ओनां दा सामान खो लया ..ऐना फिरंगियाँ नूँ मैं छड्डागा नईं माँ!
विद्यावती: (उठकर एक सेब लाती है) अच्छा...अच्छा...लै खा लै, भूख लग्गी होएगी आ!
भगतसिंह: हां माँ, भूख ते लगी है, पर सेब दी नईं
विद्यावती : वेख पुत्तर, देश की आज़ादी वास्ते तेरा तेरा चाचा अजीतसिंह लड़ रया है, स्वर्णसिंह लड़ रया है. ए आप वी लड़ रये ने..तूं वी लड़ लई, पर अजे पढ़ाई कर लै.
भगतसिंह: पढ़ाई...कादे वास्ते?
विद्यावती: अपणे वास्ते...कौम डे वास्ते...सेब खा लै. (उसके सिर पर हाथ फेरती है और चली जाती है.)
(भगतसिंह के एक हाथ में सेब तथा दूसरे में मिट्टी वाली शीशी है. वह कभी शीशी को और कभी सेब को देखता है.)
भगतसिंह: (शीशी को सामने कर्ता हुआ) एस शहीद लहू दी सौंह, फिरंगियाँ दा खात्मा करके ही दम लवांगा. (शीशी को जेब में रख लेता है और सेब को एक ओर फेंक देता है)

(दृश्य लोप).




photo credits: google search.

1 comment: