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Wednesday, July 20, 2011

ह्यू लाफिंग -डॉक्टर डू लिटिल का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर

ह्यू लाफिंग


ह्यू लाफिंग का जन्म १४ जनबरी १८८६ को मेडन हैड, बर्कशायर, इंग्लैंड में हुआ. जब वे ८ वर्ष के हुए तो डर्बीशायर के जेसुइट बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई शुरू की. आगे चलकर १९०६ लन्दन स्कूल ऑफ पोलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. काम के सिलसिले में उन्होंने अफ्रीका, कनाडा वेस्ट इंडीज की यात्राएं कीं, बाद में न्युयोर्क में रहने लगे. न जाने कब इंजीनियर ह्यू लाफिंग के मन में लेखक बनने की इच्छा जाग उठी. पर कुछ विशेष लिखने से पहले प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लेना पड़ा. कहते हैं जब लाफिंग मोर्चे पर जा रहे थे तो बच्चों ने कहा कि वह मोर्चे से पत्र लिखें.
मोर्चे पर लाफिंग का सामना गोला-बारूद के धुएं सनसनाती गोलियों और बमों के धमाकों से हुआ. सब तरफ मरे हुए सैनिकों के विकृत शब् दिखाई देते और कानों में घायलों की चीख-पुकार गूंजती रहती थी. पत्रों में बच्चों के लिए उस मृत्यु के तांडव का विवरण कैसे लिखा जा सकता था भला. पर मन में बच्चों के लिए लिखने की इच्छा लगातार उन्हें प्रेरित करती रही और तब एक पात्र का जन्म हुआ. वह थे डॉक्टर जान डू लिटिल एम.डी. डॉक्टर डू लिटिल को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था. एक तोता पोलिनिशिया डॉक्टर डू लिटिल को पशु-पक्षियों के बोलियां सिखा देता है. और फिर वह जानवरों का इलाज करने लगते हैं. वह दुनिया के पहले ऐसे डॉक्टर बन जाते हैं जो हर पशु-पक्षी से उसकी भाषा में बात करता. उनके घर में रहते हैं चीची बंदर, ज़िप कुत्ता, टूटू उल्लू, डब-डब बत्तख और सबसे बड़ा मित्र पोलिनिशिया.

इन्ही पात्रों को लेकर उन्होंने जो पुस्तक लिखीं वह १९२० में प्रकाशित हुईं. शीर्षक था-"द स्टोरी ऑफ डॉक्टर डू लिटिल." छपते ही पुस्तक लोकप्रिय हो गई. पाठक डॉक्टर डू लिटिल के बारे में और अधिक जानने के इच्छुक हो उठे और ह्यू

लाफिंग ने १९२७ तक डू लिटिल श्रंखला की सात पुस्तकें लिख डालीं.लेकिन बीच में शायद कही ह्यू लाफिंग को ऐसा लगा जैसे वह डॉक्टर डू लिटिल ही बन गए हैं. वह खुद को "टाइप्ड" महसूस करने लगे. और तब उन्होंने अपनी एक पुस्तक "डॉक्टर डू लिटिल इन द मून " (१९२८) में डॉक्टर को चाँद पर भेजकर उस पात्र से छुटकारा पाने का प्रयास किया. पर पाठकों के आग्रह पर उन्हें
डॉक्टर डू लिटिल को वापस बुलाने पर विवश होना पड़ा और उन्होंने पुस्तक लिखी"डॉक्टर डू लिटिल्ज रिटर्न" (१९३३) इस श्रंखला की अंतिम पुस्तक "डॉक्टर डू लिटिल एंड द सीक्रेट लेक" १९४८ में उनके निधन के बाद प्रकाशित हुई. अपनी कृतियों का चित्रांकन भी ह्यू लाफिंग ने स्वयं किया जिसे बहुत सराहा गया.

ह्यू लाफिंग की कुछ अन्य कृतियाँ हैं-
"द स्टोरी ऑफ मिसेज तबज"-१९२३, टामी, टिल्ली एंड मिसेज टब्स. इनमे डॉक्टर डू लिटिल मौजूद नहीं हैं. कहने की आवश्यकता नहीं है कि ह्यू लाफिंग अपनी "डू लिटिल" श्रंखला के लिए ही अधिक जाने जाते हैं. शायद उसी तरह जैसे दुनिया आर्थर कानन डायल को उनके जासूस शर्लक होम्स के लिए पहचानती है.
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डॉक्टर डू लिटिल (संक्षिप्त हिंदी रूपांतर: देवेन्द्रकुमार:रमेश तैलंग)

एक थे डॉक्टर जान डू लिटिल. वह इंग्लैण्ड के छोटे से कस्बे पद्लबाई में रहते थे. अत्यंत कुशल डॉक्टर थे डू लिटिल. वह लालची नहीं थे. बड़े ध्यान से रोगियों की जांच करके दवाई देते. रोगी जल्दी ही स्वस्थ हो जाते. डॉक्टर साहब कम फीस लेते और गरीबों का मुफ्त इलाज करते. पद्ल्वाई के सभी निवासी डॉक्टर डू

लिटिल का बहुत सम्मान करते थे.
डॉक्टर डू लिटिल के घर की देखरेख उनकी बहन सारा करती थी. डॉक्टर को पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था. डॉक्टर ने अपने मित्रों के अनोखे नाम रखे थे -जैसे डब-डब बत्तख, कुत्ता ज़िप, गब-गब सूअर, टू-टू उल्लू और पोलिनेशिया तोता. सारा को डॉक्टर भैया के पालतू पशु-पक्षियों से चिढ थी. वह कहती-विचित्र शौक है तुम्हारा, तुम्हारे पशु-मित्र सारा दिन घर को गन्दा रखते हैं. इस पर डू लिटिल मुस्कराकर चुप रह जाते, वह मानते थे कि उनके घर पर उनके मित्र पशु-पक्षियों को भी उतना ही अधिकार था जितना खुद उनका या बहन सारा का.मरीज़ आते तो पूरे घर में पशु-पक्षियों को घूमते देख घबरा जाते.

धीरे-धीरे कुछ लोगों ने दवाखाने में आना बंद कर दिया. वे लोग चाहते थे कि डॉक्टर डू लिटिल अपने पालतू पशु-पक्षियों को घर से भगा दें, पर डॉक्टर ने वैसा नहीं किया. एक दिन कोई औरत दवा लेने आई तो उसने देखा सोफे पर कुछ पशु बेठे हैं. वह डर कर भाग खड़ी हुई. तब दूसरे रोगी भी बिना दिखाए चले गए. इस तरह डॉक्टर डू लिटिल के दवाखाने में आने वाले रोगियों के संख्या बहुत कम हो गई. पर डॉक्टर डू लिटिल ने इस बात की चिंता नहीं की. फिर भी मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं. डॉक्टर की आमदनी तो कम हो गई लेकिन पालतू पशु-पक्षियों पर होने वाला खर्च बढ़ता गया. ऐसा भला कितने दिन चल सकता था.

लोग डॉक्टर डू लिटिल के घर को चिड़ियाघर कहने लगे. एक दिन डू लिटिल का एक परिचित उनसे मिलने आया. वह हँस कर बोला-डॉक्टर साहब, जब आप मनुष्यों का इलाज़ करना छोड़ दीजिए और पशु पक्षियों के डॉक्टर बन जाइए. शायद तब आपको थोड़ी-बहुत आमदनी होने लगे. वह तो अपनी बात कहकर चला गया पर डॉक्टर डू लिटिल सोच में डूब गए. तभी पोलिनेशिया तोता बोला, "डॉक्टर साहब, मैंने उस आदमी की बात ध्यान से सुनी थी. उसका आइडिया बुरा नहीं है."

डू लिटिल बोले-"पोलिनेशिया, शहर में पहले ही जानवरों के कई डॉक्टर हैं. और फिर भला मैं जानवरों की बातें कैसे समझूंगा, तुम ठहरे चतुर. मनुष्यों की बोली समझते हो और बोलते हो. मैं भी तुम्हारी बात का मतलब समझ जाता हूँ. लेकिन भला बताओ तो अगर कोई बिल्ली, भालू, बंदर, हाथी आकर मुझसे बोलने लगे तो मैं उनका मतलब कैसे समझूंगा? किसी बीमार का इलाज करने के लिए यह जरूरी है कि डॉक्टर उसकी बात सुनकर अपनी बात उनसे कह सके."

इस पर पोलिनेशिया ने कहा-"डॉक्टर साहब, आज अपने बारे में मैं आपको एक नई बात बता रहा हूँ. मैं दुनिया के लगभग सभी पशु-पक्षियों की बोलियां समझता हूँ. हर जानवर से उसकी बोली में बात कर सकता हूँ. यदि आप कहें तो मैं आपको भी पशु-पक्षियों की बोलियां समझा सकता हूँ. इसमें आपको ज्यादा परेशानी नहीं होगी. भला ऐसे डॉक्टर कहाँ मिलेंगे जो जानवरों से उनकी बोली में बात करें."

डॉक्टर डू लिटिल को पोलिनेशिया की बातें मजेदार लग रही थीं. बोले-"वाह! पोलिनेशिया, तुम मेरे गुरु बन जाओ. अगर मैं पशु-पक्षियों की बोलियां सीखकर उनका इलाज़ कर सका तो मुझे खुशी होगी. वैसे भी मुझे पशु-पक्षियों के साथ रहना अच्छा लगता है."
बस उसी दिन से पोलिनेशिया तोता डॉक्टर डू लिटिल को जानवरों की बोलियां सिखाने लगा. शुरू-शुरू में उन्हें कठिनाई अवश्य हुई पर वह मन लगाकर सीखते रहे. उन्होंने निश्चय कर लिया था कि वह हर पशु-पक्षी से उसकी बोली में बात कर सकने वाले डॉक्टर बनकर रहेंगे. इस तरह गुरु पोलिनेशिया अपने शिष्य बने डॉक्टर डू लिटिल को जानवरों की बोलियां सिखाता रहा. और फिर एक दिन डॉक्टर डू लिटिल के दरवाजे पर एक नया बोर्ड दिखाई दिया. उस पर लिखा था-डॉक्टर डू लिटिल. जानवरों के डॉक्टर



इस नए बोर्ड ने तो डॉक्टर साहब के रहे-सहे रोगियों को भी डरा दिया. अब लोग उनके पास अपने पालतू पशु-पक्षियों को इलाज के लिए लाने लगे. एक दिन एक घोडा डॉक्टर साहब के दवाखाने में आया. डॉक्टर डू लिटिल को अपनी बोली में बोलते सुन घोडा बहुत खुश हुआ. उसने कहा-"डॉक्टर साहब, तकलीफ मेरी आँखों में है, पर दवा मुझे पेट-दर्द की दी जा रही थी. मुझे आँखों से कम दिखाई देता है. मैंने मनुष्यों को चश्मा लगाए देखा है. क्या आप मेरे लिए हरे-लेंस वाला चश्मा बना देंगे?"

डॉक्टर साहब ने घोडे के लिए हरा चश्मा बना दिया. घोडा बहुत खुश हुआ. फिर तो शहर में कई घोड़े हरा चश्मा पहने दिखाई देने लगे. डॉक्टर डू लिटिल के पास इलाज़ के लिए आने वाला हर पशु-पक्षी उनके पक्का दोस्त बन जाता था. धीरे-धीरे सारे जानवर इस अनोखे डॉक्टर के बारे में जान गए. पक्षियों ने उनकी खबर दूसरे देशों में भी पहुंचा दी..

अफ्रीका से आया सन्देश:



एक दिन डॉक्टर के मोहल्ले में एक मदारी आया. उसके साथ एक बंदर था. मदारी बंदर का खेल दिखाने लगा. देखने वालों की भीड़ लग गई. भीड़ में खड़े बच्चे तालियाँ बजा रहे थे. डॉक्टर डू लिटिल ने बंदर को देखा तो जान गए कि बंदर खुश नहीं है. और फिर मदारी तो बंदर से भीख मंगवाता था. डू लिटिल ने बंदर से उसकी भाषा में बात की तो पता चल गया कि बंदर कितना परेशान था. वह मदारी की कैद से छुटकारा पाना चाहता था. डॉक्टर और बंदर के बीच हुई बातचीत को कोई नहीं समझ पाया. उन्होंने मदारी को कुछ पैसे देकर बंदर को खरीद लिया. पैसे लेकर जाते समय मदारी झगडा करने लगा. डू लिटिल ने कहा-"जानवरों को दुःख देना बुरी बात है. मैं अभी पुलिस को बुलवाता हूँ." पुलिस का नाम सुनते ही मदारी डरकर भाग गया.

घर में रहने वाले दूसरे जानवरों ने बंदर का नाम चीची रख दिया. चीची बंदर के करतबों से सभी खुश रहते थे. उन्हीं दिनों शहर में सर्कस लगा. सर्कस में था एक मगरमच्छ. उसका नाच दर्शकों को बहुत पसंद आता था. लेकिन इधर कई दिनों से मगरमच्छ के दांत में दर्द था. वह खेल दिखाए तो कैसे? उसे जानवरों के डॉक्टर का पता चला तो रात के अँधेरे में डॉक्टर डू लिटिल के दवाखाने में आ पहुंचा. डॉक्टर डू लिटिल ने मगरमच्छ के दांतों में दवा लगा दी. उसका दांत दर्द ठीक हो गया. उसने डॉक्टर डू लिटिल से कहा -"मैं सर्कस में वापस नहीं जाना चाहता. वे लोग मुझसे जबरदस्ती करते हैं. क्या मैं आपके बाग के तालाब में रह सकता हूँ. मैं वादा करता हूँ कि यहाँ रहते हुए किसी जानवर को नहीं खाऊंगा.डॉक्टर डू लिटिल ने मगरमच्छ को अपने घर में रहने की अनुमति दे दी. सर्कस वालों ने भागे हुए मगरमच्छ को बहुत ढूँढा पर वे उसका पता नहीं लगा सके.

लेकिन अब एक नई समस्या खड़ी हो गई. लोग अपने बीमार पशु-पक्षियों को दवाखाने लाने से घबराने लगे. हालांकि घड़ियाल ने डॉक्टर से किसी जानवर को न खाने का वादा किया था, लेकिन यह बात दूसरे लोग भला कैसे समझ सकते थे.

धीरे-धीरे पशु-पक्षी रोगियों की संख्या भी कम हो गई. डॉक्टर डू लिटिल जानते थे कि यह आफत मगरमच्छ के कारण आई है, पर वह अपने दयालु स्वभाव के कारण मगरमच्छ से घर छोड़कर जाने के लिए नहीं कह सके. डॉक्टर डू लिटिल की बहन सारा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकी. एक दिन वह कहीं और रहने चली गई. डॉक्टर साहब ने सारा को समझाना चाहा, लेकिन वह नहीं माना. डॉक्टर डू लिटिल अपने जानवर मित्रों के साथ अकेले रह गए. अब कोई भी उनसे मिलने नहीं आता था.एक रात डॉक्टर साहब सो रहे थे, तो चीची बंदर, पोलिनेशिया तोता और टूटू उल्लू आपस में बात करने लगे कि अब क्या किया जाए. क्योंकि उन्ही के कारण

डॉक्टर डू लिटिल पर मुश्किल आई थी. डॉक्टर के पालतू जानवरों ने फैसला किया कि घर के सभी काम वे खुद करेंगे. लेकिन काम सिर्फ चीची ही कर सकता था, जिसके दो हाथ थे. फिर सर्दी का मौसम आ गया. खूब बर्फ गिरी. ऐसे में तो भोजन मिलना भी दुर्लभ हो गया.

सर्दियों की ठंडी और अँधेरी रात थी. डॉक्टर और उनके मित्र रसोईघर में बैठे बातें कर रहे थे. पूरे मकान में रसोईघर ही कुछ गरम था. लेकिन चीची बंदर का पता नहीं था. डॉक्टर डू लिटिल ने कहा-"चीची कहाँ हो इस समय? तभी दरवाजा खुला और चीची बंदर अंदर आया. वह हांफ रहा था. इससे पहले कि डू लिटिल उसे सर्दी में घर से बाहर रहने के लिए डांटते, चीची घबराए स्वर में बोला-"डॉक्टर साहब, अफ्रीका में आफत आ गई है.
"क्या मतलब?" डॉक्टर साहब ने पूछा-"आफत अफ्रीका में आई है, पर तुम इतना क्यों घबरा रहे हो?"
"वहाँ बंदरों में एक विचित्र महामारी फ़ैल गई है. हजारों बंदर बीमार हैं, अनेक हर रोज मर रहे हैं. आपको वहाँ चलना होगा." कहकर चीची ने डॉक्टर डू लिटिल का हाथ थाम लिया. डॉक्टर डू लिटिल ने महसूस कर लिया कि चीची का हाथ कांप रहा है.
"सन्देश कहां से मिला, किसने दिया?" उन्होंने पूछा.
"एक अफ्रीकी चिड़िया यहाँ सन्देश लेकर आई है. मेरे चचेरे भाई ने सन्देश भेजा है." चीची बोला.
"चिड़िया कहाँ है?"
"बाहर."
"पहले उसे अंदर तो लाओ, नहीं तो वह सर्दी में ठिठुर कर मर जाएगी." डू लिटिल बोले.
चीची अफ्रीका से आई चिड़िया को अंदर बुला लाया. चिड़िया सचमुच ठण्ड से कांप रही थी. अंगीठी के गरमाई से उसके गीले पंख सूख गए. फिर उसने डॉक्टर को अफ्रीका के समाचार सुनाए. सचमुच अफ्रीका में बंदरों की स्थिति बहुत खराब थी. डॉक्टर डू लिटिल ने चिड़िया से कहा-"देखो, तुमसे क्या छिपाना. मैं वहाँ जरूर जाना चाहता हूँ, पर आजकल पैसों का संकट है. बिना पैसों के मैं कैसे यात्रा करूँगा."

तभी पोलिनेशिया ने कहा-"डॉक्टर साहब, एक नाविक आपका मित्र है. एक बार आपने उसकी बुलबुल का बुखार ठीक किया था. आपको उससे बात करनी चाहिए, शायद वह कोई प्रबंध कर सके." डू लिटिल बोले-"अब तो कल दिन में ही कुछ हो सकेगा ." फिर उन्होंने चिड़िया से कहा-"तुम इतनी लंबी यात्रा करके आई हो, अब आराम करो. कल आगे का कार्यक्रम बनायेंगे." इसके बाद डू लिटिल सोने चले गए, पर उनके पशु-पक्षी मित्र जागते ही रहे. वे सभी अफ्रीका की यात्रा पर जाना चाहते थे.

दिन निकलते ही डॉक्टर साहब अपने नाविक मित्र से मिलने गए. पूरी बात सुनकर उसने कहा-"जैसे भी होगा आपकी अफ्रीका यात्रा के लिए एक जहाज और दूरी आवश्यक सामग्री का प्रबंध कर दूंगा." डू लिटिल ने नाविक को वचन दिया-"मैं अफ्रीका से लौटकर तुम्हारे सारे पैसे चुका दूंगा." इस तरह बात बन गई. अफ्रीका जाने की सबसे ज्यादा खुशी मगरमच्छ, तोते पोलिनेशिया और चीची बंदर को थी. क्योंकि वे तीनों ही अफ्रीका से आए थे. पोलिनिशिया तो इससे पहले भी कई लंबी यात्राएं कर चुका था. पर एक समस्या थी-अफ्रीका तक की यात्रा में रास्ता कौन बताएगा? डॉक्टर डू लिटिल तो पहले कभी अफ्रीका गए नहीं थे. तब अफ़्रीकी चिड़िया ने कहा-"रास्ता मैं दिखाऊंगी. मैं जहाज के आगे-आगे उडती चलूंगी."

यात्रा शुरू हुई. मौसम अच्छा था. जहाज चिड़िया की पीछे-पीछे समुद्र में चलता रहा. जब चिड़िया कुछ थक जाती तो आराम करने के लिए जहाज पर उतर आती. दिन ढलने लगा. तभी पोलिनेशिया ने कहा-"रात में भला हम चिड़िया को कैसे देख पाएंगे? इस तरह तो रास्ता भटक सकते हैं.

चिड़िया ने हंसकर कहा-"मैंने इस समस्या पर पहले ही सोच लिया है." किसी की समझ में नहीं आया कि आखिर चिड़िया रात के अँधेरे मैं उन सबको कैसे दिखाई देगी. पर चिड़िया थी समझदार. योजना के अनुसार उसके पंखों से चिपककर कुछ जुगनू उड़ने लगे. उनकी रौशनी बार-बार जल-बुझ रही थी. लगता था जैसे चिड़िया अपनी चोंच में एक नन्ही लालटेन लेकर उड़ रही हो. बस, इस तरह अँधेरे में भी दिशा ज्ञान बना रहा. डॉक्टर डू लिटिल तथा उनके साथी चिड़िया को आसानी से देख सकते थे.

जहाज आगे बढ़ा तो मौसम गरम हो गया. पोलिनेशिया, चीची और मगरमच्छ को यह मौसम पसंद था लेकिन सूअर. कुत्ता और टूटू उल्लू परेशान थे. वे हर समय छाया में ही दुबके रहते थे. दब-दब बत्तख थोड़ी-थोड़ी देर में पानी में कूद जाती. कुछ देर तैरती और फिर ऊपर आ जाती. उसे इस खेल में खूब मजा आ रहा था. डब-डब ने डॉक्टर से कहा-"मुझे पता नहीं था कि अफ्रीका यात्रा में इतना आनंद आएगा. डब-डब ने डॉक्टर से कहा-"मुझे पता नहीं था कि अफ्रीका यात्रा में इतना आनंद आएगा." डू लिटिल कुछ बोले नहीं. वह आकाश की ओर देख रहे थे, जहां काले-काले बदल उमड़-उमड़ रहे थे.

कुछ देर बाद बड़ी-बड़ी मछलियों का एक झुण्ड जहाज की तरफ आया. मछलियों ने जहाज को घेर लिया. फिर एक मछली पानी से मुंह निकलकर बोली-"क्या इस जहाज में डॉक्टर डू लिटिल यात्रा कर आहें हैं?"
पोलिनेशिया ने कहा-"हां, कहो क्या बात है?"
मछली बोली-"असल में बंदरों के सरदार ने हमें यह देखने भेजा था कि डॉक्टर डू लिटिल कहाँ तक आ पहुंचे हैं? कुछ बंदरों को संदेह हो रहा है कि क्या डॉक्टर साहब उनका इलाज करने के लिए सचमुच अफ्रीका आएँगे?"
तब डॉक्टर डू लिटिल ने मछली से कहा-"मैं तो किसी बीमार पशु-पक्षी का इलाज करने के लिए दुनिया में कहीं भी जा सकता हूँ. तुम सब जाकर बंदरों से कह दो कि मैं जल्दी ही पहुँचने वाला हूँ."

थोड़ी देर बाद डॉक्टर का सन्देश लेकर मछलियों का झुण्ड वापस चला गया. उन्होंने डॉक्टर डू लिटिल से कहा था कि अफ्रीका महाद्वीप का तट बस ढोडी ही दूर है.
लेकिन क्या सच में अफ्रीका इतना पास था? क्योंकि थोड़ी देर बाद ही आकाश में बिजली कौंधने लगी, फिर तेज बारिश शुरू हो गई. समुद्र में ऊंची-ऊंची लहरें

उठ रही थीं. डॉक्टर डू लिटिल का जहाज ऊंची लहरों पर तिनके की तरह डोलने लगा. फिर अँधेरा घिर आया. बारिश उसी तरह तेजी से हो रही थी. डॉक्टर डू लिटिल नहीं जानते थे कि जहाज किधर जा रहा है. क्योंकि उस तूफानी बारिश में चिड़िया भी आकाश में उनकर उन्हें रास्ता नहीं दिखा सकती थी.



जारी ......शेष भाग के लिए थोड़ी..बस थोड़ी सी प्रतीक्षा करें
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चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

1 comment:

  1. ह्यू लाफ़िंग के बारे में जानकारी और उनकी कहानी "डॉक्टर डू लिटिल" दोनो ही बहुत रोचक लगे.. अगले भाग की बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी... रमेश तैलंग अंकल आपको बहुर-बहुत थैंक्यू!!!

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