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Thursday, August 18, 2011

बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का 300वां अंक

बाल विज्ञान पत्रिका चकमक का आगामी 300वां अंक पत्रिका के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण अंक होगा. इस पत्रिका के बारे में श्री प्रेम पाल शर्मा का एक जानकारीयुक्त आलेख लेखकमंच.कॉम से साभार यहां प्रस्तुत है:

बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की चकमक : प्रेमपाल शर्मा




बाल पत्रिका ‘चकमक’ का तीन सौवां अंक प्रकाशन की तैयारी में है। पत्रिका के शुरुआती वर्षों से लेकर आज तक की यात्रा पर कथाकार प्रेमपाल शर्मा का आलेख-

सितम्बर, 2011 का अंक बाल विज्ञान पत्रिका ‘चकमक’ का तीन सौवां अंक होगा। पच्चीस साल की अनवरत यात्रा। जुलाई, 1985 में ‘चकमक’ का पहला अंक आया था। शिक्षा में नवाचार के लिए मशहूर एकलव्य संस्थान से। संपादक : विनोद रायना। मेरी स्मृतियों में ‘चकमक’ अपने शुरुआती अंकों से बसी हुई है। शाम को मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर में नियमित जाना होता था और पहली बार ‘चकमक’ वहीं देखी और उसके बाद आज तक इसे देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता। जितना खूबसूरत नाम उतनी ही खूबसूरत साज-सज्जा और सामग्री। निश्चित रूप से वक्त के साथ इसमें भी बदलाव आया है। स्मृति का सहारा लूँ तो शुरू की ‘चकमक’ अपेक्षाकृत छोटे बच्चों के लिए थी यानि पाँचवीं-छठी तक के बच्चों के लिए। मेरा लगातार ‘चकमक’ की तरफ झुकाव उन दिनों इसलिए भी था कि मेरे बच्चे उसी उम्र में प्रवेश कर रहे थे। उसमें छपे चित्र, कहानियाँ, रोचक घटनाएं- कभी रेल की, कभी पृथ्वी की, कभी सूरज की जितना उन्हें आकर्षित करतीं उतनी ही मुझे। मेरे गाँव के बचपन में ऐसी कोई पत्रिका नहीं थी। कभी-कभी ‘चंदामामा’ की याद थोड़ी बहुत जरूर आती है। बहुत सादा कागज पर ‘चकमक’ के अनेक नियमित स्तम्‍भ आकर्षित करते थे जैसे- माथापच्ची, माह की पहेली, सवाली राम, एक मजेदार खेल आदि। ‘पाठक लिखते हैं’ में बच्चों के पत्र उनकी अनगढ़ भाषा, बोली में भी खूब छपते थे। यानि बच्चों और शिक्षा की एक मुकम्मिल दुनिया। बाल पत्रिकाएं तो इस बीच और भी छप रही हैं लेकिन ‘चकमक’ जैसी बाल मनोविज्ञान और शिक्षा दोनों को एक साथ साधने वाली पत्रिका शायद ही कोई हो।

चकमक में जो चीज पच्चीस वर्षों में लगातार कायम रही है वह है बच्चों के अंदर बहुत चुपके से एक वैज्ञानिक दृष्टि को रोप देना। साथ ही साथ उनकी रचनात्मकता को भी आगे बढ़ाना। किसी भी रूप में। चित्र, खेल, विज्ञान के प्रयोग, छोटी कहानियाँ, पत्र यानि कि जो कुछ उनकी जिन्दगी में सहज घटता है। ‘चकमक’ की यह आत्मा पहले संपादक विनोद रायना से लेकर मौजूदा संपादक सुशील शुक्ल और शशि सबलोक ने यथावत रखी है । बाजार के दबाव, चिकने पेपर पर आकर्षित चित्रों की मांग को देखते हुए पिछले सात-आठ सालों में ‘चकमक’ ने नये प्रयोगों को भी बखूबी निभाया है। निश्चित रूप से पुराने कथा कॉलम कम हुए हैं तो कुछ नये जुड़े भी हैं। मौजूदा ‘चकमक’ थोड़े और बड़े यानि कि आठवीं क्लास तक के बच्चों की जरूरतों को भी पूरा करती है।



‘चकमक’ का हर अंक बेहद खूबसूरत साजसज्जा के साथ सामने आता है दिलीप चिंचालकर जैसे वरिष्ठ चित्रकार और कनक आदि के सहयोग से। हाल ही में प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को श्रद्धांजलि देते हुए जुलाई, 2011 अंक में उन पर बहुत सुन्दर सामग्री दी गई है। इतना खूबसूरत कवर हुसैन की पैंटिग्‍स पर शायद ही किसी पत्रिका ने निकाला हो। बच्चों की दुनिया में चित्रकार के जीवन को कैसे ले जाया जाए इसी उद्देश्य को सामने रखते हुए सुशील शुक्ल का लेख ‘एक चित्रकार था’ अद्वितीय कहा जा सकता है- ‘एक देश था। नहीं। एक चित्रकार था। वह घूमता रहता। गलियों में निकल जाता तो गलियों के साथ-साथ चलता चला जाता। नंगे पाँव चलने से गलियाँ उसके पाँव में लगती रहती।’ इतने बड़े चित्रकार की जीवनी ऐसी ही आत्मीयता और रचनात्मक भाषा में लिखी जा सकती है। इसी अंक में ‘हुसैन की कहानी अपनी जुबानी’ के भी कुछ अंश दिये हुए हैं। याद आ रहा है ऐसे ही एक अंक में कथाकार स्वयंप्रकाश द्वारा लिखा हुआ लेख- ‘जब गांधी जी की घड़ी चोरी चली गई।’ वाइस राय के साथ गांधी जी के छपे चित्रों के साथ इस कहानी को शुरू करते ही आप अधूरा नहीं छोड़ सकते । स्वयंप्रकाश पिछले दिनों से लगातार ‘चकमक’ में लिख रहे हैं। उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का बच्चों पर लिखा उपन्यास इसमें धारावाहिक रूप से छपा है और अब पुस्तक रूप में उपलब्ध है। नाटककार असगर वजाहत भी लगातार पिछले दिनों से हाजिर हैं। हिन्दी के जाने-माने कवि राजेश जोशी, देवी प्रसाद मिश्र, तेजी ग्रोवर, प्रभात से लेकर पुराने दिग्‍गज सहादत हसन मंटो, हरिशंकर परसाई, प्रेमचंद, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, संजीव लगातार इधर के अंकों में उपस्थित हैं। यानि कि नये रूप में पूरी पीढ़ी का रुख अपनी भाषा की ओर मोड़ती एक अनोखी पत्रिका।

यहाँ एक और अंक की याद आ रही है जिसमें हेलेन केलर के जीवन के कुछ अंश दिये गये थे। हेलन केलर प्रसिद्ध अमेरिकी लेखिका हैं जो दुर्भाग्‍य से डेढ़ वर्ष की उम्र में ही तेज बुखार से बहरी और अंधी हो गई थीं। उनकी शिक्षिका एनी सुलिवन की सूझबूझ और मेहनत ने उनको नया जीवन दान दिया। हेलेन केलर का यह कथन भूले नहीं भूलता कि हर स्वस्थ आँख वाले व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि यदि तीन दिन उसको दिखाई न दे तो कैसा लगेगा। ऐसी सैंकड़ों प्रेरणास्‍पद कहानियाँ ‘चकमक’ के अंकों में आ रही हैं। विज्ञान लेखक और ‘स्रोत’ के संपादक सुशील जोशी के लेखों के लिए भी य‍ह पत्रिका मेरी स्मृतियों में बसी हुई हैं। न्यूटन से लेकर बड़ी से बड़ी वैज्ञानिक घटनाओं, खोजों पर सुशील जोशी के लेख किस बच्चे में वैज्ञानिक बनने की जुंबिश पैदा नहीं कर देगें?

‘चकमक’ के तीन सौवें अंक पर बाल शिक्षा और वैज्ञानिक सोच के लिए समर्पित समस्त एकलव्य परिवार को हार्दिक बधाई।

चकमक- बाल मासिक पत्रिका
संपादक : सुशील शुक्ल, शशि सबलोक
एक प्रति : 30 रुपये, सालाना व्यक्तिगत सदस्यता 300 तथा संस्थागत सदस्यता 500, आजीवन : 4000 रुपये
पता : एकलव्य,
ई-10, शंकर नगर, बीडीए कॉलोनी, शिवाजी नगर,
भोपाल, मध्य् प्रदेश-462016.
फोन नं. 0755-4252927,2550976, 2671017.
फैक्स : 0755-2551108.

2 comments:

  1. इतने विस्‍तार से परिचय देकर आपने अंक के बारे में उत्‍सुकता बढा दी है। आज ही सुशील भाई को फोन लगाता हूं।

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    कब तक ढ़ोना है मम्‍मी, यह बस्‍ते का भार?
    आओ लल्‍लू, आओ पलल्‍लू, सुनलो नई कहानी।

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  2. तैलंग जी, कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटा दें, उससे काफी असुविधा होती है। उसे हटाने का तरीका यहां देखा जा सकता है।

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