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Wednesday, August 10, 2011

प्रकाश मनु का हास्य बाल नाटक -पप्पू बन गया दादा जी!

पिछली बार इस ब्लॉग पर आपने डॉक्टर प्रताप सहगल का बाल नाटक -अंकुर पढ़ा. इस बार प्रस्तुत है हिंदी के सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉक्टर प्रकाश मनु का हास्य बाल नाटक - पप्पू बन गया दादा जी!




बच्चों में बड़ों की नक़ल करने की नैसर्गिक प्रतिभा होती है और ऐसा करते हुए वे न केवल पूरे परिवार का स्वस्थ मनोरंजन करते हैं वल्कि इस माध्यम से वे अपनी दमित इच्छाओं की पूर्ति करने का रास्ता भी खोज लेते हैं. पर नाटक तो नाटक ही होता है, पटाक्षेप हुआ नहीं कि फिर वही ढाक के तीन पात.अच्छे बाल नाटकों का हिंदी में अभी भी काफी अभाव है और इस जेनर में जो अपना सार्थक अवदान दे रहें हैं उनमे प्रकाश मनु का नाम उल्लेखनीय है. उनके बाल नाटकों की चार पुस्तकें हाल में ही डायमंड बुक्स से प्रकाशित हो कर आई हैं. तो लीजिए, यहाँ प्रस्तुत है उनका हास्य बाल नाटक -पप्पू बन गया दादा जी!


पप्पू बन गया दादा जी!

-प्रकाश मनु




पात्र-परिचय
पप्पू की मम्मी
पप्पू के पापा
सोना दीदी
दादा जी

पहला दृश्य
(एक दिन पप्पू बैठा-बैठा पढ़ रहा था, तभी उसे कमरे के कोने में राखी दादा जी की छड़ी दिखाई दे गई)

पप्पू: (खुश होकर) अरे वाह, अब आएगा मजा. दादाजी अक्सर इस छड़ी से हम बच्चों को धमकाते हैं. आज ज़रा इस छड़ी से हम भी कुछ कमाल करें तो बन जाएगी बात.
(पप्पू दौड़ा-दौड़ा गया, झट दादा जी की छड़ी उठा लाया . फिर उसे हाथ में पकड़कर बड़े रोब से सामने वाले कमरे की आरामकुर्सी पर बैठ गया. पास में ही मेज पर रखा दादा जी का चश्मा भी उसने उठाकर पहन लिया)
पप्पू: (हवा में हाथ लहराकर) अरे वाह, मैं तो सचमुच दादा जी बन गया! एकदम दादाजी बन गया! ...क्या बात है, हा-हा-हा!
पप्पू: (थोड़ी देर बाद अपने आप से) पर भाई, अभी एक कमी है - अखबार! दादा जी को तो जब भी देखो, चश्मा लगाए अखबार पढते नज़र आते हैं. भला बगैर अखबार के मैं दादा जी कैसे लगूंगा?
(पप्पू कुछ देर सोचता है. फिर एकाएक हवा में चुटकी बजाते हुए उठा...)
पप्पू: (हंसकर) चलो इसका भी कुछ इंतजाम करते हैं,
(पप्पू दौड़ा-दौड़ा गया, ड्राइंगरूम से अखबार उठा लाया. फिर आरामकुर्सी पर बड़ी शान से बैठकर अखवार पढ़ने लगा)

दूसरा दृश्य

(थोड़ी देर बाद सोना दीदी आई. पप्पू को देखकर हैरान हो गई)

सोना दीदी: (अचरज के मारे आँखें फैलाकर) अरे वाह, पप्पू, वाह! तेरे भी क्या ठाट हैं.
पप्पू: (दिखावटी गुस्से से) क्या पप्पू-पप्पू कर रही हो, दादा जी नहीं कह सकती? पता नहीं क्या हो गया है आजकल के बच्चों को? मैनर्स तक नहीं हैं, मैनर्स तक. ये बच्चे क्या करेंगे पढ़-लिखकर?...राम-राम हे राम. मेरा तो दिल दुखी हो गया इन बच्चों को देखकर. ये बड़े होकर क्या करेंगे? बहू, ओ बहू, कुछ इन बच्चों को अच्छी सीख भी देती हो या बस यों ही...?
(सोना दीदी का हँसते-हँसते बुरा हाल था. वह दौडी-दौडी गई, मम्मी को बुला लाई. मम्मी भी हैरान...)
मम्मी: (मुस्कराते हुए) यह क्या पप्पू? क्या किसी नाटक की तैयारी है?
पप्पू: (बिलकुल दादा जी वाले स्टाइल में, आवाज को थोडा भारी बनाकर) अरे बहू, तंग न किया करो. मैंने बोल दिया ना, अभी खाना नहीं खाना, अखबार पढ़ रहा हूं. हां, चाहो तो जरा सा दूध और साबूदाने की खिचड़ी दे दो! खिचड़ी अभी गरम गरम बनाई है न? कहीं ज्यादा नमक तो नहीं डाल दिया? कई बार तो बहू, तुम भी...! खैर जाओ. मुझे अखबार पढ़ना है.
मम्मी: (गुस्से में) ओ पप्पू, अब नाटक बंद कर. अभी दादा जी आएँगे, तो खूब खबर लेंगे.
पप्पू: (उसी अदा से) बहू, बोल दिया न, मेरा सिर न खाओ. वैसे ही मैं परेशान हूं. उफ़, आजकल के ये बच्चे...! और ऊपर से ये बहुएं! किसी को चिंता ही नहीं है.
पप्पू की मम्मी: चल, तेरे पापा को भेजती हूं. आकार तुझे सीधा करेंगे.
(इतने में दादा जी भी आ गए. वे नहाने गए थे. लौटकर आए तो पप्पू का स्वांग देखकर दंग रह गए.)
दादा जी: (मनुहार करते हुए) मेरे प्यारे पप्पू, ला मेरी छड़ी, ला मेरा चश्मा, जरा मंडी हो आऊँ.
पप्पू: ओह, कर दिया न मूड खराब! भाई मुन्ने, यह पांच रुपये का सिक्का ले जा, बाजार से टाफियां-वाफियाँ ले लेना. देख नहीं रहा, कितनी जरूरी खबर है. प्राइम मिनिस्टर ने बोल दिया है, हमें देश का चौतरफा विकास करना है. कितनी जरूरी खबर है और ऊपर से...जा भाई मुन्ने, जा. बाहर जाकर खेल.
(कहकर पप्पू फिर अखबार पढ़ने वाले पोज में आ गया)
दादा जी : गुस्से में आकार) ठहर, अभी निकालता हूं तेरी जरूरी खबर! ला, दे मेरी छड़ी और चश्मा.
(पप्पू अभी कुछ और कहने वाला था कि इतने में पापा आ गए. मम्मी ने वाकई उनके पास जाकर शिकायत कर दी थी.)
पापा: (रोबदार आवाज में) ओ पप्पू, यह क्या नाटक हो रहा है? तू दादा को क्यों तंग कर रहा है?
(पापा की कड़क आवाज सुनी तो पप्पू के होश फाख्ता हो गए. झटपट मेज पर चश्मा और छड़ी रखकर बाहर दौड गया.)

तीसरा दृश्य

(कुछ देर बाद पप्पू धीरे-धीरे संभल-संभलकर कदम रखता और चोकन्ने होकर आसपास की खबर लेता घर आया. लौटकर आया तो देखा, दादा जी चश्मा पहने अखबार पढ़ रहे हैं. पास में छड़ी रखी है. और मूड बढ़िया है.)
पप्पू: (धीरे से चलकर दादा जी की कुर्सी के पास खड़ा होकर) सॉरी दादा जी, मै नाटक कर रहा था. आपने बुरा तो नहीं माना?
दादा जी: (हँसते हुए) कुछ भी कहो, टू एक्टिंग में उस्ताद है पप्पू! पांच साल के मुन्ने से लेकर सत्तर साल तक के बुड्ढे तक का रोल खूब बढ़िया कर सकता है.
पप्पू: (अविश्वास से) सच्ची दादा जी , सच्ची?
दादा जी: (उत्फुल्ल मुद्रा में) हां, सच्ची!
(कहकर दादा पप्पू की पीठ थपथपाते हुए जोर से हँस पड़ते हैं. हँसते-हँसते दादा जी की मूंछे अजब ढंग से फडफडाने लगती हैं.)
पप्पू: (अपने आप से) तो इसका मतलब, दादा जी खुश हैं, बहुत खुश!
पप्पू: (चेहरे पर खुशी की चमक) अरे वाह, फिर तो मैं पास हो गया!
(कहकर पप्पू उछल पड़ा. फिर हँसते-हँसते मम्मी को यह बताने के लिए दौड पड़ा.)

पर्दा गिरता है.



image courtesy: google search

3 comments:

  1. वाह भाई साहब . ये हुई न बात . बहुत ही मजेदार रोचक नाटक के लिए आप दोनों को बधाई .

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  2. सच बड़ा रोचक लगा नाटक.....

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  3. प्रकाश मनु का नाटक पप्पू बन गया दादा जी पढ़ कर अनायास मुझे अपनी कविता मुन्ना बन बॆठा दादा जी याद हो आई हऎ। यह कविता मेरी पहली प्रकाशित बाल कविता हॆ जो धर्मयुग ( १२ फरवरी, १९७८) में प्रकाशित हुई थी ऒर इसी वरः पांजाबे शिक्षा बोर्ड की पाठय पुस्तक हिन्दी पुस्तक में भी सम्मिलित कर ली गई थी। यह मेरी पहली बाल कविता पुस्तक ’जोकर मुझे बनादो जी’ में भी हॆ जिसका अगला संसकरण ’अगर पेड़ भी चलते होते’ शिर्षक से आया था ऒर प्रकाश मनु द्वारा चयनित मेरी कविताओं की पुस्तक एक सॊ एक बाल कविताएं में भी हॆ। कविता इस प्रकार हॆ: दादा जी की लेकर ऎनक/ जम गए मुन्नाअ ले अखबार/ खोज-खोज कर हारे दादा/ कोस रहे थे हो लाचार। नज़ पड़ी जब मुन्ने पर तो/दॊड़े लेकर मोटी सोटी,/’ठहर, तुझे बतलाता हूं मॆं/अक्ल हुई हॆ बिलकुल खोटी!’ झट से ऊँगली रख होंठों पर / मुन्ने ने उनको समझाया,/ ’मॆं हूं दादा, तुम हो मुन्ना/ ऊधम तुमने बड़ा मचाया?’/ ’लो यह दस पॆसे का सिक्का/जाकर अपनी मॊज मनाओ/मुझको पढ़ने भी दो बाबा/इतना अब ना शोर मचाओ।’

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