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Saturday, August 13, 2011

एंड्रयू लैंग की क्लासिक रचना प्रिंस प्रिजियो का हिंदी रूपांतर


एंड्रयू लैंग -परिचय


३१ मार्च, १८४४ को सेल्किर्क में जन्मे. एडिनबरो, ग्लास्स्गो और आक्सफोर्ड में शिक्षा पाई. पत्रकार, कवि, इतिहासकार, जीवनी लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रियता लोक कथाओं के संकलन तैयार करने से मिली. विश्व की प्रसिद्ध लोककथाओं का पहला संकलन "ब्ल्यू फेयरी टेल बुक" शीर्षक से सन १८८९ में क्रिसमस के अवसर पर प्रकाशित हुआ. पुस्तक बहुत पसंद की गई. फिर तो हर वर्ष इसी अवसर पर लैंग लोककथाओं का नया संग्रह प्रस्तुत करते गए और इस श्रंखला पर लैंग लोककथाओं का नया संग्रह प्रस्तुत करते गए और इस श्रंखला में उनकी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हुईं. इनके अतिरिक्त यूनान और रोम की लोककथाओं पर एक संग्रह अलग से पुस्तक रूप में आया. आलोचक लैंग को दुनिया में लोककथाओं के सबसे बड़े संग्रहकर्ता के रूप में मानते हैं. यहाँ हम उनके प्रसिद्ध बाल उपन्यास "प्रिंस प्रिजियो" का संक्षिप्त कथा-सार दे रहे हैं. यह उपन्यास सन १८८९ में छपा था.

एंड्रयू लैंग का निधन २० जुलाई, १९१२ को हुआ था.

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प्रिंस प्रिजियो


पंटोफिला की रानी ने बेटे को जन्म दिया तो वह उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी. क्योंकि विवाह के अनेक वर्ष बीत जाने के बाद ही राज्य के उत्तराधिकारी ने जन्म लिया था. उन दिनों भी आज की तरह परियां आकाश में रहती थीं, लेकिन किसी के बुलाने पर वे झट धरती पर उतर आया करती थीं. कोई प्रश्न कर सकता है कि तब आज परियां धरती पर उस तरह क्यों नहीं आतीं. हम उन्हें देख क्यों नहीं पाते?

इसका उत्तर है उन दिनों लोग आम तौर पर परियों को सच मानते थे, इसलिए वे धरती के लोगों से निकट संबंध बनाए रखती थीं. अगर आज हम उन्हें नहीं देख पाते तो इसलिए कि ज्यादातर लोग परियों को कपोल कल्पना मानते हैं. इसलिए परियां भी हमसे दूर-दूर रहती हैं. वैसे वे आज भी रोज धरती पर उतरती हैं दुखियों की सहायता के लिए, लेकिन यह सब वे अदृश्य रहकर करती हैं.

पंटोफिला के राजा की दादी थी सिंड्रेला. उसकी कहानी हम सभी जानते हैं. सिंड्रेला परी की मदद से ही रानी बन सकी थी. राजा परियों को सच मानता था इसलिए परियां भी उसके बुलाने पर आ जाती थीं. लेकिन रानी परियों को कल्पना मानती थी. इसलिए जब राजा ने बेटे के नामकरण समारोह में परियों को निमंत्रण देने की बात कही तो रानी झट बोली-"यह क्या मनगढंत बातें कर रहे हैं आप. परियां अगर होती भी हैं तो किस्से-कहानियों में."

राजा जानता था रानी से बहस करना बेकार है. वह चुप रह गया. उसने चुपचाप परियों को निमंत्रण भेज दिया. परीलोक से परियां नवजात शिशु के लिए तरह-तरह के जादुई उपहार लेकर आईं . राजा ने परियों का स्वागत किया. लेकिन रानी ने तो जैसे परियों को देखकर भी नहीं देखा. परियों ने उपहार मेज पर रख दिए और चुपचाप चली गईं. रानी की इस उपेक्षा से एक परी नाराज हो गई. उसने राजा से कहा-"तुम्हारा बेटा दुनिया में सबसे ज्यादा चतुर होगा." राजा सोचता रह गया - परी ने उसके बेटे को वरदान दिया है या शाप."

परियों के जाने के बाद रानी ने उपहार देखे तो भुनभुना उठी - मेज पर रखा था एक छोटा सा बटुआ - उसमे तीन सिक्के थे, एक जोड़ी जूते, दो छोटी-छोटी टोपियां, जादुई जल से भरा एक पात्र और एक छोटा सा गलीचा. देखने में ये सभी चीजें अत्यंत साधारण लगीं रानी को. दूसरी तरफ बाहरी विशाल कक्ष में राजा के मंत्रियों और दरबारियों द्वारा लाए गए शानदार उपहार रखे थे. रानी ने परियों के लाये हुए उपहारों को कोने वाली कोठरी में रखवा दिया और फिर समारोह में व्यस्त हो गई.

लड़के का नाम रखा गया राजकुमार प्रिजियो. उसके बाद रानी ने दो बेटों को और जन्म दिया. उनके नामे थे अल्फांसो और एनरिको. लेकिन प्रिजियो सबसे अलग था. वह छुटपन में ही ऐसी चतुराई भरी बातें कर्ता कि लोग दांतों तले उंगली दबाए देखते रह जाते. वह हर किसी को नई-नई बातें बताता. कभी-कभी अपने पिता से ऐसे प्रश्न पूछता कि उनके लिए उत्तर देना कठिन हो जाता. धीरे-धीरे सबको महसूस होने लगा जैसे प्रिजियो उनकी हंसी उड़ाता है. और तो और उसके पिता भी यही सोचने लगे. लोग प्रिजियो के सामने बोलने से भी घबराने लगे. मंत्री और दरबारी अंदर ही अंदर उससे चिढने लगे, क्योंकि दरबारी राजा से प्रिजियो की झूठी शिकायतें बार-बार वह उनकी गलतियाँ बताकर उन्हें लज्जित करता है तो न जाने राजा बनकर वह उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा.

दुष्ट मंत्री और दरबारी राजा से प्रिजियो की शिकायतें करने लगे. वे कहते-"महाराज, हो सकता है, प्रिजियो समय से पहले ही राज्य पर अधिकार करने की कोशिश करे. आप सावधान रहें."

आखिर राजा भी सोचने लगे -"क्या प्रिजियो के स्थान पर उसके किसी छोटे भाई को युवराज बनाना चाहिए."

उन्ही दिनों एक बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई. राजधानी में एकाएक गर्मी बहुत बढ़ गई. फसलें झुलस गईं. पेड़ सूख गए, पानी ज़मीन में कहीं गहरे उतर गया. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था. पता चला, केवल राजधानी में ही नहीं सारे राज्य में गर्मी लगातार बढ़ती जा रही है. दूर-दूर से लोग सहायता मांगने राजा के पास आने लगे.

पता चला, पहाड़ों के बीच एक गहरी घाटी में एक विचित्र पक्षी उड़ता दिखाई देता है. उसकी चोंच से धुआं निकलता है, पंखों से अंगारे झरते हैं - यह आफत उसी के कारण आई है. पहाड़ पर पेड़ झुलस कर काले पड़ गए हैं. वन्य जीव व परिंदे तो कब के मर चुके हैं. ऊँचे पहाड़ों से गिरने वाला झरना सूख गया है. लोगों ने कहा -"उस अग्निपक्षी को मारने से ही प्राण बच सकते हैं." राजा ने सोचा -"अगर वह भयानक पक्षी उड़ता हुआ राजधानी के ऊपर आ गया तब ओ न जाने क्या अनर्थ हो जाएगा.

मंत्री ने राजा से कहा - "महाराज, राजकुमार प्रिजियो की चतुराई की परीक्षा लेनी चाहिए. क्यों न उसे ही अग्निपक्षी को मारने के लिए भेजा जाए." राजा ने कहा -"बुलाओ प्रिजियो को."

प्रिजियो आया . उसने पिता का आदेश सुना. कुछ सोचा, फिर बोला -"पिताजी, मैंने ऐसे अनेक कथाएं पढ़ी हैं जिनमें सबसे छोटा बेटा ही दैत्य को मारता है. क्यों न आप एनरिको को अग्निपक्षी से लड़ने के लिए भेजें. मेरा मन कहता है, अभी मुझे नहीं जाना चाहिए." वैसे भी अग्निपक्षी केवल कल्पना ही है."

राजा ने कहा -"तुम कायर हो, मैं तुम्हें राजपाट नहीं दूंगा." राजा के कहने पर एनरिको को अग्निपक्षी से युद्ध करके उसे मारने के लिए भेजा आया. एनरिको गया, लेकिन कभी लौटकर नहीं आया.

राजा फूट-फूटकर रोया. सबने कहा -प्रिजियो स्वार्थी है, कायर है. राजा ने कहा -"प्रिजियो, अब तुम्हें जाना है. पर उसने कहा -"पिताजी अल्फांसो से कही. अगर वह नहीं मार सका तब मैं जाऊंगा. मैं आपसे फिर कहता हूं, अग्निपक्षी एक कपोल कल्पना है."

राजा ने कहा -"तुम मेरे बेटे नहीं, मेरे शत्रु हो. अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता." इसके बाद राजा ने अल्फांसो को अग्निपक्षी से लड़ने भेजा, पर वह भी लौटकर नहीं आया.

राजा ने घोषणा करा दी-"प्रिजियो आज से मेरा बेटा नहीं रहा." इसके बाद राजा उस नगर को छोड़कर पास के दूसरे नगर में चले गए. उनके साथ रानी, मंत्री,दरबारी, राजधानी के सब बड़े व्यापारी और महल के नौकर चाकर, सब चले गए. राजा के आदेश पर राजमहल को पूरी तरह खाली कर दिया गया. बच गए मुठ्ठी भर साधारण जन और विशाल महल में अकेला राजकुमार प्रिजियो.

प्रिजियो ने देखा महल में न खाने को भोजन था, न पहनने को कपडे. उसके पिता ने नाराज हो कर प्रिजियो को महल में भूखों मरने को छोड दिया था. प्रिजियो विशाल राजमहल के हर कमरे में देखता फिरा, पर कहीं कुछ नहीं था. आखिर भटकता हुआ वह एक छोटी-सी अँधेरी कोठरी में पहुंचा. वहाँ उसे कुछ चीजें पड़ी मिलीं. सब पर धूल जमी थी. ये परियों के वही उपहार थे जिन्हें रानी ने उस कमरे में फेंक दिया था.

प्रिजियो ने सोच -"चलो कुछ तो मिला." वह उन चीजों को उठा-उठाकर देखने लगा. उसने जूते उठाए और पैरों में पहन लिए. एक टोपी सिर पर लगा ली. बटुवे में तीन सिक्के देखकर वह हंस पड़ा. उसकी समझ में न आया कि ये चीजें वहाँ कौन लाया होगा. प्रिजियो कमरे से बाहर निकल आया. उसे जोरों की भूख लग रही थी, लेकिन महल में तो खाने को एक दाना भी नहीं था. एक बार मन में आया कि वह नगर में चला जाए, वहां कुछ न कुछ तो मिल ही जाएगा पेट भरने के लिए. फिर सोचा-क्या यह ठीक रहेगा! क्या इस तरह उसके पिता की बदनामी नहीं होगी. लोग कहेंगे - देखो-देखो कैसा अन्यायी राजा है, जो अपने युवराज बेटे को भूखों मरने के लिए छोड़ गया है.

प्रिजियो को याद आ रहा था वः पिछले वर्ष ग्ल्कस्टिन नगर में घूमने गया था. वेश बदलकर. उसने वहाँ एक भोजनालय में स्वादिष्ट भोजन किया था, आम लोगों के बीच बैठकर. वाह, कितना मजा आया था. काश, इस समय भी कुछ वैसा ही खाने को मिल जाए तो..." वह सोच रहा था, और तभी उसने देखा, वह उसी भोजनालय के सामने खड़ा था, जिसके बारे में उसने सोचा था.

वह चकित रह गया कि वहाँ कैसे आ गया. असल में प्रिजियो के पैरों में परी लोक से आए इच्छा-जूते थे. वे पल भर में पहनने वाले को कहीं भी पहुंचा सकते थे. लेकिन प्रिजियो भला इसे क्यों मानता. अपनी मां की ऐसे बातें सुन-सुनकर ही वह बड़ा हुआ था कि जादू नहीं होता. परियां तो बस कहानियों में ही होती है इसलिए प्रिजियो भी परियों पर विश्वास नहीं करता था.

प्रिजियो बड़बड़ाया -"क्या मैं सपना देख रहा हूं." जो कुछ वह देख रहा था, उस पर प्रिजियो को विश्वास नहीं हो रहा था. लेकिन सच में तो यह परियों के उपहारों काही चमत्कार था. क्योंकि उसने जादुई जूते पहन रखे थे जो पहनने वाले को इच्छानुसर पल भर में कहीं से कहीं ले जा सकते थे.

तभी प्रिजियो नीचे झुका और जादुई टोपी उसके सिर से गिर गई. तुरंत भोजनालय में शोर मच गया - अरे देखो! हमारे बड़े राजकुमार लोग घबराते हुए राजकुमार के सामने झुकने लगे. यह देखकर राजकुमार को अजीब लगा, क्योंकि वह तो काफी देर से भोजनालय में खड़ा था. लेकिन तब किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया, फिर एकाएक सिर से टोपी गिरते ही लोग उसका
नाम पुकारने लगे थे. तो क्या टोपी में कुछ जादू था? या फिर उन जूतों में जो सोचते ही उसे वहां ले आए थे?

राजकुमार प्रिजियो ने फिर से टोपी पहन ली. इसके बाद भोजनालय में मौजूद लोगों के चकित स्वर सुनाई देने लगे -"अरे, राजकुमार एकाएक कहां गायब हो गए? अभी-अभी तो वह यहीं थे. यह क्या हुआ!

राजकुमार प्रिजियो स्वयं चकित था, लेकिन वह इतनी आसानी से चमत्कार वाली बात मानने को तैयार नहीं था. उसने सोचा -"काश, मैं इस समय मां के पास होता, तो उनसे सलाह ले पाता कि यह क्या चक्कर है. शायद वह कुछ बता सकें."

लेकिन प्रिजियो जानता था कि उसकी मां नए नगर की राजमहल में मौजूद थीं, जहां उसके जाने पर रोक थी. हालांकि रानी मां अपने बेटे से बहुत प्यार करती थीं, लेकिन प्रिजियो के अजीब विचारों ने उसके पिता को बहुत ही नाराज कर दिया था.लेकिन अगले ही पल प्रिजियो ने एक कमरे में बैठी आंसू बहती अपनी मां को देखा. वह सुबकती हुई कह रही थी -"पता नहीं महल में प्रिजियो का क्या हाल होगा? काश मैं उसकी कुछ मदद कर सकती." और फिर रानी की सिसकियाँ हवा में गूंजने लगीं."

तभी प्रिजियों ने सिर से टोपी उतार ली और फिर रानी आश्चर्य से चीख उठी -"प्रिजियो, तुम कहां थे, कब आ गए! क्या तुम्हें किसी ने नहीं रोका?" और अगले ही पल मां ने बेटे को गले से लगा लिया.

तब प्रिजियो ने मां को पूरी घटनाएं कह सुनाईं उसने कहा -माँ, मैं चाहता हूं तुम इन विचित्र घटनाओं के बारे में मुझे बताओ. क्या जो कुछ घट रहा है, वह सपना है या सच?"

तब प्रिजियो की मां ने भी जादुई टोपी लगाकर शीशे में देखा तो वह स्वयं को नहीं देख पाई. उसने कई बार जादुई टोपी को उतारा और पहनकर देखा और हर बार गहरे आश्चर्य में डूब गई.

जो कुछ हो रहा था, वह विचित्र और विश्वास करने लायक नहीं था, लेकिन फिर भी वह सच था, इस बात से रानी इनकार नहीं कर सकती थी.

पूछने पर उसने प्रिजियो को उसके जन्म के बाद वाली घटना बता दी और माना कि प्रिजियो को महल की पुरानी कोठरी में जो चीजें मिली थीं, उन्हें उसने स्वयं ही कोठरी में बेकार की वस्तुएँ मानकर फेंक दिया था. और फिर उस बारे में सब कुछ भूल गई.

इसके बाद प्रिजियो अपनी मां के साथ काफी समय तक इस बारे में विचार करता रहा. आखिर रानी ने हिचकिचाते हुए कहा-"बेटा प्रिजियो, आज मुझे पहली बार लग रहा है कि शायद परियां एकदम कपोल कल्पना नहीं है. हो सकता है उनके अस्तित्व भी हो."

प्रिजियो ने कहा-"मां में भी यही सोचता हूं कि हम दुनिया के सारे रहस्यों के बारे में नहीं जानते. अन्यथा इन जादुई जूतों और अद्रश्य कर देने वाली टोपी के बारे में तुम क्या कहोगी."

रानी मां ने कहा -"बेटा, अगर यह बात सच हो तब तो अग्निपक्षी का होना भी संभव है और..." इसके बाद रानी चुप हो गई. वह अग्निपक्षी को मारने गए अपने दोनों छोटे बेटों के बारे में सोच रही थी जो अब तक लौटकर नहीं आए थे.और स्वयं प्रिजियो भी वही बात सोच रहा था-क्या मैंने जानबूझकर अपने दोनों भाइयों को मौत के मुंह में भेज दिया. आखिर क्यों? वह एकाएक बोला -"माँ, मैं अल्फांसो और एनरिको की खोज में जाना चाहता हूं.

"हां, अगर परियों के उपहार जादुई हैं तो फिर अग्निपक्षी भी सच हो सकता है." रानी ने उदास स्वर में कहा -"न जाने मेरे दोनों बेटों का क्या हाल होगा."

"माँ, मैं अग्निपक्षी की खोज में जा रहा हूं- और दोनों छोटे भाइयों की भी खोज करूँगा. मुझे आशीर्वाद दो माँ. कहकर प्रिजियो ने मां से विदा ली. उसने जादुई टोपी सिर पर लगा रखी थी और पैरों में विशेष जूते थे जो इच्छा करते ही व्यक्ति को मनचाही जगह पहुंचा सकते थे.

कुछ देर बाद राजकुमार प्रिजियो एक पहाड़ी के शिखर पर खड़ा था. नीचे घाटी भयानक अग्निकुंड बनी हुई थी. उसी अग्निकुंड के ऊपर अग्निपक्षी उड़ रहा था. उसके विशाल पंखों से अंगारे झर रहे थे, चोंच से लपटें और धुआं उठ रहा था. हवा में गरम लहरें उठ रही थीं. दूर-दूर तक हरियाली का नाम निशाँ नहीं था.

प्रिजियो समझ गया था कि अग्निपक्षी के सामने कोई टिक नहीं सकता. "तब मुझे क्या करना चाहिए?" इसी सोच में डूबा हुआ राजकुमार प्रिजियो परेशान हो उठा. वह जादुई जूतों के सहारे हवा में ऊंचा उठ गया. उसके कानों में एक विचित्र शब्द गूंज रहा था -"रमोरा-रमोरा."

"यह रमोरा कौन है, कहां है. मैं उसे देखना चाहता हूं." राजकुमार प्रिजियों ने जैसे यह खुद से कहा. और अगले ही पल वह एक ऊँचे पर्वत पर खड़ा था-वहां भयानक ठण्ड थी. सब तरफ जमीन बर्फ से ढंकी थी. गुफाओं से एक आवाज आ रही थी-"अग्निपक्षी. मैं रमोरा हूं -हिम दानव! मैं उसकी आग को जमा दूंगा, उसे समाप्त कर दूंगा.

प्रिजियो के होंठों पर एक मुस्कान आ गई. वह सोचने लगा-अगर हिम दानव रमोरा और अग्निपक्षी आपस में भिड़ जाएं तो शायद...उसने जोर से कहा-"हिम दानव रमोरा. अग्निपक्षी ने कहा है-तुम उससे डरते हो. अगर वह आ गया तो तुम पिघलकर बह जाओगे."

"आने दो अग्निपक्षी को. एक गुफा में उसकी समाधि बन जाएगी." रमोरा की आवाज आई.

"अग्निपक्षी आ रहा है. युद्ध को तैयार हो जाओ." प्रिजियो ने कहा.

"तुम कौन हो मुझे दिखाई क्यों नहीं देते?" रमोरा की ठंडी आवाज आई. जब हिम दानव बोलता तो भयानक तूफानी हवा बहने लगती थी और फिर हिमपात होने लगता.

प्रिजियो ने हिम दानव की बात का कोई जवाब नहीं दिया. वह अदृश्य रहकर अग्निपक्षी वाली घाटी के ऊपर पर्वत शिखर पर जा खड़ा हुआ उसने जोर से कहा -"अग्निपक्षी सुनो! पहाड़ों के पार हिम दानव रमोरा लड़ने को तैयार है. लेकिन तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे. वह तुम्हारी ज्वालाएँ बुझाकर तुम्हे हिम में बदल देगा."

प्रिजियो की इस बात ने अग्निपक्षी को उत्तेजित कर दिया. वह आग की घाटी से ऊपर उठा, और अपने विशाल पंखों को झटकारा तो दूर-दूर तक अंगारे बिखर गए. सब तरफ धुआं फ़ैल गया. गरम हवा बहने लगी. फिर अग्निपक्षी हिम में ढंके पर्वत शिखरों की तरफ उड़ चला. आकाश से अंगारे बरस रहे थे. झुलसाने वाली तेज हवा बह रही थी.

प्रिजियो अदृश्य रहकर अग्निपक्षी और हिम दानव की लड़ाई देखने लगा-अग्निपक्षी की गर्मी से हिम दानव पिघलने लगा. पर्वत शिखरों पर जमी बर्फ पिघलकर बहने लगी. अग्निपक्षी की गर्मी से हिम दानव पिघलने लगा. पर्वत शिखरों पर जमी बर्फ पिघलकर बहने लगी. अग्निपक्षी की गर्मी से हिम दानव की देह पिघलने लगी थी.

लेकिन यह तो लड़ाई की शुरुआत थी. एकाएक हिम दानव ऊपर उछला -"आकाश में जैसे बर्फ की चादर तन गई. अग्निपक्षी के पंखों से झरते अंगारे बुझ कर काली-काली चट्टानों की तरह नीचे गिरने लगे - उसकी चोंच से निकलने वाली आग की लपटें बुझने लगीं.

"अग्निपक्षी, मरने को तैयार हो जा. अब तू अग्निपक्षी नहीं, हिम पक्षी बन जाएगा." रमोरा की आवाज गूंजी और अग्निपक्षी थककर आकाश से नीचे गिरने लगा. उसके पंखों पर हिमकन जमते जा रहे थे. तभी अग्निपक्षी ने अपने पंख झटकारे. सब तरफ अंगारों की बौछार होने लगी-उसके पंखों पर जमती बर्फ पिघलकर बूंदों के रूप में नीचे गिरने लगी. "मैं जीत गया." अग्निपक्षी ने कहा.

"नहीं, अभी नहीं..." हिम दानव ने कहा और फिर से ठंडी हवा बह चली. बर्फ का पिघलना रुक गया. जगह-जगह बर्फ दोवारा जमने लगे. ऐसा कई बार कभी लगा कि अग्निपक्षी हिम दानव

को पिघलाकर समाप्त कर देगा, तो कभी ऐसा मालूम दिया कि हिम दानव ने अग्निपक्षी को हिम पक्षी में बदल दिया.

लड़ाई चलती रही -अग्निपक्षी और हिम दानव दोनों ही थकते चले गए फिर अग्निपक्षी थककर चट्टानों पर जा गिरा.

आग का फब्बारा सा छूटा, सब तरफ अंगारे बिखरे और फिर बुझ गए. अग्निपक्षी मर गया था. लेकिन हिम दानव भी नहीं बच सका. दोनों ने एक दूसरे का काम तमाम कर दिया था. आज भी उस युद्ध के अवशेष दो पहाडियों पर मौजूद हैं. एक पहाड़ पर हिम का विशाल पक्षी बना हुआ है-वही है अग्निपक्षी जिसका शरीर बर्फ बन गया है. पास में ही एक झील है. यह पहले हिम दानव था जो अग्निपक्षी की गर्मी से पिघलकर पानी की झील में बदल गया.

अब मौसम एकाएक ठीक हो गया था-न बहुत गर्मी थी, न ज्यादा ठण्ड, अग्निपक्षी और हिम दानव रमोरा दोनों का आतंक समाप्त हो चुका था. लेकिन अभी राजकुमार प्रिजियो का असली काम पूरा नहीं हुआ था. क्योंकि अभी एनरिको और अल्फांसों को ढूँढना बाकी था. आखिर प्रिजियो के दोनों छोटे भाई कहां थे?

पहले प्रिजियो ने दोनों को हिम दानव वाले क्षेत्र में ढूँढा. वहां सब तरफ बर्फ की चादर बिछी थी. उसे कैसा भी कोई संकेत नहीं मिला और फिर वह अग्निपक्षी वाली घाटी के पास आया, जहां अब पहले जितनी भयानक गर्मी नहीं थी. घाटी में जलती आग कब की बुझ चुकी थी.

वहीँ पहाड़ी पर एक जगह उसे राख की दो ढेरियाँ पास-पास दिखाई दीं. हर ढेर के पास एक तलवार जमीन पर पड़ी थी. प्रिजियो ने तलवारें उठाईं तो उन पर एनरिको और अल्फांसो के नाम खुदे दिखाई दिए. वह समझ गया कि उसके दोनों भाई अग्निपक्षी के पास पहुंचकर राख के ढेर में बदल गए थे. अब इसमें कोई संदेह नहीं था.

प्रिजियो ने अपने थैले से जल का पात्र निकला जो उसे महल की कोठरी में मिला था. उसने जल की कुछ बूँदें बारी-बारी से राख की दोनों ढेरियों पर डाल दीं. जैसे चमत्कार हुआ. राख की ढेरियाँ गायब हो गई. वहां एनरिको और अल्फांसो खड़े नजर आने लगे. तीनों भाई गले मिले.

एनरिको और अल्फांसो के साथ प्रिजियो नए नगर में आ गया. लेकिन महल में नहीं गया. उसने अल्फांसो और एनरिको को पूरी बात बता दी. कहा - "पिताजी मुझसे नाराज हैं. मैं वहीं जा रहा हूं जहां उन्होंने मुझे अकेला छोड़ा था." फिर प्रिजियो राजधानी के सुनसान महल में चला गया. उसने जादुई टोपी और जूते उतारे और उसी कोठरी में रख दिए जहां से उन्हें उठाया था.

अब तक प्रिजियो बहुत थक चुका था. वह अपने कमरे में पलंग पर जा लेटा और गहरी नींद में डूब गया.

उधर एनरिको और अल्फांसो को जीवित लौटा देख, राजा और रानी बहुत प्रसन्न हुए. उन्हें पता चल गया कि वह चमत्कार प्रिजियो ने ही किया था. उसी क्षण राजा ने राजधानी लौटने का आदेश दिया. सबसे पहले राजा-रानी एनरिको और अल्फांसो के साथ राजधानी लौट आए.

राजा ने कमरे में प्रिजियो को सोते हुए देखा तो सिरहाने बैठकर उसके माथे पर हाथ फिराने लगा. राजा ने कहा-"प्रिजियो मेरे बेटे, मुझे माफ कर दो. रानी भी वहां खड़ी आंसू बहा रही थी."

तभी प्रिजियो की नीद टूट गई. वह हडबडाकर उठा. उसने कहा -"पिताजी, क्या बात है? आप सब यहाँ क्यों खड़े हैं? और मां क्यों रो रही है?"
राजा ने कहा -"बेटा, तुम अपने दोनों भाइयों को मौत के मुंह से लौटा लाए हो..."

सुनकर प्रिजियो जोर से हंसा. उसने कहा -"पिताजी, आप सुबह-सुबह यह क्या कहानी सुना रहे हैं मुझे?"

उन्होंने सच कहा था - उसी पल राजा-रानी, स्वयं प्रिजियो, एनरिको, अल्फांसो पुराणी सब बातें भूल गए. किसी को पिछला कुछ यद् न रहा. सब को लगा कि वे अभी भरपूर नीद लेकर उठे हैं.

लेकिन वे खुश थे. वहाँ नहीं थे. न जाने उन्हें कौन ले गया था.

पता नहीं परियां हैं या नहीं, पर उनकी कहानियां तो आज भी हम सभी कहते-सुनते हैं.

-रूपांतर प्रस्तुति : देवेन्द्र कुमार : रमेश तैलंग


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