Translate

Thursday, September 15, 2011

मेरी कुछ नयी बाल/किशोर कवितायें

खींच लो जुबान उसकी

आस-पास नज़र रखो
लोगों की खबर रखो
कौन अजनबी कहां घात है लगा रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा.

छोड़कर निशानियां
फूट की. जो आए दिन,
गढ़ रहे कहानियां
झूठ की जो आए दिन,
उनका चिटठा खोलो,
क्या है सच्चा, बोलो,

खींच लो जुबान उसकी जो है बरगला रहा.
सावधान. वक्त आज तुमको जगा रहा.

पथ है अनजाना तो
कुछ डर भी होंगे ही,
हर सवाल के लेकिन
उत्तर भी होंगे ही,

जिन्हें तुम्हे पाना है,
हौसला बनाना है,
कन्धों पर भार तुम्हारे है अब आ रहा.
सावधान, वक्त आज तुमको जगा रहा!

*****

जूते की पुकार


फट गया हूं मैं तले से,
कट गया हूं मैं गले से,
लद गया मेरा जमाना,
हो गया हूं अब पुराना,
आ पड़ी है जान पर. रुकने लगे सब काम मेरे.
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

एक बूढ़े दादा जी हैं,
छोड़ते मुझको नहीं हैं,
थक गया हूं रोज कहकर,
चल रहा हूं बस घिसटकर,
व्यर्थ ही, लगता, गए सब मिन्नतें, 'परनाम' मेरे.
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

ऑपरेशन की जरूरत,
है यही बचने की सूरत,
देर कर दी और थोड़ी,
जान जायेगी निगोडी,
वो कबाड़ी भी न देगा चार पैसे दाम मेरे.
हो कहां, मेरी खबर लो अब तो मोचीराम मेरे!

*****

ताले दिखवा लो.


जंग लगे हों, बंद पड़े हों,
या होकर बदरंग पड़े हों
सबका है इलाज सस्ते में, एक बार करवा लो.
तालों का डाक्टर आया है, ताले दिखवा लो.

मुन्नू ने खो दी है चाबी
चिंता क्यों करते हो?
मार-मार, हर बार, हथोडी
हिंसा क्यों करते हो?
एक अगर खोने का डर है दो चाबी बनवा लो.
तालों का डाक्टर आया है, ताले दिखवा लो.

नया खरीदोगे तो ज्यादा
पैसे खर्च करोगे,
और बिना ताले के, चोरों-
से किस तरह बचोगे?
समझदार को एक इशारा काफी है, घर वालो!
तालों का डाक्टर आया है, ताले दिखवा लो.

*****

सम्मान बड़ों का


कठपुतली की तरह नाचता रहूँ अगर मैं
तो सब खुश हैं.
और नहीं नाचूं तो है अपमान बड़ों का.

समझ नहीं आता, ये कैसे नियम-दायरे
जिनके अंदर मुझे बांधना चाह रहे हैं,
अनदेखा कर मेरी इच्छाएं, घर वाले
मनमानी हर रोज लादना चाह रहे हैं.

जैसे मेरा अपना कुछ सम्मान नहीं है
जो कुछ है बस
पूरे घर में, तो केवल सम्मान बड़ों का.

धीरे से है अगर बोलना तो मैं बोलूँ,
बड़े भले कितना चिल्लाएं मेरे ऊपर,
मैं विनम्रता में ही झुका रहूँ चरणों में,
वे कितनी ही सजा सुनाएँ मेरे ऊपर,

अहंकार के वाक्-युद्ध में ह्रदय हमारा
आहत करके
क्या पा जाएगा बोलो ज्ञान बड़ों का.

*****

एक नया किशोर गीत

यह किशोरावस्था मुझमें
रंग कितने भर रही है.

आ रहे हैं कुछ नये बदलाव मुझमें,
जग रहे हैं कामना के भाव मुझमें,
एक बेचैनी-सी मुझमें
आज नर्तन कर रही है.

हो गया है स्वर अचानक आज भारी,
और एक हल्की, गुलाबी-सी खुमारी
लग रहा है धीरे-धीरे
देह में पग धर रही है.

सच कहूँ तो हां, बहुत हैरान हूं मैं,
इस नए बदलाव से अनजान हूं मैं,
एक खुशी आने को है,
आते हुए, पर, डर रही है.

******


माँ समझती क्यों नहीं है?

अब नहीं मैं दूध पीता एक बच्चा
माँ समझती क्यों नहीं है?

चाहता हूं, मैं बिताऊं वक्त ज्यादा
दोस्तों के बीच जा कर,
चाहता हूं, मैं रखूँ दो-चार बातें
सिर्फ अपने तक छुपाकर,

पर मेरे आगे से डर की श्याम छाया
दूर हटती क्यों नहीं है ?

छोड़ आया हूं कभी का बचपना, जो
सिर्फ जिद्दी, मनचला था,
हो गया है अब बड़ा सपना कभी जो
थाम कर उंगली चला था,

पर बड़ों की टोका-टोकी वाली आदत
क्यों, बदलती क्यों नहीं है?

-रमेश तैलंग

2 comments:

  1. बहुत अच्छी कविताएँ, धन्यवाद!!!

    ReplyDelete
  2. बहुत बढ़िया ...एक से बढ़कर एक हैं सभी रचनाएँ ...आभार

    ReplyDelete