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Sunday, November 20, 2011

अगस्त्य मुनि -अमृतलाल नागर

शिखरस्थ कथाकार अमृतलाल नागर की एक बाल रचना जो मिथकीय साहित्य को ऐतिहासिक दृष्टि से देखने का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है:



अगस्त्य मुनि

हिंदू पुराणों में अगस्त्यजी का नाम बहुत बार आता है. दक्षिण भारत में इन्हें कूटमुनि भी कहा जाता है. इन्हीं कूटमुनि अथवा अगस्त्यजी के साथ हमारी एक दक्षिण भारतीय भाषा का भी घना संबंध माना जाता है. कहते हैं कि अगस्त्य मुनि ने ही तमिल भाषा की पहली व्याकरण बनायी.
इन अगस्त्य ऋषि की एक कथा आमतौर से बहुत प्रसिद्ध है. कहते हैं कि एक बार विन्ध्याचल पर्वत इतना ऊंचा उठ गया कि सूर्य देवता के आने-जाने के मार्ग में बाधा पड़ने लगी. तब देवों को बड़ी चिंता हुई. उन्होंने विन्ध्याचल के गुरु अगस्त्य मुनि से प्रार्थना की कि महाराज आप ही कोई उपाय सुझा सकते हैं. अगस्त्य मुनि ने विचार किया और देवों से कहा कि आप निश्चिन्त हो जाइए. मैंने उपाय सोच लिया है. यह कहकर अगस्त्य मुनि विन्च्याचल की ओर चल दिए.
गुरु को आया जानकर विन्ध्याचल ने सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया और कहा कि गुरूजी, मेरे लिए आपकी क्या आज्ञा है?'
गुरूजी ने कहा-'हे शिष्य जब तक मैं लौटकर न आऊँ, तब तक तू यों ही झुका रह.' यह कहकर अगस्त्य मुनि विन्ध्याचल के पास दक्षिण भारत में चले गए.
इस कथा में किसी पहाड़ के इंसानी गुरु का अविश्वसनीय करिश्मा जुडा देखकर अक्सर लोग इसके महत्त्व पर ध्यान नहीं देते हैं. हमारे पुराण की कथा के अनुसार राजा सगर का महायज्ञ हिमालय और विन्ध्याचल के बीच की भूमि पर हुआ था. इसका अर्थ हुआ कि तब तक आर्य लोग विन्ध्याचल के पार न जा सके थे. अगस्त्य मुनि अलबेले घुमंतू थे. उन्होंने इसी विन्ध्याचल में कहीं से दक्षिण में जाने के लिए एक खिड़की खोल ली. अगस्त्य मुनि के संबंध में दक्षिण भारत में कई कथाएं प्रचलित हैं और इसका ज़िक्र ऋग्वेद के ऋषियों में भी आता है.
दक्षिण भारत से समुद्र पार हिंद-चींन और इंडोनेशिया तक घूम-घूमकर सभ्यता का प्रचार करने वाले इन अलबेले ऋषि के पुरखे अगस्त्य प्रथम मैत्रा वरुण नामक देव कबीले के थे. उनकी माता उर्वशी थी. इस तरह वह वशिष्ठ के भाई थे. उनका विवाह लोपामुद्रा नाम की एक विदुषी महिला से हुआ था, जो स्वयं भी ऋषि थी. लोपामुद्रा के पति अगस्त्य ऋषि और विन्ध्याचल पार करके दक्षिण जाने वाले अगस्त्य मुनि एक कुल के होने पर भी दो अलग-अलग ज़मानों में पैदा हुए थे. बहरहाल, जो अगस्त्य मुनि दक्षिण भारत और ठेठ-चींन , इंडोनेशिया तक पूज्य हैं. वे भी ईसा से कई सौ वर्ष पहले ही हुए होंगे.
एक तमिल कहानी के हिसाब से अगस्त्यजी महाराष्ट्र के कोंकण वाले क्षेत्र से होकर समुद्र के द्वारा कुर्ग पहुंचे थे. इस कुर्ग देश में कुडग जाति के लोग रहते थे और एक नदी का उद्गम-स्थान भी वहीं था. यह नदी बाद में कावेरी के नाम से प्रसिद्ध हुई. वहां के तमिल या द्रविड़ राजा कुबेर ने अगस्त्य के सामान विद्वान को अपने यहाँ आया जानकर उन्हें सादर बुलवाया और उनसे बातें की. राजा कुबेर अगस्त्यजी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने पहले तो उन्हें अपना मंत्री बनाया और बाद में अपनी बेटी कावेरी का विवाह भी उन्ही के साथ कर दिया.
उन दिनों चोल राज्य में कोई भी नदी न होने से सारा क्षेत्र सिंचाई के बिना सूखा पड़ा था. चोल राजा ने जब सुना कि कुबेर के जमाई और मंत्री बड़े हुनरमंद हैं, तब उसने कुबेर राजा की मार्फ़त उनसे प्राथना की. उसने अगस्त्य से कहा कि किसी उपाय से एक नदी आप हमारे देश में भी बहा दीजिए तो हमारा बड़ा कल्याण हो. अगस्त्य मुनि ने उसकी बात पर गहरा विचार किया और सब नदियों की शक्ति पहचान कर उन्होंने कावेरी नदी की धारा को, जो अरब सागर में गिरती थी, पूर्व की ओर एक नहर निकालकर बढ़ा दिया. इस तरह कावेरी नदी चोल देश में बहती हुई बंगाल की खाडी में गिरने लगी. सारी भूमि हरी-भरी हो उठी. जन-जन अगस्त्यजी की महिमा गाने लगा. लोगों ने अगस्त्य का इतना उपकार माना कि इस नदी का नामकरण उनकी परम प्रिय पत्नी के नाम पर ही किया. अगस्त्य ऋषि ने तमिल भाषा का संस्कार किया. वहां की संस्कृति को कई तरह से उन्नत किया और फिर अपने भ्रमण के हौसले से वे समुद्र पार कर हिंद-चींन और इंडोनेशिया तक गए. इंडोनेशिया में अगस्त्यजी को शिव का अवतार, एक महान गुरु और भगवान बुद्ध के बराबर माना जाता है. धन्य हैं वे जन, जिन्होंने दूर-दूर तक मानव सभ्यता को सुसंस्कार देने के लिए उस पुराने ज़माने में समुद्री यात्राएं की, जब कि ऐसा करना भय से खाली नहीं था. अगस्त्य मुनि ने निर्भीक होकर यात्राएं कीं और सभ्यता की आवाज़ दूर देशों तक पहुंचाई.
इसी प्रकार चिड़ियों जैसे निरीह प्राणियों की संतानों को उबारने के लिए अगस्त्य मुनि सचमुच ही समुद्र को सोख गए थे.

(-सम्पूर्ण बाल रचनाएं: अमृतलाल नागर से साभार)

Wednesday, November 9, 2011

किस्सा बनो बुआ का

किस्सा बनो बुआ का
-रमेश तैलंग



बनो बुआ की गप्प मंडली और खिलखिलाती हंसी दोनो ही सारे मोहल्ले में मशहूर थीं। उनके मोती जैसे दांत जब चमकते ता बिजली सी कौंध जाती आंखों के आगे। पर हाय री किस्मत! एक दिन उनका पैर सीढ़ी से क्या फिसला, चारों खाने चित्त हो कर पड़ गईं बनो बुआ। दायीं टांग और कमर में तो चोट आयी ही, आगे के चार दांत टूट कर गिर गए सो अलग।
अब असली दांत टूट गए तो या तो नकली दांत लगवाती बनो बुआ या फिर इस तीस साल की उम्र में छोटे-बड़ों से ‘बोंगी बुआ’, ‘बोंगी बुआ’ कहलवाती खुद को।
सोच में डूबी बनो बुआ कुछ फैसला नहीं कर पा रही थीं कि सलमा चाची ने उनके दिल के घावों को और हरा कर दिया। बोलीं- ‘ हाय बनो! तुम्हारी तो चांद सी सूरत ही बिगड़ गई। सुना है अब नकली दांत लगबाओगी तुम! मेरी मानो तो ये मसाले के दांत मती लगवाना, पता नहीं मरे क्या गंद-संद मिलावे हैं मसाले में। वो क्या कहें, आजकल तो सोने के दांत भी बन जावे हैं, वही लगवाना। दमक उठेगा ये मुखड़ा।’
सलमा चाची की बात बनो बुआ के कलेजे में सीधी उतर गई। उन्होंने निश्चय कर लिया कि लगवाऊंगी तो सोने के दांत ही लगवाऊंगी। बस, घर में जो थोड़ा-बहुत सोना था लगा दिया ठिकाने और बनवा लिये सोने के दांत।
कुछ दिन ही बीते थे कि सलमा चाची ने फिर एक उल्टा पांसा फेंक दिया। बोलीं-‘अरी बनो! ये क्या सुबह-शाम खीं ..खीं ..कर हंसती रहे है। सोने के दांत हैं, सबकी नजर में आते हैं। किसी दिन किसी चोर उचक्के की नीयत बिगड़ गई देख कर तो सीधा टेंटुआ दबा देगा। मैं कहूं हूं जरा मुंह बंद रखा कर अपना।’
सलमा चाची की बात सुन कर बनो बुआ के बदन में काटो तो खून नहीं। ये तो और मुसीबत मोल ले ली सोने के दांत लगवा कर। अब मोहल्ले की औरतें, बच्चे हंसी-ठठ्ठा करेंगे तो बनो बुआ क्या मुंह पर ताला लगा कर बैठेगी? हंसी के मौके पर हंसी तो आयेगी ही, हंसी आयेगी तो मुंह खुलेगा ही और मुंह खुलेगा तो सोने के दांत भी चमकेंगे चम-चम। पर किसी की नीयत सच में खराब हो गई तो? किसी ने सचमुच लालच में आकर गला दबा दिया तो। इन सवालों ने बनो बुआ की हंसी-खुशी सब छीन ली।
बनो बुआ को गुस्सा आता सलमा चाची पर। आखिर उन्ही के कहने पर तो लगवाये थे सोने के दांत। अब वो ही बातों-बातों में जान-माल का खतरा जता गईं।
पशोपेश में फंसी बनो बुआ एक दिन आईने के सामने बैठी थीं कि खुद को देख कर हैरान रह गईं। चेहरे पर आधा बुढ़ापा झलक आया था कुछ ही दिनों में। जब हंसी ही चली गई रूठ कर तो बनो बुआ की जवानी किसके बल पर ठहरती?
बस........बैठे-बैठे ही बनो बुआ को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक झटके से अपने मुंह में फंसे सोने के दांत निकाल लिए और कमरे में पड़ी पेटियों के पीछे फेंक कर खुद से ही बोली- ‘ ले बनो! खत्म हुआ ये बबाल। अब खूब हंसा कर।
खिल-खिल...खिल।
बनो बुआ की गप्प मंडली, जिसमें अब सलमा चाची को छोड़ कर मोहल्ले की लगभग सभी औरतें और बच्चे हाते, फिर पहले की तरह जुड़ने लगीं। खूब चुहलबाजियां होतीें, मजाब होते और बनो बुआ जी खोल कर हंसतीं। बनो बुआ का बोंगा मुंह देख कर बच्चे भी खुश होते और बार-बार कहते- ‘बनो बुआ! और हंसो! बेंगी बुआ, और हंसो!’ बच्चों के साथ बनो बुआ हंसती ही चली जाती, खिल...खिल...खिल...खिल!


चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

Wednesday, November 2, 2011

आज पढ़िए डॉ हेमंत कुमार का जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित यह लेख

आज के जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित मेरे लेख का विषय हैं बेटियां,परिवार और उनके साथ होने वाला भेदभाव्। आप इसे इस लिंक पर भी जाकर पढ़ सकते हैं।---http://jansandeshtimes.com/images/lucknow_03_11_2011_page11.jpg