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Monday, December 5, 2011

फिसलन : भगवती प्रसाद द्विवेदी की किशोर कहानी

एक किशोर वय वाले विद्यार्थी के मन में अपनी अध्यापिका के प्रति जन्मे यौनाकर्षण
(infatuation) को शालीनता से उकेरती आदरणीय भगवती प्रसाद द्विवेदी की यह अनूठी कहानी हिंदी की बेहतरीन किशोर कहानियों में से एक है :

फिसलन
- भगवती प्रसाद द्विवेदी (मोबा: ०९४३०६००९५८)

दिनेश के रहन-सहन, चाल-ढाल में अचानक हो रहे परिवर्तन से विद्यालय के सभी लोग दंग हैं.
होस्टल के लड़के आजकल उसकी तरफ घूर-घूरकर देखने लगे हैं. सचमुच, तब और अब के दिनेश में कोई तुलना ही नहीं है.

निपट देहात से प्रायमरी स्कूल की शिक्षा लेकर दिनेश छठी कक्षा में प्रवेश के लिए इस शहर में आया था. उसके लटियाए धूल-धूसरित बालों, लंबी चुटिया और देहाती कपड़ों को देखकर स्कूल के नए सहपाठी उसे चिढा-चिढकर मज़ा लेने लगे थे. मगर पता नहीं, वह शख्स किस मिटटी का बना था कि लाख चिढ़ाने के बावजूद वह मंद-मंद मुस्करा रहा होता था. पहले नाम लिखाकर कुछ दिनों सहमा-सहमा सा दिखा था जरूर, मगर जल्दी ही वह सबसे घुल-मिलकर बतियाने लगा था. अब दोस्तों के उपहास का पात्र बनकर भी वह चिढता नहीं था, बल्कि अपने-आप पर ही ठहाके लगाने लगता था. उसके रहन-सहन में भी कोई खास बदलाव नहीं आया. आखिरकार संगी-साथी भी उसे अब उसी रूप में देखने के आदी हो गए.विद्यालय की छमाही परीक्षा में जब देहाती से दिखने वाले दिनेश ने तमाम विषयों में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए तो सबकी आंखें फटी-की फटी रह गई. फिर तो अध्यापक, सहपाठी सबकी आँखों का तारा बन गया वह.

छठी से नौवीं कक्षा तक दिनेश ने देहाती रहन-सहन, वेशभूषा और कक्षा में अव्वल आने का रिकार्ड कायम रखा. होस्टल से स्कूल और स्कूल से होस्टल, यही उसकी दिनचर्या होती थी.
सभी घंटियों को मनोयोग से अटेंड करना, नियमित नोट्स तैयार करना और रात में जमकर पढ़ाई करना ही उसकी ड्यूटी थी.

मगर दसवीं कक्षा में आते ही दिनेश में एकाएक बदलाव नज़र आने लगा. विद्यालय में एक नई
अध्यापकी की नियुक्ति हुई थी और वे दसवीं कक्षा में हिंदी पढाने आने लगी थीं. पूरे विद्यालय में शशि मैडम इकलौती महिला थीं. पहले दिन आकर उन्होंने सभी छात्रों से एक-एक कर परिचय पूछा. जब दिनेश की बारी आई तो उसकी अजीबोगरीब हुलिया देखकर वे अपने को रोक न सकी थीं और खिलखिलाकर हंस पड़ी थीं. दिनेश ने उस दिन पहली बार स्वय्स्म को अपमानित महसूस किया था.

छुट्टी की घंटी बजते ही दिनेश सीधे सैलून में गया था और चुटिया कटवाकर बेतरतीव बालों को उसने व्यवस्थित करवाया था. अगले माह जब घर से मनी-आर्डर आया तो दिनेश ने अपने लिए नए कपड़े बनवाए थे. दातुन की बजाय टूथब्रश से दांत साफ़ करने लगा था. साथियों की देखा-देखी उसने बाज़ार से शैम्पू और टेलकम पाउडर भी खरीद लिए हैं. सभी लोग अब अचरज से दिनेश की ओर देखते. उसे खुद भी अपने इस बदलाव पर आश्चर्य हो रहा था.

शशि मैडम को इस बात की अब बखूबी जानकारी मिल चुकी थी कि दिनेश अपनी कक्षा में सबसे होनहार और मेधावी छात्र है. उसकी भोली-भोली सूरत भी उन्हें बड़ी प्यारी लगती. जब दिनेश कक्षा में पिछली सीट पर बैठा हुआ रोता, तो मैडम उसे आगे की बेंच पर बुला लेतीं. कक्षा में पूछे गए प्रश्नों का जब वह संतोषजनक उत्तर देता, तो वे उसे शाबाशी देतीं. कभी पीठ थपथपा देतीं, तो कभी माथा सहला देतीं. दिनेश उस वक्त अजीब अनुभूति से भर उठता था.

सिर्फ वेशभूषा और रहन-सहन में ही नहीं, बल्कि और भी कई तरह के बदलाव दिनेश में आने लगे. अब वह पढ़ाई की अपेक्षा शशि मैडम में ही अधिक रूचि लेने लगा. कभी शशि मैडम उसे स्वर्ग की किसी अप्सरा-सी लगतीं, तो कभी किसी राजकुमारी-सी. उसका शर्मीलापन न जाने कहां उड़न-छू हो गया था. गाहे-बगाहे शशि मैडम की तरफ वह गौर से देखा करता. जब वे ब्लैकबोर्ड पर शब्दार्थ आदी लिख रही होतीं, अथवा कोई पाठ पढाने में मशगूल होतीं तो वह उनके चेहरा और खुले अंगों की ओर चोर निगाहों से देखा करता था. इस बात पर मैडम ने भी गौर किया था, पर शायद खुले स्वभाव की होने के कारण वे हंसकर टालती रही थीं.
दिनेश मैडम के घर का पता भी जान चुका था. एक रोज वे शाम को जब रिक्शे से घर जाने लगीं, तो उसने पीछे से एक रिक्शे से उनका पीछा किया था और घर के पास पहुंचकर ही दम लिया था. फिर तो जब भी उसके पास खाली समय होता, वह फटाफट मैडम के घर की ओर ही भागता और गली के पास वाली उनके कमरे की खिड़की से झांककर उन्हें देखा करता था. कभी मैडम अपने कमरे में लेटकर पैर हिलाते हुए किताब पढ़ रही होतीं, तो कभी नहा-धोकर बाल सुखा रही होतीं. अलग-अलग समय में वह मैडम को अलग-अलग रूपों में पाता था.

अब विद्यालय में चपरासियों, टीचरों या सहपाठियों के बीच जहां भी शशि मैडम की चर्चा हो रही होती, भनक मिलते ही दिनेश तत्काल वहां जा पहुँचता और कान खड़े कर सब-कुछ सुनने लगता था. उसे यह जानकारी भी बखूबी मिल चुकी थी कि शादी के कुछ साल बाद मैडम ने अपने पति को तलाक दे दिया था और अब मां-बाप के यहां ही रह रही थीं. दिनेश बार-बार चिंतातुर होकर सोचता कि शशि मैडम ने फिर दूसरी शादी क्यों नहीं की. आखिर क्यों दे दिया उन्होंने अपने पति को तलाक.

छमाही परीक्षा में जब दिनेश को बहुत ही कम अंक प्राप्त हुए, तो तभे लोग अवाक रह गए. दिनेश जैसे होनहार छात्र से किसी को भी ऐसे आशा नहीं थी. शशि मैडम ने भी अंदाज लगाया कि जिस बात को वे बहुत ही हल्के रूप में ले रही थीं, वह तो अब गंभीर रूप धारण कर चुकी है. मन-ही-मन उन्होंने कुछ निश्चय किया और अगला रविवार का छुट्टी का दिन दिनेश के साथ ही गुजारने के लिए उसे अपने घर बुलाया.

उस रोज रात में दिनेश को नींद नहीं आई, पूरी रात वह मैडम के बारे में ही सोचता रहा. उनकी खूबसूरती, उनकी मुस्कराहट, उनकी भाव-भंगिमाएं बार-बार उसकी आँखों के सामने आती रहीं और वह उन्हीं में खोया रहा. फिर उसने मन-ही-मन कुछ अंतिम फैसला भी कर लिया. अपनी कक्षा में पढ़ाई के मामले पिछड़ते जाने का उसे जरा भी अफ़सोस नहीं हुआ.

अगले दिन सज-धजकर वह समय से पहले ही मैडम के घर जा पहुंचा. शशि मैडम ने उसे बड़े प्यार से अपने कमरे में बिठाया.मैडम अभी कुछ कहने ही वाली थीं कि दिनेश अधीरता से बोला. 'मैडम! मैंने अंतिम फैसला कर लिया है. घर-परिवार की मुझे जरा भी चिंता नहीं है. मुझे तो बस आपकी इज़ाज़त चाहिए.'
'मेरी इज़ाज़त? कैसे फैसला?' मैडम ने अचरज से पूछा.
"मैं आपसे शादी करना चाहता हूं, मैडम!' दिनेश ने हकलाते हकलाते हुए कहा.
'शादी और मुझसे?' शशि मैडम ने ठहाका लगाते हुए कहा, 'जानते हो, मेरा बेटा तुमसे कहीं ढाई-तीन साल बड़ा ही होगा. मेरी उम्र तुम्हारी उम्र से दुगुनी से भी अधिक होगी. तुम्हें देखकर मैं यही सोचा करती थी कि मेरा बेटा भी अब इतना बड़ा हो गया होगा. मैं तो तुम्हें अपने पुत्र की तरह ही प्यार करती गई. और कोई बेटा, क्या अपनी मां से ही शादी करने की बात कभी सोचता है?'

दिनेश को काटो तो खून नहीं! यह क्या किया उसने! छिः, मां के साथ शादी का प्रस्ताव?
'हाथ जुड़ते हुए उसने बस इतना कहा, 'मैडम! मैंने आपको पहचानने में भूल की. मैं बहुत ही शर्मिंदा हूं. मुझे क्षमा करो, मां! वाकई भटक गया था मैं.'

'यह उम्र ही भटकाव की है, बेटे!' शशि मैडम ने समझाया, 'अभी तुम्हारी उम्र न् तो शादी की है और न ही इस विषय में उल-ज़लूल सोचने की. अभी तो तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य होना चाहिये - कड़ी मेहनत से परीक्षा में अधिक-से-अधिक अंग प्राप्त करने का और उत्तरोत्तर अपनी प्रतिभा को विकसित करने का. जब भविष्य में तुम ऊँची शिक्षा ग्रहण कर आत्मनिर्भर बन जाना, तब फिर शादी की बात सोचना, समझे.'
दिनेश को मैडम से आज बहुत बड़ी सीख मिल गई थी. जब वह होस्टल लौटने की इज़ाज़त लेकर आँगन से होकर गुजरने लगा, तो हडबड़ी में नल के पास फिसलते-फिसलते बचा. शशि मैडम ने पास आकार फिर समझाया, 'देखो बेटे, जीवें में कदम-कदम पर फिसलन-ही-फिसलन है. इसलिए हर व्यक्ति को संभल-संभलकर कदम बढ़ाना चाहिए.'

दिनेश को लगा शशि मैडम ने आज उसे जीवन की बहुत बड़ी फिसलन से उबार लिया, वर्ना वह फिसलते-फिसलते न जाने कहाँ से कहाँ चला जाता.

(स्रोत: मेरी प्रिय बाल कहानियाँ-भगवती प्रसाद द्विवेदी/मदन बुक हाउस/दिल्ली-५१, मूल्य: २९५/= रूपये )

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