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Tuesday, December 6, 2011

बड़ दादा और नीम नानी

-हरिकृष्ण तैलंग

स्कूल के अहाते में बड़ और नीम के दो वृक्ष लगे हैं. बड़ का वृक्ष काफी पुराना है. बूढा चपरासी मंगलू कहता है कि जब वह इसी स्कूल की दूसरी कक्षा में पढता था तो बड़ का वृक्ष छोटा सा था. लेकिन अब तो वह काफी फ़ैल गया है. उसके तने खूब मोटे हो गए हैं और मंगलू को सफ़ेद लटकती दाढी के सामान शाखाओं में से जताएं लटक पड़ी हैं. नीम का वृक्ष है तो पुराना, परन्तु इसे मंगलू ने स्वयं उस समय लगाया था, जब उसने अपनी नौकरी शुरू की थी.

मंगलू को सभी बच्चे उसकी सफ़ेद दाढी के कारण दादा कहकर पुकारते हैं. बड वृक्ष के साठ भी इसीलिये दादा शब्द जुड गया है. जब बड दादा कहलाने लगा तो नीम का भी कुछ नाम होना चाहिए, यही सोच बच्चे उसे नीम नानी कहा करते थे.

बड़ दादा और नीम नानी बच्चों को बड़े प्यारे हैं. इनकी छाया में छुट्टी के समय सभी बच्चे खेला करते हैं. पी.टी भी इन्हीं की छाया में होती है और कभी-कभी कक्षाएं भी वहां लगे जाती हैं. बड़ दादा और नीम नानी भी बच्चों को हँसते-खेलते देखते हैं तो उनकी शाखाएं खुशी से हिलने लगती हैं. पट्टे सर-सर करते हुए झूमने लगते हैं और उनसे ऐसे अच्छी हवा के झोंके आते हैं कि बच्चों का मन उमंग से भर उठता है.

एक बार इन दोनों वृक्षों पर एक बड़ा संकट आ पड़ा. उनकी जान तक जाने की नौबत आ गई. बात यह हुई कि एक दिन शाम को जब चारों ओर सुनसान था, बड़ दादा नीम नानी से बोले-'नीम, तुझे बच्चे बेकार में नानी कहते हैं. नानी तो स्वभाव से बड़ी मीठी होती हैं, परन्तु तू तो बड़ी कड़वी हैं.'

नीम ने उत्तर दिया -'हां, दादा, हूं तो मैं कड़वी, पर तब भी बच्चों को बड़ा प्यार करती हूं. मुझे यदि बच्चे खा लें, तो उन्हें कोई नुक्सान नहीं होते. मेरा हर अंग - छल, पट्टे, फल आदी चर्म रोग और घावों को अच्छा करने के लिए काम आता है. पर तुम तो नाम के ही बड़े हो, बच्चों के किसी काम के नहीं. 'नाम बड़े और दर्शन थोड़े' यह कहावत तुम पर बिलकुल ठीक बैठती है.

नीम नानी की यह बात सुनकर बड दादा क्रोध से भड़क उठे. बोले -'अरी नीम, तू बढ़ चढ़ कर मत बोल. छोटे मुंह बड़ी बात. सारा शरीर तो तेरा कड़वा है, फिर ज़बान तेरी कैसे मीठी हो सकती है? तू मेरा महत्त्व क्या जाने? मेरे दूध और फलों के गुण वैद्य ही जानते हैं. मेरे पट्टे हाथी जैसे बड़े प्राणी का भी पे भर देते हैं, पर तू तो बकरी के भी काम की नहीं. मैं वृक्षों का राजा हूं. मनुष्य मुझे बड़ा पवित्र मानते हैं. स्त्रियां सौभाग्य की रक्षा के लिए मेरी पूजा करती हैं. मेरी जाति के वृक्ष अश्वत्थ के नीचे शाक्य राजकुमार सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्त कर भगवान बुद्ध बने थे. इसलिए बोधि वृक्ष के रूप में संसार भर के बौद्ध उसकी पूजा करते हैं. ज्ञानदाता होने के कारण मुझे हर स्कूल में लगा होना चाहिए. परन्तु, निकम्मी नीम, तेरा स्थान तो बच्चों से दूर ही होना चाहिए, ताकि वे तेरे कड़वेपन से प्रभावित न् हो सकें.'

नीम नानी ने भी भन्नाकर वैसा हि जवाब दिया -'अरे बूढ़े बड़, तो क्यों इतना बड़बड़ा रहा है? ढोल की आवाज तेज जरूर होती है, पर उतनी ही कर्कश भी होती है. मैं छोटी और कड़वी भले ही हूं, पर यदि मैं अपने गुणों का वर्णन करने बैठूं तो उन्हें सुन तेरा दिमाग चक्र जाएगा. सुना है मोटों का दिमाग भी मोटा होता है. जिसका तू साक्षात प्रमाण मालूम होता है. यदि तू ज्ञानी होता, तो तुझे मेरी उस प्रशंसा का ज्ञान अवश्य होता, जो आयुर्वेद के ग्रंथों में भरी पड़ी है. परन्तु तो अकाल का कोल्हू है, कोल्हू. तेरी संगत में तो बच्चों की भी बुद्धि खराब होने का खतरा है. कल से उन्हें सचेत करना पड़ेगा ताकि तेरी छाया उन पर न् पड़ सके.'

इस तरह बड़ दादा और नीम नानी सारी रात आपस में तू-तू मैं-मैं करते रहे और तभी चुप हुए जब सुबह हुई.

स्कूल का समय हुआ, तो बच्चे आने लगे. घंटी बजने में कुछ देर थी इसलिए वे खेलने लगे. कुछ बच्चे बड के नीचे खेलने लगे और कुछ नीम के नीचे. बड़ के नीचे खेलने वालों ने कबड्डी जमाई और नीम के नीचे खेलने वालों ने आँख मिचौनी. आँख पर पट्टी बांधे हुए लड़के ने जब एक कबड्डी वाले लड़के को पकड़ लिया तो दोनों में तकरार हो गई. अपने-अपने साथी का साठ देने अन्य लड़के भी आ पहुंचे. बात बढ़ गई और दोनों ओर से मारपीट होने लगी.

इतने में ही घंटी बज उठी. झगडा उस समय तो बंद हो गया लेकिन दोनों ओर के लड़कों के मन में गाँठ पड़ गई. परिणाम यह हुआ कि लड़की दो दलों में बाँट गए. एक दल 'बड़दल' कहलाने लगा और दूसरा 'नीम दल'. अब यदि बड़ दल वाला कोई लड़का नीम के नीचे पाया जाता, तो नीम दल वाले उसकी मरम्मत कर देते. उसी तरह बड़ दल के लड़के करते.

पिटने वाले लड़के शिकायतें लेकर हेड मास्टर साहब के पास पहुंचते. रोज ही शिकायतें होने लगीं. झगड़े निबटाते-निबटाते हेड मास्टर साहब परेशान हो गए. एक दिन झुंझलाकर उन्होंने निश्चय किया कि दोनों वृक्षों को कटवा दिया जावे. न् रहेगा बांस न् बजेगी बांसुरी. उन्होंने मंगलू को बुलाकर बधाई लगवा कर वृक्षों को कटवा देने का आदेश दे दिया.

मंगलू ने यह आदेश सुना, तो उसे बड़ा दुःख हुआ. जिन वृक्षों से उसे अत्यधिक लगाव था, जिनकी छाया में उसके जीवन के अनेक वर्ष कटे थे. वे अब काटने वाले हैं, यह सोचकर उसका मुंह लटक गया. वह दोनों वृक्षों के पास आया. बारी-बारी से वह दोनों वृक्षों के तने चूमता और उन्हें सहलाता. उसकी आंखें दबदबा आई थीं.

लड़कों ने उस ऐसा करते देखा तो इसका कारण पूछा. मंगलू ने हेड मास्टर साहब का आदेश उन्हें बता दिया और कहा कि यह सब लड़कों को आपसी लड़ाई के कारण ही हो रहा है.

मंगलू से यह जानकर कि अब वे काटने वाले हैं. बड दादा और नीम नानी के देवता कूच कर गए. कितना बड़ा धोका खाया उन्होंने. मन ही मन वे सोचने लगे - यह मुसीवत खुद उन्होंने ही तो मोल ली है. न् वे आपस में झगड़ते, न् बच्चों के मन में झगडने की भावना पैदा होती. अब क्या करें, जिससे उनका जीवन बच सके.

रात हुई तो दोनों ने सलाह की. वे अपनी करनी पर खूब पछताए. उन्होंने निश्चय किया कि यदि अबकी बार उनका जीवन बच जाए तो वे आपस में कभी भी न् झाग्देंगे और न् बच्चों को बह्कायेंगे. बच्चे अपनी इच्छा से जिसकी छाया में चाहे खेलें उन्हें कोई शिकायत न् होगी. ऐसा तय करके दोनों वृक्ष सबेरे का इंतज़ार करने लगे.

जब लड़के स्कूल आए तो उन्होंने देखा कि बढई बड़ी-बड़ी कुल्हाडियां और आरे लिए वृक्षों के नीचे बैठे हैं. वे हेड मास्टर साहब का इंतज़ार कर रहे थे. लड़कों को यह भी पता चला कि मंगलू दादा ने आज की छुट्टी ले राखी है क्योंकि वह अपनी आँखों से अपने प्यारे वृक्षों को कटते हुए नहीं देखना चाहता.

बहुत से लड़के कल से ही वृक्षों का कटना सुनकर बुरा महसूस कर रहे थे. वे यह समझ गए थे कि उन्ही के झगडों की वजह से हेडमास्टर साहब ने वृक्षों को काटने का आदेश दिया है. अब भी मौका है वृक्षों को कटने से बचाने का. यह सोचकर दोनों दलों के समझदार लड़कों ने आपस में मेल कर लेने का फैसला कर लिया. अन्य लड़के भी इसके लिए राजी हो गए. दलों को भंग कर दिया गया और वे अपना निश्चय सुनाने के लिए हेडमास्टर साहब के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे.

इतने में ही हेडमास्टर साहब आते हुए दिखे. सब लड़के मिलकर उनके सामने पहुंचे. उन्होंने अपना निश्चय सुनाते हुए प्रार्थना की कि वृक्षों को कटवाया न् जावे, क्योंकि अब वे कभी नहीं झगड़ेंगे.

हेडमास्टर साहब बड़े अच्छे थ. उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक उनकी बात मान ली और बढ़ई लोगों को विदा कर दिया.

दूसरे दिन मंगलू जब स्कूल आया तो उसने दोनों वृक्षों को जैसे का तैसा खड़ा पाया. बच्चे उनके नीचे हँसते हुए उछल कूद रहे थे. उसका चेहरा दमक उठा. मारे खुशी के वह भी बच्चों में शामिल होकर दोनों वृक्षों के चकार लगाने लगा. बड़ दादा और नीम नानी भी प्रसन्नता से लहरा उठे. उनकी शाखाएं झूम उठीं.

1 comment:

  1. बहुत मजेदार और शिक्षा प्रद कहानी

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