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Friday, July 27, 2012

नानी की चिठ्ठियां ब्लॉग पर एक नया स्तंभ 'पुनर्पाठ' शुरू

नानी की चिठ्ठियां ब्लॉग पर एक नया स्तंभ 'पुनर्पाठ' शुरू किया जा रहा है जिसके अन्तर्गत  बाल साहित्य की  अनेक ऐसी रचनाएं जिन्हें क्लासिक श्रेणी में रखा जाना चाहिए  या जो पुस्तक रूप में कभी प्रकाशित हुईं थी पर आज उन्हें भुला-विसरा दिया गया है , समय-समय पर पाठकों से परचाने की कोशिश की जायेगी. आशा है हमारा यह प्रयास बाल-साहित्य प्रेमियों को पसंद आएगा.

सबसे पहले इन्तजार करिये डॉ. मस्तराम कपूर के बाल उपन्यास 'सुनहरा मेमना' के  पुनर्पाठ. का.....

Monday, July 16, 2012

अंगोला के लेखक-जॉन बेला की बाल पुस्तक : "As Lagrimas do Rei-Sol" (Eng.Trans: The Tears of King-Sun) के बहाने हिंदी जगत से कुछ सवाल




जॉन बेला 




अंगोला के बाल लेखक जॉन बेला की ३६ प्रष्टों वाली एक पुस्तक "As Lagrimas do Rei-Sol" (Eng.Trans: The Tears of King-Sun) पिछले महीने बाल/किशोर पाठकों के समक्ष आई है और इस अवसर पर अनेक जगहों पर बच्चों के समूहों के बीच उन्होंने अपनी हस्ताक्षरित पुस्तकें बांटी हैं. कुल मिलाकर पुस्तक का लोकार्पण हर जगह एक भव्य समारोह का हिस्सा बना है . यह पुस्तक बाल पाठकों को प्रकृति तथा पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले मानव व्यवहार के विरुद्ध सचेत कराती है.

पर्यावरण की चिंताओं से जुडी यह बाल पुस्तक अफ्रीकन बाल साहित्य में क्या स्थान रखती है, इस सवाल को फिलहाल छोड़ भी दें तो कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर यहां मैं आपका ध्यान आकर्षण करना चाहता हूं. पहला बिंदु यह है कि इस समाचार को विस्तार से कई अफ्रीकी मीडिया यानी राष्ट्रीय/स्थानीय समाचारपत्रों/वेब साइट्स पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है. लगभग १०-१५ वेब साइट्स तो मैंने स्वयं ही देखी हैं. 

विदेशों में जब भी कोई बाल साहित्य की पुस्तक प्रकाशित होती है तो ऐसे आयोजन वहां के मीडिया में प्रमुखता से /प्रचारित/प्रसारित होतेहैं और उनका विपणन तंत्र इस तरह का है कि पुस्तक की बिक्री भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है, लेखक को प्रतिष्ठा/पुरस्कारों की झड़ी लग जाती है. निस्संदेह यह सहज नहीं है. पर इसके बरक्स हिंदी बाल साहित्य की महत्वपूर्ण पुस्तक भी सामने आए तो एक अजीब सा सन्नाटा फैला रहता है और मीडिया में भी उसे कोई नहीं पूछता है. पुस्तक से होने वाली आमदनी की बात तो पूछिए ही मत, वह प्रकाशित हो गई यही बड़ी बात है.

आखिर ऐसा क्या है हिंदी बाल साहित्य में जो उसे अंतर-राष्ट्रीय स्तर के बरक्स बौना साबित कर देता है जबकि बास्तव में ऐसा होना नहीं चाहिए. बच्चों के साहित्य के प्रति हिंदी जगत में इतनी संवेदनहीनता क्यों है, ज़रा सोचिये. 

यह सवाल पुस्तकों के स्तर से कहीं ज्यादा मानसिकता बदलने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है.

चित्र सौजन्य: गूगल /Journal de Angola online

Friday, July 13, 2012

नाइजेरियन कहानी -अशरफ का उड़नखटोला -डॉ. फातिमा अकिलू


चित्र सौजन्य: केसवारिपब्लिक.बिज़ 

नाइजीरिया की प्रतिष्ठित लेखिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. फातिमा अकिलू की एक बाल कहानी अशरफ का उड़नखटोला पिछले दिनों चकमक के अप्रैल २०१२ अंक में पढ़ी जिसका अनुवाद अरविन्द गुप्ता ने किया था . यह कहानी बच्चों की वैज्ञानिक अभिरुचि, उनकी नए आविष्कार करने की कोशिश एवं प्रतिभा को बड़े ही रचनात्मक ढंग से प्रोत्साहित करती है. इस ब्लॉग पर चकमक के संपादक श्री सुशील शुक्ल की मौखिक अनुमति उपरांत यहां साभार  पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है. बड़े आकार में पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर जाएँ: http://www.eklavya.in/chakmak/chakmak/Apr_12_Issue/pages/17_Ashraf_udankhatola.htm 
 
संक्षेप में मैं यहां बता दूं कि नाइजीरियायी लेखिका डॉ. फातिमा अकिलू बाल कथा लेखन उनकी महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट : मिलेनियम डेवेलोपमेंट गोल्स के अंतर्गत चलाया जा रहे अनेक कार्यक्रमों जैसे बच्चों की प्राथमिक शिक्षा, गरीवी उन्मूलन, स्वास्थ्य और सफाई आदि का ही हिस्सा है. वे : मिलेनियम डेवेलोपमेंट गोल्स की संस्थापक है और अपनी कथापुस्तकों के द्वारा बच्चों में पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के उद्येश्य से अनेक तरह की प्रतियोगिताए भी आयोजित करती रहती हैं. उनके एक ऐसे ही प्रतियोगिता है -१०० पुस्तकें पढ़ो और इनाम पाओ. डॉ. अकिलू की कुछ बाल पुस्तकों के नाम और संक्षिप्त पुस्तक परिचय इस लिंक पर उपलब्ध है: http://cassavarepublic.biz/our-authors-mainmenu-100/100


Wednesday, July 11, 2012

मेरे कुछ प्रिय बाल गीत बाल- पाठकों के लिए


लेखकों के पास उनकी अपनी लिखी किताबों की प्रतियां बिलकुल ही सीमित होती हैं इसलिए वे चाह कर भी अपने पाठकों/बच्चों को मुफ्त नहीं बांट पाते. इसका मलाल मुझे भी रहता है. इस उद्देश्य से मैं अपनी कुछ रचनाओं की फोटो प्रतिलिपियां दे कर या उन्हें इन्टरनेट पर उपलब्ध कराकर वितरित करने का माध्यम ढूंढ लेता हूं. बस, इसी उस्द्देश्य से अपने कुछ प्रिय बालगीत यहां साझा कर रहा हूं, आप जिस तरह चाहें  इनका उपयोग करें: 






कोई झांके 

कोई झांके हमारे मन में जरा
तो खजाने मिलें
खिलखिलाती हंसी
मीठे गाने मिलें.

हम भी चाहें कोई हमसे बातें करे,
धूप घर में हमारे कुलांचें भरे
चलो ज्यादा नहीं
थोड़ी देर को ही
हमें शैतानियों के बहाने मिलें.

इन किताबों से भी थोड़ी फुर्सत मिले
भूले-भटके कभी प्यारा सा खत मिले
जिसे पढकर नई -
आस हमें जगे
जिंदगी को हमारी भी माने मिलें.
************


छुट्टियों में 

छुट्टियों में बोलो क्या काम करोगे?
काम करोगे  या आराम करोगे?

गांव से सटा पोखर
सूखने लगा है
रोज एक ही सवाल
पूछने लगा है
पानी का कब इंतजाम करोगे?

जामुन के पेड़ों के
मिले हें संदेशे,
उनके भी काटने के
हैं अब अंदेशे,
सोचो, कैसे  ये नुकसान भरोगे?

**********************

मेरी झोली में

मेरी झोली में
सपने ही सपने भरे
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

एक सपना है
फूलों की बस्ती का
एक सपना है
बस मौज मस्ती का,
मुफ्त की चीज है
फिर कोई क्यों डरे?

एक सपना है
रिमझिम फुहारों का
एक सपना है
झिलमिल सितारों का
एक सपना जो
भूखे का पेट भरे.
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

*************************





सोन मछरिया 

ताल में जी ताल में
सोंमछरिया ताल में.
मछुआरे ने मंतर फूंका
जाल गया पाताल में

थर-थर कांप ताल का पानी
फंसी जाल में मछली रानी,
तड़प-तड़प कर सोनमछरिया
मछुआरे से बोली भैया-
मुझे निकालो, मुझे निकालो,
दम घुटता है जाल में.

जाल में जी जाल में
सोनमछरिया जाल में.

मछुआरे ने सोचा पल भर,
कहा- छोड़ दूं तुझे मैं अगर,
उठ जाएगा दाना-पानी,
क्या होगा फिर मछली रानी?'
मछली बोली रोती-रोती-
'मेरे पास पड़े कुछ मोती,
जल में छोड़ो, ले आऊँगी,
सारे तुमको दे जाऊंगी.'

मछुआरे को बात जंच गई,
बस मछली की जान बच गई,
मछुआरे को मोती दे कर
जल में फुदकी जल की रानी.
सोनमछरिया-मछुआरे की
खत्म हुई इस तरह कहानी.
*******************

एक दुनिया रचें

एक दुनिया रचें आओ हम प्यार की
जिसमे खुशियाँ ही  खुशियाँ हों संसार की.

एक धरती ने हमको दिया है  जनम
एक धरती के बेटे हैं हम, मान लें
अजनबी हों भले हाथ अपने मगर
गर्मियां एक-दूजे की पहचान लें
तोड़-डालें ये दीवारें बेकार की.
एक दुनिया रचें आओ हम प्यार की

धूप गोरी है क्यों, रात काली है क्यों,
इन सवालों का कुछ आज मतलब नहीं,
बांट दें जो बिना बात इंसान को
उन ख्यालों का कुछ आज मतलब नहीं
जोड़कर हर कड़ी टूटते तार की
एक दुनिया रचें आओ हम प्यार की
******************



चित्र सौजन्य: गूगल 

Monday, July 9, 2012

कनाडा के बाल/किशोर साहित्यकार -२ : एरिक विल्सन




२४ जुलाई, १९४० को ओटावा, ओंटारियो, कनाडा में जन्मे एरिक विल्सन कनाडा के बाल-किशोर साहित्य के सबसे अधिक लोकप्रिय एवं प्रतिष्ठित समकालीन लेखक हैं. उन्होंने २० से ऊपर मिस्ट्री नोवेल्स/जासूसी उपन्यास लिखे हैं जो विश्व भर के किशोरों में इतने लोकप्रिय हुए हैं कि उनकी अब तक लाखों प्रतियाँ देश-विदेश में बिक चुकी हैं. 

पेशे से एरिक अध्यापक रहे हैं पर स्कूल में पढ़ाई जाने वाली क्लासिक साहित्य सामग्री की भारी-भरकम शब्दाबली, अनावश्यक विस्तार तथा नीरस कथाओं में छात्रों की कम रूचि देखते हुए उन्होंने स्वयं ही ऐसी पुस्तकों को लिखना शुरु कर दिया जो भाषा कथ्य एवं शिल्प सभी दृष्टियों से किशोर/युवा वर्ग को बाँध कर रख सके. 

एरिक का बचपन CANADA में घूमते-घूमते बीता है क्योंकि उनके पिता ऐसी नौकरी में थे जहां उनका स्थान्तरण अक्सर होता रहता था. पर इसका फायदा यह हुआ कि एरिक ने कनाडा के इतिहास/भूगोल, और सांस्कृतिक विकास के बारे में अपने गहरी समझ विकसित कर ली. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह, कि उन्होंने अपनी पुस्तकें लिखते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि उनकी भाषा, कहानी तथा प्रस्तुति इतनी सहज हो और सरल कि उनके पाठक पुस्तक को एक बार उठायें तो फिर खत्म किये बिना नहीं छोड़ें. यहीं नहीं उनकी हर पुस्तक से उनके पाठकों की अपने आस-पास घट रही घटनाओं को विश्लेषित करने की क्षमता भी बढ़े.

एरिक को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार/सम्मान मिल चुके हैं जिनमे प्रमुख हैं - Arthur Ellis Award for Lifetime Achievement from The Crime Writers of Canada
Voted Author of the Year by the Canadian Booksellers Association in 1992
Three “Silver Plate Awards” from Spain for sales in excess of 100,000
Queen’s Golden Jubilee Medal in 2002 for his work in fostering literacy and promoting a love of Canada
एरिक का एक मिस्ट्री क्लब है जिससे पूरी दुनिया के किशोर/युवा जुड़े हुए हैं. आप चाहें तो आप या आपके बच्चे भी इस क्लब से जुड सकते हैं और एक किशोर उपन्यास पीडीएफ रूप में मुफ्त प्राप्त कर सकते हैं. एरिक की वेबसाइट का नाम है -http://www. members.shawa.ca एवं उनकी अन्य पुस्तकें डिजिटल रूप में 'किंडल' के माध्यम से भारत में प्राप्त की जा सकती हैं. Kindle/'किंडल' के बारे में विस्तृत जानकारी इन्टरनेट से मिल सकती है.

एरिक की कुछ प्रमुख पुस्तकों के नाम हैं: Murder on The Canadian/Vancouver Nightmare/The Case of Golden Boy/Disneyland Hostage/The Kootenay Kidnapper/Vampires of Ottawa/Spirit in the Rainforest/The Green Gables Detectives/Code Red at the Supermall/Cold Midnight in Vieux Quebec/The Ice Diamond Quest/The Prairie Dog Conspiracy/The St. Andrews Werewolf/The Inuk Mountie Adventure/Escape From Big Muddy/The Emily Carr Mystery / The Ghost of Lunenburg Manor/Terror in Winnipeg/The Lost Treasure of Casa Loma/Red River Ransom NEW !

एक और बात- एरिक की कुछ पुस्तकों के शीर्षक/कथ्य संभव है भारतीय किशोर पाठकों को 'टेबू' की तरह लगें पर विदेशी कथा साहित्य में ऐसा 'पोपुलर' साहित्य किशोरों के लिए आम तौर पर उपलब्ध है और वे इसे पसंद भी करते हैं. पर एरिक की अपनी एक वैज्ञानिक दृष्टि है जिसका उपयोग वे अपनी हर रचना में करते हैं. एरिक से संपर्क करने के लिए उनकी मेल आई-डी उनकी वेबसाईट उपलब्ध है.

कनाडा के बाल/किशोर-साहित्यकार -१ ल्यूसी माड मोंत्गोमेरी




३० नवंबर १८७४ को क्लिफटन (आज न्यू लंदन के नाम से प्रसिद्ध), प्रिंस एडवर्ड आयलैंड में जन्मी लूसी माड मोंत्गोमेरी कनाडा के

क्लासिक बाल साहित्यकारों में आज सबसे अग्रणी मानी जाती हैं. उन्होंने बच्चों के लिए २० से ऊपर उपन्यास तथा सैंकड़ों कहानियां/कविताएँ लिखीं और उनकी पहली ही कथा-कृति -एन्नी ऑफ ग्रीन गेबल्स जो १९०८ में प्रकाशित हुई, ने अपने पाठकों के बीच असाधारण सफलता प्राप्त की. एन्नी ऑफ ग्रीन गेबल्स की मुख्य पात्र एन्नी नाम की एक अनाथ बच्ची है. 

एन्नी के लोकप्रिय चरित्र को लेकर मोंत्गोमेरी ने इसी श्रंखला में आगे और भी अनेक उत्तर-कथाएं(sequels) रचीं जिन्होंने मोंत्गोमेरी को आर्थिक लाभ के साथ कनाडा के आधुनिक बालसाहित्य निर्माताओं के बीच अप्रतिम स्थान पर स्थापित .कर दिया.
मोंत्गोमेरी का बचपन ज्यादा सुखद नहीं रहा. जब वे २१ महीने की थीं तभी उनकी मां की मृत्यु हो गई . सात वर्ष की उम्र में उनके पिता भी 'प्रिंस अलबर्ट-सस्कशेवान' में जा बसे और मोंत्गोमेरी का लालन-पालन तथा शिक्षण उनके ननिहाल में हुआ. ननिहाल में भी उन्हें कड़े अनुशासन के अंदर जीवन गुजारना पड़ा. वे अकेलेपन की पीड़ा का शिकार हो गईं पर यही पीड़ा उनकी रचनात्मक शक्ति की उत्प्रेरक भी सिद्ध हुई. वे अपना ज्यादातर समय बच्चों के लिए नया-से नया लिखने और स्मरणीय चरित्र गढ़ने में गुजारती रहीं. विवाहोपरांत वे पारिवारिक तथा अपने पति की चर्च संबंधी जिम्मेदारियों को निभाती रहीं 

मोंत्गोमेरी की कुछ प्रमुख रचनाओं के नाम हैं: एन्नी ऑफ ग्रीन गेबल्स, एन्नी ऑफ अवोन्लिया, द स्टोरी ऑफ गर्ल, एन्नी'ज हाउस ऑफ ड्रीम्स,मेजिक फॉर मेरीगोल्ड, द ब्ल्यू केसल, अमोंग द शेडोज, आफ्टर मैनी देस आदि.

उत्कृष्ट लेखन के लिए मोंत्गोमेरी को अनेक सम्मान भी मिले जिनमे 'आर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर' (१९३५) प्रमुख है. इसके अलावा वे 'रोयल सोसायटी ऑफ आर्ट्स इन इंग्लैंड' की फेलो होने का सम्मान पाने वाली कनाडा की प्रथम महिला थीं. उनकी जन्मस्थली तथा ग्रीन गेबल्स से जुडे अनेक स्थानों को कनाडा की राष्ट्रीय ऐतिहासिक स्थलियों के रूप में मान्यता दी गई है जहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है. मोंत्गोमेरी की ख्याति आज कनाडा ही नहीं बल्कि विश्व के सभी देशों में फैली हुई है और उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए उनके कैवेंडिश वाले घर के पास एक राष्ट्रीय उद्यान का भी निर्माण हो चुका है. मोंत्गोमेरी की पार्थिव मृत्यु ६७ वर्ष की अवस्था में २४ अप्रैल १९४२ को टोरंटो-ओंटारियो में हुई पर वे अपनी रचनाओं के लिए पाठकों के बीच आज भी अमर हैं. उनकी अनेक रचनाएं/कृतियां व्यक्तिगत पठन-पाठन के लिए गुटेनबर्ग डॉट ऑर्ग पर निश्शुल्क उपलब्ध हैं.

pic.dredit: google

जयप्रकाश मानस की तीन चुनिन्दा बाल कविताएं





जयप्रकाश मानस बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न एवं अति-संवेदनशील कवि हैं. उनकी वयस्क कविताओं की कृति 'अबोले के बोल' जहां हाल में ही चर्चित हुई है वहीं उनकी बाल कविताओं का एक संग्रह भी यश प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है -'जयप्रकाश मानस की बाल कविताएं' .इस संग्रह से तीन  चुनिन्दा बाल कविताएं यहां प्रस्तुत हैं . तीनों बाल कविताएं आम तौर पर लिखी जा रही बाल कविताओं से अलग तो हैं ही, साथ ही बिना किसी उपदेश के पर्यावरण की दयनीय स्थिति के प्रति वे मार्मिकता के साथ हमें सचेत करती हैं: 


पंछी का मन दुखता

कुआँ है गांव में
कुएं में घटता पानी
सोचकर मछली को
है बड़ी हैरानी.

घास है जंगल में
घास भी मुरझाई
सोचकर गायों की
आंखें भर आईं.

पेड़ है पर्वत में
पेड़ भी लो सूखता
सोचकर पंछी का
मन बहुत दुखता.
____________

चलो चलें अब झील पर

टांग दें बस्ता कील पर
चलो चलें अब झील पर.

पकडें मछली बंसी डाल
सीपी, घोंघा रखें संभाल
नजर रहे पर चील पर.

जा बैठें फिर नाव में,
घूमें पानी के गांव में
नाविक काका की अपील पर.

__________________


रखते नहीं उधार खेत


सबके  पालन हार खेत
कितने समझदार खेत


देते ये फौलादी ताकत
जैसे हों लुहार खेत


अन्न, फल, फूल,सब्जी देते
सबसे बड़े उपहार खेत

जैसे बोंयें, पायें वैसे 
रखते नहीं उधार खेत.

सीखें लहलहाना इनसे
धरती का श्रृंगार खेत.


साथ निभाते जीवन भर
कृषकों के सच्चे यार खेत.

Friday, July 6, 2012

लेखक का घर -बाल नाटक-रमेश तैलंग




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चित्र सौजन्य -गूगल 

Thursday, July 5, 2012

मेरे कुछ नए शिशु/बाल- गीत



निन्ना कर लो 

चूं-चूं-चूं महारानी जी!
क्या है परेशानी जी?
भूखी हो तो दाने खालो,
प्यासी हो तो पानी पी.

चूं-चूं-चूं महारानी जी!
क्या है परेशानी जी?
रात हो गई,निन्ना करलो
छोड़-छाड शैतानी जी.
--------------------

लड्डू 

चार लड्डू लाये दादा
चार लड्डू, चार.
एक चट्टू बंदर ले गया
तेज झपट्टा मार.

तीन लड्डू लाये दादा
तीन लड्डू तीन,
एक काना कौआ ले गया
हाथों मे से छीन.

बाकी गिर कर चूरा हो गए
दो लड्डू दो.
उनको ले गई चींटी सेना
कंधे पर ढो-ढो.

दादा से फिर दादी बोली
अब काहे को रो!.
जिसका दाना, उसका खाना
मुंह ढक कर अब सो.
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मुट्ठी 

एक अंगूठा,
उंगली चार,
मिल गए तो
पंजा तैयार.
पंजा बंद,
बन गई मुट्ठी.
कर देगी अब
सबकी छुट्टी.
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आगड़ बम 

आगड़ बम,
बागड़ बम!
बारिश अभी
न जाना थम.
मस्ती का है
ये मौसम.
हमें मचाना
है धम-धम.
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मुन्ने राजा 

मुन्ने राजा बड़े हुए.
दो पैरों पर खड़े हुए.
गिरते-पड़ते चलते हैं.
पाँव न सीधे पड़ते हैं
धीरे-धीरे सीखेंगे.
पहिया-गाड़ी खींचेंगे.
सरपट-सर जब भागेंगे
सबको नाच नचा देंगे.
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ऑटो रिक्शा 

ऑटो रिक्शा आया है
होरन तेज बजाया है
तीन सवारी लाया है
पूरा शहर घुमाया है
दो सौ रुपया आने-जाने
का ले लिया किराया है.
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झुग्गी वाला बच्चा

पार्क मे जब
खेल-तमाशा  होता है.
झुग्गी वाला
वो बच्चा क्यों रोता है?
सोसाइटी का
गार्ड भगा देता उसको
छोटी-मोटी
रोज सजा देता उसको
वो भी तो है
मेरे जैसा बच्चा मां!
क्या वो  झूला
झूल नहीं सकता मम्मा?
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मजदूर 

अम्मा गिर गई छज्जे से..
बापू दब गए कर्जे से
हम भी घर से दूर हुए..
बचपन में मजदूर हुए.

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