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Monday, July 16, 2012

अंगोला के लेखक-जॉन बेला की बाल पुस्तक : "As Lagrimas do Rei-Sol" (Eng.Trans: The Tears of King-Sun) के बहाने हिंदी जगत से कुछ सवाल




जॉन बेला 




अंगोला के बाल लेखक जॉन बेला की ३६ प्रष्टों वाली एक पुस्तक "As Lagrimas do Rei-Sol" (Eng.Trans: The Tears of King-Sun) पिछले महीने बाल/किशोर पाठकों के समक्ष आई है और इस अवसर पर अनेक जगहों पर बच्चों के समूहों के बीच उन्होंने अपनी हस्ताक्षरित पुस्तकें बांटी हैं. कुल मिलाकर पुस्तक का लोकार्पण हर जगह एक भव्य समारोह का हिस्सा बना है . यह पुस्तक बाल पाठकों को प्रकृति तथा पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले मानव व्यवहार के विरुद्ध सचेत कराती है.

पर्यावरण की चिंताओं से जुडी यह बाल पुस्तक अफ्रीकन बाल साहित्य में क्या स्थान रखती है, इस सवाल को फिलहाल छोड़ भी दें तो कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर यहां मैं आपका ध्यान आकर्षण करना चाहता हूं. पहला बिंदु यह है कि इस समाचार को विस्तार से कई अफ्रीकी मीडिया यानी राष्ट्रीय/स्थानीय समाचारपत्रों/वेब साइट्स पर प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है. लगभग १०-१५ वेब साइट्स तो मैंने स्वयं ही देखी हैं. 

विदेशों में जब भी कोई बाल साहित्य की पुस्तक प्रकाशित होती है तो ऐसे आयोजन वहां के मीडिया में प्रमुखता से /प्रचारित/प्रसारित होतेहैं और उनका विपणन तंत्र इस तरह का है कि पुस्तक की बिक्री भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है, लेखक को प्रतिष्ठा/पुरस्कारों की झड़ी लग जाती है. निस्संदेह यह सहज नहीं है. पर इसके बरक्स हिंदी बाल साहित्य की महत्वपूर्ण पुस्तक भी सामने आए तो एक अजीब सा सन्नाटा फैला रहता है और मीडिया में भी उसे कोई नहीं पूछता है. पुस्तक से होने वाली आमदनी की बात तो पूछिए ही मत, वह प्रकाशित हो गई यही बड़ी बात है.

आखिर ऐसा क्या है हिंदी बाल साहित्य में जो उसे अंतर-राष्ट्रीय स्तर के बरक्स बौना साबित कर देता है जबकि बास्तव में ऐसा होना नहीं चाहिए. बच्चों के साहित्य के प्रति हिंदी जगत में इतनी संवेदनहीनता क्यों है, ज़रा सोचिये. 

यह सवाल पुस्तकों के स्तर से कहीं ज्यादा मानसिकता बदलने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है.

चित्र सौजन्य: गूगल /Journal de Angola online

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