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Friday, October 12, 2012

हिंदी के पुरोधा बाल साहित्यकार डॉ. श्रीप्रसाद का निधन

अभी-अभी मित्र डॉ.प्रकाश मनु के सूत्र से एक हृदयविदारक समाचार मिला कि हिंदी के पुरोधा बाल साहित्यकार डॉ. श्री प्रसाद का देहांत हो गया. सूचना के अनुसार वे यहां मेक्स हॉस्पिटल साकेत में ह्रदय चिकित्सा कराने आए थे. वैसे वे स्वस्थ, कर्मठ और पहले
 की तरह रचनारत थे.पर ईश्वर के विधान को कौन जान सकता है. मेरी तथा पूरे बाल साहित्य प्रेमियों के परिवार की ओर से दिवंगत आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि.





काशी के बाबा थे






एक वरद हस्त थे
हंसमुख और मस्त थे
कविताएं रचते थे
कहानियां कहते थे
जहां बैठ जाते थे 
मेला लगाते थे 
खुलकर बतियाते थे 
खेला रचाते थे
बच्चों के दादा थे 
दादा से ज्यादा थे 
बिना कहे चले गए
हम सब तो छले गये,
काशी के बाबा थे 
क्या बोलें, क्या-क्या थे
कहां गया वो खेला?
कहां गया वो मेला?

बाबा कुछ तो बोलो,
दादा कुछ तो बोलो,
ऐसे क्यों चुप हुए?
नज़रों से गुम हुए,
विदा करें हम कैसे?
जाते हैं क्या ऐसे?

र.तै. 12-10-2012







4 comments:

  1. कविता का एक-एक शब्द पढ़ते हुए श्री प्रसाद नानाजी का चेहरा और उनकी बातें मेरे सामने जीवित हो जा रही हैं और मुझे रुलाई आ रही है .... हाँ, बिलकुल ऐसे ही थे हम बच्चों के प्रिय डॉ श्री प्रसाद नानाजी... इस फोटो में बगल में मैं ही बैठी हूँ और नानाजी बड़े प्रेम से अपनी कविताएँ हमें सुना रहे थे... अब तो बस स्मृतियाँ शेष हैं ...उन्हें शत-शत नमन !!!

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  2. पिछले तकरीबन बारह सालों से उनके संपर्क में थी मैं.जब भी मिलते ढेरों नई-पुरानी कवितायें सुनाते. कभी-कभी तो उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए रोकना भी पड़ता. लेकिन बच्चों को अपनी कविताएँ सस्वर सुनाने में उन्हें असीम आनंद मिलता था.कल जब से उन्हें शांत , निष्प्राण देख कर लौटी हूँ बड़ा कष्ट हो रहा है.रमेश जी आभार आपको....इस सूचना का संप्रेषण अपने ब्लॉग के माध्यम से करने के लिए.

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