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Friday, November 23, 2012

प्रिय पौत्री "प्लाक्षा" की शिकायत : कविता - २







गालों में उंगलियां  फंसा कर
पता नहीं  कैसी लगती हूं.
सच्ची-सच्ची कहना मुझसे, 
अच्छी या बुद्धू लगती हूं.

मिची-मिची सी दोनों आंखें,
दांतों की पतली सी रेखा.
पापा ने फोटो खींची तो 
जल्दी में ये भी न देखा.

अब जो भी है मुझे देखता
कहता है - ए,गुच्ची-पुच्ची.
सुनते ही आ जाता मुझको  
झूठा गुस्सा सच्ची-मुच्ची.


रमेश तैलंग /२४-११-२०१२ 

प्रिय पौत्री "प्लाक्षा" के लिए कविता -1




अहा! पेड़ ये कितना सुंदर 
ज्यों अंग्रेजी का 'वी' अक्षर..

बड़ी शान से खड़ी 'प्लाक्षा'
लाल सूट और बूट पहनकर

माथे पर लट खेल रही है
मुस्काती वह देख रही है.

पेड़ दोस्त लगता है उसका
छुटकी के संग जैसे छुटका.







- रमेश तैलंग /24.11.2012

Friday, November 16, 2012

बाल नाटक - रास्ते का पत्थर :: रमेश तैलंग






रास्ते का पत्थर

पात्र:  राजा
राहगीर -1
राहगीर -2
राहगीर -3
राहगीर -4
किसान  


(सुविधा के लिए राहगीर -1 और राहगीर -2 ही वेशभूषा बदल कर राहगीर -3 और राहगीर -4 की भूमिका निभा सकते हैं.)

दृश्य : बाहर एक सामान्य सड़क. सड़क के दोनों ओर कुछ झाडियाँ हैं जिनके पीछे एक आदमी आसानी से छुप सकता है. समय सायंकाल.

(राजसी पोशाक में राजा खाली सड़क के बीचों-बीच एक पत्थर का विशाल टुकड़ा रखकर झाड़ी के पीछे छुप जाता है और उस सड़क से गुजरने वाले राह्गीरों की प्रतिक्रिया देखता है. पहला राहगीर सड़क की बाईं ओर से आता है और बीच रास्ते में इतने बडे पत्थर को देखकर झुंझलाता है)
राहगीर-1 : उफ़, ये कौन बेवकूफ है जो रास्ते के बीचों-बीच इतना बड़ा पत्थर अड़ा कर  चला गया. अगर भूले-भटके मैं इस पत्थर से टकरा जाता तो अपने हाथ-पैर जरूर तोड़ लेता.
(तभी सड़क की दायीं ओर से दूसरा राहगीर आता है)
राहगीर -2:  क्या बात है भाई, क्यों चिल्ला रहे हो इतनी जोर से?
राहगीर -1 : (चिढकर) दिखता नहीं क्या, रास्ते के बीचोंबीच इतना बड़ा पत्थर जो पड़ा है?
राहगीर -2 : हां, हां, दिख तो रहा है, मैं कोई अंधा थोड़े ही हूं. पर इस तरह भुनभुनाकर किस पर गुस्सा निकाल रहे हो?
राहगीर -1 : तुम्हारे ऊपर! क्या पता, तुमने ही रखा हो यह पत्थर?
राहगीर-2 : मैं क्यों रखूंगा भला?
राहगीर -1 : बेवकूफों की कमी थोड़े ही है इस दुनिया में.
राहगीर -2 : अच्छा, तो अब मैं बेवकूफ भी हो गया.
राहगीर -1 : और नहीं तो क्या. समझदार होते तो इस पत्थर को हटा चुके होते अब तक.
राहगीर -2 : (व्यंग्य से) वाह! मैं क्यों हटाऊँ? मैंने  थोड़े ही रखा है इसे. तुम चाहो तो हटा दो.
राहगीर -1 : (सकपकाकर) म...म...म...मैं ..क्यों हटाऊँ? पड़ा रहे यहीं, मेरी बला से.
राहगीर -2 : (घृणा  से राहगीर-1 को देखते हुए) हंह..और मैं भी क्यों हटाऊँ..पड़ा रहे यहीं...मेरी बला से.

( दोनों राहगीर पत्थर को वहीं छोड़कर अपने-अपने रास्ते चल देते हैं, तभी तीसरा राहगीर लड़खड़ाते क़दमों से आता है और पत्थर के ठीक सामने
अभिवादन की मुद्रा में खड़ा हो जाता है.)

राहगीर -3 : नमस्कार! नमस्कार! ठीक-ठाक हो भाई? बीच रास्ते में अड़े-पड़े हो. तनिक परे हट जाते तो ठीक रहता. वो क्या है, अपन को थोड़ी जल्दी है घर जाने की. समझ रहे हो ना?

(थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करता है, फिर लडखडाती जबान में बोलता है)

उंह, लगता है, नहीं समझे. चलो कोई बात नहीं, मैं ही परे होकर चला जाता हूं. आप जमे रहो, अ...रा..म से जमे रहो. भगवान ने चाहा तो फिर यहीं ...मिलेंगे... टा..टा!

(तभी चौथा राहगीर आता  है और रास्ते में इतने बडे पत्थर को देखकर चौंक जाता है)

राहगीर -4 : (आश्चर्य से) अरे बाप रे, ये गिरिराज जी यहां क्या कर रहे हैं. गोवर्धन में मन नहीं लगा क्या, जो इस सुनसान में आकर बीचों-बीच विराज गए हैं. चलो, लगे हाथ इनकी तीन परकम्मा ही दे डालें, क्या पता कुछ कृपा हो जाए महाराज की हम पर भी. आजकल कुछ ज्यादा ही कड़की चल रही है.)
(दर्शकों की ओर देखकर एक आंख दबाता है और तीन परिक्रमा लगाकर
गाना गाते हुए आगे बढ़ जाता है)

हे गोवर्धन महाराज!
तेरे माथे
मुकुट विराज रह्यो.
तो पे फूल चढ़े
तो पे पान चढ़े
तो पे चढ़े दूध की धार
तेरे माथे
मुकुट विराज रह्यो...

( राहगीर -4 के अदृश्य होते ही एक किसान अपने सिर पर गठरी लादे हुए आता  दिखाई देता है. रास्ते में इतना बड़ा पत्थर देखकर दूर ही ठगा-सा खड़ा रह जाता है. फिर अपने सिर की गठरी नीचे उतारकर आगे बढ़ता है और पत्थर को दोनों हाथों से धकेल कर रास्ते के एक ओर करने की कोशिश करता है)

मंच पर प्रकाशवृत्त घूमकर थोड़ी देर के लिए झाडी के पीछे छिपे राजा के ऊपर केंद्रित होता है. राजा के चेहरे पर किसान के लिए प्रशंसा के भाव साफ़ नज़र आते हैं.
किसान पत्थर को रास्ते के एक ओर धकेल देने के बाड़ अपनी गठरी के पास आकर बैठ जाता और गमछे से अपने माथे का पसीना पोंछता है. जरा-सा विश्राम करके वह सिर पर गठरी लादता है और आगे बढ़ने लगता है, तभी रास्ते में पड़े पत्थर की जगह उसे सोने के सिक्कों से भरी थैली दिखाई देती है. सिर की गठरी उतारकर वह फिर ठिठक कर खड़ा हो जाता है और आश्चर्य से थैली उठाकर अपने चारों ओर देखता है.

किसान : हे रामदेव बाबा, अब ये कौन-सी मुसीबत पड़ गई?
तभी राजा झाड़ी के पीछे से निकलकर सामने आता है
और किसान की पीठ थपथपाते हुए कहता है)

राजा :  मुसीबत नहीं, यह सोने के सिक्कों से भरी थैली है भाई, तुम्हारी मेहनत का इनाम!
किसान : पर अन्नदाता, मैंने क्या किया है जो ........?
राजा : अरे तुमने तो वह काम किया है जो अब तक यहां से गुजरने वाले किसी भी राहगीर ने नहीं किया. यह पत्थर बीच रास्ते में न जाने कब से पड़ा हुआ है पर सब इसे देखकर चले गए. किसी ने भी इसे यहां से हटाने की कोशिश नहीं की. तुम सचमुच मेहनती और दयालु किसान हो और इस ईनाम के सच्चे हकदार भी. इसे रख लो, मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूं.



         (किसान कृतज्ञता से राजा के पैरों में झुकता है. पर्दा गिरता है)

images: google.   











Thursday, November 15, 2012

सूर्य कुमार पाण्डेय की बालकविता- गांव के बच्चे








उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बसे श्री सूर्य कुमार पाण्डेय देश के प्रतिष्ठित, जाने-माने व्यंग्य लेखक एवं बाल कवि है. उन्होंने बच्चों के लिए काफी-कुछ लिखा है. यहां प्रस्तुत है उनकी एक बहुत ही प्यारी बाल कविता - गांव के बच्चे.  इस बाल कविता में उन बच्चों की जिंदगी और कार्यकलापों का जीवंत चित्रण हैं जो ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े हैं: