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Friday, November 23, 2012

प्रिय पौत्री "प्लाक्षा" की शिकायत : कविता - २







गालों में उंगलियां  फंसा कर
पता नहीं  कैसी लगती हूं.
सच्ची-सच्ची कहना मुझसे, 
अच्छी या बुद्धू लगती हूं.

मिची-मिची सी दोनों आंखें,
दांतों की पतली सी रेखा.
पापा ने फोटो खींची तो 
जल्दी में ये भी न देखा.

अब जो भी है मुझे देखता
कहता है - ए,गुच्ची-पुच्ची.
सुनते ही आ जाता मुझको  
झूठा गुस्सा सच्ची-मुच्ची.


रमेश तैलंग /२४-११-२०१२ 

1 comment:

  1. हमें आप पसंद आयीं ...सच्ची मुच्ची
    सुंदर कविता

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