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Saturday, December 15, 2012

नानी की चिठ्ठी -4 (16 दिसंबर-2012)



मेरे प्यारे चम्पू, पप्पू, टीटू, नीटू, गोलू, भोलू, किट्टी, बिट्टी, चिंकी, पिंकी, लीला, शीला, लवली, बबली! खुश रहो और जुग-जुग जियो.

          आज मेरा मन सचमुच बहुत ही विचिलित है. जिस घड़ी से अमेरिका में  20 बच्चों के शूट आउट में मरने का समाचार मिला है उसे पढ़-सुन कर कलेजा कांप उठा है. यह पहली घटना नहीं है.  जैसा कि वहां के महामहिम राष्ट्रपति ओबामा ने भी इस हादसे पर गहरा दुःख प्रकट करते हुए कहा है. मैं तो हैरान हूं कि बच्चों द्वारा बच्चों की हत्या करने के कौन से कारक  हैं जो उन्हें इस तरह की घटनाओं ओर ले जाते हैं. क्या उन्हें हथियार इतनी आसानी से उपलब्ध हैं. क्या उनके दिमाग में हिंसा इतनी बलवती होती जा रही है? क्या उनके मन में प्रेम, दया, संवेदना और सहिष्णुता बिलकुल सूखती जा रही है? ये ऐसे कई सवाल हैं जो मेरे मन को बुरी तरह से मथ रहे हैं. और जानते हो, जो बच्चे इस हादसे का शिकार हुए हैं उनकी उम्र क्या है - 5 से 10 वर्ष. च..च..च..कैसा ज़माना आ गया है. और अमेरिका ही क्यों, अफगानिस्तान, इराक, सियरालोन में भी बच्चों के साथ जैसे अमानवीयता बरती जा रही है उसे देख कर कलेजा दहल उठता है.

          मुझे तो लगता है मेरे नन्हें मुन्नो, अगर एक भी बच्चा ऐसे हादसे में मरता है तो हमारा पूरा भविष्य मरता है. कल-परसों की ही बात है, एक खबर पढ़ रही थी, सेन्ट्रल अफ्रीका रिपब्लिक में CPRJ नाम का एक  विद्रोही लड़ाकू समूह है जिसमें   ऐसे कई बच्चे हैं जिनका बचपन जंगी हथियारों की आग में झोंक दिया गया है. इन बच्चों में से कुछ बच्चों को मुक्त कराने के लिए जब यूनिसेफ के कुछ प्रतिनिधि वहां पहुंचे तो बड़ी मुश्किल से एक बच्चे को मुक्त करा सके और उसे उन बच्चों में शामिल कर सके जिन्हें उन्होंने पहले मुक्त कराया था .

          बाल सैनिकों का मुद्दा अंतर-राष्ट्रीय मंचों पर वर्षों  से उठाया जा रहा है पर इस दानव का अंत होता ही नहीं दिखाई देता. मेरा तो क्या है, नन्हे-मुन्नो, मैं तो ठहरी पका हुआ पात, पता नहीं कब डाल से टूट कर बिखर जाऊं, पर तुम सब तो पूरे मानव जगत की आशा हो, इस बात पर अच्छी तरह से सोचो और सामूहिक रूप से इस मुद्दे को सभी उपलब्ध राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाओ. चिट्ठियां लिखो, प्रतिरोध करो, प्रदर्शन करो और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का हर संभव प्रयास करो. सिर्फ स्कूली पढाई तक ही अपने को सीमित नहीं रखो. दुनिया तेजी से बदल रही है. पहले भी बच्चों ने ही बड़ों को दिशा दी है और आगे भी वे ही दिशा देंगे.

          मेरा मन तो कर रहा था कि तुम्हें कुछ ऐसे बच्चों की कहानियां सुनाऊं जिन्होंने अपने कारनामों से इतिहास ही रच दिया पर अभी लग रहा है जैसे इस हादसे का दिन  अंतर्राष्ट्रीय विषाद दिवस बन गया है. इस विषाद से उबरते ही अगली चिठ्ठी में तुम्हें एक ऐसी जर्मन  यहूदी बच्ची की कहानी सुनाऊंगी जो द्वितीय विश्व युद्ध के आस पास तत्कालीन शासक हिटलर के फौजी आक्रान्ताओं से बचकर लगभग दो साल तक गुप्तावास में छिपी रही और उसके ऊपर जो गुजरी उसे अपनी डायरी  में लिखती रही.आज वह डायरी  एक क्लासिक पुस्तक के रूप पूरे विश्व में लोक़प्रिय हो चुकी है और उसके अनुवाद अनेकानेक भाषाओं में हो चुके हैं...अब तुम समझ ही गए  होगे कि वह बहादुर यहूदी लड़की एन फ्रैंक थी और पुस्तक का नाम है: एन फ्रैंक : द डायरी ऑफ  ए यंग  गर्ल.

          कभी-कभी मुझे लगता है, हमने अब तक जितना भी जाना है वह बहुत ही कम है और जितना नहीं जाना है वह बहुत ज्यादा. क्या तुम्हें भी ऐसा ही लगता है, बताना जरूर . अब अगली चिठ्ठी तक तुम करो इंतज़ार और मैं देती हूं तुम सबको अपना ढेर सा आशीर्वाद.

तुम्हारी अपनी नानी.


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