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Saturday, December 21, 2013

किताबें नहीं हैं तो यहाँ पढ़िए : कुछ नटखट शिशुगीत - रमेश तैलंग

बकरी


में..में..बकरी मटक-मटक.
चली तो रस्ता गई भटक .
ब..ब..बचाओ! गले से उसके..
बोली निकली अटक-अटक..

******

घोडा

टिक-टिक-घोडा टिम्मक-टिम.
चलता डिम्मक-डिम्मक-डिम.
जिसने छोड़ी ज़रा लगाम.
धरती पर आ गिरा धडाम.

********



कबूतर

उड़ा कबूतर ऊपर-ऊपर
कित्ते ऊपर? इत्ते ऊपर!
नीचे कब तक आएगा?
उड़कर जब थक जाएगा!

*********

मुट्ठी

एक अँगूठा, उँगली चार
मिल जाएँ पंजा तैयार
पंजा बंद तो बन गई   मुठ्ठी
कर देगी अब सबकी छुट्टी.


- रमेश तैलंग  
+91 9211688748 

Tuesday, December 10, 2013

सुनो कहानी - मनोहर चमोली 'मनु' से



अगली बार जरूर आना

मनोहर चमोली ‘मनु’


अनुभव चिल्लाया-‘‘मम्मी! यहाँ आओ। देखो न, ये नई चिडि़या हमारे घर में घुस आई है। इसकी पूँछ दो मुँह वाली है।’’
अमिता दौड़कर आई। खुशी से बोली-‘‘अरे! ये तो अबाबील है। प्रवासी पक्षी। दूर देश से आई है। ये हमेशा यहाँ नहीं रहेगी। कुछ महीनों बाद ये वापिस अपने वतन चली जाएगी।’’
अनुभव सोचने लगा-‘‘इसका मतलब ये विदेशी चिडि़या है। भारत में घूमने आई है। मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूँगा।’’
अबाबील का जोड़ा मेहनती था। दोनों ने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने घर की बैठक वाले कमरे का एक कोना चुन लिया था। छत के तिकोने पर दोनों ने मिलकर घोंसला बना लिया।
अमिता ने अनुभव से कहा-‘‘अबाबील ने कितना सुंदर घोंसला बनाया है। अब हम इन्हें झुनका और झुनकी कहेंगे।’’
अनुभव ने पूछा-‘‘मम्मी। ये अपनी चोंच में क्या ला रहे हैं?’’

pic.credit: google

अमिता ने बताया-‘‘झुनकी अंडे देगी। घोंसला भीतर से नरम और गरम रहेगा। इसके लिए झुनका-झुनकी घास-फूस के तिनके, पंख और मुलायम रेशे ढूँढ-खोज कर ला रहे हैं।’’ यह कहकर अमिता रसोई में चली गई।
अनुभव ने मेज सरकाया। उस पर स्टूल रखा। स्टूल पर चढ़ कर अनुभव ने छतरी की नोक से झुनका-झुनकी का घोंसला तोड़ दिया। झुनका-झुनकी चिल्लाने लगीं। कमरे के चारों ओर मँडराने लगीं।
‘‘अनुभव। ये तुमने अच्छा नहीं किया। चलो हटो यहाँ से।’’ अमिता दौड़कर रसोई से आई और टूटा हुआ घोंसला देखकर अनुभव से बोली।
विदेशी चिडि़या की वजह से मुझे डाँट पड़ी है। अनुभव यही सोच रहा था।
शाम हुई तो अमिता ने अनुभव को चाय-नाश्ता देते हुए कहा-‘‘झुनका-झुनकी फिर से अपना घोंसला उसी जगह पर बना रहे हैं। घास-फूस और गीली मिट्टी चोंच में ला-लाकर वह अपना घोंसला बनाते हैं। तिनका-तिनका जोड़ते हैं। देखो। बेचारे दोबारा मेहनत कर रहे हैं। सिर्फ तुम्हारी वजह से। शुक्र है कि वे हमारा घर छोड़कर कहीं ओर नहीं गये।’’ यह सुनकर अनुभव चुप रहा। फिर मन ही मन में सोचने लगा-‘‘मैं झुनका-झुनकी को किसी भी सूरत में यहाँ नहीं रहने दूँगा। मैं इनका घोंसला बनने ही नहीं दूँगा।’’
झुनका-झुनकी ने बिना थके-रुके दो दिन की मशक्कत के बाद घोंसला तैयार कर लिया। अनुभव अपने दोस्त से गुलेल माँग कर ले आया। उसने गुलेल स्टोररूम में छिपा दी। झुनका-झुनकी दिन भर चहचहाते। फुर्र से उड़ते हुए बाहर निकलते। बैठक के दो-तीन चक्कर लगाते। फिर एक-एक कर घोंसले के अंदर घुस जाते।
एक दिन अमिता ने अनुभव को बताया-‘‘लगता है झुनकी ने अंडे दे दिये हैं। देखो। झुनका चोंच में कीड़े-मकोड़े पकड़ कर ला रहा है। कीट-पतंगे और केंचुए इनका प्रिय भोजन है। पंद्रह-बीस दिनों के बाद घोंसले से बच्चों की चीं-चीं की आवाजें सुनाई देने लगेंगी।’’
अनुभव सोचने लगा-‘‘मेरा निशाना पक्का है। बस एक बार गुलेल चलाने का मौका मिल जाए। मैं घोंसला अंडों समेत नीचे गिरा दूँगा।’’
फिर एक दिन घोंसले से बच्चों की चींचीं की आवाजें आने लगीं। अनुभव दौड़कर आया। घोंसले से आ रही आवाजों को सुनने लगा।
‘‘अब कुछ ही दिनों में बच्चे घोंसले से बाहर निकल आएँगे।’’ अमिता ने अनुभव से कहा। अनुभव मन ही मन बुदबुदाया-‘‘कुछ भी हो। आज रात को मैं घोंसला तोड़ कर ही दम लूँगा।’’
रात हुई। अनुभव चुपचाप उठा। स्टोररूम से गुलेल निकाल कर वह घोंसले के नजदीक जा पहुँचा। वह अभी निशाना साध ही रहा था कि झुनका-झुनकी चींचीं करते हुए अनुभव पर झपट पड़े। अनुभव के हाथ से गुलेल छिटक कर सोफे के पीछे जा गिरी। अनुभव उछलकर सोफे पर जा चढ़ा।
‘‘अनुभव बच कर रहना। देखो सोफे के सामने कितना बड़ा बिच्छू है।’’ अंकिता खटका सुनकर बैठक वाले कमरे में आ चुकी थी। दूसरे ही क्षण झुनका-झुनकी ने बिच्छू को चोंच मार-मार कर जख्मी कर दिया। झुनका बिच्छू को चोंच में उठा कर घोंसले में ले गया। अनुभव डर के मारे काँप रहा था।
अमिता ने कहा-‘‘ अनुभव तुम बाल-बाल बच गए। वह बिच्छू तो खतरनाक था। अब तक झुनका-झुनकी के बच्चे बिच्छू को अपना भोजन बना चुके होंगे। यदि बिच्छू कहीं छिप जाता तो बड़ी मुश्किल हो जाती।’’ अनुभव ने राहत की साँस ली।
दिन गुजरते गए। अनुभव स्कूल आते-जाते घोंसले पर नज़र जरूर डालता। अब वह बैठक वाले कमरे में ही पढ़ाई करता। एक शाम अमिता ने कहा-‘‘अनुभव। मैं बाजार जा रही हूँ।’’
अनुभव को इसी पल का इंतजार था। वह दौड़कर गुलेल ले आया। घोंसला निशाने पर था। इस बार उसका निशाना चूका नहीं। घोंसला भर-भराकर नीचे आ गिरा। ढेर में मिट्टी, पँख, घास-फूस के अलावा कुछ नहीं था। अमिता देर शाम घर लौटी और सीधे रसोई में खाना बनाने चली गई। खाना खाकर सब सो गए।
सुबह हुई। अमिता ने उठकर बैठक की सफाई की। अनुभव उठा तो वह डरता हुआ बैठक के कमरे में जा पहुँचा। अमिता ने कहा-‘‘अनुभव बेटा। झुनका-झुनकी का घोंसला न जाने कैसे टूट गया।’’
अनुभव ने कहा-‘‘ मम्मी लगता है कि वे अपने बच्चों समेत अपने देश वापिस लौट गए।’’
अमिता उदास हो गई। अनुभव से बोली-‘‘हाँ। लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि तुम झुनका-झुनकी के बच्चों को देख नहीं पाए। तुम्हारे स्कूल जाने के बाद और तुम्हारे स्कूल आने से पहले वे सब बैठक में यहाँ-वहाँ खूब उड़ते थे। कई बार रसोई में भी आ जाते थे। लेकिन जब भी तुम घर में होते, तो वे बच्चे घोंसले में ही रहते। पता नहीं क्यों? लगता है वे तुमसे बेकार में डरते ही रहे।’’
यह सुनकर अनुभव को हैरानी हुई। कुछ ही देर में उसे महसूस होने लगा कि घर सूना-सूना सा लग रहा है। वह मुस्कराया और मन ही मन कहने लगा-‘‘साॅरी झुनका-झुनकी। अगली बार फिर आना और हमारे घर ही आना। मैं इंतजार करुँगा।’’
अनुभव चुपचाप स्टोररूम में गया। गुलेल एक कोने में पड़ी थी।
‘‘ये सब इस गुलेल की वजह से हुआ है।’’ यह सोचते हुए अनुभव ने गुलेल उठाई और उसे दोस्त को वापिस करने के लिए घर से निकल पड़ा।

Thursday, August 8, 2013

फ़िल्मी बातें - आज शुक्रवार है

इस शुक्रवार देखिये एनसीईआरटी के शिक्षा प्रौद्योगिकी केन्‍द्र द्वारा  यूनिसेफ और यूनेस्‍को की मदद से बनाई गई यह शिक्षा प्रद लघुफिल्म -'किशन का उड़नखटोला'. इसे फेसबुक के माध्यम से सुझाया है मेरे प्रिय मित्र एवं अजीमप्रेमजी फाउन्डेशन में संपादक के रूप में कार्यरत राजेश उत्साही ने. link hai: -

http://teachersofindia.org/hi/video/%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%89%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%A8%E0%A4%96%E0%A4%9F%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%BE#.UgMXkmm0560.facebook



(abhaar : teachers of india.org)






Thursday, July 25, 2013

फ़िल्मी बातें -आज शुक्रवार है

एक थे जॉन चाचा



बीती शताब्दी के छठे दशक में एक ऐसी यादगार फिल्म प्रदर्शित हुई जिसने  सड़क पर भीख मांगते बच्चों को आत्म सम्मान से जीने का रास्ता दिखाया और श्रम के महत्त्व का एक शाश्वत सन्देश दिया. यह फिल्म थी  बूट पॉलिश
शंकर -जयकिशन का कर्णप्रिय सदाबहार संगीत, और अपने समय के श्रेष्ठ बाल कलाकार बेबी नाज़ और मास्टर रतन  के साथ मंजे हुए अभिनेता डेविड की बेहतरीन कलाकारी ने दर्शकों का मन मोह लिया.. इस फिल्म के गीत और संगीत  जितने लोकप्रिय हुए उनसे कहीं अधिक मशहूर हुआ डेविड का जॉन चाचा वाला अद्भुत चरित्र. जो बच्चों को इस तरह भाया कि आज भी उनकी स्मृति से उसे मिटाया नहीं जा सकता.


डेविड ने इस फिल्म में एक ऐसे लंगड़े व्यक्ति की भूमिका अदा की ,जो पियक्कड़  और जेबकतरा होते हुए भी  बच्चों के प्रति प्रगाढ़ स्नेह रखता है.  बाल कलाकार  नाज़ और मास्टर रतन ने  क्रमशः बेलू और भोला नाम से दो ऐसे अनाथ बाल चरित्रों को परदे पर जिया जिनके माता-पिता  हैजा से मरते वक्त उन्हें  कमला नाम की स्त्री  के दरवाजे पर छोड़ जाते है और जो उनसे  सड़क पर भीख मांगने का धंधा कराती है. जब इन दो बच्चों की मुलाक़ात जॉन चाचा से  होती है तो वे उन्हें भीख मांगने की बजाय  बूट पॉलिश करने और श्रम के ज़रिये  आत्म सम्मान से जीने की प्रेरणा देते है. 
याद कीजिये ये प्रेरणास्पद गीत

नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है,
मुट्ठी में है तकदीर हमारी.......
.....
जॉन चाचा तुम कितने अच्छे
तुम्हे प्यार करते सब बच्चे....

बूट पॉलिश फिल्म को  कान्स फिल्म समारोह के लिए नामांकित किया गया जिसमें   दोनों बाल कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय की विशेष सराहना की गई.
जॉन चाचा  की भूमिका के लिए डेविड को फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता पुरस्कार दिया गया. अपने लगभग चालीस साले के फ़िल्मी करिएर में  डेविड ने एक सौ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया पर उनकी सहृदय चाचा वाली छवि ही दर्शकों को सदा लुभाती रही.




नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है'  के अलावा, डेविड पर फिल्माया गया एक और गीत लपक-झपक तू आ रे बदरवा  जो मन्नाडे की आवाज में था भी बेहद लोकप्रिय हुआ (http://www.youtube.com/results?search_query=lapak+jhapak+tu+aa+re+badarwa&oq=lapak&gs_l=youtube.1.0.0l6j0i10j0l3.1495.2017.0.7753.5.2.0.0.0.0.1145.1919.6-1j1.2.0...0.0...1ac.1.11.youtube.W1_W8B6q64M)

बूट पॉलिश. फिल्म के निर्देशक के रूप में हालांकि औपचारिक रूप से प्रकाश अरोड़ा का नाम क्रेडिट लाइन में गया  पर अब यह तथ्य सर्व विदित है कि इसका असली निर्देशन स्व. राज कपूर ने ही किया और फिल्म को व्यावसायिक रूप से एक नया जीवन दिया.
डेविड का पूरा नाम डेविड अब्राहम श्युलकर था. वे यहूदी थे. उनका जन्म 1909 में हुआ और 71 वर्ष की आयु में २८ दिसंबर, 1981 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए. डेविड की चमकती हुई  खल्वाट, छोटा कद, मुस्कराता चेहरा, सुतवां नाक, और बड़ी-बड़ी आँखें आज भी उनके प्रशंसकों  को भुलाए नहीं भूलती.
कहा तो ये जाता है कि उन्होंने गंजों का एक  क्लब भी बनाया हुआ था  . सच कुछ भी हो पर उनके आकर्षक व्यक्तित्व और हाजिर जवाबी के किस्से कईयों की स्मृति में आज भी जिंदा होंगे.. डेविड बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे, वाशिंगटन में बसी उनकी पौत्री एन.रयूबेन के शब्दों में वे (डेविड) भारतीय फिल्मों के बॉब होप थे. यही नहीं डेविड  अनेक राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय समारोह, जिनमें पहला फिल्मफेयर सम्मान समारोह भी शामिल है, के सूत्रधार और अंतर-राष्ट्रीय कुश्ती के रेफरी भी रहे. पर जहाँ तक बच्चों का सवाल है, उनके लिए वे जॉन चाचा थे, जॉन चाचा हैं, और जॉन चाचा ही रहेंगे
-         रमेश तैलंग

सन्दर्भ सामग्री सौजन्य
http://www.washingtonpost.com/lifestyle/style/shalom-bollywood-reveals-indian-cinemas-surprising-stars-of-its-golden-age/2013/04/18/d043967c-a833-11e2-b029-8fb7e977ef71_story.html      


चित्र सौजन्य गूगल सर्च 

Saturday, July 20, 2013

बालरंगमंच -आज रविवार है


भारत में बालरंगमंच की पहचान


बाल्रंग्मंच की एक कार्यशाला 

          बच्चों की शिक्षा में रंगमंच की भूमिका और नाटकों के महत्त्व को विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में ही पहचान लिया था और पश्चिम बंगाल स्थित अपने शान्तिनिकेतन विद्यापीठ में इस कलारूप को समुचित स्थान दे दिया था. उन्होंने बच्चों के लिए स्वयं शैक्षिक महत्त्व वाले नाटक लिखे और शिक्षा में इसे एक अनिवार्य विषय भी बना दिया.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 
          लगभग उसी समय तमिलनाडु में शंकरदास स्वमिगल ने समरस सन्मार्ग सभा तथा तत्त्व मिनालोचनी विद्या बालसभा  तथा कर्नाटक में गुब्बी वीरन्ना ने चलित बालमंच की स्थापना कर बच्चों को रंगमंच की शिक्षा देने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पहल की. महाराष्ट्र में जी.आर.शिर्गोप्पिकर ने ग्रामीण बच्चों को इकठ्ठा कर आनंद संगीत मण्डली बनाई और अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर बाल कलाकारों को नाटक एवं रंगमंच के क्षेत्र में प्रवीण किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, जिन्हें बच्चे और जो बच्चों को सदैव प्रिय रहे, ने  देश में अनेक जगह नाट्यशालाओं की स्थापना के लिए प्रोत्साहन दिया  जिसक एक महत्वपूर्ण उदाहरण   कोलकाता स्थित 'चिल्ड्रेन'स लिटिल थिएटर'  भी  है.
          बीसवीं शताब्दी के छठे दशक के बाद इस दिशा में और ज्यादा जागृति हुई. चिल्ड्रेन'स थिएटर की दुनिया में आज कई ऐसे  नाम हैं जिन्होंने हाशिये पर पड़े और विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए उपयुक्त रंगमंच तैयार किया और उनसे लगातार ऐसे नाटकों को अभिनीत कराया जो उनमें न केवल अभिनय कला की निहित संभावनाओं को विकसित कर सकें बल्कि बाल-रंगमंच के महत्त्व को एक अलग कलारूप की तरह स्थापित भी कर सकें. हालांकि, यह भी सच है कि यह काम देश में अभी तक अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका और इसके पीछे समर्पण, संसाधन, तथा जनजागृति की कमी जैसे अनेक कारण रहे हैं जो सर्व विदित हैं.

बैरी जॉन 

          बाल रंगमंच की इस विकास यात्रा में, 'थिएटर एक्शन ग्रुप' के बेरी जॉन, गुजराती अभिनेता प्रानसुख नायक, तमिलनाडु के वेलु श्राव्णन,एम् रामास्वामी,कर्णाटक के नीनासम, शालरंगा,  पश्चिम बंगाल के नन्दिकर,तथा ज़रीन चौधरी के अलाबा   रामगोपाल बजाज,कुछ और भी ऐसी प्रतिष्ठित नाम है जैसे -अनुपम खेर, रामगोपाल बजाज, (स्व.) रेखा जैन, देवेन्द्रराज अंकुर, अब्दुल लतीफ़ खटाना, युवराज शर्मा, राजेश तैलंग, अभिषेक गोस्वामी, राजू रॉय, आदि,

(स्व.) रेखा जैन 

जिनका योगदान अविस्मरणीय है, तथा जिन्होंने बच्चों के साथ अभिनय की अनेक कार्यशालाएं की  और आज भी इस क्षेत्र में लगातार नित-नए प्रयोग कर रहे हैं.
..... जारी ...

- रमेश तैलंग 

इनपुट सौजन्य -www.indianetzone.com/59/childrens_theatre_india.htm
चित्र सौजन्य-google.
-अगली कड़ी में पढ़िए : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की 'चिल्ड्रेन थिएटर में महत्वपूर पहल' और थिएटर इन एड्यूकेशन का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कार रंगटोली का इस दिशा में अप्रतिम योगदान.  





Thursday, July 18, 2013

फ़िल्मी बातें - आज शुक्रवार है


भारतीय बाल चलचित्र समिति 
(Children's Film Society of India)
द्वारा १९५६ में प्रदर्शित पहली बाल फिल्म 
 'जलदीप'



           फिल्मों की बात हो और वह भी बच्चों की फिल्मों की तो चिल्ड्रेन'स फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया  का नाम आगे न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. एक तरह से देखा जाए तो स्वतंत्र भारत में बच्चों के लिए सिनेमा  की अवधारणा और बाल फिल्मों का इतिहास ही चिल्ड्रेन'स फिल्म सोसायटी के इतिहास से शुरू होता है. इससे पूर्व बाल फ़िल्में पारिवारिक फिल्मों का ही हिस्सा मानी जाती रही और उनकी कोई स्वतंत्र पहचान भारत में बनी तो सी.ऍफ़.एस.आई के जन्म के साथ ही बनी.  सी.ऍफ़.एस.आई द्वारा मशहूर सिने-लेखक/गीतकार/निर्देशक केदार शर्मा के निर्देशन में बनी और  सन १९५६ में प्रदर्शित श्वेत-श्याम बालफिल्म 'जलदीप' को स्वतंत्र भारत में बनी पहली बाल फिल्म का दर्ज़ा प्राप्त है, हालांकि कुछ लोग सन १९३० में प्रदर्शित वी.शांताराम की फिल्म 'रानी साहेबा' को भी पहली  बालफिल्म मानते हैं. पर इसके प्रिंट मौजूद  हैं या नहीं इसकी प्रामाणिक जानकारी मुझे नहीं है.
.
          जलदीप फिल्म का संगीत की स्नेहल भाटकर ने रचा और इसमें अभिनय किया अशोक कुमार, प्रीतिवाला, दुबे और चन्दन ने


'जलदीप' फिल्म के निर्देशक : केदार शर्मा 


          फिल्म की संक्षिप्त कथा यह है कि उसका कथा - नायक अशोक नाम का बालक है जिसके पिता एक लाइटहाउस के प्रभारी हैं. एक दिन अशोक  बिना किसी को बताये अपनी मित्र प्रीति को पाल-नौका में बैठाकर समुद्र की सैर कराने की ठान लेता है. इसमें साथ देता है चन्दन नाम का बालक, चन्दन  नौका का लापरवाह नाविक है. वह दोनों को अपनी झूठी शान दिखाने के लोभ में नाव को  खतरनाक जगहों से गुजारता है. दुर्भाग्य की बात,उसी  समय एक तूफ़ान भी समुद्र में आ जाता है. अब चन्दन, अशोक और प्रीति - तीनों की  ही जान पर बन आती है. अशोक के पिता को जैसे ही इसका पता चलता है तो वे अपनी जान पर खेल कर तीनों बच्चों की जान बचाते हैं. जान तो बच  जाती है सभी की पर क्या इस घटना से इन बच्चों को कुछ सबक मिलता है..यह तो तब पता चलेगा जब यह फिल्म देख ली जाए.

          'जलदीप' फिल्म बहुत पुरानी है पर शायद उसकी डी.वी.डी चिल्ड्रेन'स फिल्म सोसायटी में उपलब्ध हो. पता करना चाहो तो उनकी वेब साईट -www.cfsindia.org पर उनका फोन नंबर और पता दोनों मौजूद हैं.

          हाँ, इस बाल फिल्म के इक्के-दुक्के गाने youtube पर चाहो तो अभी सुने जा सकते हैं , लिंक दी जा रहे है -जैसे 'छोटा-सा पप्पू,

          चलते-चलते एक और महत्वपूर्ण बात यह कि जलदीप फिल्म को  1957 में वेनिस में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी मिला.


-रमेश तैलंग 

इनपुट्स एवं चित्र सौजन्य: सी.ऍफ़.एस.आई/googal 

Friday, July 12, 2013

फ़िल्मी बातें – आज शुक्रवार है

देख इंडियन सर्कस 



मंगेश हडावले के निर्देशन में बनी बाल फिल्म देख इंडियन सर्कस पता नहीं, तुम बच्चों में से किस-किस ने देखी है पर जिन्होंने नहीं देखी उनके लिए थोड़ी जानकारी आज चलो हम यहाँ बांटते है-

राजस्थान की  रेतीली ज़मीन पर फिल्माई गई इस बाल फिल्म के प्रमुख कलाकार हैं तनिष्ठा चटर्जी (कजरो), नवाजुद्दीन सिद्दीकी (जेठू) , वीरेंदर सिंह राठोड(घुमरू) और सुहानी ओझा (पन्नी). 

गरीबी की मार से जूझता कजरो और जेठू का परिवार अपने बेटे-बेटी यानि घुमरू और पन्नी को खूब पढ़ाना-लिखाना चाहता है और उनके सब सपने सच करना चाहता है पर सपने बड़े हैं और साधन छोटे. राज्य में  चुनाव होने वाले हैं. तभी गाँव में एक सर्कस का आगमन होता  है पर इस सर्कस में क्या  घुमरू और पन्नी अपने सपनों का सुंदर संसार खोज पाते हैं या फिर वे भी जीवन के सर्कस में कठपुतली की तरह पात्र बन कर रह जाते हैं, इस प्रश्न का उत्तर तो इस फिल्म को देखने के बाद ही पता चल पायेगा तुम सबको. लेकिन फिलहाल इस फिल्म का एक प्रोमो तुम यू-ट्यूब पर अभी इस लिंक पर जरूर देख सकते हो : http://www.youtube.com/watch?v=nJJBETZ2sws

अब इस फिल्म के बारे में कुछ और ज़रूरी बातें. देख इंडियन सर्कस के दोनों प्रमुख वयस्क कलाकारों क्रमशः  तनिष्ठा चटर्जी तथा नवाजुद्दीन सिद्दीकी को बारहवें सालाना न्यूयार्क भारतीय फिल्म समारोह के अंतर्गत इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अभिनेत्री का पुरस्कार मिल चुका है, और यह फिल्म सोलहवें बुसान फिल्मोत्सव में ऑडियंस चॉइस अवार्ड भी जीत चुकी है. यहीं नहीं साठवें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी इसने  सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म, तथा सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेता (वीरेंदर सिंह राठोड) के पुरस्कार भी जीते हैं.



देख इंडियन सर्कस के निर्देशक मंगेश हडावले ने अपनी पहली ही मराठी  बाल फिल्म टिंग्या(२००७) को अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दिला कर देश-विदेश में अच्छी-खासी ख्याति बटोर ली थी और आज भी उनकी गणना देश के श्रेष्ठ युवा फ़िल्मी निर्देशकों में होती है.

देख इंडियन सर्कस की अन्य कुछ संक्षिप्त जानकारियां विकिपीडिया के हवाले से इस प्रकार हैं:


Dekh Indian Circus  (Source: Wikipedia)

Directed by          Mangesh Hadawale
Produced by         Anil Lad, Mahaveer Jain, Chirag Shah, Vivek Oberoi
Story by            Mangesh Hadawale
Starring             Tannishtha Chatterjee, Nawazuddin Siddiqui,Virendra Singh Rathod, Suhani Oza
Music by            Shankar-Ehsaan-Loy
Cinematography      Laxman Utekar
Editing by           James J Valiakulathil
Studio              Sundial Pictures
Release date(s)       7 October 2011
Running time         101 minutes
Country            India
Language                     Hindi Rajasthani


Thursday, July 11, 2013

तीन नटखट बाल कविताएँ


-1-
आज मेरी मम्मी ने खूब डांट-डपट की 
और मेरे गालों पर हल्की-सी चपत दी 
क्योंकि मैं शैतानी करता ही जा रहा था 
कैसे बताऊं मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था 
पर इस शैतानी ने सबक एक सिखा दिया
आगे का दांत मेरा जड़ से हिला दिया 
अब मैं मुंह बंद किये चुपचाप रहता हूँ.
हाहाहा - हीहीही करने से डरता हूँ.




-2-

हरी सब्जियों का एक दिन लगा चस्का
हरा हो गया चेहरा पूरी  किचन का 
लौकी -तोरी, पालक, लाए  घर वाले 
बेसन ने सब के मन मगर बदल डाले  
पालक, तोरी, सब के बन गए पकोड़े
प्लेट लिए सब के सब खाने को  दौड़े.





- 3-

सुबह-सुबह अपनी  स्कूल बस आई 
नींद हमारी तब तक पूरी  न हो पाई,
सीट पर झपकी ली, सबने जगा दिया 
ड्राइवर ने भी पों-पों हॉरन बजा दिया.


- रमेश तैलंग 
  



चित्र सौजन्य : गूगल






Saturday, June 29, 2013

समकालीन बाल साहित्‍य: स्‍वरूप एवं दृष्टि। | मेरी दुनिया मेरे सपने

समकालीन बाल साहित्‍य: स्‍वरूप एवं दृष्टि। | मेरी दुनिया मेरे सपने

मेरे कुछ प्रिय बालगीत


चक्की चले

चक-चक चकर-चक चक्की चले,
हो रामा! हो रामा! हो रामा!

भोर से उठ माँ रामधुन गाए,
इस हाथ उस हाथ पाट घुमाए,
पाट जो घूमे तो धरती ‘हले’,
हो रामा! हो रामा! हो रामा!

पंछी को दाना, ढोरों को सानी,
चिंता जगत की माँ में समानी,
माँ, तेरे दम से गिरस्थी चले,
हो रामा! हो रामा! हो रामा!


वाह मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-शूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!



अम्माँ की रसोई में 

हल्दी दहके, धनिया महके,
अम्माँ की रसोई में ।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा ।
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा ।
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में ।

आटा-बेसन, चकला-बेलन,
घूम रहे हैं बतियाते ।
राग-रसोई बने प्यार से
ही अच्छी, ये समझाते ।
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में ।

थाली, कड़छी और कटोरी,
को सूझी है मस्ती।
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती।
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।


समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यूँ अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

Friday, June 21, 2013

मेरे चार नए बाल गीत

आम की डाली, नीचे झुक


आम की डाली, नीचे झुक,
नीचे झुक, एक आम दे,
आम दे, एक आम दे!

हत्थू मेरे छोटे से, ऊपर तक न जाते हैं,
भैया हैं पूरे नकटे, कंधोली न चढाते हैं,
खड़े-खड़े टाँगें दूखीं
थोड़ा-सा आराम दे!

आम मिले तो जल्दी से मैं भी अपने घर जाऊं,
खट्टा-मीठा जैसा हो चूस-चूस कर खा जाऊं,
एक आम के बदले में
तुझे ढेर से, राम दे!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप


पिछली गली में झमाझम पानी,
अगली गली में है सुरमई धूप.
बारिश के मौसम के हैं कई रूप.

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओले,
बिसना की मौसी का सूखा है सूप.

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गडबड घोटाला,
चुन्नू के घर में निकल गए छाते,
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप.

बारिश के मौसम के हैं कई रूप.



पतंग मेरे घर आई



टूटकर पतंग मेरे घर आई.

थामे थी जिसकी उंगली हवा,
उसको दे दिया बीच में ही दगा,
पल भर भी दोस्ती न निभ पाई.
टूटकर पतंग मेरे घर आई.


टूटे ज्यों हरा पात शाख से,
टपके जैसे आंसूं आंख से,
पांव पर गिरे जैसे परछाई.
टूटकर पतंग मेरे घर आई.

न,न पतंग मेरी, मत रोना,
कसम तुझे, यूं उदास मत होना,
जीता वो जिसने ठोकर खाई.
टूटकर पतंग मेरे घर आई.
  
ओ कारी बदरिया!


ओ कारी बदरिया, पानी तो ला,
पर आंधी न ला.

उड़ जाएगा मेरी खोली का छप्पर,
बापू जब आएंगे बज्जी से थक कर,
पूंछेंगे, हाय राम, ये क्या हुआ?

मेहनत से हमने ये खोली बनाई,
बापू की खर्च हुई आधी कमाई,
बुंदियां  गिरा, पर न ओले गिरा.

ओ कारी बदरिया, पानी तो ला,

पर आंधी न ला 


- रमेश तैलंग 

चित्र सौजन्य : गूगल 

Friday, April 19, 2013

अखिलेश श्रीवास्तव चमन के नए बाल कहानी संग्रह "सब बुद्धू हैं" पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी



प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली से २०१२ में प्रकाशित अखिलेश श्रीवास्तव चमन की ११ बाल कहानियों का संग्रह "सब बुद्धू है" बच्चों का अपेक्षित मनो रंजन करेगा ऐसी आशा की जानी चाहिए. 

           अखिलेश श्रीवास्तव काफी समय से बाल साहित्य मे  रचना रत हैं और उनकी  इन कहानियों में जो बात मुझे सबसे अधिक रुचिकर लगी  वह है कहानी कहने की कला. अन्य सुधी बाल कथाकारों की तरह मेरा भी मानना है कि कहानी में  'कहन' का  होना पहली आवश्यकता है . कहन  से मेरा तात्पर्य यहां किस्सागोई से है. ज़रूरी नहीं कि बच्चों को जिस तरह पचास वर्षों पहले  कहानी सुनाई जाती थी  उसी तरह से आज भी सुनाई जाए.. पर इसका यह अर्थ भी नहीं कि परंपरा से बिलकुल ही मुंह मोड़ लिया जाए.  आधुनिकता परंपरा का ही विकास है...इस संग्रह की कुछ कहानियों में भले ही किसी लोककथा की सुगंध समाहित हो पर उनके नए संदर्भ उन्हें समसामयिक बनाते हैं. हर कहानी में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कोई सन्देश भी मौजूद है.
          संग्रह की पहली कहानी 'सब बुद्धू हैं'  में साढ़े पांच वर्षीय मास्टर अमोल यानि बंटी जी मुख्य पात्र हैं जो टी.वी दूरदर्शन के शौक़ीन हैं और उन्हें जो बातें अच्छी लगती हैं उनका पालन वे दूसरों से भी कराना चाहते हैं. जो उनकी बात नहीं मानता वे उनकी  नज़र में "बुद्धू" की श्रेणी में आते हैं...दूसरों को समझाते-समझाते वे स्वयं किस मुसीबत में पड़ते रहते हैं उसका  मनोरंजक वर्णन इस कहानी में है. "ऊधो माधव" दो ऐसे आलसियों की कहानी है जो शिकारियों का छद्म वेश बनाकर एक गांव में जाते हैं और अपनी बहादुरी के झूठे किस्से सुना कर गांव वालों पर अपना रौब गांठते हैं पर एक दिन जब उनकी पोल खुलती है तो गांव वालों के सामने ही उन्हें बुरी तरह शर्मिंदा होना पड़ता है. 
         "बेचारे नथ्थू लाल" अपनी ईमानदारी के कारण मुसीबतों में फंसते हैं तो "बड़कन छोटकन" ऐसे दो जुड़वां भाइयों की कहानी है जिसमें शैतानियां करता है छोटकन और सजा पाता है बड़कन क्योंकि दोनों की शक्ल-सूरत एक सी है. पर जब बड़कन का मुंह पिटाई के कारण कुछ दिनों तक सूजा हुआ रहता है तो छोटकन अलग से पहचान में आने के डर से कोई शैतानी नहीं करता. एक ही शक्ल के जुड़वां भाइयों की ऐसी कहानियां अन्यत्र भी अन्य रूप में मिल सकती हैं.
         'पापा की रसोई ' एक मजेदार कहानी है जिसमें श्रीमान पापा जी खाने में हर रोज कोई न कोई नुक्स निकालते रहते हैं और एक दिन स्वयं रसोई बनाने की चुनौती स्वीकार लेते है..नतीजा ऐसा होता है कि उनकी पस्त हालत देख कर सारे घरवाले हंस पड़ते है.
         "अंग्रेजी का ट्यूशन" एक ऐसे कंजूस पिता की कहानी है जो अपने नालायक बच्चे को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए अच्छा पढ़ा-लिखा  शिक्षक तो चाहता है पर उसे समुचित पैसे नहीं देना चाहता. आखिर  उसे भी एक दिन नहले पर दहला मिल जाता है और फिर उसे अपनी कंजूसी भूल कर शिक्षक को उचित पारिश्रमिक देना पड़ता है. 'ठग का बेटा' है तो नए संदर्भ की कहानी पर लगती है किसी लोक कथा की तरह... राजू के पिता की असामयिक मृत्यु हो जाती है और जब उसे मां  से अपने पिता के ठगी के व्यवसाय के बारे में पता चलता है तो वह भी इसी व्यवसाय को अपना कर लोगों को ठगना शुरू कर देता है.  पर एक दिन जब राजू की हरकतों से तंग आकर मामा उसे बोरे में बंद कर नदी में फेंकने जाने लगता  हैं तो राजू अपने चातुर्य से किस तरह इस मुसीबत से निजात पाता है, वह इस कथा को पढकर ही जाना जा सकता है.
          'खब्बू मिसिर" एक ऐसे निकम्मे व्यक्ति की  कहानी है जो "काम के न काज के, सौ मन अनाज के  सिद्ध होते हैं प र एक दिन उनकी भी अक्ल ठिकाने आती है. 
          संग्रह की अंतिम कहानी -' हबरा की गारी' एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो' ड' को' र' बोलता है और अपने उच्चारण की  इस कमी के कारण हास्यास्पद स्थितियों में फंसता रहता है.
          कुल मिला कर इस संग्रह की सभी कहानियां बच्चों की रुचि और उनके उपयुक्त भाषा को ध्यान में रख कर लिखी गई हैं पर एक़ दो बातें मुझे विशेष  रूप से कहनी  हैं -  
          पहली तो यह कि एक कहानी का शीर्षक  जिसे "अंग्रेजी का ट्यूशन" का नाम दिया  गया है वह  "अंग्रेजी की ट्यूशन " होता तो उचित होता क्योंकि आम तौर पर इसे "अंग्रेजी की ट्यूशन" ही कहा जाता है या फिर इसे  "अंग्रेजी का ट्यूटर" नाम दे दिया जाता. फिर भी संभव है कि ट्यूशन को कहीं-कहीं  स्त्रीलिंग संज्ञा की जगह पुल्लिंग संज्ञा के  रूप में इस्तेमाल किया जाता हो. 
          दूसरी बात यह कि संग्रह की अंतिम कहानी "हबरा की गारी" में किसी-किसी को उच्चारण की ऐसी कमी को हास्य का उपादान बनाना अप्रिय भी लग सकता है .  पर चूंकि यह सिर्फ एक  बाल कथा है इसलिए आशा है कि पाठक इसे सही परिप्रेक्ष्य में सहजता से लेंगे.

- रमेश तैलंग 

समीक्ष्य पुस्तक 
प्रकाशक 

प्रकाशन विभाग, (सूचना और प्रसारण मंत्रालय-भारत सरकार)
सूचना भवन, सी जी ओ काम्प्लेक्स,
लोदी रोड, नई दिल्ली-११०००३ 
पेपरबैक-मूल्य: १२० रूपये

Sunday, March 31, 2013

गुलेलबाज लड़का -- भीष्म साहनी






प्रतिष्ठित कथाकार भीष्म साहनी की "गुलेलबाज लड़का  "  ऐसी  संवेदनात्मक बाल कहानी है जो मुझे सबसे ज्यादा विचलित किये रहती है. इससे पूर्व जब मैंने  F.B.-World of Children's Literature समूह की वाल पर आलम शाह खान   की बाल-कहानी "मिनी महात्मा" की चर्चा की थी तो उसके साथ इस कहानी का भी ज़िक्र किया था. हालांकि यह कहानी "मिनी महात्मा" से आकार में थोड़ी बड़ी है और पाठक से एक ही बार में पढ़ने के लिए समुचित धीरज मांगती है पर इसमें किशोर मन की परपीड़ा प्रवृत्ति को जिस तरह करुणा में परिवर्तित होते दिखाया गया है वह अपने आप में एक अनन्य उदाहरण है. और यही बात इस कहानी को क्लासिक दर्जा देने के लिए काफी है. 
"गुलेल्बाज लड़का" में भीष्म जी की "नरेशन आर्ट" का बेहतरीन नमूना भी देखा जा सकता है, यदि आप के अंदर एक संवेदनशील मन और करुणामयी दृष्टि है. प्रमाण के लिए कहानी के उस हिस्से पर जरा गौर करिये जहां गोदाम के रोशनदान से अंदर आई एक चील मैना के बच्चों को शिकार बनाने के लिए इधर से उधर मंडरा रही हैं और मैना के भयाक्रांत बच्चे चीख रहे हैं. इधर हृदयविदारक दृश्य है और उधर  गुलेलबाज  बोधराज की हिंसक प्रवृत्ति का अनायास कायांतर हो रहा है. वह करुणा से ओत-प्रोत है और वह मैना के बच्चों को चील के आक्रमण से बचाने की फ़िक्र में पुख्ता  रणनीति बनाने में व्यस्त हो गया है.  और जब वह मैना के बच्चों को बचा लेता है तो बोधराज के साथ-साथ पाठक का मन भी असीम संतोष से भर उठता है. 


गुलेलबाज लड़का 



छठी कक्षा में पढते समय मेरे तरह-तरह के सहपाठी थे. एक हरबंस नाम का लड़का था जिसके सब काम अनूठे हुआ करते थे. उसे जब सवाल समझ में नहीं आता  तो स्याही की दवात उठाकर पी जाता. उसे किसी ना कह रखा था कि काली स्याही पीने से अक्ल तेज हो जाती है. मास्टर जी गुस्सा होकर उस पर हाथ उठाते तो बेहद ऊंची आवाज में चिल्लाने लगता, "मार डाला! मास्टर जी ने मार डाला!" वह इतनी जोर से चिल्लाता कि आसपास की जमातों के उस्ताद बाहर निकल आते कि क्या हुआ है. मास्टर जी ठिठक कर हाथ नीचा कर लेते. यदि वह उसे पीटने लगते तो हरबंस सीधा उनसे चिपट जाता और ऊंची-ऊंची आवाज में कहने लगता, "अब की माफ कर दो जी! आप बादशाह हो जी! आप अकबर महान हो जी! आप सम्राट अशोक हो जी! आप माई-बाप हो जी, दादा हो जी, परदादा हो जी!"
क्लास में लड़के हंसने लगते और मास्टर जी झेंपकर उसे पीटना छोड़ देते. ऐसा था वह हरबंस. हर आए दिन बाग में से मेंढक पकड़ लाता और कहता कि हाथ पर मेंढक की चर्बी लगा लें तो मास्टर जी के बेंत का कोई असर नहीं होता: हाथ को पता ही नहीं चलता कि बेंत पड़ा है.
एक दूसरा सहपाठी था-बोधराज. इससे हम सब डरते थे. जब वह चिकोटी काटता तो लगता जैसे सांप ने दस लिए है. बड़ा जालिम लड़का था. गली की नाली पर जब बर्रें आकर बैठते तो नंगे हाथ से वह बर्र पकड़ कर उसका डंक निकाल लेता और फिर बर्रें की तांक में धागा बांधकर उसे पतंग की तरह उड़ाने की कोशिश करता. बाग में जाते तो फूल पर बैठी तितली को लपक कर पकड़ लेता और दूसरे क्षण उँगलियों के बीच मसल डालता. अगर मसलता नहीं तो फडफडाती तितली में पिन खोंस कर उसे अपनी कापी में टांक लेता.
उसके बारे में कहा जाता था कि अगर बोधराज को बिच्छू काट ले तो स्वयं बिच्छू मार जाता है; बोधराज का खून इतना कड़वा है कि उसे कुछ भी महसूस नहीं होता. सारा वक्त उसके हाथ में गुलेल रहती और उसका निशाना अचूक था. पक्षियों के घोंसलों पर तो उसकी विशेष कृपा रहती थी. पेड़ के नीचे खड़े होकर वह ऐसा निशाना बांधता कि दूसरे ही क्षण पक्षियों की "चों-चों" सुनाई देती और घोंसलों में से तिनके और थिगलियाँ टूट-टूट कर हवा में छितरने लगते, या वह झट से पेड़ पर चढ़ जाता और घोंसलों में से अंडे निकाल लता. जब तक वह घोंसलों को तोड़-फोड़ नहीं डाले, उसे चैन नहीं मिलता था.
उसे कभी भी कोई ऐसा खेल नहीं सूझता था जिनमें किसी को कष्ट नहीं पहुंचाया गया हो. बोधराज की मान भी उसे राक्षस कहा करती थीं. बोधराज जेब में तरह-तरह की चीजें रखे घूमता, कभी मैना का बच्चा, या तरह-तरह के अंडे, या कांटेदार झाऊ चूहा. उससे सभी छात्र डरते थे. किसी के साथ झगड़ा  हो जाता तो बोधराज सीधा उसकी छाती में टक्कर मारता, या उसके हाथ पर काट खाता. स्कूल के बाद हम लोग तो अपने-अपने घरों को चले जाते, मगर बोधराज न जाने कहां घूमता रहता.
कभी-कभी वह हमें तरह-तरह के किस्से सुनाता. एक दिन कहने लगा : "हमारे घर में एक गोह रहती है. जानते हो गोह क्या होते है?"
"नहीं तो, क्या होती है गोह?"
"गोह, सांप जैसा एक जानवर होता है, बालिश्त भर लंबा, मगर उसके पैर होते हैं, आठ पंजे होते हैं. सांप के पैर नहीं होते."
हम सिहर उठे.
"हमारे घर में सीढ़ियों के नीचे गोह रहती है," वह बोला, "जिस चीज को वह अपने पंजों से पकड़ ले वह उसे कभी भी नहीं छोडती, कुछ भी हो जाए नहीं छोडती."
हम फिर सिहर उठे.
"चोर अपने पास गोह को रखते हैं. वे दीवार फांदने के लिए गोह का इस्तेमाल करते हैं. वे गोह की एक टांग में रस्सी बाँध देते हैं. फिर जिस दीवार को फांदना हो, रस्सी झुलाकर दीवार के ऊपर की ओर फेंकते हैं. दीवार के साथ लगते ही गोद अपने पंजों से दीवार को पकड़ लेती है. उसका पंजा इतना मजबूत होता है कि फिर रस्सी को दस आदमी भी खींचे, तो गोह दीवार को नहीं छोड़ेगी. चोर उसी रस्सी के सहारे दीवार फांद जाते हैं."
"फिर दीवार को तुम्हारी गोह छोडती कैसे है?" मैंने पूछा.
"ऊपर पहुंचकर चोर उसे थोड़ा-सा दूध पिलाते हैं, दूध पीते हे गोह के पंजे ढीले पड़ जाते हैं."
इसी तरह के किस्से बोधराज हमें सुनाता.
उन्हीं दिनों मेरे पिताजी की तरक्की हुई और हम लोग एक बड़े घर में जाकर रहने लगे. घर नहीं था, बांग्ला था, मगर पुराने ढंग का और शहर के बाहर. फर्श ईंटों के, छत ऊंची-ऊंची और ढालवां, कमरे बड़े-बड़े, लेकिन दीवार में लगता जैसे गारा भरा हुआ है. बाहर खुली जमीन थी और पेड़-पौधे थे. घर तो अच्छा था मगर बड़ा खाली-खाली सा था. शहर से दूर होने के कारण मेरा दोस्त-यार भी यहां पर कोई नहीं था.
तभी वहां बोधराज आने लगा. शायद उसे मालूम हो गया कि वहां शिकार अच्छा मिलेगा, क्योंकि उस पुराने घर में और घर के आँगन में अनेक पक्षियों के घोसले थे, आसपास बंदर घूमते थे और घर के बाहर झाड़ियों में नेवलों के दो एक बिल भी थे, घर के पिछले हिस्से में एक बड़ा कमरा था जिसमें मां ने फालतू सामन भर कर गोदाम-सा बना दिया था. यहां पर कबूतरों का डेरा था. दिन भर गुटरगूं-गुटरगूं चलती रहती. वहां पर टूटे रोशनदान के पास एक मैना का भी घोंसला था. कमरे के फर्श पर पंख और टूटे अंडे और घोंसलों के तिनके बिखरे रहते.
बोधराज आता तो मैं उसके साथ घूमने निकल जाता. एक बार वह झाऊ चूहा लाया, जिसका काला थूथना और कंटीले बाल देखते ही मैं डर गया था. मां को मेरा बोधराज के साथ घूमना अच्छा नहीं लगता था, मगर वह जानती थी कि मैं अकेला घर में पड़ा-पड़ा क्या करूंगा. मां भी उसे राक्षस कहती थी और उसे बहुत समझाती थीं कि गरीब जानवरों को तंग नहीं किया करे.
एक दिन मां मुझसे बोली-"अगर तुम्हारे दोस्त को घोंसले तोड़ने में मजा आता  है तो उससे कहो कि हमारे गोदाम में से घोंसले साफ़ करदे. चिड़ियों ने कमरे को बहुत गन्दा कर रखा है. 
"मगर मां ही  तुम तो कहती थीं कि जो घोंसले तोड़ता है उसे पाप चढ़ता है."
"मैं यह थोड़े ही कहती हूं कि पक्षियों को मारे. यह तो पक्षियों पर गुलेल चलाता है, उन्हें मारता है. घोंसला हटाना तो दूसरी बात है."
चुनांचे जब बोधराज घर पर आया तो मैं घर का चक्कर लगाकर उसे पिछवाड़े की ओर गोदाम में ले गया. गोदाम में टाला लगा था. हम तालाला खोलकर अंदर गए. शाम हो रही थी और गोदाम के अंदर झुटपुटा-सा छाया था. कमरे में पहुंचे तो मुझे लगा जैसे हम किसी जानवर की मांद में पहुंच गए हों. बला की बू थी और फर्श पर बिखरे हुए पंख और पक्षियों की बीट.
सच पूछो तो मैं डर गया. मैंने सोचा, यहां भी बोधराज अपना घिनौना शिकार खेलेगा, वह घोंसलों को तोड़-तोड़ कर गिराएगा, पक्षियों के पर नोचेगा, उनके अंडे तोडेगा, ऐसी सभी बातीं करेगा जिनसे मेरा दिल दहलता था. न जाने मां ने क्यों कह दिया था कि इसे गोदाम में ले जाओ और इससे कहो कि गोदाम में से घोंसले साफ़ कर डे. मुझे तो इसके साथ खेलने को भी माना करती थीं और अब कह दिया कि घोंसले तोडो.
मैंने बोधराज की ओर देखा तो उसने गुलेल संभाल ली थी और बड़े चाव से छत के नीचे मैना के घोंसले की ओर देख रहा था. गोदाम की ढलवां छतें तिकोन-सा बनाती थीं, दो पल्ले ढलवां उतारते थे और नीचे एक लंबा शहतीर कमरे के आर-पार डाला गया था. इसी शहतीर पर टूटे हुए रोशनदान के पास ही एक बड़ा-सा घोंसला था, जिसमें से उभरे हुए तिनके, रुई के फाहे और लताक्टी थिगलियाँ हमें नजर आ जाति थीं. यह मैना का घोंसला था. कबूतर अलग से दूसरी ओर शहतीर पर गुटरगूं-गुटरगूं कर रहे थे और सारा वक्त शहतीर के ऊपर मटरगश्ती कर रहे थे.
"घोंसले में मैना के बच्चे , बोधराज ने कहा और अपनी गुलेल साध ली.
तभी मुझे घोंसले में से छोटे-छोटे बच्चों की पीली-पीली नन्हीं चोंचें झांकती नजर आईं.
"देखा?" बोधराज कह रहा था, "ये विलायती मैना हैं, इधर घोंसला नहीं बनातीं. इनके मां-बाप जरूर अपने काफिले से पिछड़ गए होंगे और यहां आकर घोंसला बना लिया होगा.
"इनके मां-बाप कहां हैं?" मैंने पूछा.
"चुग्गा लेने गए हैं. अभी आते ही होंगे," कहते हुए बोधराज ने गुलेल उठाई.
मैंने उसे रोकना चाहता था कि घोंसले पर गुलेल नहीं चलाये पर तभी बोधराज को गुलेल से फर्रर्रर्र की आवाज निकली और इसके बाद जोर के टन्न की आवाज आई. गुलेल का कंकड़ घोंसले से न लग कर सीधा छत पर जा लगा था, जहां तीं की चादरें लगी थीं.
दोनों चोंच घोंसले के बीच कहीं गायब हो गईं और फिर सकता-सा आ गया. लग रहा था मानो मैना के बच्चे सहम कर चुप हो गए थे.
तभी बोधराज ने गुलेल से एक और वार किया. अबकी बार कंकड़ शहतीर से लगा.बड़ा अकडा करता था. दो निशाने चूक जाने पर वह बौखला उठा. अबकी बार वह थोड़ी देर तक चुपचाप खड़ा रहा. जिस वक्त मैना के बच्चों ने चोंच फिर से उठाई और घोंसले के बाहर झांक कर देखने लगे, उसी समय बोधराज ने तीसरा वार किया. अबकी कंकड़ घोंसले के किनारे पर लगा. तीं-चार तिनके और रुई के गले उड़े और छितरा-छितरा कर फर्श की ओर उड़ने लगे. लेकिन घोंसला गिरा नहीं.
बोधराज ने फिर से गुलेल तान ली थी. तभी कमरे में एक भयानक-सा साया दोल गया. हमने नजर उठाकर देखा. रोशनदान में से आने वाली रोशनी सहसा ढक गई थी. रोशनदान के सींखचे पर एक बड़ी-सी चील पर फैलाए बैठी थी. हम दोनों ठिठक कर उसकी ओर देखने लगे. रोशनदान में बैठी चील भयानक-सी लग रही थी.
"यह चील का घोंसला होगा. चील अपने घोंसले में लौटी है." मैंने कहा.
"नहीं, चील का घोंसला यहां कैसे हो सकता है? चील अपना घोंसला पेड़ों पर बनाती है. यह मैना का घोंसला है."
उस वक्त घोंसले में से चों-चों की ऊंची आवाज आने लगी. घोंसले में बैठी मैना के बच्चे पर फडफडाने और चिल्लाने लगे.
हम दोनों निश्चेष्ट से खड़े हो गए, यह देखने के लिए कि चील अब क्या करेगी. हम दोनों टकटकी बांधे चील की ओर देखे जा रहे थे.
चील रोशनदान में से अंदर आ गयी. उसने अपने पर समेट लिए थे और रोशनदान पर से उतारकर गोदाम के आर-पार लगे शहतीर पर उतर आयी थी. वह अपना छोटा-सा सिर हिलाती, कभी दाएं और कभी बाएं देखने लगती. मैं चुप था, बोधराज भी चुप था, न जाने वह क्या सोच रहा था.
घोंसले में से बराबर चों-चों की आवाज आ रही थी, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थी. मैना के बच्चे बुरी तरह डर गए थे.
"यह यहां रूज आती होगी," बोधराज बोला.
अब मेरी समझ में आया कि क्यों फर्श पर जगह-जगह पंख और मांस के लोथड़े बिखरे पड़े रहते हैं. जरूर हर आए दिन चील घोंसले पर झपट्टा मारती रही होगी. मांस के टुकड़े और खून-सने पर इसी की चोंच से गिरते होंगे.
बोधराज अभी भी टकटकी बांधी चील की ओर देख रहा था.
अब चील धीरे-धीरे शहतीर पर चलती हुई घोंसले की ओर बढ़ने लगी थी और घोंसले में बैठे मैना के बच्चे पर फडफडाने और चीखने लगे थे. जब से चील रोशनदान पर आकर बैठी थी, मैना के बच्चे चीखे जा रहे थे. बोधराज अब भी मूर्तिवत खड़ा चील की ओर ताके जा रहा था.
मैं घबरा उठा. मैं मन में बार-बार कहता, "क्या फर्क पड़ता है अगर चील मैना के बच्चों को मार डालती है या बोधराज अपनी गुलेल से उन्हें मार डालता है? अगर चील नहीं आती तो इस वक्त तक बोधराज ने मैना का घोंसला नोच भी डाला होता.
तभी बोधराज ने गुलेल उठाई और सीधा निशाना चील पर बाँध दिया.
"चील को मत छेड़ो. वह तुम पर झपटेगी." मैंने बोधराज से कहा.
मगर बोधराज ने नहीं सुना और गुलेल चला दी. चील को निशाना नहीं लगा. कंकड़ छत से टकरा कर नीचे गिर पड़ा और चील ने अपने बड़े-बड़े पंख फैलाए और नीचे सिर किए घूरने लगी.
"चलो यहां से निकल चलें." मैंने डर कर कहा.
"नहीं, हम चले गए तो चील बच्चों को खा जाएगी."
"उसके मुंह से यह वाक्य मुझे बड़ा अटपटा लगा. स्वयं ही तो घोंसला तोड़ने के लिए गुलेल उठा लाया था.
बोधराज ने एक और निशाना बाँधा. मगर चील उस शहतीर पर से उड़ी और गोदाम के अंदर पर फैलाए तैरती हुई-सी आधा चक्कर काटकर फिर से शहतीर पर जा बैठी. घोंसले में बैठे बच्चे बराबर चों-चों किए जा रहे थे.
बोधराज ने झट से गुलेल मुझे थमा दी और जेब से पांच-सात कंकड़ निकाल कर मेरी हथेली पर रखे. "तुम चील पर गुलेल चलाओ. चलाते जाओ, उसे बैठने नहीं देना." उसने कहा और स्वयं भागकर दीवार के साथ रखी मेज पर एक टूटी हुई कुर्सी चढ़ा दी और फिर उछलकर मेज पर चढ़ गया और वहां से कुर्सी पर जा खड़ा हुआ. फिर बोधराज ने दोनों हाथ ऊपर को उठाये, जैसे-तैसे अपना संतुलन बनाए हुए उसने धीरे-से दोनों हाथों से घोंसले को शहतीर पर से उठा लिया और धीरे-धीरे कुर्सी पर से उतर कर मेज पर आ गया और घोंसले को थामे ही छलांग लगा दी.
"चलो, बाहर निकल चलो, उसने कहा" और दरवाजे की ओर लपका.
गोदाम में से निकल कर हम गैराज में आ गए. गैराज में एक ही बड़ा दरवाजा था और दीवार में छोटा-सा एक झरोखा. यहां भी गैराज के आरपार लकड़ी का एक  शहतीर लगा था.
"यहां पर चील नहीं पहुंच सकती" बोधराज ने कहा और इधर उधर देखने लगा था.
थोड़ी देर में घोंसले में बैठे मैना के बच्चे चुप हो गए. बोधराज बक्से पर चढ़ कर मैना के घोंसले में झाँकने लगा. मैंने सोचा, अभी हाथ बढाकर दोनों बच्चों को एक साथ उठा लेगा, जैसा वह अक्सर किया करता था, फिर भले ही उन्हें जेब में डालकर घूमता फिरे. मगर उसने ऐसा कुछ नहीं किया. वह देर तक घोंसले के अंदर झांकता रहा और फिर बोला, "थोड़ा पानी लाओ, इन्हें प्यास लगी है. इनकी चोंच में बूंद-बूंद पानी डालेंगे."
मैं बाहर गया और एक कटोरी में थोड़ा-सा पानी ले आया. दोनों नन्हें-नन्हें बच्चे चोंच ऊपर उठाये हांफ रहे थे. बोधराज ने उनकी चोंच में बूंद-बूंद पानी डाला और बच्चों को छोने से मुझे माना कर दिया, न ही स्वयं उन्हें छुआ.
इन बच्चों के मां-बाप यहां कैसे पहुंचेगे?" मैंने पूछा.
"वे इस झरोखे में से आ जाएंगे. वे अपने आप इन्हें ढूंढ निकालेंगे."
हम देर तक गैराज में बैठे रहे. बोधराज देर तक मंसूबे बनाता रहा कि वह कैसे रोशनदान को बंद कर देगा, ताकि चील कभी गोदाम के अंदर न आ सके. उस शाम वह चील की ही बाटे करता रहा 
दूसरे दिन जब बोधराज मेरे घर आया तो न तो उसके हाथ में गुलेल थी और न जेब में कंकड़, बल्कि जेब में बहुत-सा चुग्गा भरकर लाया था और हम दोनों देर तक मैना के बच्चों को चुग्गा डालते और उनके करतब देखे रहे थे.##  

( श्री सुलेमान टाक के संपादन में ग्रन्थ विकास, जयपुर से प्रकाशित "श्रेष्ठ हिंदी बाल कहानियां" से साभार )

pic.credit: google.

Saturday, March 23, 2013

आलमशाह खान की अनूठी बाल कहानी "मिनी महात्मा"






मिनी महात्मा
- आलम शाह खान 

बात जरा-सी थी पर मोहन  था कि रोये चला जा रहा था. सब समझा-समझा कर थक गए कि बड़े छोटों को पीटते चले आए हैं, अगर पुलिस-अंकल ने उसके एक चपत लगा भी दी तो क्या हो गया? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा उस पर ? बड़े हैं, पडोसी हैं-प्यार भे करते हैं, अच्छे बुरे में भी काम आते हैं, पर वह अब रोते-रोते बिसूरने लगा था, उसकी हिचकियाँ बंध गईं थीं.
"अरे, भाई,बड़े हैं, जरा जल्दी होगी, किसी ने उन्हें नहीं टोका. एक तुम्ही उनके आड़े आ गए."
"क्योंकि उनकी गलती थी. बड़ों ने नहीं टोका उन्हें और मैंने टोक दिया, तो मुझे पीट दिया, क्यों? कोई बड़ा उन्हें रोकता-टोकता तो क्या वह उसके चांटा जड़ देते? नहीं तो मुझे इसलिए पीट दिया कि मैं बच्चा हूं, छोटा और कमजोर हूं.." लोग भी तरह-तरह की बातें कर रहे थे-
"लड़का जिरह किये जाता है, कूद मगज है, इसे कौन समझाए?"
"रोता है, रोने दो-कब तक रोयेगा."
"चलो जी , चलो...सब इंस्पेक्टर साहब आप भी चलें..सुबह ही सुबह रोटी सूरत सामने पड़ी, छुट्टी का दिन न बिगड़ जाए." इतना कह-सुनकर दूध के बूथ का आगे खड़े लोग बिखर गए. दूध खत्म होने पर दूध वाला भी बूथ बंद कर चला गया. पर वह वहां खड़ा रोता रहा-रोता रहा. टस से मस न हुआ. सूरज की किरणें चमकने पर भी जब घर न पहुंचा तो उसकी मां ने इधर-उधर पूछा. पड़ोस के गुल्लू ने सारी बात बतलाई. सुनकर मां  उस बूथ के पास गयी, तो वह उससे चिपट गया. हिचकियाँ भर कर रोने लगा, मां  ने भी वही कहा, जो सबने कहा था-
अरे भले! बड़े हैं, बाप बराबर, तनिक चपलिया दिया तो क्या हो गया? कौन तीर तान दिया? चुप भी हो जा अब."
"मार दिया तो कुछ नहीं,  बड़े हैं और मार दें, पर मेरा कसूर तो बताएं. बप्पा को कारखाने में युनियां  वालों ने मारा, वह अस्पताल में पड़े हैं. उनका कोई कसूर होगा, पर मुझे क्यों मारा. मेरी क्या गलती थी, क्या कसूर था.?'
"अब जिद मत कर, तूने दूध भी नहीं लिया...तेरे बाप्पा को अस्पताल नाश्ता देने जाना तुझे या नहीं?"
"मैं नहीं जाऊंगा, कहीं नहीं जाऊंगा, जाऊंगा तो पुलिस अंकल के घर."
"मान भी जा बेटे, मैं उनसे कह दूंगी कि आगे से ऐसा सुलूक न करें बच्चों के साथ."
"पर जो दो चांटे मुझे जड़ दिया, उनका क्या?"
"उनका क्या? अब चुप भी हो ले, नहीं तो मैं भी लगा दूँगी, चल."
"तो तुम भी क्यों चूको, लगा दो."
"मैं कहती हूं घर चल. अस्पताल जाना है, अब उठ भी."
" मैं नहीं आता, पुलिस अंकल के घर जाकर पूछूँगा उनसे कि मेरा कसूर बताओ."
"नहीं आता  तो जा मर कहीं." इतना कह मां सिर पर पल्ला ढंक कर वहां से चल दी.
"ट्रिन...ट्रिन ...ट्रिन " घंटी सरसराई. थोड़ी देर बाद दरवाजा खोला तो पाया भीगी आंखें लिए सामने मोहन खड़ा है. उसे देखकर शेरसिंह सकपकाए.
"अंकल आपने मुझे क्यों मारा? मेरा कसूर क्या था? सुबकते हुए उसने वही सवाल पूछा.
"किसने मारा, किसको? मैं कुछ नहीं जानता.
"आपने मारा मुझे" आखिर क्यों मारा?"
"जा, मारा तो मारा. दफा हो जा यहां से, नहीं तो और पिट जाएगा, चल खिसक." वह गरजे.
"मारो...और मारो, पर मैं नहीं जाऊंगा, जब तक आप यह नहीं बताएँगे कि मेरा कसूर क्या था..." वह भी कड़क कर बोला. अब आसपास के घरों की मुंडेरों से दस-पांच चेह्तरे उभर आए. देखा-बरामदे के सामने बिसूरता मोहन खड़ा है और अपने बरामदे में झल्लाये शेरसिंह.
"जाएगा भी यहां से, या दो-एक खाकर ही टलेगा."
"आप जो चाहे करें. जब तक मेरा कसूर नहीं बताएँगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगा."
"अजीब उजड्ड-ढीठ लड़का है." एक पडोसी ने कहा.
"देखिये, आप इसे समझाएं..अगर यहां से दफा नहीं हुआ तो मैं इसे कोतवाली में बंद करवा दूंगा." शेरसिंह गरजे.
"आप जो चाहे सो करें, पर मेरा कसूर बताएं, जिससे मैं आगे ऐसा कुछ न करूँ कि बड़ों को मुझ प्र हाथ उठाना पड़े.
"अभी तो बस तू इतना कर कि यहां से दफा हो जा. नहीं तो..." वह भन्नाए, "सच, पड़ोस का लिहाज़ है, वरना इस लौंडे को वह सबक सिखाता कि -"शेरसिंह कूदकर बोले, परसों ही वह नायक से तरक्की लेकर असिस्टंट सब-इन्स्पेक्टर पुलिस बने थे.
"मैं सबक सीखने ही आया हूं. आप मुझे बताएं कि कतार तोड़ने वाले को टोकना कोई पाप है?"
"यार, इस लड़के पर कौन-सा भूत सवार है? किसीभी तरह नहीं मानता." इतना कह कर शर्मा जी नीचे उतरे. वर्मा जी भी साथ आए और उसे पुचकार कर दिलासा देते बोले, "बहुत हो गया, बेटे मोहन, अब छोड़ो भी और घर चले जाओ."
"आप सच मानें, मेरी हेठी नहीं हुई, अगर अंकल ने पीट दिया...और लगा दें दो-चार, पर बताएं तो कि आखिर क्यों मारा मुझे?"
"कुत्ते की दुम, टेढ़ी की टेढ़ी. कहां न भाई बड़े हैं."
"बड़े तो आप सब हैं. आप सब पीट दें, मैं कुछ नहीं बोलूँगा. लेकिन इतना बताएं कि क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं छोटा हूं, कमजोर हूं.
"नहीं-नहीं वह बात नहीं. तुमसे कोई बद्तामीजे हुई होगी. इसलिए बस."
"तो यह बता दें कि क्या बद्तामीजी हुई?"
"ज, ज कुछ नहीं हुआ. पीट दिया हमने, कर ले जो कुछ करना हो." अब शेरसिंह के भीतर बैठा पुलिस वाला बोला.
"ठीक है, तो मैं यहीं बैठा हूं. आपके फाटक के बाहर."
"बैठ या मर हमारी बला से." शेरसिंह ने कहा तभी उनकी घरवाली बाहर आयी और सामने खड़े लोगों से हाथ जोड़कर वहां से जाने को कहा और मोहन की बांह थाम भीतर ले गई.
"अब बोल बेटा. क्या गज़ब हो गया? अगर इन्होने एक-आध लगा भी दी, तो क्या हुआ? जैसे हमारी अमृत वैसा तू! चल मुंह धो, कुल्ला कर और नाश्ता कर ले, उठ!"
"आंटी! आपकी बात सर आंखों पर...पर अंकल बताएं तो?"
"अब क्या बताएं...समझले कि गुस्सा आ गया."
"तो बस, बाहर पांच पड़ोसियों के सामने यहीं कह दें."
"भई,तू तो बहुत जिद्दी है, इससे क्या हो जाएगा?"
"मुझे तसल्ली हो जाएगी कि मैंने ठीक काम किया था."
"मैं कहती हूं कि तुमने गलती नहीं की, ठीक किया."
"आपने कहा, माना,..पर पीता तो अंकल ने, सबके सामने."
"अजी सुनते हो, सुबह-सबेरे क्या महाभारत रचा बेठे. कहदो कि ठीक था मोहन, बस गुस्से में पीट दिया."
"बस, बस रहने दो अपनी भलमनसाहत. यह लौंडा मुझे अपने घर में, अपने बच्चों के सामने जलील करना चाहता है." शेरसिंह गुर्राए.
"इसमें क्या हुआ जो हेठी होती है आपकी?"
"तुम रुको, मैं इसे अभी धक्के मार-मार कर बाहर कर देता हूं." इतना कहकर शेरसिंह आगे बढ़े.
"आप क्यों हलकान होते हैं अंकल, मैं खुद ही चला जाता हूं आपके घर से." मोहन ने इतना कहा और हाथ जोड़कर बाहर आ गया, पर गया नहीं. फाटक पर ही घुटनों में सिर रखकर बैठ गया.
उधर वह पुलिस की नयी वर्दी पहनकर तैयार होने लगे.
"सुनिए, वह लड़का अभी तक फाटक पर डाटा है, कहदो कि गुस्सा आ गया था. क्यों जगत में डंका पिटवाते हो कि बीते-भर का छोकरा थानेदार के दर्जे के सरकारी अफसर के दरवाजे पर सत्याग्रह किये बैठा. कहीं अखवार वालों को जो भनक पड़ गयी तो तिल का ताड़ बनेगा. फिर आज गांधी जयंती भी है.
"क्या कहती हो, उस लौंडे के आगे गिडगिडाऊं, कहूँ कि मेरे बाप बक्शो...तभी"सबको संमि डे भगवान/ईश्वर अलाह तेरे नाम" की गूंज सुनाई दी. खिड़की से झांका, तो देखा - लड़के झंडे और तख्तियां उठाये प्रभात फेरी पर निकले हैं, असिस्टेंट सब इन्स्पेक्टर भीतर खड़े थे और मोहन बाहर उसके फाटक पर डाटा था, तभी लड़कों की टोली आ पहुँची. वहां अपने साथी को गठरी बना बैठे देखा, तो सब वहीं रुक गए.
"क्या हुआ?"
"मोहन यहां क्यों बैठा है?"
"चलो, इसे भी साथ लो, इसे भी तो एक तख्ती बनानी थी."
"चलो मोहन, प्रभात फेरी में. यहां बैठे क्या कर रहे हो?" आगे वाले बड़े लड़के ने उसे बांह थामकर उठाया तो देखा उसकी आंखें सूज कर लाल हो गई हैं और अभी भी उसकी आंखों से आंसू बह रहे हैं.
"अरे क्या हुआ इसे?" सभी के मुंह से निकला.
तभी एक लड़के ने, जो सुबह दूध लेने आया था, सारी बात बतायी और कहा कि मोहन सुबह से इस बात पर अडा है कि अंकल बताएं उसने ऐसा की कसूर किया था जो उसे उन्होंने पीट दिया था. सब समझा कर हार गए, पर वह वहां से टलता ही नहीं.
"मोहन तुम्हारी तख्ती का पन्ना कहां है, कल तो हेकड़ी बघार रहे थे कि गाँधी जी की वह बात चुनूंगा कि ...?"
"वह तो यह रहा, लो पढ़ो." कहकर मोहन ने एक कागज आगे बढ़ा दिया.
"अत्याचार को सहना उसे बढ़ावा देना है."
"ठीक है, गाँधी जयंती पर गांधी जी एक बात तो सही करके दिखाएँ." इतना बोल एक बड़े लड़के ने तिरंगे ऊंचा करते हुए जोर से कहा, "दोस्तों, अंकल को सफाई तो देनी ही होगी. हम सब यहीं रुकें. बोलो - महात्मा गांधी जी जय...अंकल, बाहर आओ." और आसपास ऐसे ही नारे गूंजने लगे.
अब तो मोहल्ले-भर के लोग भी वहां जमा हो गए. नारे गूंजते रहे. मोहन हाथ जोड़कर फाटक के आगे खड़ा रहा. थोड़ी देर बाद, बबा फरीद फाटक खोलकर फीटर गए और शेर सिंह जी के साथ बाहर आए. फिर सबको स्नेह से देखते हुए बोले-"प्यारे बच्चों!, सुनो, अंकल तुमसे कुछ कहना चाहते हैं." इतना कहकर वह पीछे हट गए.
अब सामने पुलिस अंकल आए और कहने लगे, "अच्छा बच्चों! आज सुबह मुझसे एक ज्यादती हो गयी. मैं अत्याचार कर बैठा. गुस्से में मैंने मोहन पर हाथ उठा दिया, कसूर मेरा ही था. मैं शर्मिंदा हूं." इतना सुनना था कि मोहन ने आगे बढ़कर अंकल के चरण छुए और जोर से नारा लगाया -"अंकल जिंदाबाद!" ##

(श्री सुलेमान टाक के संपादन में ग्रंथ् विकास  जयपुर से प्रकाशित: श्रेष्ठ हिंदी बाल कहानियां" से साभार : image credit : Google)