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Thursday, February 7, 2013

किताब : एक नया बालगीत





इतनी  बड़ी किताब 
उठा तो ली पढ़ने को  
लेकिन जगह बैठने की कितनी संकरी है.


अरे, अरे, ये मेरे घर का 

'रूम' नहीं है, बिग बजार है,
सच पूछो तो मेरा भी अब    
मूड नहीं, बज गया चार है.
मम्मी-पापा   शौपिंग 
करके आ पहुंचे हैं  
और मुझे भी घर जाने की अब जल्दी है.


इस किताब में एक गज़ब की 

स्टोरी है, पढनी होगी
ये स्कूली बुक थोड़े ना 
है जो पूरी रटनी होगी,
मगर  पता है, 
इसकी कीमत 
अरे बाप रे, सौ रुपये सचमुच महंगी है?


चित्र सौजन्य: टिया







Wednesday, February 6, 2013

मेरा आज का बाल गीत : 7 फरवरी, 2013





किताबों का मेला 

किताबों का मेला लगा है जहां पर
मेरा मन उड़ा जा रहा है वहां पर.

नहीं हैं बहुत ज्यादा गुल्लक में पैसे,
किताबों के मेले में पहुंचेंगे कैसे?
ज़रा ढूंढों पापा को, हैं वे कहां पर?

नहीं खाएंगे पानी-पूरी,पकोड़ी 
किताबें खरीदेंगे बस, चाहे थोड़ी,
रहेंगे उन्हें दोस्त अपना बना कर.

स्कूल के काम से जी भरेगा,
तो इनको भी पढ़ने का मन करेगा,
समय रखना होगा ही थोड़ा बचाकर.


चित्र सौजन्य: गूगल-एच.टी.