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Thursday, February 7, 2013

किताब : एक नया बालगीत





इतनी  बड़ी किताब 
उठा तो ली पढ़ने को  
लेकिन जगह बैठने की कितनी संकरी है.


अरे, अरे, ये मेरे घर का 

'रूम' नहीं है, बिग बजार है,
सच पूछो तो मेरा भी अब    
मूड नहीं, बज गया चार है.
मम्मी-पापा   शौपिंग 
करके आ पहुंचे हैं  
और मुझे भी घर जाने की अब जल्दी है.


इस किताब में एक गज़ब की 

स्टोरी है, पढनी होगी
ये स्कूली बुक थोड़े ना 
है जो पूरी रटनी होगी,
मगर  पता है, 
इसकी कीमत 
अरे बाप रे, सौ रुपये सचमुच महंगी है?


चित्र सौजन्य: टिया







2 comments:

  1. आपकी कविताएं लाजवाब होती हैं। बाल कविताओं में ऐसे भाव, ऐसा रस बहुत कम देखने को मिलता है।
    ..............

    मेरे सभी ब्‍लॉगों का पता बदल गया है। परिवर्तित पता निम्‍नानुसार है-

    मेरी दुनिया मेरे सपने
    बालमन
    हमराही
    तस्‍लीम
    सर्प संसार
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

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