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Saturday, March 23, 2013

आलमशाह खान की अनूठी बाल कहानी "मिनी महात्मा"






मिनी महात्मा
- आलम शाह खान 

बात जरा-सी थी पर मोहन  था कि रोये चला जा रहा था. सब समझा-समझा कर थक गए कि बड़े छोटों को पीटते चले आए हैं, अगर पुलिस-अंकल ने उसके एक चपत लगा भी दी तो क्या हो गया? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा उस पर ? बड़े हैं, पडोसी हैं-प्यार भे करते हैं, अच्छे बुरे में भी काम आते हैं, पर वह अब रोते-रोते बिसूरने लगा था, उसकी हिचकियाँ बंध गईं थीं.
"अरे, भाई,बड़े हैं, जरा जल्दी होगी, किसी ने उन्हें नहीं टोका. एक तुम्ही उनके आड़े आ गए."
"क्योंकि उनकी गलती थी. बड़ों ने नहीं टोका उन्हें और मैंने टोक दिया, तो मुझे पीट दिया, क्यों? कोई बड़ा उन्हें रोकता-टोकता तो क्या वह उसके चांटा जड़ देते? नहीं तो मुझे इसलिए पीट दिया कि मैं बच्चा हूं, छोटा और कमजोर हूं.." लोग भी तरह-तरह की बातें कर रहे थे-
"लड़का जिरह किये जाता है, कूद मगज है, इसे कौन समझाए?"
"रोता है, रोने दो-कब तक रोयेगा."
"चलो जी , चलो...सब इंस्पेक्टर साहब आप भी चलें..सुबह ही सुबह रोटी सूरत सामने पड़ी, छुट्टी का दिन न बिगड़ जाए." इतना कह-सुनकर दूध के बूथ का आगे खड़े लोग बिखर गए. दूध खत्म होने पर दूध वाला भी बूथ बंद कर चला गया. पर वह वहां खड़ा रोता रहा-रोता रहा. टस से मस न हुआ. सूरज की किरणें चमकने पर भी जब घर न पहुंचा तो उसकी मां ने इधर-उधर पूछा. पड़ोस के गुल्लू ने सारी बात बतलाई. सुनकर मां  उस बूथ के पास गयी, तो वह उससे चिपट गया. हिचकियाँ भर कर रोने लगा, मां  ने भी वही कहा, जो सबने कहा था-
अरे भले! बड़े हैं, बाप बराबर, तनिक चपलिया दिया तो क्या हो गया? कौन तीर तान दिया? चुप भी हो जा अब."
"मार दिया तो कुछ नहीं,  बड़े हैं और मार दें, पर मेरा कसूर तो बताएं. बप्पा को कारखाने में युनियां  वालों ने मारा, वह अस्पताल में पड़े हैं. उनका कोई कसूर होगा, पर मुझे क्यों मारा. मेरी क्या गलती थी, क्या कसूर था.?'
"अब जिद मत कर, तूने दूध भी नहीं लिया...तेरे बाप्पा को अस्पताल नाश्ता देने जाना तुझे या नहीं?"
"मैं नहीं जाऊंगा, कहीं नहीं जाऊंगा, जाऊंगा तो पुलिस अंकल के घर."
"मान भी जा बेटे, मैं उनसे कह दूंगी कि आगे से ऐसा सुलूक न करें बच्चों के साथ."
"पर जो दो चांटे मुझे जड़ दिया, उनका क्या?"
"उनका क्या? अब चुप भी हो ले, नहीं तो मैं भी लगा दूँगी, चल."
"तो तुम भी क्यों चूको, लगा दो."
"मैं कहती हूं घर चल. अस्पताल जाना है, अब उठ भी."
" मैं नहीं आता, पुलिस अंकल के घर जाकर पूछूँगा उनसे कि मेरा कसूर बताओ."
"नहीं आता  तो जा मर कहीं." इतना कह मां सिर पर पल्ला ढंक कर वहां से चल दी.
"ट्रिन...ट्रिन ...ट्रिन " घंटी सरसराई. थोड़ी देर बाद दरवाजा खोला तो पाया भीगी आंखें लिए सामने मोहन खड़ा है. उसे देखकर शेरसिंह सकपकाए.
"अंकल आपने मुझे क्यों मारा? मेरा कसूर क्या था? सुबकते हुए उसने वही सवाल पूछा.
"किसने मारा, किसको? मैं कुछ नहीं जानता.
"आपने मारा मुझे" आखिर क्यों मारा?"
"जा, मारा तो मारा. दफा हो जा यहां से, नहीं तो और पिट जाएगा, चल खिसक." वह गरजे.
"मारो...और मारो, पर मैं नहीं जाऊंगा, जब तक आप यह नहीं बताएँगे कि मेरा कसूर क्या था..." वह भी कड़क कर बोला. अब आसपास के घरों की मुंडेरों से दस-पांच चेह्तरे उभर आए. देखा-बरामदे के सामने बिसूरता मोहन खड़ा है और अपने बरामदे में झल्लाये शेरसिंह.
"जाएगा भी यहां से, या दो-एक खाकर ही टलेगा."
"आप जो चाहे करें. जब तक मेरा कसूर नहीं बताएँगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगा."
"अजीब उजड्ड-ढीठ लड़का है." एक पडोसी ने कहा.
"देखिये, आप इसे समझाएं..अगर यहां से दफा नहीं हुआ तो मैं इसे कोतवाली में बंद करवा दूंगा." शेरसिंह गरजे.
"आप जो चाहे सो करें, पर मेरा कसूर बताएं, जिससे मैं आगे ऐसा कुछ न करूँ कि बड़ों को मुझ प्र हाथ उठाना पड़े.
"अभी तो बस तू इतना कर कि यहां से दफा हो जा. नहीं तो..." वह भन्नाए, "सच, पड़ोस का लिहाज़ है, वरना इस लौंडे को वह सबक सिखाता कि -"शेरसिंह कूदकर बोले, परसों ही वह नायक से तरक्की लेकर असिस्टंट सब-इन्स्पेक्टर पुलिस बने थे.
"मैं सबक सीखने ही आया हूं. आप मुझे बताएं कि कतार तोड़ने वाले को टोकना कोई पाप है?"
"यार, इस लड़के पर कौन-सा भूत सवार है? किसीभी तरह नहीं मानता." इतना कह कर शर्मा जी नीचे उतरे. वर्मा जी भी साथ आए और उसे पुचकार कर दिलासा देते बोले, "बहुत हो गया, बेटे मोहन, अब छोड़ो भी और घर चले जाओ."
"आप सच मानें, मेरी हेठी नहीं हुई, अगर अंकल ने पीट दिया...और लगा दें दो-चार, पर बताएं तो कि आखिर क्यों मारा मुझे?"
"कुत्ते की दुम, टेढ़ी की टेढ़ी. कहां न भाई बड़े हैं."
"बड़े तो आप सब हैं. आप सब पीट दें, मैं कुछ नहीं बोलूँगा. लेकिन इतना बताएं कि क्यों? सिर्फ इसलिए कि मैं छोटा हूं, कमजोर हूं.
"नहीं-नहीं वह बात नहीं. तुमसे कोई बद्तामीजे हुई होगी. इसलिए बस."
"तो यह बता दें कि क्या बद्तामीजी हुई?"
"ज, ज कुछ नहीं हुआ. पीट दिया हमने, कर ले जो कुछ करना हो." अब शेरसिंह के भीतर बैठा पुलिस वाला बोला.
"ठीक है, तो मैं यहीं बैठा हूं. आपके फाटक के बाहर."
"बैठ या मर हमारी बला से." शेरसिंह ने कहा तभी उनकी घरवाली बाहर आयी और सामने खड़े लोगों से हाथ जोड़कर वहां से जाने को कहा और मोहन की बांह थाम भीतर ले गई.
"अब बोल बेटा. क्या गज़ब हो गया? अगर इन्होने एक-आध लगा भी दी, तो क्या हुआ? जैसे हमारी अमृत वैसा तू! चल मुंह धो, कुल्ला कर और नाश्ता कर ले, उठ!"
"आंटी! आपकी बात सर आंखों पर...पर अंकल बताएं तो?"
"अब क्या बताएं...समझले कि गुस्सा आ गया."
"तो बस, बाहर पांच पड़ोसियों के सामने यहीं कह दें."
"भई,तू तो बहुत जिद्दी है, इससे क्या हो जाएगा?"
"मुझे तसल्ली हो जाएगी कि मैंने ठीक काम किया था."
"मैं कहती हूं कि तुमने गलती नहीं की, ठीक किया."
"आपने कहा, माना,..पर पीता तो अंकल ने, सबके सामने."
"अजी सुनते हो, सुबह-सबेरे क्या महाभारत रचा बेठे. कहदो कि ठीक था मोहन, बस गुस्से में पीट दिया."
"बस, बस रहने दो अपनी भलमनसाहत. यह लौंडा मुझे अपने घर में, अपने बच्चों के सामने जलील करना चाहता है." शेरसिंह गुर्राए.
"इसमें क्या हुआ जो हेठी होती है आपकी?"
"तुम रुको, मैं इसे अभी धक्के मार-मार कर बाहर कर देता हूं." इतना कहकर शेरसिंह आगे बढ़े.
"आप क्यों हलकान होते हैं अंकल, मैं खुद ही चला जाता हूं आपके घर से." मोहन ने इतना कहा और हाथ जोड़कर बाहर आ गया, पर गया नहीं. फाटक पर ही घुटनों में सिर रखकर बैठ गया.
उधर वह पुलिस की नयी वर्दी पहनकर तैयार होने लगे.
"सुनिए, वह लड़का अभी तक फाटक पर डाटा है, कहदो कि गुस्सा आ गया था. क्यों जगत में डंका पिटवाते हो कि बीते-भर का छोकरा थानेदार के दर्जे के सरकारी अफसर के दरवाजे पर सत्याग्रह किये बैठा. कहीं अखवार वालों को जो भनक पड़ गयी तो तिल का ताड़ बनेगा. फिर आज गांधी जयंती भी है.
"क्या कहती हो, उस लौंडे के आगे गिडगिडाऊं, कहूँ कि मेरे बाप बक्शो...तभी"सबको संमि डे भगवान/ईश्वर अलाह तेरे नाम" की गूंज सुनाई दी. खिड़की से झांका, तो देखा - लड़के झंडे और तख्तियां उठाये प्रभात फेरी पर निकले हैं, असिस्टेंट सब इन्स्पेक्टर भीतर खड़े थे और मोहन बाहर उसके फाटक पर डाटा था, तभी लड़कों की टोली आ पहुँची. वहां अपने साथी को गठरी बना बैठे देखा, तो सब वहीं रुक गए.
"क्या हुआ?"
"मोहन यहां क्यों बैठा है?"
"चलो, इसे भी साथ लो, इसे भी तो एक तख्ती बनानी थी."
"चलो मोहन, प्रभात फेरी में. यहां बैठे क्या कर रहे हो?" आगे वाले बड़े लड़के ने उसे बांह थामकर उठाया तो देखा उसकी आंखें सूज कर लाल हो गई हैं और अभी भी उसकी आंखों से आंसू बह रहे हैं.
"अरे क्या हुआ इसे?" सभी के मुंह से निकला.
तभी एक लड़के ने, जो सुबह दूध लेने आया था, सारी बात बतायी और कहा कि मोहन सुबह से इस बात पर अडा है कि अंकल बताएं उसने ऐसा की कसूर किया था जो उसे उन्होंने पीट दिया था. सब समझा कर हार गए, पर वह वहां से टलता ही नहीं.
"मोहन तुम्हारी तख्ती का पन्ना कहां है, कल तो हेकड़ी बघार रहे थे कि गाँधी जी की वह बात चुनूंगा कि ...?"
"वह तो यह रहा, लो पढ़ो." कहकर मोहन ने एक कागज आगे बढ़ा दिया.
"अत्याचार को सहना उसे बढ़ावा देना है."
"ठीक है, गाँधी जयंती पर गांधी जी एक बात तो सही करके दिखाएँ." इतना बोल एक बड़े लड़के ने तिरंगे ऊंचा करते हुए जोर से कहा, "दोस्तों, अंकल को सफाई तो देनी ही होगी. हम सब यहीं रुकें. बोलो - महात्मा गांधी जी जय...अंकल, बाहर आओ." और आसपास ऐसे ही नारे गूंजने लगे.
अब तो मोहल्ले-भर के लोग भी वहां जमा हो गए. नारे गूंजते रहे. मोहन हाथ जोड़कर फाटक के आगे खड़ा रहा. थोड़ी देर बाद, बबा फरीद फाटक खोलकर फीटर गए और शेर सिंह जी के साथ बाहर आए. फिर सबको स्नेह से देखते हुए बोले-"प्यारे बच्चों!, सुनो, अंकल तुमसे कुछ कहना चाहते हैं." इतना कहकर वह पीछे हट गए.
अब सामने पुलिस अंकल आए और कहने लगे, "अच्छा बच्चों! आज सुबह मुझसे एक ज्यादती हो गयी. मैं अत्याचार कर बैठा. गुस्से में मैंने मोहन पर हाथ उठा दिया, कसूर मेरा ही था. मैं शर्मिंदा हूं." इतना सुनना था कि मोहन ने आगे बढ़कर अंकल के चरण छुए और जोर से नारा लगाया -"अंकल जिंदाबाद!" ##

(श्री सुलेमान टाक के संपादन में ग्रंथ् विकास  जयपुर से प्रकाशित: श्रेष्ठ हिंदी बाल कहानियां" से साभार : image credit : Google)







3 comments:

  1. यह एक अनूठी कहानी है. ऐसी कहानी जिससे हर बालसाहित्यकार कुछ सीख सकता है. कम से कम यह बात तो सबको सीख ही लेनी चाहिए कि बालक बड़ों का लघु संस्करण नहीं है. उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है, जो अनुकूल परिवेश और शिक्षा पाकर और भी खिल उठता है. कई बार हम बालक की जिद के लिए उसे दोषी ठहराते हैं. मगर उन परिस्थितियों को जानबूझकर; कभी अनजाने में ही नजरंदाज कर जाते हैं, जो उन जिदों को जन्म देती हैं. कहानी 'बालहठ' के सकारात्मक रूप को सामने लाती है. इसको पढ़ते हुए हरिशंकर परसाई की 'जवाहर लाल को चिट्ठी' कहानी की याद खूब आई. हिंदी बालसाहित्य में मेरी पसंद की कहानियां बहुत ही कम हैं. तैलंग जी का आभार कि उन्होंने एक अविस्मरणीय कथा—रचना से परिचय कराया. अब अगली कहानी की प्रतिक्षा रहेगी.

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  2. एक अच्छी कहानी। बच्चे को बच्चा समझना ही हमारी भूल है। दरअसल हम सोचते हैं कि बच्चा शरीर से कद से काठी से छोटा है तो उसका मस्तिष्क भी छोटा होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। बच्चा अपने आप में एक आदमी है। संपूर्ण कद। पूरे मन-मस्तिष्क के साथ। अच्छी कहानी को देने साझा करने के लिए आपका आभार।

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