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Sunday, March 31, 2013

गुलेलबाज लड़का -- भीष्म साहनी






प्रतिष्ठित कथाकार भीष्म साहनी की "गुलेलबाज लड़का  "  ऐसी  संवेदनात्मक बाल कहानी है जो मुझे सबसे ज्यादा विचलित किये रहती है. इससे पूर्व जब मैंने  F.B.-World of Children's Literature समूह की वाल पर आलम शाह खान   की बाल-कहानी "मिनी महात्मा" की चर्चा की थी तो उसके साथ इस कहानी का भी ज़िक्र किया था. हालांकि यह कहानी "मिनी महात्मा" से आकार में थोड़ी बड़ी है और पाठक से एक ही बार में पढ़ने के लिए समुचित धीरज मांगती है पर इसमें किशोर मन की परपीड़ा प्रवृत्ति को जिस तरह करुणा में परिवर्तित होते दिखाया गया है वह अपने आप में एक अनन्य उदाहरण है. और यही बात इस कहानी को क्लासिक दर्जा देने के लिए काफी है. 
"गुलेल्बाज लड़का" में भीष्म जी की "नरेशन आर्ट" का बेहतरीन नमूना भी देखा जा सकता है, यदि आप के अंदर एक संवेदनशील मन और करुणामयी दृष्टि है. प्रमाण के लिए कहानी के उस हिस्से पर जरा गौर करिये जहां गोदाम के रोशनदान से अंदर आई एक चील मैना के बच्चों को शिकार बनाने के लिए इधर से उधर मंडरा रही हैं और मैना के भयाक्रांत बच्चे चीख रहे हैं. इधर हृदयविदारक दृश्य है और उधर  गुलेलबाज  बोधराज की हिंसक प्रवृत्ति का अनायास कायांतर हो रहा है. वह करुणा से ओत-प्रोत है और वह मैना के बच्चों को चील के आक्रमण से बचाने की फ़िक्र में पुख्ता  रणनीति बनाने में व्यस्त हो गया है.  और जब वह मैना के बच्चों को बचा लेता है तो बोधराज के साथ-साथ पाठक का मन भी असीम संतोष से भर उठता है. 


गुलेलबाज लड़का 



छठी कक्षा में पढते समय मेरे तरह-तरह के सहपाठी थे. एक हरबंस नाम का लड़का था जिसके सब काम अनूठे हुआ करते थे. उसे जब सवाल समझ में नहीं आता  तो स्याही की दवात उठाकर पी जाता. उसे किसी ना कह रखा था कि काली स्याही पीने से अक्ल तेज हो जाती है. मास्टर जी गुस्सा होकर उस पर हाथ उठाते तो बेहद ऊंची आवाज में चिल्लाने लगता, "मार डाला! मास्टर जी ने मार डाला!" वह इतनी जोर से चिल्लाता कि आसपास की जमातों के उस्ताद बाहर निकल आते कि क्या हुआ है. मास्टर जी ठिठक कर हाथ नीचा कर लेते. यदि वह उसे पीटने लगते तो हरबंस सीधा उनसे चिपट जाता और ऊंची-ऊंची आवाज में कहने लगता, "अब की माफ कर दो जी! आप बादशाह हो जी! आप अकबर महान हो जी! आप सम्राट अशोक हो जी! आप माई-बाप हो जी, दादा हो जी, परदादा हो जी!"
क्लास में लड़के हंसने लगते और मास्टर जी झेंपकर उसे पीटना छोड़ देते. ऐसा था वह हरबंस. हर आए दिन बाग में से मेंढक पकड़ लाता और कहता कि हाथ पर मेंढक की चर्बी लगा लें तो मास्टर जी के बेंत का कोई असर नहीं होता: हाथ को पता ही नहीं चलता कि बेंत पड़ा है.
एक दूसरा सहपाठी था-बोधराज. इससे हम सब डरते थे. जब वह चिकोटी काटता तो लगता जैसे सांप ने दस लिए है. बड़ा जालिम लड़का था. गली की नाली पर जब बर्रें आकर बैठते तो नंगे हाथ से वह बर्र पकड़ कर उसका डंक निकाल लेता और फिर बर्रें की तांक में धागा बांधकर उसे पतंग की तरह उड़ाने की कोशिश करता. बाग में जाते तो फूल पर बैठी तितली को लपक कर पकड़ लेता और दूसरे क्षण उँगलियों के बीच मसल डालता. अगर मसलता नहीं तो फडफडाती तितली में पिन खोंस कर उसे अपनी कापी में टांक लेता.
उसके बारे में कहा जाता था कि अगर बोधराज को बिच्छू काट ले तो स्वयं बिच्छू मार जाता है; बोधराज का खून इतना कड़वा है कि उसे कुछ भी महसूस नहीं होता. सारा वक्त उसके हाथ में गुलेल रहती और उसका निशाना अचूक था. पक्षियों के घोंसलों पर तो उसकी विशेष कृपा रहती थी. पेड़ के नीचे खड़े होकर वह ऐसा निशाना बांधता कि दूसरे ही क्षण पक्षियों की "चों-चों" सुनाई देती और घोंसलों में से तिनके और थिगलियाँ टूट-टूट कर हवा में छितरने लगते, या वह झट से पेड़ पर चढ़ जाता और घोंसलों में से अंडे निकाल लता. जब तक वह घोंसलों को तोड़-फोड़ नहीं डाले, उसे चैन नहीं मिलता था.
उसे कभी भी कोई ऐसा खेल नहीं सूझता था जिनमें किसी को कष्ट नहीं पहुंचाया गया हो. बोधराज की मान भी उसे राक्षस कहा करती थीं. बोधराज जेब में तरह-तरह की चीजें रखे घूमता, कभी मैना का बच्चा, या तरह-तरह के अंडे, या कांटेदार झाऊ चूहा. उससे सभी छात्र डरते थे. किसी के साथ झगड़ा  हो जाता तो बोधराज सीधा उसकी छाती में टक्कर मारता, या उसके हाथ पर काट खाता. स्कूल के बाद हम लोग तो अपने-अपने घरों को चले जाते, मगर बोधराज न जाने कहां घूमता रहता.
कभी-कभी वह हमें तरह-तरह के किस्से सुनाता. एक दिन कहने लगा : "हमारे घर में एक गोह रहती है. जानते हो गोह क्या होते है?"
"नहीं तो, क्या होती है गोह?"
"गोह, सांप जैसा एक जानवर होता है, बालिश्त भर लंबा, मगर उसके पैर होते हैं, आठ पंजे होते हैं. सांप के पैर नहीं होते."
हम सिहर उठे.
"हमारे घर में सीढ़ियों के नीचे गोह रहती है," वह बोला, "जिस चीज को वह अपने पंजों से पकड़ ले वह उसे कभी भी नहीं छोडती, कुछ भी हो जाए नहीं छोडती."
हम फिर सिहर उठे.
"चोर अपने पास गोह को रखते हैं. वे दीवार फांदने के लिए गोह का इस्तेमाल करते हैं. वे गोह की एक टांग में रस्सी बाँध देते हैं. फिर जिस दीवार को फांदना हो, रस्सी झुलाकर दीवार के ऊपर की ओर फेंकते हैं. दीवार के साथ लगते ही गोद अपने पंजों से दीवार को पकड़ लेती है. उसका पंजा इतना मजबूत होता है कि फिर रस्सी को दस आदमी भी खींचे, तो गोह दीवार को नहीं छोड़ेगी. चोर उसी रस्सी के सहारे दीवार फांद जाते हैं."
"फिर दीवार को तुम्हारी गोह छोडती कैसे है?" मैंने पूछा.
"ऊपर पहुंचकर चोर उसे थोड़ा-सा दूध पिलाते हैं, दूध पीते हे गोह के पंजे ढीले पड़ जाते हैं."
इसी तरह के किस्से बोधराज हमें सुनाता.
उन्हीं दिनों मेरे पिताजी की तरक्की हुई और हम लोग एक बड़े घर में जाकर रहने लगे. घर नहीं था, बांग्ला था, मगर पुराने ढंग का और शहर के बाहर. फर्श ईंटों के, छत ऊंची-ऊंची और ढालवां, कमरे बड़े-बड़े, लेकिन दीवार में लगता जैसे गारा भरा हुआ है. बाहर खुली जमीन थी और पेड़-पौधे थे. घर तो अच्छा था मगर बड़ा खाली-खाली सा था. शहर से दूर होने के कारण मेरा दोस्त-यार भी यहां पर कोई नहीं था.
तभी वहां बोधराज आने लगा. शायद उसे मालूम हो गया कि वहां शिकार अच्छा मिलेगा, क्योंकि उस पुराने घर में और घर के आँगन में अनेक पक्षियों के घोसले थे, आसपास बंदर घूमते थे और घर के बाहर झाड़ियों में नेवलों के दो एक बिल भी थे, घर के पिछले हिस्से में एक बड़ा कमरा था जिसमें मां ने फालतू सामन भर कर गोदाम-सा बना दिया था. यहां पर कबूतरों का डेरा था. दिन भर गुटरगूं-गुटरगूं चलती रहती. वहां पर टूटे रोशनदान के पास एक मैना का भी घोंसला था. कमरे के फर्श पर पंख और टूटे अंडे और घोंसलों के तिनके बिखरे रहते.
बोधराज आता तो मैं उसके साथ घूमने निकल जाता. एक बार वह झाऊ चूहा लाया, जिसका काला थूथना और कंटीले बाल देखते ही मैं डर गया था. मां को मेरा बोधराज के साथ घूमना अच्छा नहीं लगता था, मगर वह जानती थी कि मैं अकेला घर में पड़ा-पड़ा क्या करूंगा. मां भी उसे राक्षस कहती थी और उसे बहुत समझाती थीं कि गरीब जानवरों को तंग नहीं किया करे.
एक दिन मां मुझसे बोली-"अगर तुम्हारे दोस्त को घोंसले तोड़ने में मजा आता  है तो उससे कहो कि हमारे गोदाम में से घोंसले साफ़ करदे. चिड़ियों ने कमरे को बहुत गन्दा कर रखा है. 
"मगर मां ही  तुम तो कहती थीं कि जो घोंसले तोड़ता है उसे पाप चढ़ता है."
"मैं यह थोड़े ही कहती हूं कि पक्षियों को मारे. यह तो पक्षियों पर गुलेल चलाता है, उन्हें मारता है. घोंसला हटाना तो दूसरी बात है."
चुनांचे जब बोधराज घर पर आया तो मैं घर का चक्कर लगाकर उसे पिछवाड़े की ओर गोदाम में ले गया. गोदाम में टाला लगा था. हम तालाला खोलकर अंदर गए. शाम हो रही थी और गोदाम के अंदर झुटपुटा-सा छाया था. कमरे में पहुंचे तो मुझे लगा जैसे हम किसी जानवर की मांद में पहुंच गए हों. बला की बू थी और फर्श पर बिखरे हुए पंख और पक्षियों की बीट.
सच पूछो तो मैं डर गया. मैंने सोचा, यहां भी बोधराज अपना घिनौना शिकार खेलेगा, वह घोंसलों को तोड़-तोड़ कर गिराएगा, पक्षियों के पर नोचेगा, उनके अंडे तोडेगा, ऐसी सभी बातीं करेगा जिनसे मेरा दिल दहलता था. न जाने मां ने क्यों कह दिया था कि इसे गोदाम में ले जाओ और इससे कहो कि गोदाम में से घोंसले साफ़ कर डे. मुझे तो इसके साथ खेलने को भी माना करती थीं और अब कह दिया कि घोंसले तोडो.
मैंने बोधराज की ओर देखा तो उसने गुलेल संभाल ली थी और बड़े चाव से छत के नीचे मैना के घोंसले की ओर देख रहा था. गोदाम की ढलवां छतें तिकोन-सा बनाती थीं, दो पल्ले ढलवां उतारते थे और नीचे एक लंबा शहतीर कमरे के आर-पार डाला गया था. इसी शहतीर पर टूटे हुए रोशनदान के पास ही एक बड़ा-सा घोंसला था, जिसमें से उभरे हुए तिनके, रुई के फाहे और लताक्टी थिगलियाँ हमें नजर आ जाति थीं. यह मैना का घोंसला था. कबूतर अलग से दूसरी ओर शहतीर पर गुटरगूं-गुटरगूं कर रहे थे और सारा वक्त शहतीर के ऊपर मटरगश्ती कर रहे थे.
"घोंसले में मैना के बच्चे , बोधराज ने कहा और अपनी गुलेल साध ली.
तभी मुझे घोंसले में से छोटे-छोटे बच्चों की पीली-पीली नन्हीं चोंचें झांकती नजर आईं.
"देखा?" बोधराज कह रहा था, "ये विलायती मैना हैं, इधर घोंसला नहीं बनातीं. इनके मां-बाप जरूर अपने काफिले से पिछड़ गए होंगे और यहां आकर घोंसला बना लिया होगा.
"इनके मां-बाप कहां हैं?" मैंने पूछा.
"चुग्गा लेने गए हैं. अभी आते ही होंगे," कहते हुए बोधराज ने गुलेल उठाई.
मैंने उसे रोकना चाहता था कि घोंसले पर गुलेल नहीं चलाये पर तभी बोधराज को गुलेल से फर्रर्रर्र की आवाज निकली और इसके बाद जोर के टन्न की आवाज आई. गुलेल का कंकड़ घोंसले से न लग कर सीधा छत पर जा लगा था, जहां तीं की चादरें लगी थीं.
दोनों चोंच घोंसले के बीच कहीं गायब हो गईं और फिर सकता-सा आ गया. लग रहा था मानो मैना के बच्चे सहम कर चुप हो गए थे.
तभी बोधराज ने गुलेल से एक और वार किया. अबकी बार कंकड़ शहतीर से लगा.बड़ा अकडा करता था. दो निशाने चूक जाने पर वह बौखला उठा. अबकी बार वह थोड़ी देर तक चुपचाप खड़ा रहा. जिस वक्त मैना के बच्चों ने चोंच फिर से उठाई और घोंसले के बाहर झांक कर देखने लगे, उसी समय बोधराज ने तीसरा वार किया. अबकी कंकड़ घोंसले के किनारे पर लगा. तीं-चार तिनके और रुई के गले उड़े और छितरा-छितरा कर फर्श की ओर उड़ने लगे. लेकिन घोंसला गिरा नहीं.
बोधराज ने फिर से गुलेल तान ली थी. तभी कमरे में एक भयानक-सा साया दोल गया. हमने नजर उठाकर देखा. रोशनदान में से आने वाली रोशनी सहसा ढक गई थी. रोशनदान के सींखचे पर एक बड़ी-सी चील पर फैलाए बैठी थी. हम दोनों ठिठक कर उसकी ओर देखने लगे. रोशनदान में बैठी चील भयानक-सी लग रही थी.
"यह चील का घोंसला होगा. चील अपने घोंसले में लौटी है." मैंने कहा.
"नहीं, चील का घोंसला यहां कैसे हो सकता है? चील अपना घोंसला पेड़ों पर बनाती है. यह मैना का घोंसला है."
उस वक्त घोंसले में से चों-चों की ऊंची आवाज आने लगी. घोंसले में बैठी मैना के बच्चे पर फडफडाने और चिल्लाने लगे.
हम दोनों निश्चेष्ट से खड़े हो गए, यह देखने के लिए कि चील अब क्या करेगी. हम दोनों टकटकी बांधे चील की ओर देखे जा रहे थे.
चील रोशनदान में से अंदर आ गयी. उसने अपने पर समेट लिए थे और रोशनदान पर से उतारकर गोदाम के आर-पार लगे शहतीर पर उतर आयी थी. वह अपना छोटा-सा सिर हिलाती, कभी दाएं और कभी बाएं देखने लगती. मैं चुप था, बोधराज भी चुप था, न जाने वह क्या सोच रहा था.
घोंसले में से बराबर चों-चों की आवाज आ रही थी, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थी. मैना के बच्चे बुरी तरह डर गए थे.
"यह यहां रूज आती होगी," बोधराज बोला.
अब मेरी समझ में आया कि क्यों फर्श पर जगह-जगह पंख और मांस के लोथड़े बिखरे पड़े रहते हैं. जरूर हर आए दिन चील घोंसले पर झपट्टा मारती रही होगी. मांस के टुकड़े और खून-सने पर इसी की चोंच से गिरते होंगे.
बोधराज अभी भी टकटकी बांधी चील की ओर देख रहा था.
अब चील धीरे-धीरे शहतीर पर चलती हुई घोंसले की ओर बढ़ने लगी थी और घोंसले में बैठे मैना के बच्चे पर फडफडाने और चीखने लगे थे. जब से चील रोशनदान पर आकर बैठी थी, मैना के बच्चे चीखे जा रहे थे. बोधराज अब भी मूर्तिवत खड़ा चील की ओर ताके जा रहा था.
मैं घबरा उठा. मैं मन में बार-बार कहता, "क्या फर्क पड़ता है अगर चील मैना के बच्चों को मार डालती है या बोधराज अपनी गुलेल से उन्हें मार डालता है? अगर चील नहीं आती तो इस वक्त तक बोधराज ने मैना का घोंसला नोच भी डाला होता.
तभी बोधराज ने गुलेल उठाई और सीधा निशाना चील पर बाँध दिया.
"चील को मत छेड़ो. वह तुम पर झपटेगी." मैंने बोधराज से कहा.
मगर बोधराज ने नहीं सुना और गुलेल चला दी. चील को निशाना नहीं लगा. कंकड़ छत से टकरा कर नीचे गिर पड़ा और चील ने अपने बड़े-बड़े पंख फैलाए और नीचे सिर किए घूरने लगी.
"चलो यहां से निकल चलें." मैंने डर कर कहा.
"नहीं, हम चले गए तो चील बच्चों को खा जाएगी."
"उसके मुंह से यह वाक्य मुझे बड़ा अटपटा लगा. स्वयं ही तो घोंसला तोड़ने के लिए गुलेल उठा लाया था.
बोधराज ने एक और निशाना बाँधा. मगर चील उस शहतीर पर से उड़ी और गोदाम के अंदर पर फैलाए तैरती हुई-सी आधा चक्कर काटकर फिर से शहतीर पर जा बैठी. घोंसले में बैठे बच्चे बराबर चों-चों किए जा रहे थे.
बोधराज ने झट से गुलेल मुझे थमा दी और जेब से पांच-सात कंकड़ निकाल कर मेरी हथेली पर रखे. "तुम चील पर गुलेल चलाओ. चलाते जाओ, उसे बैठने नहीं देना." उसने कहा और स्वयं भागकर दीवार के साथ रखी मेज पर एक टूटी हुई कुर्सी चढ़ा दी और फिर उछलकर मेज पर चढ़ गया और वहां से कुर्सी पर जा खड़ा हुआ. फिर बोधराज ने दोनों हाथ ऊपर को उठाये, जैसे-तैसे अपना संतुलन बनाए हुए उसने धीरे-से दोनों हाथों से घोंसले को शहतीर पर से उठा लिया और धीरे-धीरे कुर्सी पर से उतर कर मेज पर आ गया और घोंसले को थामे ही छलांग लगा दी.
"चलो, बाहर निकल चलो, उसने कहा" और दरवाजे की ओर लपका.
गोदाम में से निकल कर हम गैराज में आ गए. गैराज में एक ही बड़ा दरवाजा था और दीवार में छोटा-सा एक झरोखा. यहां भी गैराज के आरपार लकड़ी का एक  शहतीर लगा था.
"यहां पर चील नहीं पहुंच सकती" बोधराज ने कहा और इधर उधर देखने लगा था.
थोड़ी देर में घोंसले में बैठे मैना के बच्चे चुप हो गए. बोधराज बक्से पर चढ़ कर मैना के घोंसले में झाँकने लगा. मैंने सोचा, अभी हाथ बढाकर दोनों बच्चों को एक साथ उठा लेगा, जैसा वह अक्सर किया करता था, फिर भले ही उन्हें जेब में डालकर घूमता फिरे. मगर उसने ऐसा कुछ नहीं किया. वह देर तक घोंसले के अंदर झांकता रहा और फिर बोला, "थोड़ा पानी लाओ, इन्हें प्यास लगी है. इनकी चोंच में बूंद-बूंद पानी डालेंगे."
मैं बाहर गया और एक कटोरी में थोड़ा-सा पानी ले आया. दोनों नन्हें-नन्हें बच्चे चोंच ऊपर उठाये हांफ रहे थे. बोधराज ने उनकी चोंच में बूंद-बूंद पानी डाला और बच्चों को छोने से मुझे माना कर दिया, न ही स्वयं उन्हें छुआ.
इन बच्चों के मां-बाप यहां कैसे पहुंचेगे?" मैंने पूछा.
"वे इस झरोखे में से आ जाएंगे. वे अपने आप इन्हें ढूंढ निकालेंगे."
हम देर तक गैराज में बैठे रहे. बोधराज देर तक मंसूबे बनाता रहा कि वह कैसे रोशनदान को बंद कर देगा, ताकि चील कभी गोदाम के अंदर न आ सके. उस शाम वह चील की ही बाटे करता रहा 
दूसरे दिन जब बोधराज मेरे घर आया तो न तो उसके हाथ में गुलेल थी और न जेब में कंकड़, बल्कि जेब में बहुत-सा चुग्गा भरकर लाया था और हम दोनों देर तक मैना के बच्चों को चुग्गा डालते और उनके करतब देखे रहे थे.##  

( श्री सुलेमान टाक के संपादन में ग्रन्थ विकास, जयपुर से प्रकाशित "श्रेष्ठ हिंदी बाल कहानियां" से साभार )

pic.credit: google.

2 comments:

  1. पहले पढ़ी थी कभी लेकिन अब ध्याान से पढ़ी। बोधराज के अंदर भी भला इंसान छिपा हुआा था. यह कहानी बताती है कि सीख से ज्यादा बच्चे अपने अनुभव से जिंदगी के तौर तरीके खोज लेते हैं। साहनी जी ने बच्चों के अंतस में जाकर यह कथा लिखी होगी। यह तय है। आपका आभार कि आपकी वजह से यह पढ़ने को मिली।

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