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Saturday, June 29, 2013

समकालीन बाल साहित्‍य: स्‍वरूप एवं दृष्टि। | मेरी दुनिया मेरे सपने

समकालीन बाल साहित्‍य: स्‍वरूप एवं दृष्टि। | मेरी दुनिया मेरे सपने

मेरे कुछ प्रिय बालगीत


चक्की चले

चक-चक चकर-चक चक्की चले,
हो रामा! हो रामा! हो रामा!

भोर से उठ माँ रामधुन गाए,
इस हाथ उस हाथ पाट घुमाए,
पाट जो घूमे तो धरती ‘हले’,
हो रामा! हो रामा! हो रामा!

पंछी को दाना, ढोरों को सानी,
चिंता जगत की माँ में समानी,
माँ, तेरे दम से गिरस्थी चले,
हो रामा! हो रामा! हो रामा!


वाह मेरे किशन कन्हाई!

मेट्रो में घूमे न शापिंग मॉल देखा,
मूवी-शूवी देखी न सिनेमाहॉल देखा,
माखन के चक्कर में खाई पिटाई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

बाँसुरी की धुन में ही मस्त रहे हर दिन,
काम कैसे चल पाया सेलफोन के बिन ?
थाम के लकुटिया बस गैया चराई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!

काश कहीं द्वापर में इंटरनेट होता,
ईमेल से सबका कांटेक्ट होता,
गली-गली ढूँढ़ती न फिर जसुदा माई।
वाह मेरे, वाह मेरे किशन कन्हाई!



अम्माँ की रसोई में 

हल्दी दहके, धनिया महके,
अम्माँ की रसोई में ।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा ।
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा ।
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में ।

आटा-बेसन, चकला-बेलन,
घूम रहे हैं बतियाते ।
राग-रसोई बने प्यार से
ही अच्छी, ये समझाते ।
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में ।

थाली, कड़छी और कटोरी,
को सूझी है मस्ती।
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती।
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।


समुंदर की लहरों!

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।
हवाओं का गुस्सा न हम पर उतारो।

बनाएंगे बालू के घर हम यहाँ पर,
जगह ऐसी पाएंगे सुंदर कहाँ पर?

न यूँ अपनी ताकत की शेखी बघारो,
कभी झूठी-झूठी ही हमसे भी हारो।

हमें तो यहाँ पर ठहरना है कुछ पल,
दिखा लेना गुस्से के तेवर कभी कल,

करो दोस्ती हमसे, बाँहें पसारो।
बहो धीरे-धीरे, थकानें उतारो।

समुंदर की लहरों, उछालें न मारो।

Friday, June 21, 2013

मेरे चार नए बाल गीत

आम की डाली, नीचे झुक


आम की डाली, नीचे झुक,
नीचे झुक, एक आम दे,
आम दे, एक आम दे!

हत्थू मेरे छोटे से, ऊपर तक न जाते हैं,
भैया हैं पूरे नकटे, कंधोली न चढाते हैं,
खड़े-खड़े टाँगें दूखीं
थोड़ा-सा आराम दे!

आम मिले तो जल्दी से मैं भी अपने घर जाऊं,
खट्टा-मीठा जैसा हो चूस-चूस कर खा जाऊं,
एक आम के बदले में
तुझे ढेर से, राम दे!

बारिश के मौसम के हैं कई रूप


पिछली गली में झमाझम पानी,
अगली गली में है सुरमई धूप.
बारिश के मौसम के हैं कई रूप.

माई मेरी, देखो चमत्कार कैसा,
धोखाधड़ी का ये व्यापार कैसा,
किसना की मौसी की टोकरी में ओले,
बिसना की मौसी का सूखा है सूप.

सुनता नहीं सबकी ये ऊपर वाला,
उसके भी घर में है गडबड घोटाला,
चुन्नू के घर में निकल गए छाते,
मुन्नू के घर वाले रहे टाप-टूप.

बारिश के मौसम के हैं कई रूप.



पतंग मेरे घर आई



टूटकर पतंग मेरे घर आई.

थामे थी जिसकी उंगली हवा,
उसको दे दिया बीच में ही दगा,
पल भर भी दोस्ती न निभ पाई.
टूटकर पतंग मेरे घर आई.


टूटे ज्यों हरा पात शाख से,
टपके जैसे आंसूं आंख से,
पांव पर गिरे जैसे परछाई.
टूटकर पतंग मेरे घर आई.

न,न पतंग मेरी, मत रोना,
कसम तुझे, यूं उदास मत होना,
जीता वो जिसने ठोकर खाई.
टूटकर पतंग मेरे घर आई.
  
ओ कारी बदरिया!


ओ कारी बदरिया, पानी तो ला,
पर आंधी न ला.

उड़ जाएगा मेरी खोली का छप्पर,
बापू जब आएंगे बज्जी से थक कर,
पूंछेंगे, हाय राम, ये क्या हुआ?

मेहनत से हमने ये खोली बनाई,
बापू की खर्च हुई आधी कमाई,
बुंदियां  गिरा, पर न ओले गिरा.

ओ कारी बदरिया, पानी तो ला,

पर आंधी न ला 


- रमेश तैलंग 

चित्र सौजन्य : गूगल