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Thursday, July 25, 2013

फ़िल्मी बातें -आज शुक्रवार है

एक थे जॉन चाचा



बीती शताब्दी के छठे दशक में एक ऐसी यादगार फिल्म प्रदर्शित हुई जिसने  सड़क पर भीख मांगते बच्चों को आत्म सम्मान से जीने का रास्ता दिखाया और श्रम के महत्त्व का एक शाश्वत सन्देश दिया. यह फिल्म थी  बूट पॉलिश
शंकर -जयकिशन का कर्णप्रिय सदाबहार संगीत, और अपने समय के श्रेष्ठ बाल कलाकार बेबी नाज़ और मास्टर रतन  के साथ मंजे हुए अभिनेता डेविड की बेहतरीन कलाकारी ने दर्शकों का मन मोह लिया.. इस फिल्म के गीत और संगीत  जितने लोकप्रिय हुए उनसे कहीं अधिक मशहूर हुआ डेविड का जॉन चाचा वाला अद्भुत चरित्र. जो बच्चों को इस तरह भाया कि आज भी उनकी स्मृति से उसे मिटाया नहीं जा सकता.


डेविड ने इस फिल्म में एक ऐसे लंगड़े व्यक्ति की भूमिका अदा की ,जो पियक्कड़  और जेबकतरा होते हुए भी  बच्चों के प्रति प्रगाढ़ स्नेह रखता है.  बाल कलाकार  नाज़ और मास्टर रतन ने  क्रमशः बेलू और भोला नाम से दो ऐसे अनाथ बाल चरित्रों को परदे पर जिया जिनके माता-पिता  हैजा से मरते वक्त उन्हें  कमला नाम की स्त्री  के दरवाजे पर छोड़ जाते है और जो उनसे  सड़क पर भीख मांगने का धंधा कराती है. जब इन दो बच्चों की मुलाक़ात जॉन चाचा से  होती है तो वे उन्हें भीख मांगने की बजाय  बूट पॉलिश करने और श्रम के ज़रिये  आत्म सम्मान से जीने की प्रेरणा देते है. 
याद कीजिये ये प्रेरणास्पद गीत

नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है,
मुट्ठी में है तकदीर हमारी.......
.....
जॉन चाचा तुम कितने अच्छे
तुम्हे प्यार करते सब बच्चे....

बूट पॉलिश फिल्म को  कान्स फिल्म समारोह के लिए नामांकित किया गया जिसमें   दोनों बाल कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय की विशेष सराहना की गई.
जॉन चाचा  की भूमिका के लिए डेविड को फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता पुरस्कार दिया गया. अपने लगभग चालीस साले के फ़िल्मी करिएर में  डेविड ने एक सौ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया पर उनकी सहृदय चाचा वाली छवि ही दर्शकों को सदा लुभाती रही.




नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है'  के अलावा, डेविड पर फिल्माया गया एक और गीत लपक-झपक तू आ रे बदरवा  जो मन्नाडे की आवाज में था भी बेहद लोकप्रिय हुआ (http://www.youtube.com/results?search_query=lapak+jhapak+tu+aa+re+badarwa&oq=lapak&gs_l=youtube.1.0.0l6j0i10j0l3.1495.2017.0.7753.5.2.0.0.0.0.1145.1919.6-1j1.2.0...0.0...1ac.1.11.youtube.W1_W8B6q64M)

बूट पॉलिश. फिल्म के निर्देशक के रूप में हालांकि औपचारिक रूप से प्रकाश अरोड़ा का नाम क्रेडिट लाइन में गया  पर अब यह तथ्य सर्व विदित है कि इसका असली निर्देशन स्व. राज कपूर ने ही किया और फिल्म को व्यावसायिक रूप से एक नया जीवन दिया.
डेविड का पूरा नाम डेविड अब्राहम श्युलकर था. वे यहूदी थे. उनका जन्म 1909 में हुआ और 71 वर्ष की आयु में २८ दिसंबर, 1981 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए. डेविड की चमकती हुई  खल्वाट, छोटा कद, मुस्कराता चेहरा, सुतवां नाक, और बड़ी-बड़ी आँखें आज भी उनके प्रशंसकों  को भुलाए नहीं भूलती.
कहा तो ये जाता है कि उन्होंने गंजों का एक  क्लब भी बनाया हुआ था  . सच कुछ भी हो पर उनके आकर्षक व्यक्तित्व और हाजिर जवाबी के किस्से कईयों की स्मृति में आज भी जिंदा होंगे.. डेविड बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे, वाशिंगटन में बसी उनकी पौत्री एन.रयूबेन के शब्दों में वे (डेविड) भारतीय फिल्मों के बॉब होप थे. यही नहीं डेविड  अनेक राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय समारोह, जिनमें पहला फिल्मफेयर सम्मान समारोह भी शामिल है, के सूत्रधार और अंतर-राष्ट्रीय कुश्ती के रेफरी भी रहे. पर जहाँ तक बच्चों का सवाल है, उनके लिए वे जॉन चाचा थे, जॉन चाचा हैं, और जॉन चाचा ही रहेंगे
-         रमेश तैलंग

सन्दर्भ सामग्री सौजन्य
http://www.washingtonpost.com/lifestyle/style/shalom-bollywood-reveals-indian-cinemas-surprising-stars-of-its-golden-age/2013/04/18/d043967c-a833-11e2-b029-8fb7e977ef71_story.html      


चित्र सौजन्य गूगल सर्च 

Saturday, July 20, 2013

बालरंगमंच -आज रविवार है


भारत में बालरंगमंच की पहचान


बाल्रंग्मंच की एक कार्यशाला 

          बच्चों की शिक्षा में रंगमंच की भूमिका और नाटकों के महत्त्व को विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में ही पहचान लिया था और पश्चिम बंगाल स्थित अपने शान्तिनिकेतन विद्यापीठ में इस कलारूप को समुचित स्थान दे दिया था. उन्होंने बच्चों के लिए स्वयं शैक्षिक महत्त्व वाले नाटक लिखे और शिक्षा में इसे एक अनिवार्य विषय भी बना दिया.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 
          लगभग उसी समय तमिलनाडु में शंकरदास स्वमिगल ने समरस सन्मार्ग सभा तथा तत्त्व मिनालोचनी विद्या बालसभा  तथा कर्नाटक में गुब्बी वीरन्ना ने चलित बालमंच की स्थापना कर बच्चों को रंगमंच की शिक्षा देने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पहल की. महाराष्ट्र में जी.आर.शिर्गोप्पिकर ने ग्रामीण बच्चों को इकठ्ठा कर आनंद संगीत मण्डली बनाई और अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर बाल कलाकारों को नाटक एवं रंगमंच के क्षेत्र में प्रवीण किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, जिन्हें बच्चे और जो बच्चों को सदैव प्रिय रहे, ने  देश में अनेक जगह नाट्यशालाओं की स्थापना के लिए प्रोत्साहन दिया  जिसक एक महत्वपूर्ण उदाहरण   कोलकाता स्थित 'चिल्ड्रेन'स लिटिल थिएटर'  भी  है.
          बीसवीं शताब्दी के छठे दशक के बाद इस दिशा में और ज्यादा जागृति हुई. चिल्ड्रेन'स थिएटर की दुनिया में आज कई ऐसे  नाम हैं जिन्होंने हाशिये पर पड़े और विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए उपयुक्त रंगमंच तैयार किया और उनसे लगातार ऐसे नाटकों को अभिनीत कराया जो उनमें न केवल अभिनय कला की निहित संभावनाओं को विकसित कर सकें बल्कि बाल-रंगमंच के महत्त्व को एक अलग कलारूप की तरह स्थापित भी कर सकें. हालांकि, यह भी सच है कि यह काम देश में अभी तक अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका और इसके पीछे समर्पण, संसाधन, तथा जनजागृति की कमी जैसे अनेक कारण रहे हैं जो सर्व विदित हैं.

बैरी जॉन 

          बाल रंगमंच की इस विकास यात्रा में, 'थिएटर एक्शन ग्रुप' के बेरी जॉन, गुजराती अभिनेता प्रानसुख नायक, तमिलनाडु के वेलु श्राव्णन,एम् रामास्वामी,कर्णाटक के नीनासम, शालरंगा,  पश्चिम बंगाल के नन्दिकर,तथा ज़रीन चौधरी के अलाबा   रामगोपाल बजाज,कुछ और भी ऐसी प्रतिष्ठित नाम है जैसे -अनुपम खेर, रामगोपाल बजाज, (स्व.) रेखा जैन, देवेन्द्रराज अंकुर, अब्दुल लतीफ़ खटाना, युवराज शर्मा, राजेश तैलंग, अभिषेक गोस्वामी, राजू रॉय, आदि,

(स्व.) रेखा जैन 

जिनका योगदान अविस्मरणीय है, तथा जिन्होंने बच्चों के साथ अभिनय की अनेक कार्यशालाएं की  और आज भी इस क्षेत्र में लगातार नित-नए प्रयोग कर रहे हैं.
..... जारी ...

- रमेश तैलंग 

इनपुट सौजन्य -www.indianetzone.com/59/childrens_theatre_india.htm
चित्र सौजन्य-google.
-अगली कड़ी में पढ़िए : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की 'चिल्ड्रेन थिएटर में महत्वपूर पहल' और थिएटर इन एड्यूकेशन का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कार रंगटोली का इस दिशा में अप्रतिम योगदान.  





Thursday, July 18, 2013

फ़िल्मी बातें - आज शुक्रवार है


भारतीय बाल चलचित्र समिति 
(Children's Film Society of India)
द्वारा १९५६ में प्रदर्शित पहली बाल फिल्म 
 'जलदीप'



           फिल्मों की बात हो और वह भी बच्चों की फिल्मों की तो चिल्ड्रेन'स फिल्म सोसायटी ऑफ इंडिया  का नाम आगे न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. एक तरह से देखा जाए तो स्वतंत्र भारत में बच्चों के लिए सिनेमा  की अवधारणा और बाल फिल्मों का इतिहास ही चिल्ड्रेन'स फिल्म सोसायटी के इतिहास से शुरू होता है. इससे पूर्व बाल फ़िल्में पारिवारिक फिल्मों का ही हिस्सा मानी जाती रही और उनकी कोई स्वतंत्र पहचान भारत में बनी तो सी.ऍफ़.एस.आई के जन्म के साथ ही बनी.  सी.ऍफ़.एस.आई द्वारा मशहूर सिने-लेखक/गीतकार/निर्देशक केदार शर्मा के निर्देशन में बनी और  सन १९५६ में प्रदर्शित श्वेत-श्याम बालफिल्म 'जलदीप' को स्वतंत्र भारत में बनी पहली बाल फिल्म का दर्ज़ा प्राप्त है, हालांकि कुछ लोग सन १९३० में प्रदर्शित वी.शांताराम की फिल्म 'रानी साहेबा' को भी पहली  बालफिल्म मानते हैं. पर इसके प्रिंट मौजूद  हैं या नहीं इसकी प्रामाणिक जानकारी मुझे नहीं है.
.
          जलदीप फिल्म का संगीत की स्नेहल भाटकर ने रचा और इसमें अभिनय किया अशोक कुमार, प्रीतिवाला, दुबे और चन्दन ने


'जलदीप' फिल्म के निर्देशक : केदार शर्मा 


          फिल्म की संक्षिप्त कथा यह है कि उसका कथा - नायक अशोक नाम का बालक है जिसके पिता एक लाइटहाउस के प्रभारी हैं. एक दिन अशोक  बिना किसी को बताये अपनी मित्र प्रीति को पाल-नौका में बैठाकर समुद्र की सैर कराने की ठान लेता है. इसमें साथ देता है चन्दन नाम का बालक, चन्दन  नौका का लापरवाह नाविक है. वह दोनों को अपनी झूठी शान दिखाने के लोभ में नाव को  खतरनाक जगहों से गुजारता है. दुर्भाग्य की बात,उसी  समय एक तूफ़ान भी समुद्र में आ जाता है. अब चन्दन, अशोक और प्रीति - तीनों की  ही जान पर बन आती है. अशोक के पिता को जैसे ही इसका पता चलता है तो वे अपनी जान पर खेल कर तीनों बच्चों की जान बचाते हैं. जान तो बच  जाती है सभी की पर क्या इस घटना से इन बच्चों को कुछ सबक मिलता है..यह तो तब पता चलेगा जब यह फिल्म देख ली जाए.

          'जलदीप' फिल्म बहुत पुरानी है पर शायद उसकी डी.वी.डी चिल्ड्रेन'स फिल्म सोसायटी में उपलब्ध हो. पता करना चाहो तो उनकी वेब साईट -www.cfsindia.org पर उनका फोन नंबर और पता दोनों मौजूद हैं.

          हाँ, इस बाल फिल्म के इक्के-दुक्के गाने youtube पर चाहो तो अभी सुने जा सकते हैं , लिंक दी जा रहे है -जैसे 'छोटा-सा पप्पू,

          चलते-चलते एक और महत्वपूर्ण बात यह कि जलदीप फिल्म को  1957 में वेनिस में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी मिला.


-रमेश तैलंग 

इनपुट्स एवं चित्र सौजन्य: सी.ऍफ़.एस.आई/googal 

Friday, July 12, 2013

फ़िल्मी बातें – आज शुक्रवार है

देख इंडियन सर्कस 



मंगेश हडावले के निर्देशन में बनी बाल फिल्म देख इंडियन सर्कस पता नहीं, तुम बच्चों में से किस-किस ने देखी है पर जिन्होंने नहीं देखी उनके लिए थोड़ी जानकारी आज चलो हम यहाँ बांटते है-

राजस्थान की  रेतीली ज़मीन पर फिल्माई गई इस बाल फिल्म के प्रमुख कलाकार हैं तनिष्ठा चटर्जी (कजरो), नवाजुद्दीन सिद्दीकी (जेठू) , वीरेंदर सिंह राठोड(घुमरू) और सुहानी ओझा (पन्नी). 

गरीबी की मार से जूझता कजरो और जेठू का परिवार अपने बेटे-बेटी यानि घुमरू और पन्नी को खूब पढ़ाना-लिखाना चाहता है और उनके सब सपने सच करना चाहता है पर सपने बड़े हैं और साधन छोटे. राज्य में  चुनाव होने वाले हैं. तभी गाँव में एक सर्कस का आगमन होता  है पर इस सर्कस में क्या  घुमरू और पन्नी अपने सपनों का सुंदर संसार खोज पाते हैं या फिर वे भी जीवन के सर्कस में कठपुतली की तरह पात्र बन कर रह जाते हैं, इस प्रश्न का उत्तर तो इस फिल्म को देखने के बाद ही पता चल पायेगा तुम सबको. लेकिन फिलहाल इस फिल्म का एक प्रोमो तुम यू-ट्यूब पर अभी इस लिंक पर जरूर देख सकते हो : http://www.youtube.com/watch?v=nJJBETZ2sws

अब इस फिल्म के बारे में कुछ और ज़रूरी बातें. देख इंडियन सर्कस के दोनों प्रमुख वयस्क कलाकारों क्रमशः  तनिष्ठा चटर्जी तथा नवाजुद्दीन सिद्दीकी को बारहवें सालाना न्यूयार्क भारतीय फिल्म समारोह के अंतर्गत इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अभिनेत्री का पुरस्कार मिल चुका है, और यह फिल्म सोलहवें बुसान फिल्मोत्सव में ऑडियंस चॉइस अवार्ड भी जीत चुकी है. यहीं नहीं साठवें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी इसने  सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म, तथा सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेता (वीरेंदर सिंह राठोड) के पुरस्कार भी जीते हैं.



देख इंडियन सर्कस के निर्देशक मंगेश हडावले ने अपनी पहली ही मराठी  बाल फिल्म टिंग्या(२००७) को अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दिला कर देश-विदेश में अच्छी-खासी ख्याति बटोर ली थी और आज भी उनकी गणना देश के श्रेष्ठ युवा फ़िल्मी निर्देशकों में होती है.

देख इंडियन सर्कस की अन्य कुछ संक्षिप्त जानकारियां विकिपीडिया के हवाले से इस प्रकार हैं:


Dekh Indian Circus  (Source: Wikipedia)

Directed by          Mangesh Hadawale
Produced by         Anil Lad, Mahaveer Jain, Chirag Shah, Vivek Oberoi
Story by            Mangesh Hadawale
Starring             Tannishtha Chatterjee, Nawazuddin Siddiqui,Virendra Singh Rathod, Suhani Oza
Music by            Shankar-Ehsaan-Loy
Cinematography      Laxman Utekar
Editing by           James J Valiakulathil
Studio              Sundial Pictures
Release date(s)       7 October 2011
Running time         101 minutes
Country            India
Language                     Hindi Rajasthani


Thursday, July 11, 2013

तीन नटखट बाल कविताएँ


-1-
आज मेरी मम्मी ने खूब डांट-डपट की 
और मेरे गालों पर हल्की-सी चपत दी 
क्योंकि मैं शैतानी करता ही जा रहा था 
कैसे बताऊं मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था 
पर इस शैतानी ने सबक एक सिखा दिया
आगे का दांत मेरा जड़ से हिला दिया 
अब मैं मुंह बंद किये चुपचाप रहता हूँ.
हाहाहा - हीहीही करने से डरता हूँ.




-2-

हरी सब्जियों का एक दिन लगा चस्का
हरा हो गया चेहरा पूरी  किचन का 
लौकी -तोरी, पालक, लाए  घर वाले 
बेसन ने सब के मन मगर बदल डाले  
पालक, तोरी, सब के बन गए पकोड़े
प्लेट लिए सब के सब खाने को  दौड़े.





- 3-

सुबह-सुबह अपनी  स्कूल बस आई 
नींद हमारी तब तक पूरी  न हो पाई,
सीट पर झपकी ली, सबने जगा दिया 
ड्राइवर ने भी पों-पों हॉरन बजा दिया.


- रमेश तैलंग 
  



चित्र सौजन्य : गूगल