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Saturday, July 20, 2013

बालरंगमंच -आज रविवार है


भारत में बालरंगमंच की पहचान


बाल्रंग्मंच की एक कार्यशाला 

          बच्चों की शिक्षा में रंगमंच की भूमिका और नाटकों के महत्त्व को विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर ने बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में ही पहचान लिया था और पश्चिम बंगाल स्थित अपने शान्तिनिकेतन विद्यापीठ में इस कलारूप को समुचित स्थान दे दिया था. उन्होंने बच्चों के लिए स्वयं शैक्षिक महत्त्व वाले नाटक लिखे और शिक्षा में इसे एक अनिवार्य विषय भी बना दिया.
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 
          लगभग उसी समय तमिलनाडु में शंकरदास स्वमिगल ने समरस सन्मार्ग सभा तथा तत्त्व मिनालोचनी विद्या बालसभा  तथा कर्नाटक में गुब्बी वीरन्ना ने चलित बालमंच की स्थापना कर बच्चों को रंगमंच की शिक्षा देने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पहल की. महाराष्ट्र में जी.आर.शिर्गोप्पिकर ने ग्रामीण बच्चों को इकठ्ठा कर आनंद संगीत मण्डली बनाई और अपने स्वयं के अनुभवों के आधार पर बाल कलाकारों को नाटक एवं रंगमंच के क्षेत्र में प्रवीण किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, जिन्हें बच्चे और जो बच्चों को सदैव प्रिय रहे, ने  देश में अनेक जगह नाट्यशालाओं की स्थापना के लिए प्रोत्साहन दिया  जिसक एक महत्वपूर्ण उदाहरण   कोलकाता स्थित 'चिल्ड्रेन'स लिटिल थिएटर'  भी  है.
          बीसवीं शताब्दी के छठे दशक के बाद इस दिशा में और ज्यादा जागृति हुई. चिल्ड्रेन'स थिएटर की दुनिया में आज कई ऐसे  नाम हैं जिन्होंने हाशिये पर पड़े और विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए उपयुक्त रंगमंच तैयार किया और उनसे लगातार ऐसे नाटकों को अभिनीत कराया जो उनमें न केवल अभिनय कला की निहित संभावनाओं को विकसित कर सकें बल्कि बाल-रंगमंच के महत्त्व को एक अलग कलारूप की तरह स्थापित भी कर सकें. हालांकि, यह भी सच है कि यह काम देश में अभी तक अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका और इसके पीछे समर्पण, संसाधन, तथा जनजागृति की कमी जैसे अनेक कारण रहे हैं जो सर्व विदित हैं.

बैरी जॉन 

          बाल रंगमंच की इस विकास यात्रा में, 'थिएटर एक्शन ग्रुप' के बेरी जॉन, गुजराती अभिनेता प्रानसुख नायक, तमिलनाडु के वेलु श्राव्णन,एम् रामास्वामी,कर्णाटक के नीनासम, शालरंगा,  पश्चिम बंगाल के नन्दिकर,तथा ज़रीन चौधरी के अलाबा   रामगोपाल बजाज,कुछ और भी ऐसी प्रतिष्ठित नाम है जैसे -अनुपम खेर, रामगोपाल बजाज, (स्व.) रेखा जैन, देवेन्द्रराज अंकुर, अब्दुल लतीफ़ खटाना, युवराज शर्मा, राजेश तैलंग, अभिषेक गोस्वामी, राजू रॉय, आदि,

(स्व.) रेखा जैन 

जिनका योगदान अविस्मरणीय है, तथा जिन्होंने बच्चों के साथ अभिनय की अनेक कार्यशालाएं की  और आज भी इस क्षेत्र में लगातार नित-नए प्रयोग कर रहे हैं.
..... जारी ...

- रमेश तैलंग 

इनपुट सौजन्य -www.indianetzone.com/59/childrens_theatre_india.htm
चित्र सौजन्य-google.
-अगली कड़ी में पढ़िए : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की 'चिल्ड्रेन थिएटर में महत्वपूर पहल' और थिएटर इन एड्यूकेशन का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कार रंगटोली का इस दिशा में अप्रतिम योगदान.  





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