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Saturday, December 21, 2013

किताबें नहीं हैं तो यहाँ पढ़िए : कुछ नटखट शिशुगीत - रमेश तैलंग

बकरी


में..में..बकरी मटक-मटक.
चली तो रस्ता गई भटक .
ब..ब..बचाओ! गले से उसके..
बोली निकली अटक-अटक..

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घोडा

टिक-टिक-घोडा टिम्मक-टिम.
चलता डिम्मक-डिम्मक-डिम.
जिसने छोड़ी ज़रा लगाम.
धरती पर आ गिरा धडाम.

********



कबूतर

उड़ा कबूतर ऊपर-ऊपर
कित्ते ऊपर? इत्ते ऊपर!
नीचे कब तक आएगा?
उड़कर जब थक जाएगा!

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मुट्ठी

एक अँगूठा, उँगली चार
मिल जाएँ पंजा तैयार
पंजा बंद तो बन गई   मुठ्ठी
कर देगी अब सबकी छुट्टी.


- रमेश तैलंग  
+91 9211688748 

Tuesday, December 10, 2013

सुनो कहानी - मनोहर चमोली 'मनु' से



अगली बार जरूर आना

मनोहर चमोली ‘मनु’


अनुभव चिल्लाया-‘‘मम्मी! यहाँ आओ। देखो न, ये नई चिडि़या हमारे घर में घुस आई है। इसकी पूँछ दो मुँह वाली है।’’
अमिता दौड़कर आई। खुशी से बोली-‘‘अरे! ये तो अबाबील है। प्रवासी पक्षी। दूर देश से आई है। ये हमेशा यहाँ नहीं रहेगी। कुछ महीनों बाद ये वापिस अपने वतन चली जाएगी।’’
अनुभव सोचने लगा-‘‘इसका मतलब ये विदेशी चिडि़या है। भारत में घूमने आई है। मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूँगा।’’
अबाबील का जोड़ा मेहनती था। दोनों ने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने घर की बैठक वाले कमरे का एक कोना चुन लिया था। छत के तिकोने पर दोनों ने मिलकर घोंसला बना लिया।
अमिता ने अनुभव से कहा-‘‘अबाबील ने कितना सुंदर घोंसला बनाया है। अब हम इन्हें झुनका और झुनकी कहेंगे।’’
अनुभव ने पूछा-‘‘मम्मी। ये अपनी चोंच में क्या ला रहे हैं?’’

pic.credit: google

अमिता ने बताया-‘‘झुनकी अंडे देगी। घोंसला भीतर से नरम और गरम रहेगा। इसके लिए झुनका-झुनकी घास-फूस के तिनके, पंख और मुलायम रेशे ढूँढ-खोज कर ला रहे हैं।’’ यह कहकर अमिता रसोई में चली गई।
अनुभव ने मेज सरकाया। उस पर स्टूल रखा। स्टूल पर चढ़ कर अनुभव ने छतरी की नोक से झुनका-झुनकी का घोंसला तोड़ दिया। झुनका-झुनकी चिल्लाने लगीं। कमरे के चारों ओर मँडराने लगीं।
‘‘अनुभव। ये तुमने अच्छा नहीं किया। चलो हटो यहाँ से।’’ अमिता दौड़कर रसोई से आई और टूटा हुआ घोंसला देखकर अनुभव से बोली।
विदेशी चिडि़या की वजह से मुझे डाँट पड़ी है। अनुभव यही सोच रहा था।
शाम हुई तो अमिता ने अनुभव को चाय-नाश्ता देते हुए कहा-‘‘झुनका-झुनकी फिर से अपना घोंसला उसी जगह पर बना रहे हैं। घास-फूस और गीली मिट्टी चोंच में ला-लाकर वह अपना घोंसला बनाते हैं। तिनका-तिनका जोड़ते हैं। देखो। बेचारे दोबारा मेहनत कर रहे हैं। सिर्फ तुम्हारी वजह से। शुक्र है कि वे हमारा घर छोड़कर कहीं ओर नहीं गये।’’ यह सुनकर अनुभव चुप रहा। फिर मन ही मन में सोचने लगा-‘‘मैं झुनका-झुनकी को किसी भी सूरत में यहाँ नहीं रहने दूँगा। मैं इनका घोंसला बनने ही नहीं दूँगा।’’
झुनका-झुनकी ने बिना थके-रुके दो दिन की मशक्कत के बाद घोंसला तैयार कर लिया। अनुभव अपने दोस्त से गुलेल माँग कर ले आया। उसने गुलेल स्टोररूम में छिपा दी। झुनका-झुनकी दिन भर चहचहाते। फुर्र से उड़ते हुए बाहर निकलते। बैठक के दो-तीन चक्कर लगाते। फिर एक-एक कर घोंसले के अंदर घुस जाते।
एक दिन अमिता ने अनुभव को बताया-‘‘लगता है झुनकी ने अंडे दे दिये हैं। देखो। झुनका चोंच में कीड़े-मकोड़े पकड़ कर ला रहा है। कीट-पतंगे और केंचुए इनका प्रिय भोजन है। पंद्रह-बीस दिनों के बाद घोंसले से बच्चों की चीं-चीं की आवाजें सुनाई देने लगेंगी।’’
अनुभव सोचने लगा-‘‘मेरा निशाना पक्का है। बस एक बार गुलेल चलाने का मौका मिल जाए। मैं घोंसला अंडों समेत नीचे गिरा दूँगा।’’
फिर एक दिन घोंसले से बच्चों की चींचीं की आवाजें आने लगीं। अनुभव दौड़कर आया। घोंसले से आ रही आवाजों को सुनने लगा।
‘‘अब कुछ ही दिनों में बच्चे घोंसले से बाहर निकल आएँगे।’’ अमिता ने अनुभव से कहा। अनुभव मन ही मन बुदबुदाया-‘‘कुछ भी हो। आज रात को मैं घोंसला तोड़ कर ही दम लूँगा।’’
रात हुई। अनुभव चुपचाप उठा। स्टोररूम से गुलेल निकाल कर वह घोंसले के नजदीक जा पहुँचा। वह अभी निशाना साध ही रहा था कि झुनका-झुनकी चींचीं करते हुए अनुभव पर झपट पड़े। अनुभव के हाथ से गुलेल छिटक कर सोफे के पीछे जा गिरी। अनुभव उछलकर सोफे पर जा चढ़ा।
‘‘अनुभव बच कर रहना। देखो सोफे के सामने कितना बड़ा बिच्छू है।’’ अंकिता खटका सुनकर बैठक वाले कमरे में आ चुकी थी। दूसरे ही क्षण झुनका-झुनकी ने बिच्छू को चोंच मार-मार कर जख्मी कर दिया। झुनका बिच्छू को चोंच में उठा कर घोंसले में ले गया। अनुभव डर के मारे काँप रहा था।
अमिता ने कहा-‘‘ अनुभव तुम बाल-बाल बच गए। वह बिच्छू तो खतरनाक था। अब तक झुनका-झुनकी के बच्चे बिच्छू को अपना भोजन बना चुके होंगे। यदि बिच्छू कहीं छिप जाता तो बड़ी मुश्किल हो जाती।’’ अनुभव ने राहत की साँस ली।
दिन गुजरते गए। अनुभव स्कूल आते-जाते घोंसले पर नज़र जरूर डालता। अब वह बैठक वाले कमरे में ही पढ़ाई करता। एक शाम अमिता ने कहा-‘‘अनुभव। मैं बाजार जा रही हूँ।’’
अनुभव को इसी पल का इंतजार था। वह दौड़कर गुलेल ले आया। घोंसला निशाने पर था। इस बार उसका निशाना चूका नहीं। घोंसला भर-भराकर नीचे आ गिरा। ढेर में मिट्टी, पँख, घास-फूस के अलावा कुछ नहीं था। अमिता देर शाम घर लौटी और सीधे रसोई में खाना बनाने चली गई। खाना खाकर सब सो गए।
सुबह हुई। अमिता ने उठकर बैठक की सफाई की। अनुभव उठा तो वह डरता हुआ बैठक के कमरे में जा पहुँचा। अमिता ने कहा-‘‘अनुभव बेटा। झुनका-झुनकी का घोंसला न जाने कैसे टूट गया।’’
अनुभव ने कहा-‘‘ मम्मी लगता है कि वे अपने बच्चों समेत अपने देश वापिस लौट गए।’’
अमिता उदास हो गई। अनुभव से बोली-‘‘हाँ। लेकिन मुझे इस बात का दुख है कि तुम झुनका-झुनकी के बच्चों को देख नहीं पाए। तुम्हारे स्कूल जाने के बाद और तुम्हारे स्कूल आने से पहले वे सब बैठक में यहाँ-वहाँ खूब उड़ते थे। कई बार रसोई में भी आ जाते थे। लेकिन जब भी तुम घर में होते, तो वे बच्चे घोंसले में ही रहते। पता नहीं क्यों? लगता है वे तुमसे बेकार में डरते ही रहे।’’
यह सुनकर अनुभव को हैरानी हुई। कुछ ही देर में उसे महसूस होने लगा कि घर सूना-सूना सा लग रहा है। वह मुस्कराया और मन ही मन कहने लगा-‘‘साॅरी झुनका-झुनकी। अगली बार फिर आना और हमारे घर ही आना। मैं इंतजार करुँगा।’’
अनुभव चुपचाप स्टोररूम में गया। गुलेल एक कोने में पड़ी थी।
‘‘ये सब इस गुलेल की वजह से हुआ है।’’ यह सोचते हुए अनुभव ने गुलेल उठाई और उसे दोस्त को वापिस करने के लिए घर से निकल पड़ा।